"बृहन्मुंबई
म्यूनिसिपल कार्पोरेशन"
बृहन्मुंबई के महान कर्मचारियों तुम्हारे वैधानिक कर्तव्यों मे मुंबई की आवासीय
व्यवस्था, प्रकाश व्यवस्था,
जल-मल निकासी व्यवस्था,
सफाई एवं स्वस्थ व्यवस्था सहित मुंबई के
समस्त नागरिकों के जीवन को सरल, आसान और सुविधा
जनक बनाने की महति ज़िम्मेदारी तुम्हारे कंधों पर थी। तुम्हारे आचरण और व्यवहार से
ये अपेक्षा और आशा भी थी कि निष्पक्ष और विना भेदभाव के आप मुंबई के सभी नागरिकों
से बगैर किसी राग द्वेष के विधि सम्मत आचरण और व्यवहार करेंगे। लेकिन अपने क्लैव्यता और पौरुषहीन आश्रय
दाताओं की "चापलूस सूची" मे स्थान
पाने की तुम्हारी तीव्र लालसा और एक महिला के घरौंदे को त्वरित गति से
"उखाड़ने" की आकांक्षा ने अपने आपको जन सेवक की सूची से विलग "दरबारी
सेवकों" की "भाड़" सूची मे शामिल होने मे सफलता हांसिल कर ली।
बृहन्मुंबई नगर निगम ने देश तो छोड़िये
दुनियाँ की शायद ही कोई ऐसी म्यूनिसिपल कार्पोरेशन हो जिसने अखिल ब्रहमाण्ड
नायक सुकुमार की निज आत्मतुष्ट अहंकार और ईक्षा
पूर्ति ने बिजली से भी तेज, त्वरित
कार्यवाही कर एक अबला के घर को धूल धूसरित
करने की कुचेष्टाओं को अंजाम दिया। क्या ये बिना रीढ़ वाले अधिकारी शपथ पूर्वक कह
सकते है कि मुंबई मे अब एक भी अनधिकृत घर नहीं?
क्या मुंबई मे दुनियाँ के सबसे बड़े डॉन दाऊद
के घर सहित सभी आवासों के निर्माण भी
बृहनमुंबई म्यूनिसिपल कार्पोरेशन द्वारा स्वीकृत मानचित्र के अनुसार है?
जो तेजी और तत्परता इस महिला के घर को
रौंदने मे बीएमसी के नीति नियंताओं ने की,
क्या हाइ कोर्ट के आदेशों के बाबजूद इस तत्परता का एकांश प्रयास भी भिंडी बाजार स्थित मुंबई के डॉन दाऊद के अवैध
मकान को गिराने मे बीएमसी अधिकारियों ने किये?
कदापि नहीं! बिल्कुल नहीं! क्योंकि बृहन्मुंबई के ये चाटुकार अधिकारी जानते थे कि
एक साधारण औरत के विरुद्ध ये अपनी मर्दानगी बुलडोजर चला कर दिखा सकते है क्योंकि उनके
राजनैतिक आकाओं का बरदहस्त उनके सर पर है। लेकिन यही वीरोचित कार्य,
बहदुरी, मर्दानगी
कर्तव्यपरायणता मुंबई के डॉन के घर को बुलडोजर से
नेस्तनाबूद करने की कार्यवाही तो दूर इस कार्यवाही की एक झूठ-मूठ झलक,
नाटक-नौटंकी या प्रयास भी इन अधिकारियों ने किये होते तो उनकी
पेंट के आगे गीले द्रव्य के दर्शन और पेंट
के पीछे ठोस कम्पोस्ट खाद रूपी प्राकृतिक पदार्थ की झलक स्पष्ट दिखलाई देने
लगती।
"उखाड़ दिया" जैसे वीरोचित कार्य
करने बाले "सामना" के संपादक महोदय,
एक महिला के घर को इस तरह तोड़ आपने जो घिनौनी कायरतापूर्ण कार्यवाही का चित्रण अपने
सामना पत्र मे सुर्खियों मे छाप कर खुद ही
अपनी वाहवाही कर अपनी पीठ ठोक कर मंत्रमुग्ध होने का जो ये अधम कृत किया है, हे! पापायु: पुरुष
आपके इस तथाकथित वीरोचित दुष्कृत को आपके अपने
आदर्श देवलोक वासी स्वर्गीय श्री की मृतात्मा
ही नहीं अपितु समान्यतः देश का सारा
जनमानस और विशेषतः सारी "नारी जाति"
इस अपमान से शर्मसार महसूस कर रही है।
अपने आपको हिन्दू हृदय सम्राट का अनुयाई बताने वाले छद्म सनातन पुरुष जिस देश मे वेदों
की ऋचाओं की ये आवाज "यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता:" सारे
वातावरण मे गुंजायमान होती हो वहाँ तुम्हारे इस कुकृत ने महाभारत मे द्रोपदी के
चीर हरण की उस निंदनीय घटना को पुनः स्मरण करा दिया। दुर्भाग्य तो ये है राज सत्ता
की महाराष्ट्र सरकार जिसका कर्तव्य था कि प्रदेश की जनता को बिना भेदभाव सेवा और सुरक्षा प्रदान करती। परंतु
स्वयं ही अपने दल के क्षत्रपों और नौकर शाहों को महाभारत के पितामह भीष्म की तरह
सत्ता के अनाचार और अत्याचार की अनदेखी कर मौन रही? वे
बृहनमुंबई की सत्ता के सरकारी नौकरों और
जनसेवकों के कुटिल गठजोड़ से उपजी वैधानिक शक्ति का दुर्पयोग ठीक उसी तरह कर रहे है
जैसे महाभारत काल मे कभी दुर्योधन के कुकर्मों
की अनदेखी ध्रटराष्ट्र और पितामह भीष्म ने की थी। वे उन पौराणिक घटना क्रम को विस्मृत कर रहे है जिसमे बृहनमुंबई
कार्पोरेशन राजनैतिक नेताओं और नौकरशाहों के भ्रष्ट और पक्षपाती रवैये को संरक्षित और पोषित कर भस्मासुर रूपी दैत्याकार को रूप देने मे लगे
है जो कालांतर मे उनके पतन का हेतु बनेगा।
बृहन्मुंबई म्यूनिसिपल कार्पोरेशन के जिन निरंकुश नौकर शाहों ने अपने कुटिल आकाओं के
संरक्षत्व मे एक नारी जिसकी कोई बहुत बड़ी
पारवारिक पृष्ठभूमि दिखाई नहीं देती। जिसके माता-पिता, भाई बहिन रूपी-रिश्ते इस संघर्ष रूपी घटना क्रम मे कहीं दूर दूर तक सुनाई और दिखाई नहीं देते। क्या सामान्य भारतीय
परिवारों की कोई महिला बगैर किसी पारवारिक सदस्यों के साथ या सहयोग के आकंठ
भ्रष्टाचार, अनाचार और दुर्विचार रूपी कदाचार मे डूबे फिल्म
उद्धयोग मे पूर्व से ही स्थापित परिवार बाद या
भाई-भतीजाबाद से लड़ सकती है? इसकी कल्पना भी मुश्किल
है। कौरवों के कुटिल सेना नायकों ने जिस तरह अधोपतन सोच के बशीभूत चक्रव्यूह की रचना कर वीर अभिमन्यु को जयद्रथ
सहित कौरवों के सेनापतियों ने घेर कर नीति विरुद्ध शास्त्रीय युद्ध के नियमों की
अवहेलना कर षड्यंत्र पूर्वक मारा था ऐसे ही कुछ साजिशें बृहन मुंबई के अधिकारियों
की साँठ-गांठ से इन कुटिल राजनैतिक सेना नायकों ने एक अकेली नारी के विरुद्ध साम-दाम-दंड-भेद की शास्त्र विरुद्ध नीतियों का कपट पूर्ण उपयोग कर किया जा रहा है। इस पुरुष प्रधान एवं व्यक्ति
वर्चस्व रूपी समाजिक युद्ध मे जैसे वीर अभिमन्यु ने कौरव पक्ष के सेनानायकों की वीरोचित अभिमान को
परास्त कर व्यूह भेदन कर उनको छट्टी का
दूध याद दिला दिया था बैसे ही कुछ उस अकेली वीरांगना ने आज बीएमसी सहित मुंबई के राजनैतिक
खलनायकों को कर दिखाया है।
तुम्हारे दल के अखिल भारतीय प्रमुख से लेकर गली मुहल्ले के छुटभैये
तथाकथित शेरों तक ने अपने सारे तीर-कमान, अशस्त्र-शस्त्र, भाले-बरछे रूपी सारी ताकत एक इकलौती "शस्त्र विहीन" महिला को परास्त
करने मे झौंक दी। अपनी आत्म प्रशंसा के पुल बाँध "अपने मुंह मियाँ मिट्ठू"
बनने बाले आपके मुख पत्र "सामना" मे एक महिला के विरुद्ध "उखाड़ दिया"
जैसे निर्लज्ज शब्दों का पत्र के मुख्य पृष्ठ पर उल्लेख करके आप अपनी कौन सी सांस्कृति और सभ्यता से देश को अवगत कराना चाहते
है? इस कायरता पूर्ण फूहड़ प्रदर्शन करके आपने कौन से पाराक्रम और विरोचित कार्य किया? आपके पूरे राजनैतिक परिवार की ये
हताशा, निराशा, निरंकुशता, ये प्रदर्शित कर रही है कि ये आपकी एक नारी के विरुद्ध हार है, पराजय है, शिकस्त है और हाँ पराभूत भी। जिसे आज सारा
देश बड़ी स्पष्टता से देख रहा है।
लेकिन वर्तमान शासकों और उनके सिपहसालार को एक बात अच्छी तरह
याद रखना चाहिए कि इतिहास के स्वर्णाक्षरों मे नाम उन्ही वीरोचित वीर योद्धाओं और
बलिदानियों के लिखे जाते है जिन्होंने अपने प्राणों की आहुति हमेशा नीति परक, शास्त्र विहित पथ पर चल देश के लिये की। कदाचित ही कायरों, धोखेबाज़ों, कुटिल षड्यंत्रकारियों के नाम कहीं इतिहास के पन्नों मे दिखाई देता है? हाँ, जयचंद और मीर जाफ़रों के नाम को दुनियाँ सदा ही
हिकारत की दृष्टि से देखती और धिक्कारती है।
विजय सहगल



6 टिप्पणियां:
बिल्कुल सही, स्पष्ट एवं साहसी लेख।
सहगल साहब, नमस्ते🙏🏻
आपका लेखनी तो वो लिख दिया,जो सिर्फ प्रशंसनीय ही नहीं, पर दिल से "वाह!" "अभूतपूर्व!" "अद्वितीय!" जैसा शब्दों को जन्म देने वाली है!!
ऐसा लेख पढ़कर मैं तो उल्लासित हो गया! दिल और दिमाग में एक प्रसन्नता जा गया!
आप, पढ़ने वालों को अविभूत कर दिए। 🥰
आपको नमन करता हूं।
सटीक विशेषणों एवं संदर्भो से युक्त प्रवाह पूर्ण भाषा शैली मे बिल्कुल सही, स्पष्ट एवं साहसी लेख हेतु आप प्रशंसा के पात्र हैं sir...🙏🙏 व्हाटऐप्स पर
+91 81309 10666 की टिप्पड़ी
आपकी लेखन क्षमता से हम सभी परिचित हैं और इस लेख में मौलिक अधिकारों द्वारा एक लेखक ने बड़ी बेबाकी से विवेचना की है...सहगल भाई पुनः बधाई...👏🏽
+91 98291 25225 की टिप्पड़ी
सहगल साहब, नमस्ते 🙏🏻
आप मेरा अनुरोध स्वीकार कर जो लिखें हैं, वो तो मेरा उम्मीद से भी बहुत अच्छा है!!
आपको धन्यवाद। 😊
मैं आपका इस blog को मेरे contacts में forward करना चाहता हूं। क्या आपका अनुमति मिलेगा?
आप अनुमति देंगे तो ही forward करूंगा।
शंकर भट्टाचार्य की टिप्पड़ी
आदरणीय सहगल जी,
आपने झांसी के जावांज सैनिक की तरह अन्याय के खिलाफ एक जबर्दस्त आक्रोश व्यक्त किया।
बहुत बहुत साधुबाद।
🙏राजेन्द्र जी की तिपडी व्हाट्सएप पर
Totally agree with your views Sahgal Ji. Ab toh bachha bachha samaj raha hai ki nirlajj, kayar evam darpok kaun hai . Ek mahila ( aam nagrik) ki aawaz ko dabane ke liye poore sarkari tantra ne apni saari shakti jhonk di. Vastav mein Swatantra Bharat ke itihas mein ise kale din ke roop mein hi yaad rakha jayega.👍👍
रमन चद्रशेखर न व्हाट्सएप पर
Splendid Sahgal saheb your writing skill is marvelous.Great article.
S N pandey व्हाट्सएप पर
Apki lekhni me dam hai sir🙏🙏
विनोद अग्रवाल व्हाट्सएप
सहगल साहब
बहुत सुंदर और सटीक लेखन। आपने महाराष्ट्र के गुंडाराज के कुकृत्यों को साकार कर दिया ।
अत्यंत निर्भीक व सटीक विश्लेषण ।
आपकी लेखनी द्वारा स्पष्ट एवम् वेवाक टिप्पणी पढ़ने लायक है। आपने गज़ब का लिखा है। आजकल इतना मुखर लिखने का साहस किसी में नहीं है। कंगना तुम देश का गौरव हो। सारा देश तुम्हारे साथ है। तुम पर्दे पर ही नहीं सचमुच में मणिकर्णिका हो।
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