शुक्रवार, 8 मई 2020

माँ के नाम पत्र ("मदर्स डे")


माँ  के नाम पत्र ("मदर्स डे")





आदरणीय अम्मा,                                नोएडा 
चरण स्पर्श                                             दिनांक 08.05.2020

माँ, अत्र कुशलं तत्रास्तु। आज फ़ैमिली व्हाट्सप्प ग्रुप मे छवि (मेरी भतीजी) से पता चला कि आज "मातृ दिवस" है। ग्रुप के सदस्यों मे इसके आज होने पर मत भिन्नता थी। कुछ लोगो की राय मे "मदर्स डे" 10 मई को है पर मुझे अच्छा लगा कि उसने कहा मेरे लिये तो आज ही "मदर्स डे" है (जिद्दी है न)। मैंने उसका पक्ष लेते हुए लिखा कि "हाँ दुनियाँ के इस रिवाज़ से हट कर मेरे लिये तो हर दिन ही "मातृ दिवस" है। अतः आज इन नयी पीढ़ी के बच्चों के साथ मै भी माँ आज तुम्हें चरण वंदन करता हूँ। आशा है आप कुशल पूर्वक होंगी।

आज कल सारे देश मे चल रहे लॉक डाउन के चलते तुम्हारी बड़ी याद आ रही है "माँ"। पिछले दिनों  जब तालाबंदी की घोषणा के पूर्व जब हमने रीता और बच्चों को राशन लेने की भागम भाग देखी  तो तुम्हारी बहुत याद आई। माँ, बचपन मे मैंने हर साल देखा, तुम कैसे पूरे साल का मुख्य-मुख्य राशन जैसे गेहूं, चावल, दाल, मसाले, चिप्स, पापड़, बड़ी, सिमई, आम, नीबू मिर्च का अचार का स्टॉक करके रख लेती थी ताकि कभी किसी आपात स्थिति मे कहीं  कुछ मिले न मिले पर  दाल रोटी की पूरे साल कोई  कमी न होती। मई-जून मे गर्मियों की वे छुट्टियाँ याद है न माँ जब घर की पौर मे चाचा ताऊ के सभी बच्चे जहां हम सभी ताश मे सीप, कोट-पीस या छकड़ी खेलते, इमली के चिए को तोड़ कर जमीन मे खड़िया से लाइन खींच कर चंदा पऊआ खेलते तो तुम प्रेमा, मीरा बहिन जी, लीला बुआ के साथ कभी गेहूं बीनती या आम के अचार के लिए 30-40 किलो कच्चे आम को काटना धोना और मसाले मिला कर चीनी के बड़े-बड़े मर्तमान मे भर कर पूरे साल का स्टॉक कर लेती थी जिसमे और छोटी बहिनों दमयंती और नीलम के तुम्हारी सहायता करती थी।

मुझे याद है अम्मा जब हम भाई गर्मियों की छुट्टी मे पतंग उड़ाते थे और एक बार धागे से भरी चरखी टूट गई थी और सारा धागा बुरी तरह उलझ गया था। मै बड़ा निराश था कि धागे रूपी उस उलझी गुत्थी को दुबारा से खरीदना बड़ा मुश्किल होगा, कैसे फिर पतंग उड़ायेंगे?  पर तुमने बड़े जतन से मेरी  उलझन को न केवल दूर किया अपितु पूरे धागे मे एक दो गांठों के सिवाय धागे का पूरा गोला बना कर बापस किया था, जिसे पाकर फिर से  पतंग उढ़ाने की उस खुशी को मै आज भी नहीं भूला। तुमने ऐसे ही हम भाई बहिनों की ज़िंदगी मे आई अनेकों परेशानियों, कठिनाइयों और उलझनों को उस उलझी धागे की गुत्थी की तरह सुलझा कर सभी का रास्ता आसान किया। 

अम्मा तुम्हें तो याद होगा ही जब बरहवीं क्लास की परीक्षा थी। हम दोनों भाई एक ही क्लास मे थे और  भौतिक विज्ञान की परीक्षा थी और कॉलेज लाइब्रेरी से जारी, पढ़ने की मात्र एक  किताब थी। परीक्षा के समय एक मिनिट के लिये भी किताब से दूर होना बहुत  मुश्किल था जिस पर हम दोनों भाइयों  का झगड़ा भी हुआ था पर उस दिन इस विकट  समस्या को भी तुमने कितनी आसानी से चुटकियों मे  किताब की वाइंडिंग को सफाई से खोल कर उसे दो भागों मे अलग अलग कर किया था और परीक्षा के बाद उतनी ही सफाई से उसे दुबारा सिलाई कर धागे से  जोड़ दिया था। यहाँ तक कि किताब की बापसी मे लाइब्रेरी मे जमा करने पर लाइब्रेरियन भी किताब की उस टूट फूट को नहीं पहचान सका था। 

आस पड़ौस के बच्चों से कभी पतंग पर कभी बगल के खंडहर मे लगे बेरी के बेर तोड़ने पर, क्रिकेट खेलने पर बच्चों से  मेरा झगड़ा होता, बच्चों के, माताओं के उलाहने आते पर तुम जानती थी कि बच्चे तो आपस मे झगड़ते ही रहते है। तुमने भले ही  डांट दिया हो  पर शायद ही कोई ऐसा  पल हो जब तुमने हमे पीट कर उन बच्चों के सामने मुझे हीन  भावना का बोध कराया  हो।
घर मे पापा जब भी कोई फल जैसे आम, केले, मिठाई आदि सभी भाई बहिनों के हिसाब से गिनती कर लाते और जब कम पड़ने पर पूंछ परख होती तो तुम्हें मालूम रहता की चोरी किसने की है। बात जब गंभीर हो जाती तो चोरी कर छुपाये फल या मिठाई मै बापस कर देता लेकिन जब देखा मामला रफा दफा हो गया या कही कोई हल्ला गुल्ला नहीं मचा  तो "माले मुफ्त दिले बेरहम" सोच मै उड़ा जाता। पर आज मै जब कभी सोचता हूँ कि रफा-दफा हुए मामले की बो  फल या मिठाइयाँ जो मैंने चोरी से खाई थी बो तेरे हिस्से की होती थीं।  आज जब कभी बचपन की उन बातों को सोचता हूँ तो अपने आपसे  बहुत दु:खी  और  आत्मग्लानि से ग्रसित हो  जाता हूँ।  तुमने जानबूझ कर अपने हिस्से की न केवल फल मिठाइयाँ ही बचपन मे चोरी से  मुझे खाने दी  बल्कि अपने दुःख और तकलीफ़ों को छुपा कर अपने हिस्से  की सारी खुशियाँ भी मेरे नाम कर देती  थी।

अम्मा मुझे अच्छी तरह से याद है जब घर खर्च मे से जो कुछ रुपए-दो रूपये की चिल्लर बचा कर तुम कभी दाल के डिब्बे मे, कभी चावल के डिब्बे  या मसालदानी मे छुपा कर रख देती, उस चिल्लर मे से प्रायः 4-5 पैसे मै उठा लेता था और शाम को घर के पास के  मैदान मे बैठे चाट बाले ठेलों से पानी के गोल गप्पे खाता था। यदि पड़ौस के किसी बच्चे या भाई बहिन ने गोल गप्पे पीते देख लिया तो चोरी पकड़ी जाती। इस चोरी मे  थोड़ी बहुत डांट-फटकार के बाद अंततः अपरोक्ष रूप से मौन स्वीकृति स्वरूप घर मे मेरी चोरी की लिमिट पाँच पैसे निश्चित हो चुकी थी अर्थात पाँच पैसे चोरी करने पर थोड़ी डांट डपट तो निश्चित होती पर कभी पिटाई आदि की नौबत न आती। इस चोरी की तय लिमिट का उल्लंघन बचपन से लेकर होश सम्हालने तक  मैंने कभी नहीं किया। पर एक दिन तो बड़ा धर्मसंकट उत्पन्न हो गया और मैंने पूरी ईमानदारी से चोरी की तय सीमा के अंदर चोरी कर आदर्श उदाहरण प्रस्तुत किया। अब तक तो यहाँ वहाँ रखी चिल्लर मे से हम दो तीन या पाँच पैसे उठा लेता था, कभी पकड़ा और कभी न पकड़ा  जाता। पर एक दिन रसोई मे छान बीन करने पर दो रूपये का नोट मिला। अब तो मेरी हिम्मत जबाब दे गई।  उस नोट को हाथ लगाने की भी मै सोच नहीं पा रहा था पर रह रह कर गोल गप्पे खाने की चाह मुझे कुछ रास्ता निकालने की युक्ति के बारे मे प्रेरित कर रही थी। हमारे पाँच पैसे के उसूल और गोल गप्पे खाने की तीव्र  ईक्षा के बीच बड़ी कश्मकश थी। यहाँ वहाँ घूमता रहा और आखिर उसूल और ईक्षा के बीच का  संतुलन कायम रख मैंने बीच का  रास्ता निकाल ही लिया था। हुआ ये था कि गोल गप्पे खाने की लालसा ने मुझे दो रूपये उठाने पर तो मजबूर कर दिया पर  पाँच पैसे के गोलगप्पे खा कर बाकी के एक रूपये पिंचानवे पैसे मैंने यथा स्थान रख दिये।  शाम के समय जब सभी भाई बहन अम्मा पापा खाने पर बैठे तो माँ ने रसोई मे दो रूपये का नोट न पाकर बड़ी हैरानी जताते हुए कहा कि आज तो चोर ने बड़ी ईमानदारी का परिचय दिया और दो रूपये के नोट की जगह एक रूपये पिंचानवे पैसे रख मात्र पाँच पैसे की ही चोरी की!! इस तरह सभी के हँसते चेहरों के  सामने एक बार फिर  मेरी चोरी पकड़ी गई।

चोरी के पाँच पैसे की तय सीमा तो नौकरी मे आने के बहुत पहले ही कब जीरो से अनंत या यूं कहे अनंत से जीरो हो गई थी  पर  होली, दिवाली, संक्रांति, गणेश चौथ  पर बने गुजिया, लड्डू और पकवान को रसोई मे छुछाने (ढूढ्ने) और खाने  की आदत आज भी बदस्तूर जारी है। आज भी जब तब मै  रसोई मे अपने हाथ से खाने पीने की चीजें न उठाऊ तो लगता ही नहीं कि मै अपने घर मे हूँ।  अम्मा बचपन मे तो तुमने मुझे कभी भी रसोई मे इस छुछाने की आदत पर रोका-राकी, टोका-टाकी नहीं की  पर रीता (श्रीमती जी) आज भी रसोई मे मेरी इस  छुछाने की आदत को रोकने का निरर्थक प्रयास करती है देखो कहाँ तक सफल रहती है?  

माँ तुमने और पापा ने न जाने कितनी रातें हम भाई बहिनों के सुख और सुखद भविष्य की  खातिर कुर्बान कर दी। सालों तक पापा की रेल्वे मे गार्ड की नौकरी के रहते उनका रात-विरात ड्यूटि पर जाना होता। एक ओर जहां पापा अपनी ड्यूटि के निर्वहन सारी सारी रात जागकर करते वही दूसरी ओर तुम  उन को समय-असमय चाय और खाना बनाकर अपनी नींद का होम करती। माँ, लखनऊ मे नौकरी की शुरुआत करने के कुछ साल बाद ही तुम्हारे कंधों का कुछ बोझ हल्का करने, घर की याद और घर मे आर्थिक सहयोग की खातिर मैंने अपना स्थानांतरण लखनऊ से ग्वालियर कराया था।  पर मुझे क्या मालूम था कि झाँसी-ग्वालियर डेलि अप डाउन करने की बजह से तू अब पापा के अलावा मेरी खातिर भी अपनी रातों की नींद खराब करेगी।

मुझे याद है माँ जब मै ग्वालियर जाने के लिये सुबह 6.00-6.30 बजे निकलता था तब तुम मेरे लंच बॉक्स के लिये सम्पूर्ण भोजन सुबह 4.00-4.30 बजे उठ कर बनाने लग जाती थी। सम्पूर्ण भोजन से तात्पर्य ऐसे कच्चे भोजन से था  जो प्रायः छुट्टी या तीज त्योहार बाले दिन बनता था और जिसके बनने मे प्रायः कुछ अतरिक्त समय लगता जैसे- मंगोड़ी/पकौड़ी की कढ़ी, मुनगा की कौंसे की कढ़ी, बल्लै, मीढ़ा, दलभाजिया, पीठाफरा आदि। चार साल मे  एक भी दिन ऐसा नहीं हुआ जब तुमने कामचलताऊ तरीके से खाली रोटी सब्जी बनायी हो या बीमारी-हारी मे खाना बाज़ार मे खा लेने को कहा हो। ऐसा कोई दिन न होता जब तू मेरे खाने मे दाल सब्जी रोटी सलाद न रखती हो। खाने मे प्रायः हर रोज मिठाई रखने की बजह से हमारे डेलि पैसेंजर साथी तो ये कहने लगे थे कि तुम्हारा कोई मंदिर बगैराह है? जो तुम रोज चढ़ावे का प्रसाद/मिठाई ले के आते हो? मीढ़ा, कढ़ी, दलभजिया (पालक दाल), छोले जैसे विशेष भोजन भी हमारे लंच बॉक्स के अंग होते थे, इनके बनने मे कोई ऐसी विशेषता न थी पर विशेष होता था इन का समय  जो तुम सुबह छः बजे के पहले बना कर हमारे लंच बॉक्स के लिये तैयार कर लेती थी। माँ, एक बार ग्वालियर बैंक पहुँच  कर जब मै खाना खाने बैठा तो दाल मे नमक बिल्कुल भी न था शायद तुम दाल मे नमक डालना भूल गई थी। कड़ाके की भूख मे जब मैंने खाना शुरू किया तो दाल मे नमक न पाकर मै मन ही मन बहुत क्रोधित हुआ था। पर अगले ही पल जब मैंने खुद से सवाल किया, कहाँ ग्वालियर आकर मै तुम्हारा बोझ हल्का करने की सोच रहा था और कहाँ तुझे रोज सुबह चार बजे उठा कर चूल्हे चौके मे झोक खुद ही तेरे लिये एक बोझ बन गया? उस दिन अम्मा मै बड़ी देर तक अपनी कुंठित सोच पर मुझे बहुत अफ़सोस हुआ था और अपनी इस ओछी सोच पर हीन भावना से ग्रसित हो आत्मग्लानि से भरा रहा। मै रह रह कर अपने आप को धिक्कारता रहा कि मै कितना कृतघ्न हूँ "तूँ रोज मेरे लिये सुबह चार बजे से उठ गरम गरम ताज़ा खाना बनाती है और एक मै तंग दिल, "एक दिन दाल मे नमक न होने पर तुझ पर क्रोध किया"?  मै चाहता तो बैंक के बाहर बैठे गोपाल चाय बाले से नमक ले सकता था पर प्रयाश्चित के रूप मे मैंने उस दिन भोजन बगैर नमक की दाल के साथ ही खाया  और निश्चय किया कि भोजन मे अब से किसी भी कमी के लिये आज के बाद कभी कोई शिकायत तुमसे या  परिवार से  नहीं करूंगा। मैंने इस बात का आगे भी आज तक खाने मे किसी भी कमी पर कोई शिकायत न करने के बचन का पालन ईमानदारी से किया और अब भी  कर रहा हूँ।

मध्यम वर्गीय बड़े परिवार मे जहाँ एक कमाने बाला हो और कई  खाने बाले हों, माँ तुम्हारा घर का कुशल प्रबंधन हमेशा सराहनीय रहा। समाज मे परिवार की मान प्रतिष्ठा कायम रख और घर के संचालन के मध्य संतुलन बनाये रखने के तुम्हारे प्रयास हमेशा अतुलनीय थे। इस संतुलन को साधने मे माँ तूने अपनी पूरी ज़िंदगी खपा दी। पापा की तन्खा  रूपी सीमित आय के बीच खर्चों का संतुलन बनाना अकल्पनीय होता था। आज के हालात से तुलना पर कभी जब सोचता हूँ कि कैसे तुमने उन कठिन परिस्थितियों के बीच हम  सभी भाई बहिनों को पढ़ा लिखा कर अपने पैरों पर खड़े होने योग्य और हालातों से सामना करना सिखाया। तुम अपनी कुशल नीति के तहत कब आटे की रोटी से  पूड़ी पराठे के आयोजन तक और कब चावल से  खिचड़ी और पुलाव के व्यंजनों पर  आ जाती और कैसे बेसन के नमकीन और मीठे  चीले की पार्टी करा   परिवार मे सभी भाई बहिनों को खुश कर देती और कब अखबार की रद्दी को बेच कर  घर की समस्या का ध्यान दूसरी ओर मोढ़ देती कि परिवार मे किसी को कानों कान खबर न लगती। जब कभी आज उन परिस्थितियों को सोचता हूँ तो उस समय की तुम्हारी हिम्मत, साहस और उत्साह के सामने मै नत  मस्तक हो जाता हूँ।           
अम्मा, आज की लड़कियों और महिलाओं मे सोने के गहने और आभूषण का लोभ और मोह  किसी भी उम्र मे देखने को मिलता। कैसे बे इन गहनों और आभूषणो के लिये जीवन पर्यन्त लालायित रहती  पर मैंने तुझे कभी इन गहनों की लालसा लिये आसक्ति और उत्सुकता नहीं देखी। दीपावली या अन्य त्योहारों पर हम सब जहां एक ओर नये कपड़ो कि जिद करते पर  मैंने तुम्हें कभी भी नई साड़ी या गहनों की मांग करते नहीं देखा।  मुझे याद है कुछ साल पूर्व किसी त्योहार पर परिवार के सभी सदस्य झाँसी स्थित घर मे एकत्रित थे तब तुमने अचानक अपनी  माँ और सास से मिले सोने चाँदी के गहनों की पोटली को सबके बीच लाकर रख दिया था। सभी अचानक से इन गहनों को देख चौंक कर तुम्हारी ओर देख कर कहने लगे थे ये किस लिये लेकर तुम आई? तुमने बड़े अनिर्लिप्त भाव से जेवरों को रख कहा था आज तुम सभी जब यहाँ एक साथ हो तो ये मेरी कुल जमा पूंजी जो मुझे मेरी माँ और सास से मेरी शादी पर मिली थी  तुम सभी आपस मे बाँट लो, मै नहीं चाहती कि उम्र की इस दहलीज़ पर  मेरी मृत्यु के बाद तुम लोगो मे इनको लेकर कोई आपसी मनमुटाव या वैर हो। मेरी ज़िंदगी के बहुत भावुकतापूर्ण पल थे उस दिन। शालीनता पूर्वक हम सबके लाख मना करने के बाबजूद तुम अपने कहे पर अड़ी रही और विना किसी अपने हस्तक्षेप के गहनों के बंटबारे सर्व सहमति से करा कर ही मानी। अपनी माँ और सास से मिले आभूषणो के प्रति इतना अनासक्त भाव माँ मैंने कभी किसी दूसरी महिला मे नहीं देखा। आज जहां माँ-बाप की संपत्ति के लिये घरों मे झगड़ा फसाद देखता हूँ तो  माँ तेरी  ये सोच ही तुझे औरों से कितना अलग रखते है!!

अम्मा आज मुझे बचपन की उस घटना के लिये बेहद  भी अफसोस हो रहा है जब आप गोदी मे छोटे भाई को लिये तुम लीला बुआ और मीरा बहिन जी के साथ मिनर्वा टॉकीज मे कोई पिक्चर देखने जा रही थी। मै भी जिद करते हुए आपके साथ फिल्म देखने जाना चाह रहा था। जिद्दी स्वभाव के कारण मै पीछा करते और पत्थर फेंकते टॉकीज तक तुम्हारे पीछे पीछे गया था। लीला बुआ और मीरा बहिन जी आपके हम उम्र तो नहीं थी पर रिश्तों से कहीं ज्यादा वे  आपकी सहेलियों की तरह थी। होश सम्हालने की उम्र की उस दहलीज़ पर  पहुँचने पर हमने  मनोरंजन के लिये उस समय फिल्म देखने के आकर्षण को जब अनुभव किया तो 7-8 साल की उम्र मे उस समय आपके फिल्म देखने जाने पर की गई उस उद्दंडता को महसूस किया था। अम्मा मै कितना बेअक्ल था कि उन दिनों, दिन भर रोटी बनाने, घर की साफ सफाई, सड़क से पानी भरने चौका वर्तन से महीनों मे कभी कभार ही फ्री हो  बहिन और बुआ का एक दूसरे के साथ मिल जाने पर ही तुम सभी ने फिल्म देखने का प्रोग्राम बनाया होगा। उन दिनों चल चित्र ही मात्र  मनोरंजन का एक बहुत बड़ा माध्यम हुआ करता था। माँ, सालों पूर्व उस दिन की बो घटना मुझे जब तब धिक्कारती है। मै कितना कायर और डरपोक रहा आज बासठ साल की उम्र होकर भी मैंने अपने उस कृत के लिये तुम से आज तक माफी नहीं मांगी? माँ उस दिन से अनेकों बार मैंने कोशिश की, न जाने कितने बार अपनी उस गलती पर मै रातों मे अनेकों बार आँखों मे आँसू लिये  सिसका हूँ, पर माफी मांगने की हिम्मत आज तक न कर सका। मै जानता हूँ मै कुछ भी माँगूँ तूँ मुझे  कभी मना नहीं करेगी पर आज मै तुम से माफी मांग कर उस एक बहुत बड़े बोझ से हल्का होना चाहता हूँ आशा है तुम  मुझे माफ कर दोगी।

तुम्हारा बेटा,

विजय  
                                       

1 टिप्पणी:

विजय सहगल ने कहा…

1. By Charanjiv chawla- अती सुन्दर।
2. Very Touching, माँ ऐसी ही होती है by unknown
3. भावनाओ का अप्रतिम चित्रण।👌👏🙏-by D.K. MEHROTRA
4. You write very well vijay sehgal. 👍 BY ASHOK AGARWAL (ALL ON WHATSAP GROUP OBC'N BELLA VISTA.
5. अति सुन्दर माँ तुझे सलाम 🙏🙏🌹🌹BY ASHA TANDON
6. bhut hi sundar patr, bhai, Masi MAA aap dono mera adar sahit naman🙏🙏😪 BY UMA TANDON
7. Very touching.Great son. God bless you. Regards to Masiji.-BY SAJIV TANDON
8. I read your write up yesterday on Facebook. I took my childhood journey in between as whole lot of your mischiefs were not done by me 😊 BY KIRAN BHATIA LUCKNOW
9. Great Sahgal Sahab. बहुत सुंदर शब्दों में आपने अपनी माता जी व परिवार के साथ बिताए मधुर क्षणों को जीवंत किया । BY N.K. DHAWAN LUCKNOW
10. बहुत बढ़िया वर्णन। अति सुंदर वर्णन। BY R.R. PERI.