"टंकी के
दादा"
झाँसी मे मेरा
घर का इलाका पानी की टंकी का इलाका कहलाता है। साठ सत्तर के दशक मे शहर पूरी तरह
किले की चहर दीवारी से घिरा हुआ था। बड़ा गाँव गेट हमारे घर से मुश्किल से आधा
किलोमीटर ही रहा होगा पर टंकी तक रिहाईसी इलाके मे घनी आबादी न थी। बड़ा गाँव
दरवाजे के बाहर तो खेती-बाड़ी के क्षेत्र शुरू हो जाते थे। इक्का दुक्का ही मकान दरवाजे
बाहर नज़र आते थे। इसलिये घनी आबादी और बाज़ार हमारे घर से चंद कदम दूर पानी की टंकी
चौराहे से शुरू होता था ये एक तरह से पूर्वोत्तर
दिशा से शहर का प्रवेश द्वार था। जलूस जलसे प्रायः यहाँ से होकर ही शहर मे प्रवेश
करते थे। बैसे यहाँ कोई भी पानी
की टंकी मैंने अपने 62 साल के जीवन कल मे नहीं देखी,
बैसे मेरे स्वर्गीय पिता बताते थे कि उन्होने अपने जीवन काल मे शायद 1940 के आस पास चौराहे के पास टंकी बनी
देखी थी जिससे शहर के लोग अपनी निजी आवश्यकताओं हेतु इस टंकी से पानी भरते थे। इस
संबंध मे यदि किसी पाठक को कोई जानकारी हो तो अवश्य सांझा करे।
उन
दिनों शहर के अलग अलग गली मोहल्लों के अलग अलग दादा (गुंडे) हुआ करते थे। अपने
क्षेत्र विशेष मे उनका अच्छा खाशा दबदबा रहता था। उस क्षेत्र के छुटभैये लोग उनको भाई या भाई साहब
कहकर जी हजूरी की मुद्रा मे हाथ उठाकर
नमस्कार करते। पर क्षेत्र के गणमान्य,
पढे लिखे और बुजुर्ग लोगो को दादा ही नमस्कार करता या पायनलागू (मात्र पैर छूने की
मुद्रा पर पैर छूना नहीं) करता। कुछ दादा भाई अपनी पहलवानी कद काठी से अपना
वर्चस्व कायम करता तो कुछ भले ही छोटी कद
काठी के रहते पर अपनी फुर्ती और दिलेरी के
कारण क्षेत्र मे रुतबा रखने की कोशिश करता।
एक तो दुबली पतली काया का स्वामी चाकू बाजी कर तेज गति से दौड़ कर भागने मे
माहिर था। इन सभी मे एक समानता थी कि एकाध को छोड़ कर सभी बहुत ज्यादा शिक्षित नहीं
थे पर अपने इलाके की गली मोहल्लों मे किसी की क्या मजाल जो उन दिनों की राजनैतिक,
आर्थिक या वैश्विक मुद्दों मे उनसे असहमति रखे!! अगर किसी बुद्धिजीवि ने अपनी
बुद्धि दिखाई तो दादा भाई बस धीरे बुंदेलखंडी भाषा मे बीच मे टोक कर कहता
"अच्छा तो तुम हमसे से ज्यादा जानत
हौ? और इतना कहते ही सामने बाला अपनी औकात मे
आकार दादा भाई की हाँ मे हाँ मिलाने लगता। दिन भर ठलुआ घूमते इन दादा भाइयों को
प्रायः मै जब कभी राशन की दुकान पर राशन
लेने या मिट्टी का तेल (केरोसिन ऑइल) लेने जाता तो ये वहाँ राशन कार्डों को आगे
पीछे, उल्टा-पलटी कर मैनेजरी करते मिल जाते। किसी की क्या मजाल जो
कह सके मेरा नंबर पहले था? ऐसा नहीं था की
इनकी दादागिरी एक दम से कायम हो गई थी इन दादाओं को कई बार हमने जमके लात घूंसे और
डंडे खाते और पिटते देखा था। दादागिरी का परम पद उन्हे बड़े संघर्षों के बाद ही
नसीब हुआ था। उनमे से एक तो हमारे बचपन मे हम मित्रों के साथ पास के स्कूल के मैदान मे ही गिल्ली डंडा या क्रिकेट खेलता था पर अपने
उग्र और झगड़ालू स्वभाव के कारण एक ओर तो जहाँ हम लोग 18-20 साल तक स्कूल मे एड़ी रगड़ने के बाद बाबू पद प्राप्त कर सके वही
दूसरी ओर उस झगड़ालू मित्र ने बहुत छोटी उम्र मे ही एक अलग रास्ते पर चल "दादा
भाई" के पद को प्राप्त कर लिया था। शहर
के विभिन्न इलाकों के लगभग 10-12 दादाओं का अपने अपने क्षेत्रों मे दबदबा था पर इन
दादाओं की ज़ोर आजमाइश का अड्डा पानी की टंकी ही हुआ करता था। आए दिन इन दादाओं की दादागिरी यहीं पर परखी जाती
और कसौटी पर कस गुंडई के पैमाने से नाप कर शहर का बड़ा गुंडा घोषित किया जाता था।
इन
दादाभाई गुंडों का जीवकोपार्जन शुरू शुरू मे स्थानीय छोटे मोटे दूकानदारों से
उधारी नगदी और वस्तुओं के रूप मे पान,
तंबाकू, बीड़ी सिगरेट के रूप मे
होती। देशी दारू के ठेकों पर इन्हे पराश्रय दिया जाता ताकि उनके व्यवसाय मे उपद्रव
न उत्पन्न हो। कभी कभी आपसी वर्चस्व के लिये इनमे झगड़े तो होते पर ये प्रायः अपने
विपक्षी को पराश्रय देने बाले छोटे सीधे सच्चे लोगो को भीड़ भाड़ और सार्वजनिक जगहों
पर किसी बहाने मारपीट कर आतंक फैला कर अपना जलजला दिखाते पर कभी जब मामला उल्टा
पड़ता तो मार भी खा के भाग जाते। बचपन मे ऐसे माहौल मे पले बढ़े होने के कारण दादाओं
और उनके गुटों मे झगड़े मारपीट और कभी कभी चाकू बाजी की घटनायें देखने के हम आदि हो
गये थे। दूर खड़े होकर गुंडई देखना किसी फिल्मी ड्रामे को देखने की तरह होता था और
देखने मे बड़ा रस आता था।
जैसे
आजकल राजनैतिक दलों के नेताओं या चुने गये प्रतिनिधियों को अपने क्षेत्र मे देख कर
छुटभैये लोग, दुकानदार और जी हजूरी
करने बाले पान-तंबाकू, पान मसाला,
बीड़ी-सिगरेट लेकर उनके स्वागत मे हाथ जोड़ खड़े रहते और यदि जनप्रतिनिधि ने उनमे
किसी एक से उसके घर परिवार का हालचाल पूंछ
पीठ पर मीठी धौल जमा दी तब तो उसका सीना दूसरे लोगो के सामने चौड़ा हो जाता जैसे
संदेश दे रहा हो कि देखों नेताजी के हम कितने निकट और खास है। उसका बोलबाला उस क्षेत्र मे नेता जी के
दाहिने हाथ होने का तमगा हासिल हो जाता या अपनी देशी भाषा मे कहे कि उसे नेताजी का
"कारिंदा" होने का लाईसेन्स
हासिल हो जाता जो नेताजी और जनता के बीच मध्यस्थ की भूमिका निभाता अर्थात दोनों
पक्षो का हित चाहने बाला साथ मे अपना भी
थोड़ा बहुत हित साध लेता। कुछ
ऐसा ही हाल उन दिनों दादाओं का होता था जब वे टंकी के चौराहे पर या अपने इलाके मे अपने
कारिंदों के बीच खड़े होते।
जब
शहर मे गुंडई हो तो पुलिस भी कभी कभी अपना बजूद दिखाने के लिये शहर के सबसे बड़े
गुंडे की ठुखाई पिटाई का जलूस टंकी से शुरू कर शहर कोतबाली तक ले जाकर जलूस को
विसर्जित करती ताकि छुटभैये गुंडे देख और समझ ले की राज तो पुलिस का ही चलना है।
जब कभी इस तरह का जलूस पुलिस बाले किसी गुंडे को लठियों,
डंडों या बेल्ट से पीटते और कभी कभी जूतों से भी उनकी धुलाई करते हुए निकालते तो सड़कों का हल्ला गुल्ला घरों के अंदर
तक सुनाई देता। आम लोग जो जैसी हालत मे है आकर गुंडे के जलूस का आनंद उठाते और जब
तक आँखों से ओझल न हो जाये पुलिस की ढिठाई पिटाई देखते रहते। कुछ जोशीले नौजवान
जलूस के पीछे पीछे ऐसे चलते मानों लड़की का बाप शादी की विदाई के समय लड़की को गाँव
की सीमा तक रोते बिलखते बिदा कर रहा हो। आये दिन निकलने बाले गुंडों के जलूस को
एकाध बार मै भी देख कर जहां जैसी हालत मे होता
उस भीड़ मे शामिल हो जाता। कभी कोई पुलिस बाला पैर मे सोटे से पिलाई करता तो
कोई उसकी पीठ की डंडे से मालिश कर ठुकाई करता। कभी गुंडा रोते कलपते,
चीखते चिल्लाते तथा दया की भीख मांगते बोलता "अब मै गुंडा गर्दी नहीं
करूंगा", सट्टा नहीं खिलबाऊँगा
आदि। कभी पुलिस से माफी मांगता। फिल्मों
के फाइटिंग सीन की तरह इन दृश्यों को देखने का लोभ संवरण मुझे जलूस के पीछे पीछे
बड़ा बाज़ार मानिक चौक होते हुए पुलिस कोतबाली तक ले जाता। वहाँ पहुँच कर जब पुलिस
और खलनायक शहर कोतबाली मे दाखिल हो ओझल हो जाते तो हम गहरी नींद से ऐसे जागते जैसे मानो अभी ही सो कर उठे
हों। उपर से नीचे आत्मनिरीक्षण करते कि जलूस के जोश के कारण घर से लगभग एक
किलोमीटर बाहर तक जाने पर अपने हुलिया को देख बड़ा अफसोस और पछतावा होता कि कैसे
बगैर भेश-भूषा बदले इतनी दूर घर के परिवेश मे पहुँच गये। साधारणतया: घर के बाहर
बगैर चप्पल के जाना वर्जित रहता पर गुंडे की पिटाई देखने और जलूस का हिस्सा बनने
की चाह ने घर मे पहनने बाला देशी अंडर बीयर और बनियान मे ही बगैर चप्पल पहने
कोतबाली तक जाने को मजबूर कर दिया यह सोच कर मन बहुत कचोटता। किशोर अवस्था का बो
अल्हड़पन पाजामा शर्ट के पहनने मे जाया होने बाले समय को गुंडे के उस जलूस को देखने
से मिलने बाली खुशी के एक पल को भी खोना नहीं चाहता था। बापसी मे गलियों से होते
मुख्य मार्ग से बचते तक घर पहुँचते ताकि कोई देख न ले पर जब घर पहुँचते तो बड़ी
डांट पड़ती।
उन
दिनों देखी कड़वी सच्चाई को देख कबीर दास
जी का वो दोहा वरवस याद हो आता है कि "दुर्बल को ना सताइये,
वां की मोटी हाय।
बिना
सांस की चाम से लोह भस्म होई जाय"॥
उन
दादा भाई गुंडों मे एकाध को छोड़ कर लोगो से मिली बददुआओं और अपने आपराधिक चरित्र
के कारण अधिकतर आपसी रंजिश मे बेमौत मारे जाकर अकाल मृत्यु को प्राप्त हुए। उम्र
के इस पढ़ाव मे बचपन और किशोर अवस्था से उपजे अनुभव के आधार पर "येन केन प्रकरेण"
अपनी धन लालसा पूर्ण करने बालो और निरीह लोगो को सताने बालों पर श्रीमद्भगवत गीता
मे एक बहुत ही सुंदर श्लोक लिखा है :-
नास्ति
बुद्धिरयुक्तस्य न चायुक्तस्य भावना।
न चाभावयतः शान्तिरशान्तस्य कुतः सुखम्।।2.66।। अर्थात
(न जीते हुए मन और इन्द्रियों वाले पुरुष मे निश्चियात्मक बुद्धि नहीं होती और उस अयुक्त मनुष्य के अन्तःकरण मे भावना भी नहीं होती तथा भावनाहीन मनुष्य को शान्ति नहीं मिलती। फिर शान्तिरहित मनुष्यको सुख कैसे मिल सकता है?)
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न चाभावयतः शान्तिरशान्तस्य कुतः सुखम्।।2.66।। अर्थात
(न जीते हुए मन और इन्द्रियों वाले पुरुष मे निश्चियात्मक बुद्धि नहीं होती और उस अयुक्त मनुष्य के अन्तःकरण मे भावना भी नहीं होती तथा भावनाहीन मनुष्य को शान्ति नहीं मिलती। फिर शान्तिरहित मनुष्यको सुख कैसे मिल सकता है?)
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विजय सहगल



2 टिप्पणियां:
एक संजीदा चित्रण उस दौर का����
अजित जैन रायपुर
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