बुधवार, 8 अप्रैल 2020

रण-कोरोना


"रण-कोरोना"



उठो रण के देवता तुम, युद्ध  का उद्घोष  कर दो।
तिष्ठोत्तिष्ठ भारत अब युद्ध का जयघोष वर दो॥  
अदृश्य शत्रु की दिशा क्या?
श्रोत शक्ति की दशा क्या?
तीर  तरकश मे है जितने?
सिद्ध उनमे से है कितने?
अभेद व्यूह को भेद, गढ़ शत्रु का ज़मींदोज़ कर दो।
उठो रण के देवता तुम, युद्ध  का उद्घोष  कर दो।  
तिष्ठोत्तिष्ठ भारत अब युद्ध का जयघोष वर दो॥  
दमन रिपु  का रोकना है,
शमन शत्रु, अब शोक ना है।
कवच को धारण करे फिर,
घात अस्त्र  का  थोपना है॥
दधीचि-अस्थि का वज्र, हर वीर के आगोश भर दो।       
उठो रण के देवता तुम, युद्ध  का उद्घोष  कर दो॥  
तिष्ठोत्तिष्ठ भारत अब युद्ध का जयघोष वर दो॥  
रक्तबीज से ये पोषित,
एक से बनते ये दस है।    
दशानन अवशेष निष्ठुर,
क्रूर, बर्बर निपट वश है॥
विष अणु कोरोना से, विजय भव: का जोश भर दो।
उठो रण के देवता तुम, युद्ध  का उद्घोष कर दो॥  
तिष्ठोत्तिष्ठ भारत अब युद्ध का जयघोष वर दो॥  
क्षेत्र रण का है असीमित।
रीति वैरी, भी अनियमित॥
ललकार कोरोना ने है ठानी।
दृढ पराजय, युद्ध अभिमानी॥  
धर्मसंस्थापनार्थाय हरि हे!, रणभेरी विजयीघोष भर दो।
उठो रण के देवता तुम, युद्ध  का उद्घोष कर दो॥  
तिष्ठोत्तिष्ठ भारत अब युद्ध का जयघोष वर दो॥  
     
विजय सहगल  
  


कोई टिप्पणी नहीं: