"एक म्यान मे दो तलवार"
मैंने कभी सोचा भी न था कि "एक म्यान मे दो
तलवार" के मुहाबरे से हमें भी ऐसे रुबारू होना पढ़ेगा। एक ही छत के तले किसी बड़े हाल
मे राज्य सरकार के कार्यालय के साथ बैंक की शाखा भी मुझे चलाना पड़ेगी। दरअसल हुआ
ये था मेरे द्वारा 1996 मे कल्क्ट्रेट कार्यालय रायपुर मे नवीन विस्तार पटल खोला
गया था जिसका उद्घाटन तत्कालीन कलेक्टर श्री डी॰पी॰तिवारी महोदय
द्वारा किया गया था। इस हेतु कलेक्टर महोदय ने बैंक की तत्कालीन आवश्यकता के अनुरूप
अस्थाई व्यवस्था के तहत कल्क्ट्रेट कॉम्प्लेक्स मे आबकारी विभाग के दो गोडाउन मे से एक गोडाउन बैंक की शाखा चलाने
हेतु दे दिया था जिसमे दो छोटे छोटे कमरे थे। अग्रेजों के जमाने की बनी झोपड़ी नुमा
एक बहुत छोटी जगह थी। अंदर के कमरे मे कैश सेफ के साथ दो टेबल और दो कुर्सी के
अलावा दो-तीन कुर्सी और थी जिन पर ग्राहकों को बैठने की सुविधा बाहरी कमरे मे थी।
लेकिन वेतन बाले दिन भीड़ के मध्य कल्क्ट्रेट कार्यालय के कर्मचारी बैंक के बाहर
बड़ी संख्या मे खड़े हो अपने भुगतान की प्रतीक्षा करते। बगल मे ही स्थित आबकारी
विभाग द्वारा छापेमारी मे पकड़ी शराब के दूसरे गोडाउन से आने बाली महक से बगैर शराब के सेवन
किये ही चाहे-अनचाहे शराब के नशे का अनुभव होता। ये सिलसिला कुछ महीनों तक यूं ही अधिक सुविधाजनक बड़ी जगह आवंटन के पूर्व तक चलता
रहा।
कुछ महीनों बाद कलेक्टर महोदय ने एक बड़ा और सुविधा
जनक परिसर बैंक को आवंटित कर दिया जिसमे पहले जिला निर्वाचन कार्यालय रायपुर चलता
था। जिला निर्वाचन कार्यालय को कोई अन्य भवन मे स्थानान्तरित किया जाना था।
कलेक्टर महोदय ने इस आशय का पत्र हमारे पास भेज दिया जिसमे आवंटित नये बैंक परिसर के किराये, रख रखाव, बिजली पानी से संबन्धित सामान्य शर्ते लिखी थी।
आदेश तुरंत प्रभाव से लागू होने की हिदायत भी लिखी थी। हमने सर्वप्रथम आवंटन पत्र
के निर्देशानुसार बैंक का किराया कोषालाय के निर्धारित मद मे जमा कर दिया। नवीन
परिसर कलेक्टर कार्यालय के एकदम मध्य मे अच्छी अवस्थिति मे था, पर एक समस्या थी उसमे अभी भी निर्वाचन कार्यालय
के कर्मचारी बैठे हुए अपने कार्यालीन गतिविधियों को संपादित कर रहे थे। मै हैरान
था कि इनके रहते हम कैसे इस भवन मे अपनी बैंकिंग कार्य शुरू करे? एक दो दिन हम इंतज़ार करते
रहे कि निर्वाचन कार्यालय के लोग भवन खाली करके दे तो हम बैंक का कार्य शुरू कर
सके पर इंतज़ार हर दिन आगे बढ़ता जा रहा था। संकोच बस मै समझ नहीं पा रहा था किससे संपर्क कर अपनी समस्या का निदान
कराये?
2-3 दिन मे
जब बैंक शिफ्ट नहीं हुआ तो कलेक्टर महोदय ने स्वयं ही अर्दली को भेज मुझे बुलवा
भेजा। मै तुरंत ही कलेक्टर महोदय से मिलने उनके कार्यालय पहुंचा तब उन्होने बैंक
को नये भवन का कब्जा लेने के बारे मे पूंछा? मैंने बताया कि श्रीमान पूर्व कार्यालय के
कर्मचारियों ने भवन खाली नहीं किया तब हम कैसे वहाँ पर शिफ्ट हो सकते है। उन्होने
हँसते हुए कहा जब हमने बैंक को आवंटन पत्र जारी कर दिया तो अब क्या समस्या है? आप तो अपना काम आज ही
आवंटित परिसर से शुरू कर दे अन्यथा कही ऐसा न हो की ऊपर से किसी अन्य उच्च अधिकारी
का आदेश या सिफ़ारिश आ जाये तो फिर हो सकता है आवंटन संशोधित या निरस्त हो जाये। तब
फिर कुछ नहीं किया जा सकेगा। कलेक्टर महोदय की इतनी बात सुनते ही मेरे तो होश उड़ गये। मन मे ऐसी आशंका होने
लगी कि कहीं कुछ गड़बड़ न हो जाये। मैंने मन ही मन सोच कलेक्टर महोदय के आशय को समझ अपनी शाखा मे पहुंच चपरासी को एक-दो हाथ ठेला लाने के लिया भेजा। उन दिनों शाखा का सारा कार्य, लिखत-पढ़त, जमा-निकासी हाथ से लेजर मे प्रविष्टि आदि होती थी।
हाल ही मे शुरू हुई शाखा मे अभी मुख्यतः कलेक्टर
कार्यालय के कर्मचारियों के वेतन के बचत खातों के 10-12 लेजर और एक करेंट खातों का
लेज़र ही था। सबसे पहले एक-दो स्टील अलमिरा
और लेज़र को हाथ ठेले पर लदवा कर हम कैशियर
और चपरासी के साथ नये परिसर मे पहुंच गये। मैंने निर्वाचन विभाग के कर्मचारियों से
आग्रह कर थोड़ी सी जगह देने का निवेदन किया ताकि बैंक के सामान को एक कोने मे रखा
जा सके और इस तरह थोड़े से सामान को
कार्यालय मे रखवा कर शुरुआत की। परिसर मे चारों तरफ निर्वाचन विभाग का सामान पहले
से ही फैल रखा था। यध्यपि निर्वाचन विभाग के स्टाफ को मालूम था कि यह भवन बैंक को
आवंटित हो चुका है पर अपने आलस्य पूर्ण और
ढुलमुल रवैये के कारण वे वही पर जमे थे। हमने कैश सेफ को पुरानी बिल्डिंग मे ही छोड़ अपना
मुख्य मुख्य सामान नये परिसर मे बैंक की अलमारियों मे रख लॉक कर दिया। उस दिन
परिसर मे दोनों कार्यालयों का सामान रखा रहा। कार्यालय की मुख्य गेट की चाबी उस
दिन निर्वाचन विभाग के पास ही रही चूंकि वहाँ नगदी आदि नहीं था तो हमने भी ज्यादा आपत्ति या चिंता नहीं
की।
अगले दिन भी बैंक और निर्वाचन विभाग ने एक ही छत्त
के तले बैठ कर अपना अपना काम किया। ऑफिस के एक कोने मे हम लोगो ने ग्राहकों का
भुगतान एवं अन्य बैंकिंग कार्य नये परिसर मे शुरू कर दिया। पुराने परिसर मे लगा
बैंक का साइन बोर्ड भी नये परिसर के बाहर मे लगा दिया। शाखा के स्थानांतरण की सूचना भी
पुराने परिसर मे चस्पा कर अन्य सीक्योरटी पेपर जैसे चैक बुक, ड्राफ्ट बुक आदि भी नये
परिसर मे रख लिये। दूसरे दिन बैंक कार्य पूर्ण कर जब ऑफिस बंद करने की बारी आयी
तो मैंने स्पष्ट रूप से निर्वाचन कार्यालय
के स्टाफ को बता दिया कि अब आज से गेट पर बैंक का ही ताला लगेगा और आप शीघ्र अतिशीघ्र
अपने सामान को शिफ्ट कर ले। इस तरह अब परिसर का कब्जा बैंक के पास आगया। पर एक दो
दिन आगे भी निर्वाचन कार्यालय और बैंक की कार्यवाही एक ही परिसर मे चलती रही। कभी कोई हमारे पास
निर्वाचन के कार्य हेतु आता तो हम उसे सामने बैठे निर्वाचन विभाग के कर्मचारियों
के पास भेज देते और यदि कोई बैंक के कार्य हेतु उनके पास चला जाता तो वे बैंकिंग
कार्य हेतु उसे हमारे पास भेज देते। अब तक हमने भारी भरकम कैश सेफ भी नये परिसर मे
स्थानांतरित कर लिया था कहने का तात्पर्य अब हमने अंगुली पकड़ कर पौंचा पकड़ लिया और
पूरे बैंक परिसर मे फैल गये।
एक दो दिन मे धीरे धीरे निर्वाचन कार्यालय के
कर्मचारियों ने अपना सामान अपने नये भवन मे शिफ्ट कर लिया हमने भी अपने स्टाफ के साथ उनका पूरा पूरा सहयोग किया ताकि दो कार्यालयों का कार्य एक
ही परिसर मे किये जाने की इस समस्या से
जल्दी से जल्दी छुटकारा मिले। इस तरह हम अपने आप मे एक अजूबे पर यादगार
अनुभव को अपनी यादों की गठरी मे आज भी सँजो कर रखे है और कभी कभी सोच कर मुस्कराते है
कि कैसे एक ही परिसर मे दो कार्यालय के
कर्मचारियों ने कार्य कर एक म्यान मे दो तलवार की कहावत को चरितार्थ किया।
विजय सहगल



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Unbelievable but truth
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