गुरुवार, 16 अप्रैल 2020

लॉक डाउन पार्ट-1


"लॉक डाउन पार्ट-1"





( पिछले ब्लॉग मे आपने पढ़ा कि लॉक डाउन 1 मे कैसे हमने अपने आपको परिस्थितियों के अनुरूप अपने को ढाल समय के काल खंडों मे बाँट बिभिन्न माध्यमों मे बिताये समय का उल्लेख किया था अब अगले माध्यम के बारे मे विचार)

व्हाट्सप

सामाजिक माध्यम के एक व्हाट्सप ग्रुप का मै सदस्य हूँ इस ग्रुप मे हमारे बैंक के उच्चतम पदों सहित हम जैसे छोटे पदों से से निवृत लोग भी  इस ग्रुप के सदस्य है। ग्रुप के नियंत्रक द्वारा इस लॉक डाउन से उपजी इंटरनेट स्पीड की समस्या के कारण माननीय सदस्यों से अनुरोध कर फोटो/विडियो/प्रातः काल नमस्कार के फोटो/संदेश एवं कोविड19 से संबन्धित भ्रामक संदेश  शासन की नीति अनुसार पोस्ट न करने का निवेदन किया। पर घोर आश्चर्य कुछ सदस्य अपने स्वभाव से विवश लगातार एडमिन के निर्देश को दरकिनार वर्जित संदेश भेजते रहे। मजबूरन नियंत्रक ने ग्रुप मे संदेश भेजने की शक्ति सामान्य सदस्यों से हटा कर अपने हाथ मे ले ली। जब ग्रुप के  कुछ (सभी नहीं) इतने योग्य और बुद्धिजीवि वर्ग अपनी भावनाओं को नियंत्रित नहीं कर सकते  तो कट्टरपंथी सोच या अल्प विचार धारा के लोग इस माध्यम के दुर्पयोग से विष वमन कर  समाज और देश का  कितना अहित करते होंगे? ग्रुप के सदस्यों के इस गैरजिम्मेदारान व्यवहार ने हमे चिंतित कर दिया? हमे ये सोचने पर मजबूर कर दिया कि वास्तव मे व्हाट्सप को हम नियंत्रित करेंते है  या व्हाट्सप हमे नियंत्रित करेगा??  एक व्यक्ति या संस्था द्वारा संचालित ये व्हाट्सप जैसे सामाजिक माध्यम हमारे जैसे लोकतांत्रित देश की कानून व्यवस्था को तहस नहस कर हिंसा और दंगों मे झोंक इन सोशल माध्यमों के  अस्तित्व पर एक बहुत बड़ा प्रश्न चिन्ह खड़ा करते है ?? व्हाट्सप एवं अन्य सोशल माध्यमों  को बलपूर्वक रोकने के  सदपरिणाम 5 अगस्त 2019 को  धारा 370 को जम्मू कश्मीर से समाप्त करते समय हम देख ही चुके है कि जम्मू कश्मीर जैसे अशांत क्षेत्र धरण 370 समाप्त के दिनांक से अब तक  एक भी गोली चले बगैर या किसी भी  हिंसक घटना या हिंसा से मृत्यु  के बिना  होने का समाचार मिला!! और बही दूसरी ओर पिछले दिनों व्हाट्सप से फैली हिंसा के   दुष्परिणाम की  झलक दिल्ली मे फैले दंगों मे हम सब देख ही चुके है। अपने अंतर्निहित कर्तव्यों को भूलकर "बोलने की स्वतन्त्रता" के छद्म पैरोकारों पर संदेह कर हमारे नीति नियंतकों को उक्त सामाजिक माध्यमों को रोक लगाकर/समाप्त करने पर क्यों न विचार करना चाहिये??  क्या हम इस तरह के  सामाजिक माध्यम का उपयोग करने के सुपात्र है भी या नहीं??

समाचार पत्र

समाचार पत्र की भूमिका भी लॉक डाउन के इस समय काल मे महत्वपूर्ण रही। शुरू शुरू मे तो सोसाईटी मे समाचार पत्र के वितरण पर एकबार तो संकट के बादल छा गये। सोसाईटी मे  किसी भी बाहरी व्यक्ति के सोसाईटी के  अंदर प्रवेश न देने की नीति के कारण एक दिन समाचार पत्र का वितरण नहीं हुआ। मैंने जब सोसाईटी के एक पदाधिकारी के इस निर्णय के औचित्य पर सवाल किया तो वे कुछ भी सुनने को तैयार न थे। नोएडा के नवभारत टाइम्स के प्रबंधन से मोबाइल से संपर्क का नतीजा भी  ढीला ढाला एवं निराशाजनक रहा। अब तक मै अगले 20 दिन से मै समाचार पत्र न पढ़ने हेतु मानसिक रूप से तैयार हो गया था। निराश तो था बगैर समाचार पत्र के दो-ढाई घंटे कैसे व्यतीत होंगे। पर श्री चौधरी जो समाचार पत्र वितरक थे अच्छे आदमी है ने  कुछ रास्ता निकाल लिया  जिसके कारण समाचार पत्र निर्वाध रूप वितरित होता  रहा। शनिवार और रविवार को समाचार पत्रों की तड़क-भड़क इन दिनों नदारद है। लंबे चौड़े विज्ञापन गायब है।  समाचार पत्रों मे आजकल सिर्फ और सिर्फ समाचार है।  पर इन दिनों  इसमे सिर्फ कोरोना कोविड19 की ही चर्चा अधिक  रहती। आम पाठकों की एकांत वास से उपजी एकाकीपन को कम करने हेतु नवभारत टाइम्स की पहल रचना के अंतर्गत पाठकों की कविताए आमंत्रित की गई जो एक सुखद और प्रशंसनीय पहल रही।  एक बात बताऊँ एक असफल रचना भेजकर मै भी इसका सहभागी रहा। एनबीटी रंगमंच द्वारा ऑन लाइन  आयोजित कार्यक्रम मे प्रसिद्ध बांसुरी वादक  श्री रौनू मजूमदार का बांसुरी वादन एक सुंदर प्रस्तुति थी जिसमे सहभागिता कर मैंने श्री मजूमदार जी से जीवंत संपर्क किया जो एक यादगार पल था।  समाचार पत्र के पठन पाठन मे इन दिनों लगभग 2 घंटे व्यतीत करना एक बहुत ही अच्छा माध्यम बना। 8 घंटे के शयन काल को निकाल कर शेष बचे 16 घंटे मे समाचार पत्र मे व्यतीत 2 घंटे जो लगभग 12.5% होता है जो  लॉक डाउन के समय का बहुत ही शानदार  सदोपयोग  है और 12.5% एक बहुत बड़ा हिस्सा भी। जिसे  प्रसन्नता पूर्वक व्यतीत किया जा रहा है। समाचार पत्र की इस अहम भूमिका इन दिनों ही समझ आई।  

इन 21 दिनों के लॉक डाउन मे मेरे जीवन की कमोवेश यही दिनचर्या रही। परिवार के सभी सदस्यों के साथ सुबह का नाश्ता, खाना शाम की चाय पर एक साथ बैठना, रात्री भोजन मे विविध तरह के भोज्य, व्यंजन, भोजन, आहार और पेय पर शोध और प्रयोग लगातार चलते रहे। रसोई के कामों मे बेटी द्वारा  बराबरी से पत्नी का हाथ बँटाना नित्य का क्रम होता। अपने पीएचडी के शोध को कुछ समय विराम देकर बेटी स्नेहा का घर मे पोंछा लगाना सुखद अनुभूति कराता कि कैसे किसी परिवार के सारे लोग मिलजुलकर किसी समस्या को सामना कितनी आसानी से कर सकते  है!!  दोनों बेटे जहां फल सब्जी एवं  दैनिक आवश्यकताओं की अन्य वस्तुओं को  3-4 दिन मे एक बार नजदीक के स्टोर से लेकर आते एवं  घर के अन्य कामों परिवार का हाथ बंटाते और बाकी समय घर से ऑफिस का कार्य करने मे बिताते।  दोपहर मे प्रायः माँ, भाइयों, बहिनों से फोन और दृश्य श्रवण माध्यम से "अत्र कुशलम तत्रास्तु" पश्चात अन्य बातों पर   चर्चा हो जाती। सुबह शाम को चाय पे चर्चा मे परिवार मे स्थानीय स्तर से अंतर्राष्ट्रीय स्तर तक की चर्चा होती। मै भी अपने कुछ घनिष्ठ मित्रों से शाम के लंबी चर्चा मोबाइल पर  कर लेता। लॉक डाउन के  इस दौर मे  इतनी  फिल्मे देखी जितनी शायद पिछले 7-8 साल मे न देखी होंगी। लॉक डाउन के आखिरी दिन की खुशी मे मेरी बेटी ने मूंग की दाल का बहुत ही स्वादिष्ट हलवा बनाया। लॉक डाउन समाप्त होने की खुशी को  तो सुबह दस बजे प्रधानमंत्री महोदय  द्वारा आगे  9 दिन स्थगित कर दिया पर हलवा से उपजी  स्वादिष्ट, मधुर, सरस सुखद खुशी का भरपूर आनंद सारे परिवार ने दिनभर  मिलजुल कर खूब उठाया। 
     
21 दिन के लॉक डाउन का आज अंतिम दिन है हम जैसे करोड़ो श्रोता सिर्फ और सिर्फ आकाशवाणी के साथ कोरोना कोविड19 से उपजी महामारी के कारण  देश के सामने उत्पन्न कठिनतम दौर से निजात पाने के लिये लागू   लॉक डाऊन को सफल बनाने एवं उसका हिस्सा बनने मे अपने आप को गौरवान्वित महसूस करते है। परिवार का साथ इस कठिन दौर से उवरने मे सबसे महत्वपूर्ण रहा। टेलिविजन, समाचार पत्र और सामाजिक माध्यमों की भी अपनी एक अहम भूमिका अपना स्थान रखती है। इस लॉक डाउन से उपजी एकाकी निर्जनता  ने अन्य माध्यमों के साथ   विविध भारती और एफ़एम गोल्ड के इस योगदान को भुलाया नहीं जा सकता।  हमे उम्मीद ही  नहीं द्रढ़ विश्वास है सरकार के निर्देशों के अनुपालन करते हुए समाचार पत्रों, टेलिविजन और  विविध भारती और एफ़एम गोल्ड जैसी  नाव पर सवार करोड़ो देशवासी कोविड19 रूपी समस्या के भवसागर से अवश्य ही पार होकर विजयश्री का वरण करेंगे।  (समाप्त)

विजय सहगल