शनिवार, 25 अप्रैल 2020

केश कर्तन


"केश कर्तन"




मैंने ज़िंदगी मे अनेकों बार परम्पराओं से हट कर काम किये है जिनको करने से मेरे  दिल को सकून मिला है। खर्चीली शादियो मे फिजूल खर्ची मैंने देखी  और महसूस की थी जिनको देखकर मैंने तय किया था कि मै अपनी शादी इस फिजूल खर्ची मे पैसा वर्बाद करने से बचने के लिये दिन मे शादी करूंगा और मैंने ऐसा किया भी। लॉक डाउन-2 मे ऐसे ही एक कदम उठाने को आज मै मजबूर हुआ जो "न भूतो न भविष्यति:" की तर्ज़ पर न पहले किया और भविष्य मे भी शायद न हो।

ग्वालियर और नोएडा प्रवास के कारण लॉक डाउन-1 के 25 मार्च 2020 को शुरू होने के दिन तक मै अपने बाल कटाने मे पहले से ही 20-25 दिन लेट हो चुका था। तीन हफ्ते के लॉक डाउन ने बालों की समस्या को और बढ़ा दिया था और रही-सही कसर लॉक डाउन-2 ने पूरी कर दी। मेरे बाल काफी बड़े  होकर मेरे लिये समस्या हो गये थे। बैसे बालों मे अनासक्त भाव के चलते मैं पहले भी दो बार बिना पूर्व निर्धारित कार्यक्रर्म के चलते बालों को "तिरुपति बालाजी" मे समर्पित  कर चुका था, सिर्फ ये महसूस करने की बगैर बालों के कैसा  लगता है। देश मे पूर्ण तालाबंदी के चलते जब-जब मै अपने फ्लैट की 13वी मंजिल पर बैठता या घर के अंदर पंखे के नीचे बैठता तो बाल उड़ कर यहाँ-वहाँ और कभी आँखों के सामने आ जाते। मुझे बचपन के दिन याद हो आये जब हमारे घर के बाहर एक टेलर मास्टर बैठा करते थे। खाली वक्त मे स्कूल से बापसी मे या छुट्टियों के दिन घंटों मै उनकी दुकान पर समय व्यतीत किया करता था। मास्टर साहब थे तो बड़े अनुभवी पर दिखावे और तड़क-भड़क से दूर सीधे साधे इसिलिये शहर उनके ग्राहक कम देहात के ज्यादा आते। घंटे दो घंटे मे पजामा, अंडरवियर, शर्ट-पैंट सिल के देना उनकी विशेषता थी। जब तक किसान बाज़ार हाट करके आता, घंटे आधा घंटे टेलर मास्टर की दुकान पर आराम फरमाता तब तक कपड़े सिल के तैयार। कई बार हम भी हाथ आजमा लेते। पेंट शर्ट तो कठिन था पर देशी अंडरवियर, पाजामा सिल हम भी अपना हाथ साफ कर लेते। अक्सर हम जैसे नौसिखियों पर मास्टर कहावत कहता "मोड़ा सीखे नाऊ को सिर कटे किसान को" अर्थात नाई का लड़का बाल काटना सीखने को देहातियों के बाल काट कर आजमाइश करता। जब हम कहते मास्टर कहीं सिलाई मे कुछ कमीवेशी या  गड़बड़ हुई तो ग्राहक नाराज़ न हो जाये? बड़े निश्चिंत भाव से हंस कर जबाब देता क्यों चिंता करते हो "कौन उसका बाप दर्जी है जो कमी निकलेगा"!!   

जब हम कागज काट सकते, कपड़ा काट सकते, घर के सामने न जाने कितनी बार मशीन से घास की कटाई की तो लॉक डाउन मे आज देश पर आये संकट के समय हम अपने बाल क्यों नहीं काट सकते?? आज इसी चुनौती को स्वीकार, "किसान और नाई" की उसी कहावत से हमे भी दो चार होना पड़ा। बाल काटने का तो अनुभव नहीं था पर बाल कटवाने का तो 60-62 साल का अनुभव था ही। आज सुबह कैंची लेके बाथरूम मे बालों से ज़ोर आजमाइश शुरू कर दी, सिर का बजन जो हल्का करना था। आईने के सामने  कैंची कंघा लेकर काम शुरू किया ज्यों ही कंघे से बालों को उपर उठाया ही था कि कैंची से उनको काट कर हल्का करे, कैंची कभी ऊपर तो कभी नीचे हवा मे ही चलती रही बाल सामने होते हुए भी कैंची के फंदे मे नहीं फंस रहे थे। बड़ी उलझन हुई तब कंघे को विदा किया। एक हाथ से लटों को पकड़ा और बाल कटवाने के अनुभव के आधार पर  माथे पर लाये और कैंची से उन्हे छोटा कर दिया। कभी बाल कैंची के बीच आते और कभी बगैर आये बच कर निकल हमारे अनाड़ी पन पर इठलाते। साइड की "कलमे" जैसे तैसे कटी और उनको सेविंग करते समय दोनों तरफ एक सा तो कर लिया पर कान के उपर कैंची चलाना भरी पड़ गया न जाने कैसे बालों के चक्कर मे कैंची ने कान के किनारे आक्रमण कर दिया बो तो खुश किस्मत रहा कैंची कान को हल्के से छू के निकल गयी। एक हाथ से बालों को पकड़ कर आगे करता तो शीशे मे बे पीछे नजर आते, उन्हे उपर करते पर कैंची नीचे हो जाती, जब जब उनके उपर कैंची चलाता पर कैंची बार बार निशाने चूक जाती। बड़ी मुसीबत खड़ी हो गई। रह रह कर वो कहावत याद आने लगी "बिच्छू का मंत्र न जाने साँप के बिल मे हाथ डाले"। अब मुसीबत तो आ गई थी जैसे तैसे छुटकारा भी पाना था। अब तो स्टाइल से ज्यादा बजन के हिसाब से बाल कटना शुरू कर दिये। पहले तो  बालों पर कैंची चलाई पर अब कैंची के रास्ते मे जो भी बाल आये उड़ा दिये। अब तो बस एक ही लक्ष्य था बालों का बजन हल्का करना है। सिर के  पीछे के बालों का जब नंबर लगा तो लगा "आज आया ऊंट पहाड़ के नीचे"। जैसे "पेड़ पर तो चढ़  गये पर उतरना न आया" पर बहुत प्रयास के बाद भी  ज्यादा सफलता न मिली तब लगा यहाँ सिर भी अपना है और सीख भी मै ही रहा हूँ। अब तक वॉश वेसिन मे काफी मात्रा मे बाल एकत्रित हो गये थे मानसिक रूप से न सही भौतिक रूप से देख कर खुशी जरूर हो रही थी कि वांछित वजन तो कम हो ही गया। लेकिन एक बात की तस्सलि थी कि जितने भी बार्बर देखे जिन्होने हमेशा दूसरों के बाल काटे होंगे पर मै दुनियाँ मे अपने आप मे एक ऐसा इकलौता  हज्जाम रहा हूंगा जिसने अपने बाल स्वयं काटे हों!! ये तो घर की खेती है इसलिये चिंता नहीं थी कि चलो इस बार की फसल खराब हो गई अगली फसल लॉक डाउन के बाद नाई से ठीक करा लूँगा। परखिये खुद मेरे  द्वारा मेरा  केश कर्तन, "है न परम्परा से हटके काम"??

विजय सहगल               

रविवार, 19 अप्रैल 2020

शुभलग्न-पाणिग्रहण संस्कार

"शुभलग्न-पाणिग्रहण संस्कार"


(नोट- ये ब्लॉग इंडिया टूडे के आधार पर लिखा गया जिसका लिंक निम्न है। https://www.indiatoday.in/india/story/did-nothing-wrong-former-karnataka-cm-hd-kumaraswamy-defends-son-s-lockdown-wedding-1668198-2020-04-17 




श्री एचडी कुमार स्वामी पूर्व मुख्यमंत्री कर्नाटक ने 14 अप्रैल 2020 को बाबा साहिब भीम राव अंबेडकर की जयंती पर कितने सुंदर विचार व्यक्त किये। उन्होने कहा की बाबा साहिब अंबेडकर के इस विचार मे मेरा द्रढ़ विश्वास है कि  "सरकार को समाज के अंतिम व्यक्ति का ध्यान रखना होगा" उक्त विचार ने ही देश का एकीकरण कर प्रगति के पथ पर आगे बढ़ाया। शिक्षा, ज्ञान, समानता, बंधुत्व, मानवता और धर्मनिरेपेक्षता ही अंबेडकर का दूसरा नाम है जिस के तहत ही देश शांति पूर्वक प्रगति के पथ पर ले जाने की आवश्यकता है।

कितने सुंदर और गरिमा पूर्ण विचार है। कुमार स्वामी जी आपकी  समाज के अंतिम व्यक्ति के प्रति आपकी वेदना और दर्द आपको देश के अन्य सत्तालोलुप, लालची, अनुसाशन हीन   राजनैतिक नेताओं से कितना अलग रखता है। कितनी दया आपके दिल मे इन वंचित लोगो के लिये है जिसकी जितनी भी प्रशंसा की जाये कम है।

17 अप्रैल 2020 को बड़ी सादगी और सरलता से सम्पन्न हुई आपके बेटे चिरंजीव निखिल एवं सौभाग्यकांक्षि रेवती के शुभ विवाह की बहुत बहुत बधाई। वर्तमान मे देश मे फैली कोरोना कोविड19 की महामारी के बीच इस शादी मे आपने 15 लाख लोगो की जगह घर के ही मात्र 70 लोगो को बुला जितनी सादगी, संयम, शुद्धता से इस शादी को समपन्न कर देश की 130 करोड़ जनता को अनुग्रहित किया जिसके लिये देश आपका लंबे काल तक ऋणी रहेगा। श्रीमान स्वामी आपके  इस आभार और कृतज्ञता के लिये देश मे आपका यशोगान, गुणगान, स्तुति और सराहना इतिहास मे स्वर्णिम अक्षरों मे लिखी जाएगी। देश बेशक "अशुभलग्न" के इस दौर मे विश्व मे फैली कोरोना विषाणु जनित महामारी के सबसे दुःखद  और कठिन दौर से गुजर रहा हो, चारों तरफ त्राहि त्राहि मची हो, क्या बूढ़े, क्या जवान, क्या बच्चे, इस महामारी की चपेट मे आकर कालकबलित हो रहे हों, समाज का अंतिम व्यक्ति भूख और निराशा से दुःखी अपने बच्चों को सूखी रोटी भी उपलब्ध न करा पा रहा हो तब भी इन अनगिनित अशुभ लग्नों, संकटों, विपत्तियों, आफ़तों, जोखिमों के बीच आपके कुलपुरोहित द्वारा आपके चिरंजीव के विवाह की  शुभलग्न निकाल विवाह सम्पन्न कराना काबिले तारीफ है। धन्य है आप और आपके कुलपुरोहित और उनके द्वारा निकाली गई शुभलग्न।

हम देश के 130 करोड़ नागरिक आपको ईश्वर द्वारा प्रदाय उदारता और कृपा से अभिभूत है कि उसने आपके परिवार मे समस्त संस्कार शुभ मुहूर्त मे सम्पन्न कराये फिर चाहे वो पुंसवन संस्कार हो, नामकरण संस्कार हो, अन्नप्रासन संस्कार हो, विध्यारम्भ संस्कार, यज्ञोपवीत संस्कार या फिर 17 अप्रैल 2020 का ये विवाह संस्कार। आपने बहुत ही अच्छा किया जो इस शुभलग्न मे अपने पुत्र का विवाह इतनी आडम्बरहीन रीतिरिवाज और सादगी से सम्पन्न कराया। यदि आप कोरोना कोविड19 महामारी की फुंसियों मे उलझे रहते तो कदाचित ही ये शुभलग्न फिर प्राप्त होता। आप बधाई के पात्र है कि आपने अपने आत्मज का  ब्याह शुभलग्न मे कर  एक पिता होने का कर्तव्य बड़े अनासक्त और निष्काम भाव से सम्पन्न कर भारत भूमि के हजारों साल से चले आ रहे  धृतराष्ट्र के पुत्र मोह के वर्चस्व को तोड़ एक अनुपम उदाहरण प्रस्तुत किया। 

आप इस राष्ट्र के सबसे शक्तिशाली परिवार मे से एक है इस मे कोई भी अतिस्योक्ति न होगी। आप और आप के पिताश्री कई बार कर्नाटक राज्य के मुख्य मंत्री के साथ आपके पूज्य पिता श्री एचडी देवेगौड़ा को भी देश के प्रधानमंत्री होने का गौरव प्राप्त है। इतने बड़े राजनैतिक रसूख के बाबजूद आपकी सरलता और सहृद्यता देखो कि शुभलग्न मे पुत्र के विवाह समारोह की समस्त संवैधानिक अनुमतियाँ आपने प्राप्त की शायद ही कोई इतना शक्तिशाली परिवार हो जो इस तरह की कानूनी प्रिकरियओं  का पालन करता हो। धन्य है हम सभी, श्रीमान हम सभी देशवासी आपके ऋणी है और सादर प्रणाम करते है। विवाह समारोह मे घरातियों और बरातियों का मास्क न पहनने का आपका तर्क विचारणीय है। देश और राज्य के कानून के तहत  घर के बाहर चेहरे के मास्क की आवश्यकता के परे आपने चेहरे के मास्क का उपयोग इसलिए नहीं किया क्योंकि विश्व स्वास्थ संगठन का ऐसा कोई भी बाध्यकारी आदेश नहीं थे!! आप जैसे ज्ञानवन पूर्व मुख्यमंत्री से ऐसी ही अपेक्षा थी क्योंकि अक्ल बड़ी या भैंस के बीच निश्चित भैंस ही बड़ी होगी और  विश्व बड़ा या देश तो निश्चित ही विश्व ही बड़ा होगा!! आपकी तर्क शक्ति अकाट्य है। बड़े से बड़े कानूनविद आपके सामने बौने होकर नतमस्तक है क्योंकि "देश" के कानून के उपर "विश्व" के कानून के मत की आपकी  प्राथमिकता निर्विवादित है, इति सिद्धम।

उक्त सामाजिक समारोह मे सामाजिक सुरकक्षित दूरी न रखने के कानून की धज्जियां उड़ाने के  आरोपों का जितनी सफागोई और स्पष्टता से आपने खंडन किया वो विधि शास्त्र के विध्यार्थियों के लिये एक सुंदर सीखने योग्य उदाहरण है। कैसे आपने प्रमाण दिये कि प्रधानमंत्री के ताली और थाली बजाकर स्वास्थकर्मियों के प्रति सम्मान ज्ञापित करने मे कैसे लोग समूह मे  एकत्रित हो सामाजिक सुरकक्षित दूरी रखने मे नकामयाब रहे! आपने एक अन्य मिसाल मे कर्नाटक के मुख्यमंत्री द्वारा कोरोना के संदर्भ मे बुलाई मीटिंग मे जिसमे आप भी थे बताया कि शासन के अधिकारियों, पोलटिकल नेताओं, ने न मास्क लगाया न सुरकक्षित दूरी कायम रखी! एक अन्य द्रष्टांत मे आपने गरीब, वंचित लोगो द्वारा राशन की पीडीएस (सार्वजनिक वितरण प्रणाली) दुकानों पर सुरकक्षित दूरी के कानून का मखौल उड़ाये जाने की बात कही! जब देश के आम जनों द्वारा, नौकरशाहों द्वारा, देश के निचले तबके के गरीबों द्वारा सुरकक्षित दूरी का पालन न कराया जा रहा हो तो देश के सर्वशक्तिमान परिवार को सुरकक्षित दूरी रखने को कैसे वाध्य किया जा सकता है। जय हो कुमार  स्वामी जी जय हो। आपके कुतर्क बड़े से बड़े न्यायविदों को भी लाजबाब कर देंगे! धन्य हो प्रभु!! धन्य हो!! लेकिन एक बात निश्चित है कि शुभलग्न से पोषित शक्ति से सम्पन्न कोरोना आपको छू भी नहीं सकता।

जिस परिवार मे देश को एक प्रधानमंत्री और कर्नाटक राज्य को  दो मुख्यमंत्री के कई कार्यकाल दिये हों उस परिवार के पूर्व मुख्यमंत्री से क्या किसी ज़िम्मेदारी क्रत की अपेक्षा नहीं की जानी चाहिये?? क्या इस परिवार की देश के आम नागरिक से हट कर कुछ अतरिक्त जवाबदेही के रूप मे एक आदर्श उदाहरण प्रस्तुत करने की उम्मीद नहीं की जानी चाहिये?? जब देश मे इस महामारी की बजह से मध्यम और निम्न परिवारों ने आर्थिक हानि उठाते हुए हजारों शादियाँ या तो स्थगित कर दी या सिर्फ नव दंपति के अतरिक्त परिवार के 4-5 सदस्यों की उपस्थिती मे शादियाँ सम्पन्न की गई, ऐसे ही किसी आदर्श मिसाल की आप और आपके परिवार से अपेक्षा की गई थी।  दुर्भाग्य से ऐसा कोई द्रष्टांत प्रस्तुत करने मे आप चूक गये। हाँ इस बात मे कोई शक नहीं देश के करोड़ो परिवार आपकी तरह इतने सौभाग्य शाली नहीं है जो शुभलग्न मे अपने हर संस्कार संपादित करते हों!! क्योंकि उन गरीब, विपन्न, समाज के आखिरी मुहाने पर खड़े वंचित, शोषित  व्यक्तियों, मजदूरों  और अभावों मे पले बड़े किसानों  का जन्म ही अशुभ लग्न मे होता है और उसी अशुभ घड़ियों मे सारा जीवन यापन कर जिनका  अंतिम संस्कार भी अशुभलग्न मे सम्पन्न हो जाता है। देश के सामान्य जन जहां एक ओर  चेहरे के मास्क को न लगाने, सुरक्षित  दूरी के पालन न करने और लॉक डाउन के पालन न करने  के चलते कितनी बार कभी मेढक बनने, कभी मुर्गा कभी कान पकड़ कर उठक बैठक लगाने, कभी अगबाड़े या कभी पिछ्बाड़े पुलिस के डंडे खाने को बाध्य और अपमानित होता है वही आप जैसे लोग  इस नपुंसक व्यवस्था/सरकार और उनके नौकरशाहों से वैधानिक  स्वीकृति प्राप्त कर उन्ही आम जनों पर थोपे कानून को तोड़ते है (कृपया वैधानिक अधिकार प्राप्त अधिकारी इसको स्वत: संज्ञान न ले)।   
  
श्रीमान जिस अंतिम व्यक्ति की चिंता आपने अपने ट्विट्टर अकाउंट मे डॉ॰ बाबा साहिब भीमराव अंबेडकर की जयंती पर 14 अप्रैल 2020 को की थी पर 17 अप्रैल 2020 को पुत्र के विवाह मे आपके व्यवहार और आचरण मे उस अंतिम व्यक्ति के लिये वो दुःख और वेदना देखने को दूर दूर तक नहीं मिली। ऐसा प्रतीत होता है बाबा साहिब की जयंती पर समाज के उस अंतिम व्यक्ति के प्रति आपकी संवेदना मात्र एक दिखावा था।

एक साधारण नागरिक की वेदना।

विजय सहगल             


           

गुरुवार, 16 अप्रैल 2020

लॉक डाउन पार्ट-1


"लॉक डाउन पार्ट-1"





( पिछले ब्लॉग मे आपने पढ़ा कि लॉक डाउन 1 मे कैसे हमने अपने आपको परिस्थितियों के अनुरूप अपने को ढाल समय के काल खंडों मे बाँट बिभिन्न माध्यमों मे बिताये समय का उल्लेख किया था अब अगले माध्यम के बारे मे विचार)

व्हाट्सप

सामाजिक माध्यम के एक व्हाट्सप ग्रुप का मै सदस्य हूँ इस ग्रुप मे हमारे बैंक के उच्चतम पदों सहित हम जैसे छोटे पदों से से निवृत लोग भी  इस ग्रुप के सदस्य है। ग्रुप के नियंत्रक द्वारा इस लॉक डाउन से उपजी इंटरनेट स्पीड की समस्या के कारण माननीय सदस्यों से अनुरोध कर फोटो/विडियो/प्रातः काल नमस्कार के फोटो/संदेश एवं कोविड19 से संबन्धित भ्रामक संदेश  शासन की नीति अनुसार पोस्ट न करने का निवेदन किया। पर घोर आश्चर्य कुछ सदस्य अपने स्वभाव से विवश लगातार एडमिन के निर्देश को दरकिनार वर्जित संदेश भेजते रहे। मजबूरन नियंत्रक ने ग्रुप मे संदेश भेजने की शक्ति सामान्य सदस्यों से हटा कर अपने हाथ मे ले ली। जब ग्रुप के  कुछ (सभी नहीं) इतने योग्य और बुद्धिजीवि वर्ग अपनी भावनाओं को नियंत्रित नहीं कर सकते  तो कट्टरपंथी सोच या अल्प विचार धारा के लोग इस माध्यम के दुर्पयोग से विष वमन कर  समाज और देश का  कितना अहित करते होंगे? ग्रुप के सदस्यों के इस गैरजिम्मेदारान व्यवहार ने हमे चिंतित कर दिया? हमे ये सोचने पर मजबूर कर दिया कि वास्तव मे व्हाट्सप को हम नियंत्रित करेंते है  या व्हाट्सप हमे नियंत्रित करेगा??  एक व्यक्ति या संस्था द्वारा संचालित ये व्हाट्सप जैसे सामाजिक माध्यम हमारे जैसे लोकतांत्रित देश की कानून व्यवस्था को तहस नहस कर हिंसा और दंगों मे झोंक इन सोशल माध्यमों के  अस्तित्व पर एक बहुत बड़ा प्रश्न चिन्ह खड़ा करते है ?? व्हाट्सप एवं अन्य सोशल माध्यमों  को बलपूर्वक रोकने के  सदपरिणाम 5 अगस्त 2019 को  धारा 370 को जम्मू कश्मीर से समाप्त करते समय हम देख ही चुके है कि जम्मू कश्मीर जैसे अशांत क्षेत्र धरण 370 समाप्त के दिनांक से अब तक  एक भी गोली चले बगैर या किसी भी  हिंसक घटना या हिंसा से मृत्यु  के बिना  होने का समाचार मिला!! और बही दूसरी ओर पिछले दिनों व्हाट्सप से फैली हिंसा के   दुष्परिणाम की  झलक दिल्ली मे फैले दंगों मे हम सब देख ही चुके है। अपने अंतर्निहित कर्तव्यों को भूलकर "बोलने की स्वतन्त्रता" के छद्म पैरोकारों पर संदेह कर हमारे नीति नियंतकों को उक्त सामाजिक माध्यमों को रोक लगाकर/समाप्त करने पर क्यों न विचार करना चाहिये??  क्या हम इस तरह के  सामाजिक माध्यम का उपयोग करने के सुपात्र है भी या नहीं??

समाचार पत्र

समाचार पत्र की भूमिका भी लॉक डाउन के इस समय काल मे महत्वपूर्ण रही। शुरू शुरू मे तो सोसाईटी मे समाचार पत्र के वितरण पर एकबार तो संकट के बादल छा गये। सोसाईटी मे  किसी भी बाहरी व्यक्ति के सोसाईटी के  अंदर प्रवेश न देने की नीति के कारण एक दिन समाचार पत्र का वितरण नहीं हुआ। मैंने जब सोसाईटी के एक पदाधिकारी के इस निर्णय के औचित्य पर सवाल किया तो वे कुछ भी सुनने को तैयार न थे। नोएडा के नवभारत टाइम्स के प्रबंधन से मोबाइल से संपर्क का नतीजा भी  ढीला ढाला एवं निराशाजनक रहा। अब तक मै अगले 20 दिन से मै समाचार पत्र न पढ़ने हेतु मानसिक रूप से तैयार हो गया था। निराश तो था बगैर समाचार पत्र के दो-ढाई घंटे कैसे व्यतीत होंगे। पर श्री चौधरी जो समाचार पत्र वितरक थे अच्छे आदमी है ने  कुछ रास्ता निकाल लिया  जिसके कारण समाचार पत्र निर्वाध रूप वितरित होता  रहा। शनिवार और रविवार को समाचार पत्रों की तड़क-भड़क इन दिनों नदारद है। लंबे चौड़े विज्ञापन गायब है।  समाचार पत्रों मे आजकल सिर्फ और सिर्फ समाचार है।  पर इन दिनों  इसमे सिर्फ कोरोना कोविड19 की ही चर्चा अधिक  रहती। आम पाठकों की एकांत वास से उपजी एकाकीपन को कम करने हेतु नवभारत टाइम्स की पहल रचना के अंतर्गत पाठकों की कविताए आमंत्रित की गई जो एक सुखद और प्रशंसनीय पहल रही।  एक बात बताऊँ एक असफल रचना भेजकर मै भी इसका सहभागी रहा। एनबीटी रंगमंच द्वारा ऑन लाइन  आयोजित कार्यक्रम मे प्रसिद्ध बांसुरी वादक  श्री रौनू मजूमदार का बांसुरी वादन एक सुंदर प्रस्तुति थी जिसमे सहभागिता कर मैंने श्री मजूमदार जी से जीवंत संपर्क किया जो एक यादगार पल था।  समाचार पत्र के पठन पाठन मे इन दिनों लगभग 2 घंटे व्यतीत करना एक बहुत ही अच्छा माध्यम बना। 8 घंटे के शयन काल को निकाल कर शेष बचे 16 घंटे मे समाचार पत्र मे व्यतीत 2 घंटे जो लगभग 12.5% होता है जो  लॉक डाउन के समय का बहुत ही शानदार  सदोपयोग  है और 12.5% एक बहुत बड़ा हिस्सा भी। जिसे  प्रसन्नता पूर्वक व्यतीत किया जा रहा है। समाचार पत्र की इस अहम भूमिका इन दिनों ही समझ आई।  

इन 21 दिनों के लॉक डाउन मे मेरे जीवन की कमोवेश यही दिनचर्या रही। परिवार के सभी सदस्यों के साथ सुबह का नाश्ता, खाना शाम की चाय पर एक साथ बैठना, रात्री भोजन मे विविध तरह के भोज्य, व्यंजन, भोजन, आहार और पेय पर शोध और प्रयोग लगातार चलते रहे। रसोई के कामों मे बेटी द्वारा  बराबरी से पत्नी का हाथ बँटाना नित्य का क्रम होता। अपने पीएचडी के शोध को कुछ समय विराम देकर बेटी स्नेहा का घर मे पोंछा लगाना सुखद अनुभूति कराता कि कैसे किसी परिवार के सारे लोग मिलजुलकर किसी समस्या को सामना कितनी आसानी से कर सकते  है!!  दोनों बेटे जहां फल सब्जी एवं  दैनिक आवश्यकताओं की अन्य वस्तुओं को  3-4 दिन मे एक बार नजदीक के स्टोर से लेकर आते एवं  घर के अन्य कामों परिवार का हाथ बंटाते और बाकी समय घर से ऑफिस का कार्य करने मे बिताते।  दोपहर मे प्रायः माँ, भाइयों, बहिनों से फोन और दृश्य श्रवण माध्यम से "अत्र कुशलम तत्रास्तु" पश्चात अन्य बातों पर   चर्चा हो जाती। सुबह शाम को चाय पे चर्चा मे परिवार मे स्थानीय स्तर से अंतर्राष्ट्रीय स्तर तक की चर्चा होती। मै भी अपने कुछ घनिष्ठ मित्रों से शाम के लंबी चर्चा मोबाइल पर  कर लेता। लॉक डाउन के  इस दौर मे  इतनी  फिल्मे देखी जितनी शायद पिछले 7-8 साल मे न देखी होंगी। लॉक डाउन के आखिरी दिन की खुशी मे मेरी बेटी ने मूंग की दाल का बहुत ही स्वादिष्ट हलवा बनाया। लॉक डाउन समाप्त होने की खुशी को  तो सुबह दस बजे प्रधानमंत्री महोदय  द्वारा आगे  9 दिन स्थगित कर दिया पर हलवा से उपजी  स्वादिष्ट, मधुर, सरस सुखद खुशी का भरपूर आनंद सारे परिवार ने दिनभर  मिलजुल कर खूब उठाया। 
     
21 दिन के लॉक डाउन का आज अंतिम दिन है हम जैसे करोड़ो श्रोता सिर्फ और सिर्फ आकाशवाणी के साथ कोरोना कोविड19 से उपजी महामारी के कारण  देश के सामने उत्पन्न कठिनतम दौर से निजात पाने के लिये लागू   लॉक डाऊन को सफल बनाने एवं उसका हिस्सा बनने मे अपने आप को गौरवान्वित महसूस करते है। परिवार का साथ इस कठिन दौर से उवरने मे सबसे महत्वपूर्ण रहा। टेलिविजन, समाचार पत्र और सामाजिक माध्यमों की भी अपनी एक अहम भूमिका अपना स्थान रखती है। इस लॉक डाउन से उपजी एकाकी निर्जनता  ने अन्य माध्यमों के साथ   विविध भारती और एफ़एम गोल्ड के इस योगदान को भुलाया नहीं जा सकता।  हमे उम्मीद ही  नहीं द्रढ़ विश्वास है सरकार के निर्देशों के अनुपालन करते हुए समाचार पत्रों, टेलिविजन और  विविध भारती और एफ़एम गोल्ड जैसी  नाव पर सवार करोड़ो देशवासी कोविड19 रूपी समस्या के भवसागर से अवश्य ही पार होकर विजयश्री का वरण करेंगे।  (समाप्त)

विजय सहगल 

मंगलवार, 14 अप्रैल 2020

लॉक डाउन पार्ट-1


"लॉक डाउन पार्ट-1"





पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य जी की ये सद्वाक्य आज के पूर्ण बंद (लॉक डाउन) की मौजूदा संकट की  परिस्थितियों का सामना करने के लिये एकदम सटीक है कि  "प्रसन्न रहने के दो ही उपाय  हैं, आवश्यकताएँ कम करें और परिस्थितियों से तालमेल बिठाएँ"। मेरा मानना है कि समय और परिस्थितियों का नियंत्रण किसी भी व्यक्ति के वश मे नहीं है। या तो आप परिस्थितियों से दुःखी हो पल-पल, तिल-तिल घुटते रहे या आचर्य जी की उक्ति के अनुरूप अपनी आवश्यकताओं को सीमित कर अपने आपको उन परिश्थितियों के अनुरूप ढाले, हमने ऐसा ही किया। लॉक डाउन जैसी घटना "न भूतो न भविष्यति" न तो अब तक हुई और न भविष्य मे होगी। सारे विश्व मे एक साथ ऐसी आपदा का घटित होने उल्लेख नहीं मिलता। सरकार के  घर मे एकांत वास के निर्देश का शब्दशः पालन मैंने अपने 13वी मंजिल के अपने फ्लैट मे रह कर किया। समस्या तो गंभीर थी पर दिन भर के समय काल को खंडों मे बांटने से समस्या कुछ आसान हो गई। इन काल खंडों को आधुनिक तकनीकों से  अपने आपको जोड़ने से हर दिन को प्रसन्नता पूर्वक व्यतीत करने मे आसानी रही इन मे निम्न माध्यम मुख्यतः रहे:-

आकाशवाणी की विविध भारती एवं एफ़एम गोल्ड सेवा  

फ्लैट के बाहर प्रातः पौने छः बजे अपने नियमित समय पर उठ कर रेल के डिब्बे जितने लंबे गैलरी मे हमारा प्रातः भ्रमण शुरू हो जाता जो लगातार प्रातः 05.45 के लगभग शुरू होकर  7.20-30 तक जारी रहता। भ्रमण और सुरीले भजन के साथ साथ श्रवण अद्भुद होता, लगभग सवा घंटे के थकाऊ और मैराथन पद संचलन से उत्पन्न थकान विविध भारती एफ़एम बैंड (106.4) से  कभी भीमसेन जोशी, कभी पंडित जसराज और कभी जगजीत सिंह, हरिओम शरण और अनूप जलोटा के  भजन सुनकर तिरोहित हो जाती। इस भ्रमण मे हमारा साथी (100.1 पर) एफ़एम गोल्ड भी बीच बीच मे हो जाता।  इस संकट की घड़ी मे विविध भारती के कार्यक्रमों मे भी भारी फेर बदल किया गया। जो विविध भारती के दशकों से चली आ रही अपनी परंपरा से हटकर था। विविध भारती 5.52 बजे सुबह शुरू करने के बजाय आज कल 24x7 श्रोताओं की सेवा कर रही है। 24 घंटे की सेवा के कारण प्रातः विविध  भारती की चित परिचित विशेष  धुन गायब रहती। 6 बजे प्रातः के समाचार से 2-3 मिनिट पहले बजने बाली विस्मिल्ला खाँ की शहनाई भी इन दिनों सुनाई नही पड़ी। प्रातः 6 बजे, पाँच मिनिट के समाचारों का समय 10 मिनिट हो चुका है। समाचार देश और दुनियाँ मे फैल रही महामारी कोरोना कोविड19 के इर्द-गिर्द ही घूमते। आकाशवाणी के इन दोनों स्टेशन से नवीनतम समाचार देश और विश्व के लगातार मिलते रहते।   "वंदनबार" कार्यक्रम  कुछ दिन लॉक डाउन मे चला लेकिन इसमे रामचरित मानस के और जुड़ जाने से भक्तिमय कार्यक्रम के विस्तार से  और रौनक आ गई। जिसके बाद 23 मिनिट का बंदनबार बदस्तूर सुनने से मन को भारी सुकून मिलता। भूले बिसरे गीत का अंतराल थोड़ा कम जरूर हुआ पर कार्यक्रम की गहराई मे कही कोई कमी न हुई। इस दौरान कभी कभी 100.1 मीटर पर एआईआर का एफ़एम गोल्ड का भी श्रवण करते। एफ़एम गोल्ड भी काफी बदला बदला नज़र आया, या यूं कहे कि एफ़एम गोल्ड एक तरह से कोरोना कोविड-19 से पीढ़ित हो एकांतवास (कोरंटीन) मे चला गया। स्टाफ की कमी एवं अन्य नीतिगत निर्णयों के चलते इस का स्थान 24x7 एआईआर न्यूज़ ने ले लिया। इन रेडियो स्टेशन के नये रूप के श्रवण/दर्शन भी अच्छे लगे।

शाम को चाय पीने के बाद साढ़े पाँच-पौने छः बजे से विविध भारती के संग हमारी दूसरे सभा पुनः शुरु हो जाती। "शाम सिंदूरी" मे 60 के दशक से 70-80 के दशक तक के पुराने फिल्मी गीत बड़े मनभावन लगते। लगभग 30 से 45 मिनिट तक रेल के डिब्बे नुमा गलियारे मे चहल कदमी होती। नॉन स्टॉप बगैर श्रोताओं के नाम-उपनाम और पते सुने पुराने गाने हमे भ्रमण से उपजी थकान का अहसास भुला देते। यध्यपि मै विविध भारती का  चालीस साल से भी ज्यादा पुराना श्रोता हूँ पर  अनुगूंज कार्यक्रम इसी लॉक डाऊन मे सुना अच्छा लगा। एक दिन श्री उपेन्द्रनाथ अश्क का साक्षात्कर उनकी ही आवाज मे सुना मंत्र मुग्ध कर गया। श्री  मुक्ति बोध और महान कवि सुब्रमण्यम भारती का तमिल भाषा के स्वर्णिम योगदान पर आकाशवाणी के श्रेष्ठ जनों द्वारा तैयार कार्यक्रम बहुत  ही अच्छा लगे  जिसकी जितनी भी प्रशंसा की जाये कम है। इस पर आने बाला कार्यक्रम शाम 6.30 से 7.00 बजे तक  मार्केट मंत्रा भी सुनने मे अच्छा जानकारी देने बाला लगा।

 शाम 7बजे के समाचार के बाद "शाम सिंदूरी" कार्यक्रम जय माला के पूर्व तक जारी रहता। लगभग पैतालीस मिनिट गैलरी मे घूमने के बाद आराम के कुछ क्षण विताने हमारी बैठक बारहवी-तेरहवी मंजिल के मध्य की सीढ़ियों के चबूतरे पर जो सैक्टर 50 की मुख्य सड़क पर खुलती,  लगभग 1.30 घंटे की बैठक घर से लाई प्लास्टिक की कुर्सी पर होती। इस दौरान विविध भारती का श्रवण और सुदूर-दूर छत्तों पर खेलते बच्चों, आती जाती आवश्यक वस्तुओं की गाड़ी, यदा कदा सड़क पर दौड़ती कारें  और स्कूटर को आते जाते देख कर समय व्यतीत करता। कुछ दिन पूर्व तक सड़क के पार आईपीएस स्कूल और मानव रचना स्कूल जहां सैकड़ो बच्चों की चहल-पहल रहती थी पर आज बच्चों के बिना वीरान पड़े है।  इसी दौरान शाम 7.00 बजे के आस पास एक साथ सड़कों, गलियों की  लाइट जलने  से नोएडा रोशन हो जाता जो एक बहुत ही शानदार और मनोहारी द्रश्य प्रस्तुत करता। शाम 7 बजे के 5-10 मिनिट आगे पीछे  सुरक्षा एवं अन्य सरकारी ड्यूटि मे लगे कर्मियों को लाने, ले जाने  ब्लू लाइन की मेट्रो को देखना बचपन मे गाँव से गुजरती रेल और मालगाड़ी को गुजरते देखना और उन के डिब्बों को गिनना की  यादे ताजा कर देता। नियत समय पर मेट्रो को आते जाते देखने का लोभ संभरण मे एक भी  दिन की चूक नहीं हुई।  इसी दौरान जय माला मे कुँवर विक्रमजीत सिंह, किरण जुनेजा, कारगिल युद्ध के नायक  कैप्टन स्व॰ विवेक गुप्ता   के बारे मे जानना मेरे लिये नया अनुभव था। इसी लॉक डाऊन के दौरान एक बार एफ़एम रेडियो के दोनों स्टेशन मे से किसी पर जब आकाशवाणी केंद्र कठुआ, कोहिमा और श्री नगर के स्टाफ से बात चीत दिल को छू गई। कितनी कठिन परिस्थिति और कितने कम स्टाफ  के साथ आकाशवाणी केंद्र के स्टाफ बड़ी कर्मठता और समर्पण के भाव से अपने आकाशवाणी केंद्र से कार्यक्रमों को प्रसारित कर रहे थे। स्वर एक रंग अनेक मे पंडित श्री जसराज जी और पंडित आशकरन शर्मा जी की वार्ता अच्छी लगी। भारतीय संगीत के रगों से सरावोर "रसिकनी राधा पलना झूले" सुनकर  आनंद आ गया। सर्वोच्च वीरता के पदक से सम्मानित  स्वर्गीय कैपटिन विवेक गुप्ता की वीर गाथा आज के जयमाला कार्यक्रम के अंतर्गत बहुत ही हृदयस्पर्शी लगी देश के इस जांबाज सेना अधिकारी ने 29 साल की उम्र मे भारत माता की रक्षा के लिये अपना जीवन आहूत कर दिया। कारगिल युद्ध के इस बीर सपूत को हार्दिक नमन।

21 दिनों के इस लॉक डाउन मे आकाशवाणी के विविध भारती एवं एफ़एम गोल्ड के सभी स्टाफ सदस्यों का बड़ा योगदान रहा। आकाशवाणी के सभी अधिकारी कर्मचारी इस हेतु बधाई के पात्र है। एक-दो दिन पूर्व किस तकनीकी खराबी के चलते विविध भारती के प्रसारण केंद्र  से (शायद शाम को) से लगभग 10 मिनिट प्रसारण बंद रहा नहीं मालूम?? एक दिन सुबह  समाचार वाचन के दौरान पृष्ठभूमि से आने बाली "चीं-चीं" की आवाज बड़ी ही भद्दी लगी जो शायद उद्घोषणा कक्ष मे लगे दरबाजे से आ रही होगी। संबन्धित अधिकारियों को समाचार के दौरान इस भद्दी आवाज को बंद करने हेतु कार्यवाही अपेक्षित है।

टेलिविजन

यूं तो टेलिविजन आज के दौर का सबसे मुख्य साधन है जो मनोरंजन के साथ समाचारों के माध्यम से देश दुनियाँ की खबर देता है।  इस दौरान भरसक कोशिश रही कि टीवी के समाचार चैनलों पर राजनैतिक दलों और कुछ तथाकथित मूर्ख और पाखंडी, बेबकूफ और मंदबुद्धि राजनैतिक विश्लेषकों के बीच की कुत्तों जैसे संग्राम रूपी चर्चा, और मिस्टर खीश के प्राइम टाइम  का हिस्सा न बनू। इस दौरान डिस्कवरी, डिस्कवरी साइन्स, हिस्ट्री चैनल का भी उपयोग खूब किया। मैन वर्सिस वाइल्ड मे बेयर ग्रिल्ल्स की साहस और चुनौती से परिपूर्ण यात्रा सुखद रोमांच देने बाली लगतीं। (क्रमश:)


विजय सहगल 

शनिवार, 11 अप्रैल 2020

घूमती कुर्सी




"घूमती कुर्सी"


बड़ी विपरीत हालातों मे साढ़े चार साल की कार्यावधि  पश्चात  बड़े अहसानों के बाद हमारे उच्चाधिकारियों ने  मेरा स्थानांतरण प्रबन्धक के रूप मे मेरे घर से लगभग 1500 किमी दूर तब के छत्तीसगढ़ स्थित रायपुर मे एक नई शाखा को शुरू करने के लिये किया गया था। इतनी दूर बैंक मे स्थानांतरण कुछेक अपवादों को छोड़ कर प्रायः प्रोन्नति, आपके निवेदन या फिर सजा के तौर पर ही किये जाते रहे है। हमारे विषय मे पहले दो तर्क लागू नहीं थे अतः मै मान कर चला था घर से इतनी दूर पदस्थापना मुझे तीसरे कारण से ही किया गया होगा। लेकिन अपने ईष्ट के इस कथन पर हमारा दृढ़ विश्वास था "कि प्रसन्न रहने के दो ही उपाय  हैं, आवश्यकताएँ कम करें और परिस्थितियों से तालमेल बिठाएँ"।  मात्र इस एक सूत्र के कारण ही बेमन से स्वीकार्य ये पदस्थपना मेरे  बैंकिंग सेवा काल की सर्वश्रेष्ठ पदस्थपना साबित  हुई। पहली बार रायपुर पहुँचने पर हमारे बैंक के मात्र एक-दो अंतरंग  मित्रों के सिबाय, अंजान और अपरचित इस शहर मे कोई भी जानकार न था। पर बैंक के  लगभग चार वर्ष बाद हमारे बैंक के  सहचर, सहयोगी, साथी, बैंक के माननीय संरक्षक एवं  ग्राहक गण, मेरे आवास के मेरे पड़ौसी, मित्रगण एवं शुभचिंतक रूपी एक बहुत बड़ा कोषालय छत्तीसगढ़ की संस्कारधानी मे हमने इस दौरन एकत्रित कर लिया था। बीस साल बाद रायपुर के  मित्रों, शुभचिंतकों, पडौसी और बैंक के माननीय ग्राहकों से मिले सम्मान, स्नेह, प्यार और अपनेपन रूपी धरोहर हमारे अमूल्य खजाने की शोभा आज भी बढ़ा रही है।

शाखा के उद्घाटन के अवसर के उस एक पीढ़ादायक  क्षण को मै आज भी नहीं भूल पाया जब हमारे नियंत्रण कार्यालय के एक  उच्च अधिकारी ने उद्घाटन के मुख्य कार्यक्रम के पश्चात फुर्सत के समय बातों ही बातों मे ये कह कर मेरा ध्यानाकर्षण गोदरेज कंपनी की उस तांत से बुनी हत्थे बाली मैनेजर की कुर्सी की तरफ इशारा  कराया जिस पर मै बैठा था  कि "you  know घूमने बाली कुर्सी तुम्हें allow नहीं है"। मै ये सुनकर घोर आश्चर्य चकित और हैरान था कि मैंने तो कुर्सी के संदर्भ मे कभी कोई भी सवाल किया ही नहीं था तो क्योंकर माननीय महोदय ने इस घूमती कुर्सी न देने की बात का स्मरण मुझे कराया? मै बैसे ही उस समय वक्त और हालात का सताया हुआ था कुछ भी उत्तर/प्रत्युत्तर देने की स्थिति मे न था। मन मार कर चुप रह गया!!  पर न जाने क्यों रह रह कर मेरे दिमाक मे उन माननीय के "घूमने बाली कुर्सी" के बारे मे  कहे गये बो शब्द  "you know.........कानों मे डाले गये गर्म तेल की तरह    बड़े दिनों तक गूँजते रहे। जब जब वे शब्द मुझे याद आते मै हीन भावना से ग्रसित हो अपराध बोध  से भर जाता। बगैर किसी अपराध या त्रुटि के उन माननीय द्वारा हमारे प्रति इस व्यवहार को आज तक मै  समझ न सका  कि आखिर क्यों कर उन्होने मुझे  घूमने बाली कुर्सी न देने की बात का स्मरण कराया जबकि मैंने उन्हे शाखा के उद्घाटन बाले दिन या शाखा के उद्घाटन के पूर्व तैयारी के समय घूमने बाली कुर्सी तो क्या किसी भी तरह की सुविधा, वस्तु या स्थान की  ईक्षा या आकांक्षा प्रकट की थी? तो फिर घूमने बाली  कुर्सी की क्या विसात!! मेरा इस सद्वाक्य मे द्रढ़ मत था कि "दूसरों के साथ वैसी ही उदारता बरतो, जैसी ईश्वर ने तुम्हारे साथ बरती है" माननीय महोदय शायद इस सद्वाक्य को स्मरण न रख सके। धीरे धीरे कुछ दिनों और महीनों मे घूमने बाली कुर्सी की बात हमारे मानस पटल से विस्मृत हो गई और सहज़ ढंग से बैंक का कार्य अपनी सामान्य गति से चलता रहा।

कुछ महीनों बाद शाखा मे एक दिन सहायक प्रादेशिक प्रबन्धक का दौरा हुआ। एआरएम महोदय ने अस्थाई छोटे परिसर मे उपलब्ध साधनों के रहते  बैंक के निरीक्षण के दौरान ही कुछ आवश्यक निर्देश दिये इसी दौरान उन्होने मेरी हत्थे बाली तांत से बनी कुर्सी के बारे मे पूंछा और बैंक की नीति के तहत घूमने बाली कुर्सी के न होने पर  सवाल किया? मैंने जब उन्हे शाखा के उद्घाटन पर उन  उच्च अधिकारी के "घूमने बाली कुर्सी" न देने के निर्णय से अवगत कराया। तब  उन्होने नई शाखाओं के खोलने पर बैंक द्वारा  उपलब्ध कराये जाने बाले फ़र्निचर के प्रधान कार्यालय की नीतियों और  निर्देश का उल्लेख करते हुए गोदरेज के स्थानीय डीलर को फोन कर "घूमने बाली कुर्सी" का कोटेशन प्रादेशिक कार्यालय भेजने और कुर्सी क्रय करने की अग्रिम  अनुमति दी तो मै एक बार फिर गुजरे जमाने की घूमने बाली कुर्सी की कहानी मे कहीं खो गया। हमे ये सुन और जान कर बड़ा आश्चर्य हुआ बैंक की नीति होने के बाबजूद उन माननीय द्वारा घूमने बाली कुर्सी न देकर वे हमे क्या संदेश देना चाहते थे? क्या उनका इरादा हमे हेय द्रष्टि से दिखाने का था? हमारे ऊपर उनकी पूर्वाग्रह ग्रसित सोच का तो कोई  विशेष असर नहीं हुआ  पर उनके बारे मे मेरे दिल को सोचने के लिये मजबूर जरूर कर दिया कि क्यों कुछ आदमी अपनी पद प्रतिष्ठा से मिली शक्ति के मद मे अहंकार से ग्रसित हो अपने अधीनस्थों के प्रति इतना दुराग्रह रखते है?? अपनी हठधर्मिता से वशीभूत ऐसे लोग अपने मातहतों  के विरुद्ध ऐसा पूर्वाग्रह क्यों रखते है? वे भूल जाते है कि पद प्रतिष्ठा से प्राप्त शक्ति, यौवन की तरह  चिरस्थाई नहीं है? प्रबंधन मे बैठे कुछ लोगो की इस नकारात्मक सोच ने हमारी संस्थान एवं मानव संसाधन का बड़ा अहित किया है। मेरा मानना है कि पद प्रतिष्ठा से प्राप्त शक्ति का उपयोग गुरवाणी के उस शबद कीर्तन के सार की तरह होना चाहिये जिसमे "शूरा सो पहचानिये जो लरे दीन के हेत, शूरा सोई" । असली  मान सम्मान बही है जब पद प्रतिष्ठा रूपी शक्ति के न रहने के बाद भी आपके मित्र, शुभचिंतक एवं  अधीनस्थ  आपके कार्य व्यवहार के प्रति वही मान सम्मान और श्रेष्ठता का भाव रखे जो आपके पद पर रहते हुए रखते थे।

कुछ दिन बाद जब घूमने बाली कुर्सी आई। मेरे मन मे संत कबीर दास जी कि इन पंक्तियाँ का स्मरण हो आया कि "दास कबीर जतन करि ओढ़ी, ज्यों की त्यों धर दीनी चदरिया"। तब भी उस कुर्सी पर मै अनासक्त भाव से इस तरह  बैठा कि एक दिन इसे छोड़ कर हमे पुनः जाना है। कुर्सी पर बैठे बैठे मन ही मन अपने और अपने हालात पर काफी हँसता और मुस्कराता रहा  कि उन माननीय ने शायद मुझे घूमने बाली कुर्सी न दे कर मुझे मेरी हैसियत दिखाई थी या कदाचित अपनी .......  बताई थी!!!!

विजय सहगल       
                   

बुधवार, 8 अप्रैल 2020

रण-कोरोना


"रण-कोरोना"



उठो रण के देवता तुम, युद्ध  का उद्घोष  कर दो।
तिष्ठोत्तिष्ठ भारत अब युद्ध का जयघोष वर दो॥  
अदृश्य शत्रु की दिशा क्या?
श्रोत शक्ति की दशा क्या?
तीर  तरकश मे है जितने?
सिद्ध उनमे से है कितने?
अभेद व्यूह को भेद, गढ़ शत्रु का ज़मींदोज़ कर दो।
उठो रण के देवता तुम, युद्ध  का उद्घोष  कर दो।  
तिष्ठोत्तिष्ठ भारत अब युद्ध का जयघोष वर दो॥  
दमन रिपु  का रोकना है,
शमन शत्रु, अब शोक ना है।
कवच को धारण करे फिर,
घात अस्त्र  का  थोपना है॥
दधीचि-अस्थि का वज्र, हर वीर के आगोश भर दो।       
उठो रण के देवता तुम, युद्ध  का उद्घोष  कर दो॥  
तिष्ठोत्तिष्ठ भारत अब युद्ध का जयघोष वर दो॥  
रक्तबीज से ये पोषित,
एक से बनते ये दस है।    
दशानन अवशेष निष्ठुर,
क्रूर, बर्बर निपट वश है॥
विष अणु कोरोना से, विजय भव: का जोश भर दो।
उठो रण के देवता तुम, युद्ध  का उद्घोष कर दो॥  
तिष्ठोत्तिष्ठ भारत अब युद्ध का जयघोष वर दो॥  
क्षेत्र रण का है असीमित।
रीति वैरी, भी अनियमित॥
ललकार कोरोना ने है ठानी।
दृढ पराजय, युद्ध अभिमानी॥  
धर्मसंस्थापनार्थाय हरि हे!, रणभेरी विजयीघोष भर दो।
उठो रण के देवता तुम, युद्ध  का उद्घोष कर दो॥  
तिष्ठोत्तिष्ठ भारत अब युद्ध का जयघोष वर दो॥  
     
विजय सहगल