"केश कर्तन"
मैंने ज़िंदगी मे अनेकों बार परम्पराओं से हट कर काम
किये है जिनको करने से मेरे दिल को सकून
मिला है। खर्चीली शादियो मे फिजूल खर्ची मैंने देखी और महसूस की थी जिनको देखकर मैंने तय किया था
कि मै अपनी शादी इस फिजूल खर्ची मे पैसा वर्बाद करने से बचने के लिये दिन मे शादी
करूंगा और मैंने ऐसा किया भी। लॉक डाउन-2 मे ऐसे ही एक कदम उठाने को आज मै मजबूर हुआ
जो "न भूतो न भविष्यति:" की तर्ज़ पर न पहले किया और भविष्य मे भी शायद न
हो।
ग्वालियर और नोएडा प्रवास के कारण लॉक डाउन-1 के 25
मार्च 2020 को शुरू होने के दिन तक मै अपने बाल कटाने मे पहले से ही 20-25 दिन लेट
हो चुका था। तीन हफ्ते के लॉक डाउन ने बालों की समस्या को और बढ़ा दिया था और
रही-सही कसर लॉक डाउन-2 ने पूरी कर दी। मेरे बाल काफी बड़े होकर मेरे लिये समस्या हो गये थे। बैसे बालों मे
अनासक्त भाव के चलते मैं पहले भी दो बार बिना पूर्व निर्धारित कार्यक्रर्म के चलते
बालों को "तिरुपति बालाजी" मे समर्पित
कर चुका था, सिर्फ ये महसूस करने की बगैर बालों के कैसा लगता है। देश मे पूर्ण तालाबंदी के चलते जब-जब
मै अपने फ्लैट की 13वी मंजिल पर बैठता या घर के अंदर पंखे के नीचे बैठता तो बाल उड़
कर यहाँ-वहाँ और कभी आँखों के सामने आ जाते। मुझे बचपन के दिन याद हो आये जब हमारे
घर के बाहर एक टेलर मास्टर बैठा करते थे। खाली वक्त मे स्कूल से बापसी मे या
छुट्टियों के दिन घंटों मै उनकी दुकान पर समय व्यतीत किया करता था। मास्टर साहब थे
तो बड़े अनुभवी पर दिखावे और तड़क-भड़क से दूर सीधे साधे इसिलिये शहर उनके ग्राहक कम
देहात के ज्यादा आते। घंटे दो घंटे मे पजामा, अंडरवियर, शर्ट-पैंट सिल के देना उनकी विशेषता थी। जब तक
किसान बाज़ार हाट करके आता, घंटे आधा घंटे टेलर मास्टर की दुकान पर आराम फरमाता तब तक कपड़े
सिल के तैयार। कई बार हम भी हाथ आजमा लेते। पेंट शर्ट तो कठिन था पर देशी अंडरवियर, पाजामा सिल हम भी अपना
हाथ साफ कर लेते। अक्सर हम जैसे नौसिखियों पर मास्टर कहावत कहता "मोड़ा सीखे
नाऊ को सिर कटे किसान को" अर्थात नाई का लड़का बाल काटना सीखने को देहातियों
के बाल काट कर आजमाइश करता। जब हम कहते मास्टर कहीं सिलाई मे कुछ कमीवेशी या गड़बड़ हुई तो ग्राहक नाराज़ न हो जाये? बड़े निश्चिंत भाव से हंस कर
जबाब देता क्यों चिंता करते हो "कौन उसका बाप दर्जी है जो कमी निकलेगा"!!
जब हम कागज काट सकते, कपड़ा काट सकते, घर के सामने न जाने कितनी बार मशीन से घास की कटाई
की तो लॉक डाउन मे आज देश पर आये संकट के समय हम अपने बाल क्यों नहीं काट सकते?? आज इसी चुनौती को स्वीकार, "किसान और नाई"
की उसी कहावत से हमे भी दो चार होना पड़ा। बाल काटने का तो अनुभव नहीं था पर बाल
कटवाने का तो 60-62 साल का अनुभव था ही। आज सुबह कैंची लेके बाथरूम मे बालों से
ज़ोर आजमाइश शुरू कर दी, सिर का बजन जो हल्का करना था। आईने के सामने कैंची कंघा लेकर काम शुरू किया ज्यों ही कंघे से
बालों को उपर उठाया ही था कि कैंची से उनको काट कर हल्का करे, कैंची कभी ऊपर तो कभी
नीचे हवा मे ही चलती रही बाल सामने होते हुए भी कैंची के फंदे मे नहीं फंस रहे थे।
बड़ी उलझन हुई तब कंघे को विदा किया। एक
हाथ से लटों को पकड़ा और बाल कटवाने के अनुभव के आधार पर माथे पर लाये और कैंची से उन्हे छोटा कर दिया।
कभी बाल कैंची के बीच आते और कभी बगैर आये बच कर निकल हमारे अनाड़ी पन पर इठलाते।
साइड की "कलमे" जैसे तैसे कटी और उनको सेविंग करते समय दोनों तरफ एक सा
तो कर लिया पर कान के उपर कैंची चलाना भरी पड़ गया न जाने कैसे बालों के चक्कर मे
कैंची ने कान के किनारे आक्रमण कर दिया बो तो खुश किस्मत रहा कैंची कान को हल्के
से छू के निकल गयी। एक हाथ से बालों को पकड़ कर आगे करता तो शीशे मे बे पीछे नजर आते, उन्हे उपर करते पर कैंची नीचे
हो जाती, जब जब उनके उपर कैंची चलाता पर कैंची बार बार निशाने चूक जाती।
बड़ी मुसीबत खड़ी हो गई। रह रह कर वो कहावत याद आने लगी "बिच्छू का मंत्र न जाने
साँप के बिल मे हाथ डाले"। अब मुसीबत तो आ गई थी जैसे तैसे छुटकारा भी पाना
था। अब तो स्टाइल से ज्यादा बजन के हिसाब से बाल कटना शुरू कर दिये। पहले तो बालों पर कैंची चलाई पर अब कैंची के रास्ते मे
जो भी बाल आये उड़ा दिये। अब तो बस एक ही लक्ष्य था बालों का बजन हल्का करना है।
सिर के पीछे के बालों का जब नंबर लगा तो
लगा "आज आया ऊंट पहाड़ के नीचे"। जैसे "पेड़ पर तो चढ़ गये पर उतरना न आया" पर बहुत प्रयास के
बाद भी ज्यादा सफलता न मिली तब लगा यहाँ सिर
भी अपना है और सीख भी मै ही रहा हूँ। अब तक वॉश वेसिन मे काफी मात्रा मे बाल एकत्रित
हो गये थे मानसिक रूप से न सही भौतिक रूप से देख कर खुशी जरूर हो रही थी कि वांछित
वजन तो कम हो ही गया। लेकिन एक बात की तस्सलि थी कि जितने भी बार्बर देखे जिन्होने
हमेशा दूसरों के बाल काटे होंगे पर मै दुनियाँ मे अपने आप मे एक ऐसा इकलौता हज्जाम रहा हूंगा जिसने अपने बाल स्वयं काटे
हों!! ये तो घर की खेती है इसलिये चिंता नहीं थी कि चलो इस बार की फसल खराब हो गई अगली
फसल लॉक डाउन के बाद नाई से ठीक करा लूँगा। परखिये खुद मेरे द्वारा मेरा केश कर्तन, "है न परम्परा से हटके काम"??
विजय सहगल















