रविवार, 22 मार्च 2020

बैंड बाजा और बारात



"बैंड बाजा और बारात"





बैंड बाजों की धुन अलग अलग कारज  पर अलग अलग तरह की होती है इसको हम जैसे छोटे शहरों के वासिंदे बचपन मे ही समझने लगे थे। झाँसी मे हमारा घर मुख्य शहर मे ही था सड़क से लगभग डेढ़  सौ फीट अंदर  जब कभी दूर सड़क से कोई बैंड बाजे की आवाज अंदर घर मे   सुनाई देती  तो हम लोग समझ जाते कि ये बाजे बारात के है या किसी धार्मिक समारोह जैसे मंदिर मे पोशाक चढ़ाने, झण्डा चढ़ाने के या किसी व्यक्ति के देहावसान के वक्त निकलने वाली शवयात्रा के। क्योंकि अलग अलग कार्यों और अवसरों पर बैंड की धुन अलग होती थी। किसी व्यक्ति की शव यात्रा मे बाजे अलग धुन मे बजाये जाते जिसमे ट्रंपेट से  रामधुन बजती जिसे सुन कर घर के प्रायः सभी आसपास के घरों के लोग  बाहर चबूतरे पर या छत्त पर आ जाते और मृतक के प्रति प्रणाम करते चप्पल या जूते पहने सड़क पर चलते व्यक्ति अपने चप्पल या जूते उतार कर मृतक के प्रति सम्मान का भाव कर कुछ कदम उसी दिशा मे चलकर प्रणाम करते। ऐसे संस्कार प्रायः सभी परिवारों मे हम जैसे सारे  बच्चों मे बचपन से ही आ गये थे।

धार्मिक कार्यक्रमों मे बैंड की धुन देवी भजन या  रामायण की चौपाई "मंगल भवन अमंगल हारी"...... की धुन मृदंग वादन के साथ चलती। दशहरे पर राम रावण युद्ध के रूप मे भगवान राम चंद्र जी की युद्ध आवाहन करती यात्रा भी हम लोगो के घर से निकलती जिसमे जय घोष का नारा बैंड बाजों के वाद्य यंत्रों के माध्यम से बजाया जाता। कुछ लोग रमतूला को बजाते हुए बारात मे सबसे आगे चलते और अपने विशेष ध्वनि से युद्ध का शंखनाद करते।  उन दिनों भूतनाथ मंदिर और काली मंदिर, लक्ष्मी गेट से से शिवरात्रि पर भी एक विशाल शिव बारात निकाली जाती जिन मे झाँसी के बैंड बाजे बड़ी जोश खरोश से भाग लेते।  सुनते है इन कार्यक्रमों मे ये बैंड बाजे बाले अपनी नि:शुल्क सेवायें देते थे। गणेश चतुर्दशी के सप्ताहांत चलने बाले चाचर जैसे बुन्देली लोक नृत्य नगड़िया जैसे वाद्य यंत्र के विना अधूरे रहते। मै खुद भी चाचर जैसे लोक नृत्य का सहभागी बन अपने आपको नगड़ियाँ की जोश भरी आवाज पर अपने पैरों और हाथों मे ली चाचर को अगल बगल के साथी से लयवध्य होकर ज़ोर से टकराता जो एक अलग तरह के उत्साह और उमंग और रोमांच को प्रतिध्वनित करता था।   

बारात आदि मे ट्रंपेट या मशकबीन (बैग पाइपर) पर फिल्मी गाने, नागिन की धुन "तेरा मन डोले मेरा मन डोले......." या "आज मेरे यार की शादी है......" जैसे अनेक गीत बाजाये जाते जिसकी धुन पर बच्चे, युवा जम कर थिरकते थे। नगाड़े और शहनाई 2-3 दिन पहले से शादी बाले घर मे दिन भर बजाई जाती। बारात और विदाई के समय रमतूला का बजाना शुभ फल दायक माना जाता था और आवश्यक रूप से सभी वर्ग के लोगों के यहाँ बजाया जाता था। इन बाध्य यंत्रों के बजाने बाले अपने अपने यंत्रों मे महारत हासिल करने बाले उस्ताद या मास्टर कहलाते थे। 
  
बचपन के उस दौर मे एक और बैंड बाजा बारात प्रायः पूरे शहर मे घूमती वह होती शहर मे थिएटर मे चलने बाली किसी नई फिल्म के प्रचार की यात्रा। इस प्रचार मे प्रायः इलाइट सिनेमा मे चलने बाली फिल्मों का प्रचार लगातार चलता। इस प्रचार यात्रा मे तांगे मे एक सज्जन दो लाउडस्पीकर तांगे के उपर विपरीत दिशा मे लगा माइक से फिल्म का प्रचार करते। उस व्यक्ति की शक्ल आज भी हमारे अन्तःकरण मे स्पष्ट है। तांगे के आगे 15-20 बैंड बाजे बाले बैंड ट्रंपेट मशक बीन बैग पाइपर, झांझ और बड़े मजीरे नुमा यंत्र बजाते हुए शहर मे भ्रमण करते। बैंड बाजों के आगे दो चूने के पुते  कपड़े जो लकड़ी के फ्रेम पर कसे रहते और उपरी सिरे से जुड़े झोपड़ी नुमा बोर्ड के बीच मे घुसा एक लड़का अपने दोनों हाथो से बोर्ड को चार पहियों पर लुढ़का के चलता ("क्रांति"बोर्ड फिल्म की  आकृति का प्रयास संलग्न)। दोनों बोर्ड पर फिल्म के बड़े बड़े पोस्टर चिपके रहते और जिनके नीचे फिल्म शो की टाइमिंग, टिकिट की दर, टॉकीज का नाम और फिल्म कलाकारों के नाम बड़े  और रंगीन रंगों के अक्षरों से लिखा रहता। जहां एक ओर बैंड बाजे अपनी धुनों मे गाने बजाते एक जलूस के रूप मे  बाजार के बीच मे निकलते बही तांगे पर बैठा  व्यक्ति रेकॉर्ड प्लेयर से गाने बजाता और बीच बीच मे गानों को रोक कर फिल्म का नाम और कलाकारों के नाम बताता चलता। फिल्म के संगीतकर और गायकों के नाम का उल्लेख कर फिल्म के गानों की झलक सुनवा सभी आम लोगो से परिवार सहित फिल्म को देखने की गुजारिश करता। सड़क चलते लोग कौतूहल और उत्साह से निकलने बाले इस बैंड बाजे जलूस को सड़क के दोनों ओर खड़े होकर बड़े  कौतुहल के साथ अवश्य देखते। हम बच्चे भी बड़े उमंग से निकलते इस जलूस को खड़े होकर निहारते। ये बैंड बाजे बाले हम लोगो के घर के आसपास बने चबूतरे पर आकार विश्राम करते। 8-10 झोपड़ी नुमा बोर्ड को बे लोग सड़क किनारे लाइन से लगा देते। बैंड बाजे बाले अपने वाद्य यंत्रों को हमारे और आसपास के घरों के चबूतरे पर रख कर पास मे बने गोपाल धर्मशाला के नीचे स्थित गुंठू चाय बाले, जैन चाय बाले  की दुकानों पर चाय पीने चले जाते। उनकी अनुपस्थिति मे हम बच्चे कभी कभी बैंड बाजों पर लकड़ी से बजा कर अपना हाथ साफ कर खुश होते चारों तरफ चौकस निगाहों से पहरेदारी करते कहीं बैंड बाजे बाले तो नहीं आ रहे है। तांगे बाला शक्स भी चाय पीकर बापस तांगे मे बैठ कर सिगरेट के लंबे लंबे कश खींच सुट्टा लगाता  हुआ कुछ आराम करता। आधा पौना घंटा विश्राम के बाद बैंड बाजे का कारवाँ पुनः  एक बार फिर अगले पढ़ाव पर जाने की तैयारी करता। लाउडस्पीकर पर गाने और फिल्म की उद्घोषणा एक बार  फिर शुरू हो जाती और बैंड  बाजे अपनी लय मे गाना  बजाने शुरू कर  झोपड़ी नुमा फिल्मी पोस्टर के बोर्ड के बीच मे घुस कर लड़के अपने सिर और हाथो से बोर्ड को उठा जलूस के रूप मे आगे के मंजिल की ओर रवाना हो जाते।

उस दौर के फिल्मों के प्रचार का तरीका फिल्म देखने के लिए लोगो को प्रेरित करता टीवी, इंटरनेट के इस दौर मे अब वो सब पुरानी यादें ही शेष बन कर रह गई जो रह रह कर, बार बार याद आती है।

विजय सहगल                  

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