"कोरोना
का सूतक काल"
और
दिन की तरह आज भी जब मेरी बात मेरी माँ से वीडियो कॉलिंग के माध्यम से झाँसी मे हो रही थी। आज कल बातचीत का मुख्य विषय दुनियाँ
मे फैली महामारी कोरोना कोविड 19 का ही रहता है। माँ ने बताया कि उसके बचपन मे कमोवेश ऐसे ही हालत उन दिनों पैदा हुए
थे जब प्लेग बीमारी झाँसी मे महामारी के
रूप मे फैली थी। मेरी ननिहाल झाँसी मे अनाज मंडी के निकट सुभाष गंज मे ही है। माँ
ने बताया अनाज मंडी के कारण उन दिनों चारों ओर चूहों के मरने पर उन्हे तुरत फुरत गोबर के उपलों के
बीच रख कर जला दिया जाता था। चूहों के जलाने से उत्पन्न बदबू वातावरण मे चारों तरफ
उन दिनों आती थी। चूहों के मरने से उत्पन्न छोटे कीड़े "पिस्षु" अगर आदमी
को प्रभावित करता तो उसकी मौत हो जाती थी। उन दिनों शहर बहुत छोटा था प्लेग
महामारी का रूप ले चुका था तब मेरी माँ अपने बहिन भाइयों के साथ झाँसी से घर छोड़
कर 30-32 किमी दूर "मंडोर" गाँव
मे अपने रिश्तेदारों के यहाँ चले गये थे। शहर मे जगह जगह पानी की तलाश मे चूहे
बिलों से निकल कर गली कूँचों मे जहाँ-तहाँ मरे मिलते जो प्लेग रूपी महामारी फैलाते
थे। आज के हालत कोरोना कोविड19 बीमारी के कारण भी कुछ ऐसे ही है बस फर्क इतना है
कि उन दिनों लोग प्लेग के कारण घरों को
छोड़ने को मजबूर थे और आज कोरोना के कारण घरों मे रहने को मजबूर है।
चिकित्सा
विशेषज्ञ इस बीमारी से बचने का एक मात्र तरीका व्यक्तियों से व्यक्ति की सुरक्षित दूरी बना कर रहने की सलाह दे रहे है ताकि ये
बीमारी एक आदमी से दूसरे आदमी मे अंतरित न हो अतः सरकार सभी व्यक्तियों को सिर्फ
और सिर्फ घरों मे रहने की हिदायत दे रही है। अगर शतकों पूर्व आज के तरह की आकस्मिक परिस्थितियों के जीवन
की कल्पना करे जब तमाम अंजान बीमारियों या महामारियों के कारण उन दिनों जानकारी और
इलाज के अभाव मे अनेकों मौते हो जाया करती थी। छुआ छूट रूपी बीमारियों के कारण सैकड़ों
लोग काल कल्वित हो जाया करते थे। शायद इस छुआ छूत रूपी बीमारियों के उन्मूलन हेतु
समाज ने उन दिनों कुछ ऐसे अलिखित नियम कानून बनाए होंगे जिनका पालन पीढ़ी दर पीढ़ी
होने के कारण कालांतर मे वे हमारे धार्मिक संस्कार हो गये।
हमे
याद है मेरे प्रपिता (दादा) के देहांत पर मै 5-6 साल का रहा हूंगा। तब हमारे घर के
साथ साथ घर के अगल-बगल, सामने, आसपास
के 7-8 घरों मे जहाँ हमारे कुटुंब के ही अन्य
सदस्य निवास करते थे "सूतक" रूपी शोक संतप्त रस्म या संस्कार मे
शामिल रहते थे। उस सूतक काल के संस्कार मे उक्त घरों के 30-40 सदस्य आज के
एकांतवास (isolation) की तरह घरों के अंदर अपने आपको सीमित
कर लिया करते थे। हो सकता है कभी इस छुआ छूट बीमारी के कारण समाज मे ये नियम आज के
कोरोना वाइरस के कारण एकांतवास की तरह कभी
किसी मृतक के माध्यम से इस तरह की बिषाणु जनित रोग के कारण "सूतक" रूपी
संस्कार की ये प्रथा शुरू की गई होगी। इस अनेकों साल से
चली आ रही सनातन परंपरा कब से चली आ रही है नहीं मालूम पर इस परंपरा का
उल्लेख वेद पुराणो मे अवश्य ही मिलता है। कुटुंब मे किसी भी बुजुर्ग या परिवार के
सदस्य के निधन पर यह "सूतक" प्रथा स्वतः ही शुरू हो जाती थी और अन्त्येष्टि क्रिया के 4-5 दिन तक लागू रहती
थी। शमशान घाट से अन्त्येष्टि के बाद घर बापसी मे मृतक के सभी छोटे बड़े कुटुंबी जन
नीम की पत्ती मुंह मे चबा कर पानी से कुल्ला करने के पश्चात उपस्थित जन समुदाय का हाथ
जोड़ कर उनके दुःख की इस घड़ी मे शामिल होने के लिये आभार व्यक्त करता था। नीम की पत्ती का मुंह मे चबाना
शायद नीम के एंटी सेप्टिक गुण के कारण किया जाता हो। इस सूतक काल मे मृतक के
परिवार और कुटुंबी जन अपने अपने घरों मे ही रहा करते थे। यहाँ तक कि इस काल मे
उनके घर पर भोजन भी नहीं पकाया जाता था। भोजन की व्यवस्था नजदीकी रिश्तेदार, मित्र और पड़ौसी सुबह शाम के अनुसार क्रम से करते थे। घरों के पूजा गृह मे भगवान की पूजा करना निषेध था, पूजा हेतु कुलपुरोहित आते थे या सूतक काल मे भगवान के स्वरूपों को ही
पंडितजी के गृह भेज दिया जाता था। उस शोक काल मे परिवार के किसी भी सदस्य चाहे वो छोटा हो या बड़ा घर से बाहर जाना बर्जित था। शोकाकुल
परिवार के व्यापार और वाणिज्या संस्थान भी
इस सूतक काल मे बंद रखे जाते थे जो शायद सामाजिक दूरी (social distancing) बनाने का ही एक रूप था ताकि विषाणु को फैलने से रोका जा सके। सूतक काल
के दिनों यदि कोई बाहरी मित्र रिश्तेदार या मिलने बाले शोक संवेदना प्रकट करने
मृतक के घर आते थे तो वे शोक संतृप्त परिवार
से एक स्वीकृत सुरक्षित दूरी बना कर ही बैठ
कर मृतक के प्रति संवेदना व्यक्त कर अपना
सम्मान प्रकट करते थे। शोक व्यक्त करने आने बाले व्यक्ति के लिये भी संवेदना प्रकट
करने के पश्चात बगैर किसी अन्य जगह जाए सीधे ही अपने घर जाकर स्नान करना
आवश्यक होता था एवं पहने हुए सम्पूर्ण कपड़ो को बगैर कही किसी को छूए, धोना आवश्यक था। अस्पताल मे किसी बीमार रिश्तेदार को देख कर घर बापस आने पर
भी ऐसा ही क्रम सुनिश्चित किया जाता था, जो छुआ छूट रूपी
अणुओं और विषाणुओं घरों मे न फैलने का एक आदर्श उदाहरण था। ऐसा चलन कुटुंब के बाहर
दूसरे बच्चों या पड़ौस के अन्य बच्चों से
संपर्क रखना, मिलना या खेलना कूदना पूर्ण तय: निषेध था। सूतक
ग्रसित परिवार के सदस्यों की पहचान समाज मे सहज रूप से हो सके इस हेतु इन परिवारों के सदस्य अपने सिर के बाल त्याग कर
घुटी मुड़ी रखते थे। सम्पूर्ण घर का अपनी दैनिक आवश्यकताओं के रूप उपयोग करना भी वर्जित था। घर के सीमित स्थान का प्रयोग
दैनिक निस्तार हेतु किया जाता था। प्रायः पुरुष लोग घरों के बाहर चबूतरों पर खरारी
(बगैर बिछोने/विस्तर बाली) खाट (चारपाई) पर ही सोया करते थे। मृतक का अंतिम संस्कार की क्रिया करने बाला व्यक्ति के
लिए तो और भी नियम कठोर होते थे। वह सूतक काल के दौरान सिर्फ दो धोती के इस्तेमाल
ही कर सकता था एक को पहनना और दूसरी को धोकर सुखाने हेतु डालना ताकि अगले दिन उसका उपयोग
किया जा सके और उसका जमीन पर सोना आवश्यक था। इस सभी रीतियों, रस्मों का सिर्फ और सिर्फ एक ही
मकसद रहा होगा ताकि कोई भी विषाणु समज मे दूसरे लोगो को न फैले और सनय सनय ये
बीमारे फैलाने बाले विषाणु स्वतः ही नष्ट हो जाये।
तदोपरांत
5-6 दिन बाद उस शोक संतृप्त परिवार को एक
अन्य रीति जिसे अलग अलग क्षेत्रों मे भिन्न भिन्न नमो से जाना जाता है कहीं इसे "शुद्धता"
कही "उठावनी" या "उठाला", रस्म पगड़ी आदि नाम से जानते है। इस दिन सम्पूर्ण घर और शोकाकुल
परिवार के सदस्यों द्वारा उपयोग की गई हर वस्तु और सामान की धुलाई पुछाई कर विषाणु
रहित किया जाता था। हमे याद है शुद्धता बाले दिन रिश्तेदार एवं मित्रगण एकत्रित
होकर शोकाकुल परिवार के साथ लक्ष्मी तालाब पहुँच कर अपने अपने बाल बनवा कर मृतक के प्रति सम्मान
प्रकट करते थे। तालाब मे सभी स्नान आदि कर
दोपहर के पश्चात देवस्थान मे देव
दर्शन कर परिवार के अगले वरिष्ठ सदस्य
को समाज के गणमान्य व्यक्तियों की
उपस्थिति मे पगड़ी पहनाकर, घर एवं वाणिज्य प्रतिष्ठान का मुखिया के रूप मे मान्यता
देकर स्वीकारते थे।
आज की इन आधुनिक बदली हुई परिस्थिति मे जहां एक तरफ
एकल परिवार का चलन है और समय के अभाव
मे ये परंपराये शहरों मे धीरे-धीरे कम होकर लुप्तप्राय होती जा रही है पर सुदूर
ग्रामों मे लोग इस रस्मों रिवाज़ का पालन
आज भी पूरे समर्पण और श्रद्धापूर्वक करते देखा जा सकताहै।
आइये
देश के प्रत्येक नागरिक मानव जाति पर आयी इस विपदा "कोरोना कोविद 19" रूपी इस
विषाणु से मुक्ति के लिये सूतक रूपी सनातन संस्कार को अपना कर 21 दिन का "घर
मे प्रथक रह कर एकांतवास" करे एवं दृढ़ संकल्पित होकर इस वाइरस विषाणु को परास्त कर इस रण मे
"विजयी भवः" की मुद्रा मे आगे बढ़े।
विजय सहगल




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