"शारदा
बालग्राम"
ग्वालियर
प्रवास पर आज प्रातः भ्रमण के लिये मै सिरौल पहाड़ी पर स्थित शारदा बलग्राम की ओर
बड़ा। प्रातः के छः बजने को थे, सूरज की लालिमा पूर्व दिशा की
ओर द्रष्टिगोचर हो रही थी। बलग्राम मे प्रवेश करते ही जैसे जैसे बलग्राम के अंदर
बढ़ता गया बैसे बैसे शहर का कोलाहल धीरे-धीरे कम से कमतर होकर पूरी तरह समाप्त हो
चुका था। अब वातावरण मे थी मात्र कोयल, मोर, पपीहा, नीलकंठ और तोतों जैसे सुंदर पक्षियों का कलरव, घने पेड़ो के झुरमुट के तले दूर दूर तक हरियाली। बालग्राम की छोटी पहाड़ी
की चढ़ाई एक छोटी मोटी ट्रैकिंग का अहसास कराती है। सीधी खड़ी पर छोटी सी चढ़ाई आपकी
सांस मे हाँफ भरने को काफी है। चढ़ाई पर चढने
के बाद दिल को सुकून देने बाले सोमेश्वर महादेव एवं कष्ट हरण श्री हनुमान जी के
मंदिर के दर्शन वास्तव मे ट्रेकिंग से मिली थकान रूपी कष्ट को मंदिर के सामने लगी
आरामदायक बेंच पर सुकून के आरामदायक दो पल मन को बड़ी प्रसन्नता और खुशी की अनुभूति
देते है। ऐसे ही सुकून के पल मे सुस्ताने
के लिये एक बेंच पर मै भी जा बैठा। बगल मे ही एक बुजुर्ग पूर्णतः ग्रामीण परिवेश
मे बैठे थे। अनौपचारिक परिचय मे उन्होने अपना नाम सुघर सिंह बताया। उम्र व्यासी
साल। भितरवार के निवासी थे यहाँ अपने बेटे के पास रहने चले आये थे। शहरीकरण से
असहमति रखते हुए ग्रामीण परिवेश और रहन सहन के पक्षधर सुघर सिंह जी बताने लगे एक
समय था जब यहाँ लोग दिन मे भी आने से डरते थे। निपट डांग का इलाका था। चारों ओर
जंगल ही जंगल। अब न जंगल बचे न डांग, चारों ओर कंक्रीट के
ऊंचे-ऊंचे जंगल। कंक्रीट के रेगिस्तान मे शारदा बालग्राम मरुध्यान अर्थात नखलिस्तान की तरह है। जहां पर आप महसूस
कर सकते है जंगल की पथरीली पगडंडी, ऊंची नीची पहाड़ी चढ़ाई और
ढलान का अहसास, जंगल
मे विचरती मोरे, पक्षियों का कलरव,
झाड़-झंकाड़ों के बीच खो जाने का अहसास, ऊबड़-खाबड़ रास्ते जो
देते है आपको भरपूर प्राण वायु जो आपके
स्वास्थ के लिये सर्वथा सुखद अनुभूति कराता दिन की एक शुभ शुरुआत कराने बाला सुखद
और सुंदर पल। इन सुखद पलों के बीचे साधना करने हेतु साधना कक्ष भी इस जंगल के बीच
स्थापित है। इन पगडंडी और पत्थरीली रस्तों
के मध्य स्वामी विवेकानंद की केशरिया वस्त्रों के विपरीत सुनहरे वस्त्रों की एक प्रतिमा वृत्ताकार पार्क
के मध्य मे स्थापित है, जहाँ कुछ लोग अनुलोम-विलोम और कपालभांति
तथा अन्य योग करते नज़र आये। बालग्राम मे
पहाड़ी से बहने बाले वर्षा जल को एकत्र कर संग्रह करने के लिए जगह जगह वॉटर
हार्वेस्टिंग की गई है जो जल संचय के लिये
बालग्राम के संचालकों द्वारा उठाया गया एक और अनूठा कदम है जिसके लिये वे बधाई के
पात्र है।
पहाड़ी
पर बनी पगडंडी के इत्तर कुछ जगह ऐसी है जहां घने पेड़ और कंटीली झाड़ियाँ है जहाँ
साँप और विच्छुओं का जमावड़ा है, इन सघन पेड़ो के बीच कुछ जगह
शायद जमीन पर धूप भी न पहुँचती होगी, उसके बीच रास्ता बना कर निकलना मैन वरसिस
वाइल्ड के मुख्य पात्र बेयर ग्रिल्ल्स के लिये भी कठिन होगा ऐसा मेरा मानना है।
शारदा
बालग्राम यूं तो 1.5 -2.00 किमी लंबी, 50 हे॰ मे फैली छोटी मगर सुखद अहसास कराती पहाड़ी है जो आस पास के
निवासियों को स्वास्थ की द्रष्टि से स्वस्थ और सुखकर माहौल देती है। शारदा
बालग्राम के चारों ओर निवासरत नागरिकों के लिये वास्तव मे ये सौगात है, प्रकृति का एक अनमोल उपहार है पर यहाँ पर घूमने आने बालों मे मुश्किल से किसी
ने इस प्राकृतिक छटा को बढ़ाने मे अपना कुछ योगदान दिया होगा बरना प्रातः भ्रमण करने बाले कुछेक तो घोर आततायी ही
है, जो यहाँ सुबह की
हवाखोरी के नाम पर रोज फूल तोड़कर चोरी के फूल अपने आराध्य को चढ़ाते है। उनका ये
पुष्पार्पण ईश्वर कदाचित ही स्वीकारेंगे।
उससे भी ज्यादा क्रूर वे लोग है, जिन्हे आतंकवादी
कहने मे भी कोई गुरेज़ नहीं जो नित्य अपने स्वास्थ के ख़ातिर नीम की दातौन तोड़ने के
लिये नीम के छोटे छोटे पौधों की बड़ी बेरहमी और वेदर्दी से हत्या करते है। ऐसे
नराधमों ने जीवन मे एक वृक्ष लगाना तो दूर
शारदा बालग्राम के न जाने कितने नीम के छोटे-छोटे पौधों की हत्या की होगी। आज ऐसी ही एक मैडम को मैंने
हाथ जोड़ कर अन्यथा लेने के निवेदन के साथ कहा जो पतली सी दातौन के साथ आयुर्वेद के नुस्खों के अनुसार अपने दांत चमकने का कुप्रयास कर रही थी जिसको
उन्होने एक 2.5-3.00 फुट ऊंचे नन्हें पौधे से तोड़ा था, मैंने कहा "मैडम, आप
क्यों हर रोज एक नीम के पेड़ की हत्या कर रही हैं। दातौन के आपके शौक मे विचारे
नन्हें नीम के पेड़ मारे जा रहे है, इतना शौक है तो किसी बड़े
नीम के पेड़ से आप बीसों दातौन तोड़ सकती है। शायद उन्हे इस तरह के उपदेश की अपेक्षा
नहीं रही होगी। मैडम ये बताना नहीं भूली की वे पढ़ी लिखी है इसलिए अँग्रेजी मे बोली
"Thank you for your suggestion" देखो ये suggestion
कहाँ तक कारगर होता है??
पर
शारदा बालग्राम का उद्देश्य आसपास के नागरिकों के स्वास्थ और प्राकृतिक वातावरण
प्रदान करने से बहुत आगे है। 1993-94 मे स्वामी स्वरूपानन्द जी ने शारदा बालग्राम की स्थापना की थी जो कि विश्व प्रसिद्ध संस्था रामकृष्ण आश्रम
द्वारा संचालित एक ऐसी संस्था है जो कि मानव कल्याण के परम उद्देश्य को
प्राप्त करने को तत्पर है। संस्थान के इस उद्देश्यों की प्राप्ति मे संस्था स्वामी
श्री का बड़ा योगदान है। इस ग्राम मे लगभग
150 निराश्रित, गरीब, पिछड़े एवं समाज के
कमजोर वर्ग से है एवं यहाँ बच्चों को न केवल आश्रय दिया जा रहा है अपितु
उनकी दैनंदनी आवश्यकताओं की पूर्ति के साथ उनके शैक्षणिक कार्यकलापों की पूर्ति भी
की जा रही हैं। इनमे कई बच्चे ऐसे है जिनको समाज ने निराश्रय कर छोड़ दिया पर आश्रम
इनको आश्रय देकर समाज मे स्थान सम्मानजनक स्थान दिलाने का प्रयास कर रहा है। ये सारे बच्चे समाज के वंचित, गरीब, आदिवासी, पिछड़े समाज से
आते हैं। आज स्वस्थ लाभ ले कर जब मै पहाड़ी के दूसरे सिरे से नीचे
उतर कर आया तो पहाड़ी की तलहटी मे बने दस छात्रावासों से होकर गुजर रहा था।
दो छात्र एक थाली मे पोहे का नाश्ता ले जाते दिखे। मैंने जिज्ञासावश उनका नाम
पूंछा और कब से बे यहाँ रह रहे है जानना चाहा? पहले छात्र ने
अपना नाम हुकुम सिंह बताया वह नरवर का रहने बाला था। दूसरे ने अपना नाम अशोक बताया
जो एग्रिकल्चर से 12वी कर रहा था उसको नहीं मालूम था बो कहाँ का रहने बाला था और
कब से इस संस्था मे रह रहा था। उसने बताया मै यही रहकर पला बढ़ा हूँ। मुझे बेहद
आत्मग्लानि हुई कि शायद मुझे उससे ऐसा सवाल नहीं पूंछना चाहिये था। आगे पक्की सड़क
के किनारे एक ही वास्तु नक्शे से बने 10 कुटीर बने है। इनमे से चार केन्या निवासी
श्रीमती सावित्री बहल दो जिंदल ट्रस्ट एवं अन्य संस्थाओं द्वारा बनवाये गए है। प्रत्येक आवासीय कुटीर का नामकरण किसी महान
व्यक्ति या स्थान के नाम पर रखा गया हैं। जैसे वृन्दावन कुटीर, लक्ष्मीबाई कुटीर, महावीर कुटीर, नानक देव जी, सुभाष कुटीर, रामानुजम कुटीर आदि। हर कुटीर मे 10-12 बच्चों
के लिये आवास की व्यवस्था समूहिक रूप से की गई है। हर कुटीर को बच्चों ने अपने
श्रम से सजाया संवारा है, कुटीर के सामने की सफाई आदि रखने
का प्रयास किया गया है इसमे और भी सुधार की संभावना है। ऐसे ही एक कुटीर के सामने
बैठे एक 4-5 साल के बच्चे से हमने उत्साह बढ़ाने बाली मुस्कराहट कर पुकारा तो बगैर
किसी प्रतिक्रिया के उसका आसमान मे शून्य की ओर निहारना मेरे दिल को कचोट गया, उसकी गुमशुम तस्वीर आज भी भुलाये नहीं भूली। उम्र की इस दहलीज़ पर उसके मन
मे चल रहे अंतर द्वंद को न पढ़ पाने का अफ़सोस हमे लंबे समय तक रहेगा, ईश्वर उस बालक को जीवन मे आने बाले कष्टों से लड़ने की अपार शक्ति दे!!
कुटीरों
के मध्य जगह जगह स्वामी विवेकानंद एवं अन्य महान विभूतियों के सुंदर वचनों को बड़े
बड़े बोर्ड पर दर्शाया गया है जो मानव मन मे दिव्यता का बोध कराते हैं। आगे ही
बालिकाओं के लिये सुरक्षित स्नेहालय बनाया गया है जिसमे लगभग 50 निराश्रित बच्चियाँ
एक बड़े आवासीय कुटीर मे रह कर अपने शैक्षिक सत्र को पूरा करती हैं। ग्राम के मध्य
मे एक ओर स्वामी विविकानन्द की शिकागो यात्रा की याद मे एक प्रार्थना भवन बनाया
गया है, जिसे शिकागो भवन नाम दिया गया है। इस भवन के बड़े हाल मे समस्त बच्चे
एकत्रित होकर समूहिक प्रार्थना करते है और इस भवन के ठीक सामने बड़े से प्रांगण के पार एक बड़ा, स्वामी प्रेमानन्द भवन है जिसमे बलग्राम के बच्चों का भोजनालय बनाया गया है जिसमे बच्चों के लिये सुबह
का नाश्ता, दोनों समय का भोजन और चाय पानी का प्रबंध किया जाता हैं।
बच्चों
के शुद्ध पेय जल हेतु एक बड़ा प्लांट लगाया गया था जिससे बालग्राम मे रहने बाले
बच्चों को पीने के पानी की आपूर्ति की जा रही है। जल शुद्धिकरण यंत्र के सामने बहुत
बड़ी राखाल गौशाला बनी है जिसमे 8-10 गायें
रह रही है, गोबर की खाद और गोबर गैस के उत्पादन के
अतिरिक्त बालग्राम मे दूध की व्यवस्था इसी
गौशाला की जा रही प्रतीत होती है। अन्य गौ उत्पाद भी यहाँ बनाए जाते है। भोजनालय
के बाहर छोटे बड़े 30-40 बच्चे जो नाश्ता करने के बाद स्कूल जाने की तैयारी मे थे
उनमे से 8-10 बच्चे सुंदर स्कूल युनिफ़ोर्म
मे पंक्तिवद्ध खड़े स्कूल जाने के लिये तैयार थे, सबसे आगे
नन्हा राज उक्त बच्चों की रेल का नेतृत्व इंजिन के रूप मे कर रहा था जिसका एक
सुंदर कुछ सेकंड का विडियो दर्शनीय है। इन
बच्चों की देख रेख के लिये तीन-चार बड़े
बच्चे जो सागर, टीकमगढ़, और शिवपुरी से
थे उनका कुशलक्षेम हेतु तैनात थे जो स्वयं कोई 5वी, 6वी का
छात्र था। बालिकाओं के स्नेहालय के सामने कारगिल उपवन मे कारगिल युद्ध मे उपयुक्त युद्धक टैंक का प्रदर्शन एवं
कारगिल युद्ध मे चंबल के शहीदों की फोटो, नाम आदि प्रदर्शित
कर वीर सैनिकों को श्रद्धा सुमन अर्पित किये गये है। बापसी मे मुख्य गेट के प्रवेश
द्वार से आरकेवीएम हाइयर सेकोण्ड्री स्कूल की विशाल इमरात इन बच्चों के भविष्य निर्माण मे समर्पित नज़र आती
है। इसी विध्यालय मे बालग्राम मे रह कर विभिन्न कक्षाओं मे पढ़ रहे 150 बच्चों के अतिरिक्त
नगर के लगभग एक हजार अन्य छात्र भी इस विध्यालय मे अध्यनरत है।
मेरा
मानना है बालक एवं बालिकाओं के भविष्य निर्माण मे रत ऐसी संस्थाएं समाज के तीर्थ
स्थल की तरह है। न केवल ग्वालियर नगर के सभी नागरिकों को बल्कि पर्यटन मे पधारे
पर्यटकों भी ऐसे नव तीर्थ स्थलों का भ्रमण अवश्य ही करना चाहिये। मानव की सेवा मे समर्पित शारदा बालग्राम मे पढ़
रहे समाज के कमजोर और बंचित वर्ग तथा निराश्रित बालक बालिकाओं के भविष्य निर्माण
मे रत इस संस्था को एवं संस्था के महान उद्देश्यओं को प्राप्त करने मे प्रयासरत वर्तमान
संस्था प्रमुख स्वामी श्री सुप्रदिप्ता नन्दा और उनकी टीम को हार्दिक नमन।
विजय
सहगल


































