बुधवार, 30 अक्टूबर 2019

"शारदा बालग्राम"


"शारदा बालग्राम"





















ग्वालियर प्रवास पर आज प्रातः भ्रमण के लिये मै सिरौल पहाड़ी पर स्थित शारदा बलग्राम की ओर बड़ा। प्रातः के छः बजने को थे, सूरज की लालिमा पूर्व दिशा की ओर द्रष्टिगोचर हो रही थी। बलग्राम मे प्रवेश करते ही जैसे जैसे बलग्राम के अंदर बढ़ता गया बैसे बैसे शहर का कोलाहल धीरे-धीरे कम से कमतर होकर पूरी तरह समाप्त हो चुका था। अब वातावरण मे थी मात्र कोयल, मोर, पपीहा, नीलकंठ और तोतों  जैसे सुंदर पक्षियों का कलरव, घने पेड़ो के झुरमुट के तले दूर दूर तक हरियाली। बालग्राम की छोटी पहाड़ी की चढ़ाई एक छोटी मोटी ट्रैकिंग का अहसास कराती है। सीधी खड़ी पर छोटी सी चढ़ाई आपकी सांस मे हाँफ भरने को काफी है।  चढ़ाई पर चढने के बाद दिल को सुकून देने बाले सोमेश्वर महादेव एवं कष्ट हरण श्री हनुमान जी के मंदिर के दर्शन वास्तव मे ट्रेकिंग से मिली थकान रूपी कष्ट को मंदिर के सामने लगी आरामदायक बेंच पर सुकून के आरामदायक दो पल मन को बड़ी प्रसन्नता और खुशी की अनुभूति देते है।  ऐसे ही सुकून के पल मे सुस्ताने के लिये एक बेंच पर मै भी जा बैठा। बगल मे ही एक बुजुर्ग पूर्णतः ग्रामीण परिवेश मे बैठे थे। अनौपचारिक परिचय मे उन्होने अपना नाम सुघर सिंह बताया। उम्र व्यासी साल। भितरवार के निवासी थे यहाँ अपने बेटे के पास रहने चले आये थे। शहरीकरण से असहमति रखते हुए ग्रामीण परिवेश और रहन सहन के पक्षधर सुघर सिंह जी बताने लगे एक समय था जब यहाँ लोग दिन मे भी आने से डरते थे। निपट डांग का इलाका था। चारों ओर जंगल ही जंगल। अब न जंगल बचे न डांग, चारों ओर कंक्रीट के ऊंचे-ऊंचे जंगल। कंक्रीट के रेगिस्तान मे शारदा बालग्राम मरुध्यान  अर्थात नखलिस्तान की तरह है। जहां पर आप महसूस कर सकते है जंगल की पथरीली पगडंडी, ऊंची नीची पहाड़ी चढ़ाई और ढलान  का अहसास, जंगल मे विचरती मोरे, पक्षियों का कलरव, झाड़-झंकाड़ों के बीच खो जाने का अहसास, ऊबड़-खाबड़ रास्ते जो देते है आपको भरपूर प्राण  वायु जो आपके स्वास्थ के लिये सर्वथा सुखद अनुभूति कराता दिन की एक शुभ शुरुआत कराने बाला सुखद और सुंदर पल। इन सुखद पलों के बीचे साधना करने हेतु साधना कक्ष भी इस जंगल के बीच स्थापित है। इन पगडंडी और पत्थरीली रस्तों के मध्य स्वामी विवेकानंद की केशरिया  वस्त्रों के विपरीत  सुनहरे वस्त्रों की एक प्रतिमा वृत्ताकार पार्क के मध्य मे स्थापित है, जहाँ कुछ लोग अनुलोम-विलोम और कपालभांति तथा अन्य योग करते नज़र आये।  बालग्राम मे पहाड़ी से बहने बाले वर्षा जल को एकत्र कर संग्रह करने के लिए जगह जगह वॉटर हार्वेस्टिंग की गई  है जो जल संचय के लिये बालग्राम के संचालकों द्वारा उठाया गया एक और अनूठा कदम है जिसके लिये वे बधाई के पात्र है।
 
पहाड़ी पर बनी पगडंडी के इत्तर कुछ जगह ऐसी है जहां घने पेड़ और कंटीली झाड़ियाँ है जहाँ साँप और विच्छुओं का जमावड़ा है, इन सघन पेड़ो के बीच कुछ जगह शायद जमीन पर धूप भी न पहुँचती होगी,  उसके बीच रास्ता बना कर निकलना मैन वरसिस वाइल्ड के मुख्य पात्र बेयर ग्रिल्ल्स के लिये भी कठिन होगा ऐसा मेरा मानना है।  
   
शारदा बालग्राम यूं तो 1.5 -2.00 किमी लंबी, 50 हे॰ मे फैली छोटी मगर सुखद अहसास कराती पहाड़ी है जो आस पास के निवासियों को स्वास्थ की द्रष्टि से स्वस्थ और सुखकर माहौल देती है। शारदा बालग्राम के चारों ओर निवासरत नागरिकों के लिये वास्तव मे ये सौगात है, प्रकृति का एक अनमोल उपहार है पर यहाँ पर घूमने आने बालों मे मुश्किल से किसी ने इस प्राकृतिक छटा को बढ़ाने मे अपना कुछ योगदान दिया होगा बरना  प्रातः भ्रमण करने बाले कुछेक तो घोर आततायी ही  है, जो यहाँ सुबह की हवाखोरी के नाम पर रोज फूल तोड़कर चोरी के फूल अपने आराध्य को चढ़ाते है। उनका ये पुष्पार्पण ईश्वर कदाचित ही स्वीकारेंगे।  उससे भी ज्यादा क्रूर वे लोग है, जिन्हे आतंकवादी कहने मे भी कोई गुरेज़ नहीं जो नित्य अपने स्वास्थ के ख़ातिर नीम की दातौन तोड़ने के लिये नीम के छोटे छोटे पौधों की बड़ी बेरहमी और वेदर्दी से हत्या करते है। ऐसे नराधमों ने जीवन मे एक  वृक्ष लगाना तो दूर शारदा बालग्राम के न जाने कितने नीम के छोटे-छोटे पौधों  की हत्या की होगी। आज ऐसी ही एक मैडम को मैंने हाथ जोड़ कर अन्यथा लेने के निवेदन के साथ कहा जो पतली सी दातौन के साथ आयुर्वेद  के नुस्खों के अनुसार  अपने दांत चमकने का कुप्रयास कर रही थी जिसको उन्होने एक 2.5-3.00 फुट ऊंचे नन्हें पौधे से तोड़ा था,  मैंने कहा "मैडम, आप क्यों हर रोज एक नीम के पेड़ की हत्या कर रही हैं। दातौन के आपके शौक मे विचारे नन्हें नीम के पेड़ मारे जा रहे है, इतना शौक है तो किसी बड़े नीम के पेड़ से आप बीसों दातौन तोड़ सकती है। शायद उन्हे इस तरह के उपदेश की अपेक्षा नहीं रही होगी। मैडम ये बताना नहीं भूली की वे पढ़ी लिखी है इसलिए अँग्रेजी मे बोली "Thank you for your suggestion" देखो ये suggestion  कहाँ तक कारगर होता है??   

पर शारदा बालग्राम का उद्देश्य आसपास के नागरिकों के स्वास्थ और प्राकृतिक वातावरण प्रदान करने से बहुत आगे है। 1993-94 मे स्वामी स्वरूपानन्द जी ने  शारदा बालग्राम की स्थापना की थी  जो कि विश्व प्रसिद्ध संस्था  रामकृष्ण आश्रम  द्वारा संचालित एक ऐसी संस्था है जो कि मानव कल्याण के परम उद्देश्य को प्राप्त करने को तत्पर है। संस्थान के इस उद्देश्यों की प्राप्ति मे संस्था स्वामी श्री का बड़ा योगदान है।  इस ग्राम मे लगभग 150 निराश्रित, गरीब, पिछड़े एवं समाज के कमजोर वर्ग से है एवं यहाँ   बच्चों को न केवल आश्रय दिया जा रहा है अपितु उनकी दैनंदनी आवश्यकताओं की पूर्ति के साथ उनके शैक्षणिक कार्यकलापों की पूर्ति भी की जा रही हैं। इनमे कई बच्चे ऐसे है जिनको समाज ने निराश्रय कर छोड़ दिया पर आश्रम इनको आश्रय देकर समाज मे स्थान सम्मानजनक स्थान दिलाने का प्रयास कर रहा है।  ये सारे बच्चे समाज के वंचित, गरीब, आदिवासी, पिछड़े समाज से आते हैं। आज स्वस्थ लाभ ले कर जब मै पहाड़ी के दूसरे सिरे  से नीचे  उतर कर आया तो पहाड़ी की तलहटी मे बने दस छात्रावासों से होकर गुजर रहा था। दो छात्र एक थाली मे पोहे का नाश्ता ले जाते दिखे। मैंने जिज्ञासावश उनका नाम पूंछा और कब से बे यहाँ रह रहे है जानना चाहा? पहले छात्र ने अपना नाम हुकुम सिंह बताया वह नरवर का रहने बाला था। दूसरे ने अपना नाम अशोक बताया जो एग्रिकल्चर से 12वी कर रहा था उसको नहीं मालूम था बो कहाँ का रहने बाला था और कब से इस संस्था मे रह रहा था। उसने बताया मै यही रहकर पला बढ़ा हूँ। मुझे बेहद आत्मग्लानि हुई कि शायद मुझे उससे ऐसा सवाल नहीं पूंछना चाहिये था। आगे पक्की सड़क के किनारे एक ही वास्तु नक्शे से बने 10 कुटीर बने है। इनमे से चार केन्या निवासी श्रीमती सावित्री बहल दो जिंदल ट्रस्ट एवं अन्य संस्थाओं द्वारा बनवाये गए है।  प्रत्येक आवासीय कुटीर का नामकरण किसी महान व्यक्ति या स्थान के नाम पर रखा गया हैं। जैसे वृन्दावन कुटीर, लक्ष्मीबाई कुटीर, महावीर कुटीर, नानक देव जी, सुभाष कुटीर,  रामानुजम कुटीर आदि। हर कुटीर मे 10-12 बच्चों के लिये आवास की व्यवस्था समूहिक रूप से की गई है। हर कुटीर को बच्चों ने अपने श्रम से सजाया संवारा है, कुटीर के सामने की सफाई आदि रखने का प्रयास किया गया है इसमे और भी सुधार की संभावना है। ऐसे ही एक कुटीर के सामने बैठे एक 4-5 साल के बच्चे से हमने उत्साह बढ़ाने बाली मुस्कराहट कर पुकारा तो बगैर किसी प्रतिक्रिया के उसका आसमान मे शून्य की ओर निहारना मेरे दिल को कचोट गया, उसकी गुमशुम तस्वीर आज भी भुलाये नहीं भूली। उम्र की इस दहलीज़ पर उसके मन मे चल रहे अंतर द्वंद को न पढ़ पाने का अफ़सोस हमे लंबे समय तक रहेगा, ईश्वर उस बालक को जीवन मे आने बाले कष्टों से लड़ने की अपार  शक्ति दे!!

कुटीरों के मध्य जगह जगह स्वामी विवेकानंद एवं अन्य महान विभूतियों के सुंदर वचनों को बड़े बड़े बोर्ड पर दर्शाया गया है जो मानव मन मे दिव्यता का बोध कराते हैं।   आगे ही बालिकाओं के लिये सुरक्षित स्नेहालय बनाया गया है जिसमे लगभग 50 निराश्रित बच्चियाँ एक बड़े आवासीय कुटीर मे रह कर अपने शैक्षिक सत्र को पूरा करती हैं। ग्राम के मध्य मे एक ओर स्वामी विविकानन्द की शिकागो यात्रा की याद मे एक प्रार्थना भवन बनाया गया है, जिसे शिकागो भवन नाम दिया गया है। इस भवन के बड़े हाल मे समस्त बच्चे एकत्रित होकर समूहिक प्रार्थना करते है और इस भवन के ठीक सामने  बड़े से प्रांगण के पार एक बड़ा, स्वामी प्रेमानन्द भवन है जिसमे बलग्राम के बच्चों का  भोजनालय बनाया गया है जिसमे बच्चों के लिये सुबह का नाश्ता, दोनों समय  का भोजन और चाय पानी का प्रबंध किया जाता हैं।

बच्चों के शुद्ध पेय जल हेतु एक बड़ा प्लांट लगाया गया था जिससे बालग्राम मे रहने बाले बच्चों को पीने के पानी की आपूर्ति की जा रही है। जल शुद्धिकरण यंत्र के सामने बहुत बड़ी राखाल  गौशाला बनी है जिसमे 8-10 गायें रह रही है, गोबर की खाद और गोबर गैस के उत्पादन के अतिरिक्त बालग्राम मे दूध की व्यवस्था इसी गौशाला की जा रही प्रतीत होती है। अन्य गौ उत्पाद भी यहाँ बनाए जाते है।   भोजनालय के बाहर छोटे बड़े 30-40 बच्चे जो नाश्ता करने के बाद स्कूल जाने की तैयारी मे थे उनमे से 8-10 बच्चे  सुंदर स्कूल युनिफ़ोर्म मे पंक्तिवद्ध खड़े स्कूल जाने के लिये तैयार थे, सबसे आगे नन्हा राज उक्त बच्चों की रेल का नेतृत्व इंजिन के रूप मे कर रहा था जिसका एक सुंदर कुछ  सेकंड का विडियो दर्शनीय है। इन बच्चों की देख रेख के लिये तीन-चार  बड़े बच्चे जो सागर, टीकमगढ़, और शिवपुरी से थे उनका कुशलक्षेम हेतु तैनात थे जो स्वयं कोई 5वी, 6वी का छात्र था। बालिकाओं के स्नेहालय के सामने कारगिल उपवन मे कारगिल  युद्ध मे उपयुक्त युद्धक टैंक का प्रदर्शन एवं कारगिल युद्ध मे चंबल के शहीदों की फोटो, नाम आदि प्रदर्शित कर वीर सैनिकों को श्रद्धा सुमन अर्पित किये गये है। बापसी मे मुख्य गेट के प्रवेश द्वार से आरकेवीएम हाइयर सेकोण्ड्री स्कूल की विशाल इमरात  इन बच्चों के भविष्य निर्माण मे समर्पित नज़र आती है। इसी विध्यालय मे बालग्राम मे रह कर विभिन्न कक्षाओं मे पढ़ रहे 150 बच्चों के अतिरिक्त नगर के लगभग एक हजार अन्य छात्र भी इस विध्यालय मे अध्यनरत है।

मेरा मानना है बालक एवं बालिकाओं के भविष्य निर्माण मे रत ऐसी संस्थाएं समाज के तीर्थ स्थल की तरह है। न केवल ग्वालियर नगर के सभी नागरिकों को बल्कि पर्यटन मे पधारे पर्यटकों भी ऐसे नव तीर्थ स्थलों का भ्रमण अवश्य ही करना चाहिये।  मानव की सेवा मे समर्पित शारदा बालग्राम मे पढ़ रहे समाज के कमजोर और बंचित वर्ग तथा निराश्रित बालक बालिकाओं के भविष्य निर्माण मे रत इस संस्था को एवं संस्था के महान उद्देश्यओं को प्राप्त करने मे प्रयासरत वर्तमान संस्था प्रमुख स्वामी श्री सुप्रदिप्ता नन्दा और उनकी टीम को हार्दिक नमन।   

विजय सहगल                  

रविवार, 27 अक्टूबर 2019

दीवाली उजियारी



"दीवाली उजियारी"






दीयों की रोशनी के रहते, फिर क्यों है ये स्याह अँधेरा?
हर घर दीवाली उजियारी, पर क्यों बंचित इसमे घर मेरा?

हे कृष्ण आओ इस दीपावली, सुदामा तुम्हारा बुलायेगा ज्यों?
गारीबों के दाता तुम्हें सब पुकारें, पर मित्र तुमको पुकारेगा क्यों?
दीनहीन  के  आँसू पोंछो, दीनन का  कल्याण करो।
दीन दरिद्र निहारे तुमको, निर्धन का तुम ध्यान धरो॥
बदला जीवन सुदाम का ऐसे, रात के बाद सुबह का सवेरा॥  
हर घर दीवाली उजियारी, पर क्यों बंचित इसमे घर मेरा॥

राम हमारे भी  आराधन, परम  मर्यादा  पुरुषोत्तम।
ध्यावे-आराधे यश गावे, ऋषि मुनि गण द्विजोत्तम॥
बिता वरष चउदा घर आये, आनंदित हर घर हरि जन।  
वनवास हमारा पड़ा अधूरा, भोगे कुटुंब  सहित नन्दन॥       
अबकी उबारो पार लगाओ, जिन दुःख दरिद्रों  ने घेरा।
हर घर दीवाली उजियारी, पर क्यों बंचित इसमे घर मेरा॥

ज्ञान के देवी वीणा वादिनी, धवल वस्त्रधारी हंस वाहिनी।
स्वर की देवी, वेदों की ज्ञानी, मेधा-प्रज्ञा, बुद्धि, प्रदायनी॥       
अज्ञानता पर हो ज्ञान की जय, हे शारदे माँ  सद्ज्ञान देना।
हम है निरक्षर, हे! बुद्धिदात्री, सद्ज्ञान का हमको वरदान देना॥
ज्ञानाक्षरों  को  मुझे तू पढ़ा कर, मेरे घर तूँ  बना ले डेरा।    
हर घर दीवाली उजियारी, पर क्यों बंचित इसमे  घर मेरा॥

विजय सहगल

मंगलवार, 22 अक्टूबर 2019

दीवाली का एक दिया


दीवाली का एक दिया





एक दिया  इस दीवाली का, उस  बलिवेदी पर  भी जलाओ।
देश की खातिर खेत रहे उस, वीर सा जीवन निज अपनाओ॥  

सीमाओं की रक्षा  करने,  नींद चैन को  भगा-गवा कर।
देश की खातिर अपनी रातें, रिपु-दमन मे लगा-जगा कर॥
हम सब की खुशियों अटूट कर, अपने सुख को लगा दिया।
आन पड़ा  जब देश पे संकट, जीवन  अपना  गवा दिया॥
सीमा के उस सतत प्रहरी को सजल श्रद्धा  सुमन चढाओं।  
एक दिया इस  दीवाली का उस बलिवेदी पर भी जलाओ॥

हमने सीखा ऋषि-मुनियों से, गुरु गोविंद मे चुनना क्या?
गुरु ज्ञान के उपजे गुण से, वेद-उपनिषद मे सुनना क्या? 
ऋषि आश्रम की शिक्षा हमको मानवता का बोध कराती।
सत्या, अहिंसा, करुणा-प्रेम और गीता का संदेश सुनाती॥
उस गुरु सत्ता का सुमरिन कर पथ से  कांटे दूर हटाओ।
एक दिया इस दीवाली का उस बलिवेदी पर भी  जलाओ॥

उस श्रमिक को याद करो, जिसके श्रम से मिला है आश्रय। 
खुद रहा खुले आसमां नीचे, रही संतति भी सदा निराश्रय॥  
निर्माण वास्तु का उस श्रम से जो उत्पीढन के बिना बना॥  
उजड़े-महल, किले-वीराने, सुख  शांति-निकेतन है  अपना।
वास्तु देव को नमन करो, शुभ-लाभ के पग अंदर लाओ।
एक दिया इस दीवाली का उस बलिवेदी पर भी  जलाओ॥

अन्न के दाता का भी श्रेय है, जीवन रुधिर बनाने का।  
खेत से  अपने उपजा जीवन, मानव श्रेष्ठ जगाने का॥ 
नहीं सराहों उन्हे जिन्होने, अनीति पूर्वक कमाया धन हैं।
नीति शास्त्र की शिक्षा कहती जैसा अन्न-बैसा ही मन हैं॥
अन्न देव का ग्रहण प्रसाद कर वसुधैव की अलख जगाओ।
एक दिया इस दीवाली का उस बलिवेदी पर भी  जलाओ॥

विजय सहगल

शुक्रवार, 18 अक्टूबर 2019

गिनती

गिनती (Counting)





















हमारी क्लास मे बच्चों का गिनती सीखने का नया तरीका वर्ण माला या ABCD सुनाने के बाद बच्चे अपना हाथ आगे कर डंडे से मार खाने हाथ बड़ाते है और हर डंडे पर गिनती सुनते है देखिये कितनी खुशी-खुशी डंडे से मार खा कर 1 से 20 तक की गिनती कितने प्यार से सुनाते है एक बानगी नन्हा गौतम :-



विजय सहगल

बुधवार, 16 अक्टूबर 2019

एसटीडी-पीसीओ



एसटीडी-पीसीओ





हमारे एक  वरिष्ठ साथी एवं मित्र जिनके साथ मुझे दो  बार ग्वालियर मे कार्य करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। अच्छे मित्र आकर्षक व्यक्तित्व, व्यवहार कुशल, शानदार ज्योतिष एवं जन्मकुंडली विशेषज्ञ।  खुर्दबीन से खोज के बाबजूद  भी हमे उनमे कमी के नाम पर सिर्फ पान मसाले का शौक के अलावा कोई और लत उन्हे छू भी नहीं गई थी। पर कभी कभी किसी आदमी के उपर ऐसा आरोप लग जाता है जिस पर दूर दूर तक कोई सहज विश्वास नहीं कर सकता बिल्कुल बैसे ही जैसे किसी हिन्दू पर गौ हत्या का आरोप?? एक घटना हमे रह रह कर याद आती है जब हमारे उक्त मित्र  पर बैंक के पास मे स्थित एसटीडी-पीसीओ, संचालक ने एक दुर्घटना मे उसके पीसीओ का काँच टूट जाने  के कारण जो आरोप लगाया सुनकर हम लोग सकते मे आ गये, विश्वास तो दूर आरोप को सुन कर हंस-हंस कर लोट-पोट हो गए।  जिस व्यक्ति ने सादा जीवन उच्च विचार के संदेश से इतर जीवन मे कभी कोई कार्य नहीं किया। जिसने पूरा जीवन भर शुद्ध शाकाहार से हट कर कभी कोई ऐव या लत नहीं पाली, उस पर शराब.....तौबा- तौबा लिखते हुए भी घिन और अफसोस हो रहा था। पर सारे स्टाफ की हंसी चाह कर भी नहीं रुक रही थी।

दरअसल हुआ ये था, शाखा नया बाजार ग्वालियर मे अर्धवार्षिक लेखा बंदी का समय था। 1989-90 की बात थी। हम हमारे उंक्त मित्र और अन्य मित्रों विजय गुप्ता, यशवीर, रामानुज, हरज्ञान सिंह सिसोदिया, व्यास जी, बलबीर, अजय गुप्ता, राजेंद्र जी  आदि सहित 30-32 स्टाफ के साथ था। श्री आर के वोहरा जी शाखा प्रमुख थे और शायद खिच्ची साहब हाल इंचार्ज और अन्य काफी स्टाफ सदस्यों के नाम इस समय याद नहीं आ रहे हैं शाखा मे थे। नया बाजार शाखा उस समय बैंक के टॉप 10 शाखाओं मे समाहित हुआ करती थी। जेसी मिल, ग्वालियर रेयॉन, सिमको जैसी  देश की जानी मानी कंपनियों के व्यावसायिक लेन-देन नया बाज़ार शाखा मे होता था। पहले जैसा कि  शाखाओं मे रिवाज था अर्ध वार्षिक और वार्षिक लेखा बंदी पर शाखाओं मे बढ़िया डिनर पार्टी का आयोजन हुआ करता था। यध्यपि शाखा मे मदिरापान निषेध था पर विदेशी मदिरा के शौकीन इसका स्वाद चखने के लिये शाखा के आसपास के स्टाफ के निवास मे इसका रसास्वादन का इंतजाम हरी बाबू शिवहरे और ग्वालियर डिस्टिलर जैसे गणमान्य लोगो के सौजन्य से कर ही लेते थे। डिनर का कार्यक्रम बहुत ही हास-परिहास के माहौल मे चल रहा था। इस डिनर पार्टी मे सिमको कंपनी के एक उच्च अधिकारी श्री गुप्ता जी भी विशेष आमंत्रित मे थे। शाखा ने निर्देशित लक्ष्यों को प्राप्त कर लिया था जिसका उत्साह शाखा प्रमुख श्री बोहरा सहित शाखा के सभी स्टाफ सदस्यों के चेहरे पर झलक रही खुशी से स्पष्ट देखा  जा सकता था। मोबाइल उन दिनों  नहीं आया था।  लैंड लाइन टेलीफोन का विस्तार देश मे चरम पर था। जगह जगह आम पब्लिक के लिये एसटीडी-पीसीओ उन दिनो काफी पाये जाते थे। चूंकि रात 10 बजे के बाद टेलीफोन के शुल्क आधे हो जाते थे तब लोग प्रायः रात 10 बजे के बाद पीसीओ के माध्यम से अपने रिशतेदारों और परिजनों से बात करते थे। उस दिन भी रात 10 बज चुके थे  डिनर पार्टी लगभग समाप्ती की ओर थी, डिनर के आखिरी दौर मे मिष्ठान के वितरण और ग्रहण करना शेष था। लेकिन टेलीफोन के शुल्क मे छूट का समय होने के कारण कुछ स्टाफ शाखा के बाहर स्थित पीसीओ मे फोन करने चले गये। रात के समय सिवाय पीसीओ के अन्य जगह ज्यादा चहल पहल नहीं थी। अचानक ज़ोर से धमाके  की आवाज सुनाई दी। ये आवाज शाखा के अंदर बैठे स्टाफ के सदस्यों ने भी सुनी। स्वाभिक थे सभी लोग शाखा के बाहर दौड़े। जो स्टाफ शाखा के बाहर खड़े थे वह उस जगह पर भागे जहाँ धमाके की आवाज आई थी। पता चला एसटीडी-पीसीओ संचालक की दुकान मे प्रवेश द्वार से लगा फुल साइज़ काँच किसी व्यक्ति के टकराने से टूट गया है।  वास्तव मे काँच पीसीओ संचालक के ऑफिस के प्रवेश द्वार के बगल मे फुल साइज़ का फिक्स (स्थिर) काँच टूटा था। सभी किसी अनहोनी न होने की  चिंता कर रहे थे। कहीं  किसी को चोट आदि तो नहीं लगी, कोई घायल तो नहीं हुआ इसके लिये सभी व्याकुल थे। तभी पता चला काँच टूटने से हमारे उक्त स्टाफ मित्र महोदय को चोट लगी हैं। कुछ स्टाफ सदस्य उनको  बोहरा साहब की  कार से लेकर शाखा के नज़दीक स्थित जय आरोग्य अस्पताल ले गये। बाकी सभी सदस्य इतने बड़े काँच के टूटने से घायल उक्त मित्र  की चोट के बारे मे चर्चा कर उसकी गहराई और नाजुकता  के बारे मे चिंतित थे। कहीं कोई गंभीर चोट आदि न लगी हो!! डिनर मे शामिल लोग कुछ दुःखी और गमगीन होकर उक्त मित्र  के आने का इंतजार कर रहे थे। थोड़ी देर बाद वह जेए हॉस्पिटल से बापस आ गये। ईश्वर को धन्यवाद था चोट गंभीर नहीं थी। साधारण चोट काँच के टुकड़े नाक पर गिरने के कारण लगी थी, चिंता की कोई बात नहीं थी। ये तो अच्छा रहा  काँच सिर के ऊपर नहीं गिरा अन्यथा मामला गंभीर हो सकता था। ये देख सुनकर सभी स्टाफ सदस्यों ने चैन के साथ मिठाई का रसास्वादन किया। हम लोगो ने जब उक्त मित्र  से यूं ही मज़ाक मे पूंछा आपसे  इतना बड़ा काँच टूटा कैसे और  ये बहादुराना काम आपने किया कैसे? बातचीत मे उन्होने  बताया कि फुल साइज़ काँच जो लगभग 10X8 फुट का होगा द्रष्टि भ्रम के कारण लगा कि इस मे कोई काँच नहीं है यह खाली  खुली रास्ता है। क्योंकि काँच पर कुछ क्रॉस का निशान या प्रवेश निषेध या कुछ फूल पत्ती आदि लिखा या बना नहीं था। कुछ लिखा या बना होता या कुछ अवरोध रखा होता तो रात मे  दृष्टि  भ्रम न होता और न ही ये दुर्घटना होती। उनकी इस बहादुराना काम देख कर किसी शायर की ये लाइनें हमे याद आ गई:-

"डर मुझे भी लगा फासला देख कर, पर मै बढ़ता गया रास्ता देख कर। 
खुद व खुद टकराती......  गई, मेरी मंजिल मेरा  हौसला  देख  कर"॥

दूसरे दिन जब सभी शाखा मे आये तो सभी रात को हुई घटना की ही चर्चा कर रहे थे और ईश्वर को अनहोनी टालने के लिये धन्यवाद दे रहे थे। उन दिनो "शिंकारा" के टीवी विज्ञापन की चर्चा कर कुछ स्टाफ मज़ाक मज़ाक मे उक्त मित्र को "शिंकारा बॉय" कह बुला रहे थे, जिसमे टीवी पर दिखाया जाता था कि कैसे एक ऑफिस का अधिकारी  काम के बोझ से दबा है और एक चम्मच शिंकारा पीते ही ताकत का अहसास कर  फ़ाइल लेकर काँच तोड़ते हुए ऑफिस से निकलता दिखाई देता हैं। उसकी पंच लाइन होती थी:-

"ये बेचारा, काम के बोझ का मारा, इसे चाहिये हमदर्द का टॉनिक शिंकारा।" टिंग-ठोंग। उक्त विज्ञापन पिछले रात हुई घटना पर सटीक बैठता थी।

काँच टूटने की रात मे घटी घटना से  सभी स्टाफ इसलिये खुश थे कि चलो रात को आया संकट किसी तरह  टल गया। पर काँच टूटने से हुई गंभीर चोट का संकट तो टल गया पर एक नया संकट दूसरे दिन  आ गया जिसकी कल्पना हम स्टाफ ने नहीं की थी। हुआ यूं कि दूसरे दिन एसटीडी-पीसीओ संचालक आया और अपने  टूटे काँच का हर्जाना मांगने लगा। हम लोगो ने पीसीओ बाले से कहा एक तो आपने पूरे प्लेन काँच मे कुछ पेंट आदि से "प्रवेश निषेध" या कुछ शब्द आदि लिखना चाहिए था या कुछ अवरोध गमले आदि रखना चाहिए था, ताकि दृष्टि  भ्रम से होने बाली दुर्घटना से बचा जा सके।  तुम  काँच का हर्जाना मांग रहे हो और हमारे मित्र  को जो चोट लगी और कष्ट हुआ उसका हर्जाना कौन देगा। अब पीसीओ बाले और बैंक के स्टाफ मे कुछ वाद-विवाद होने लगा। पीसीओ बाला बोला यदि हमे हर्जाना नहीं दोगे तो हम पुलिस मे शिकायत दर्ज कराएंगे कि "हमारे उंक्त मित्र  ने शराब के नशे मे पीसीओ मे आकार हमारा शो-केश का काँच तोड़ दिया"? बात पुलिस से डरने की नहीं थी, पर आरोप "शराब के नशे मे काँच तोड़ने"  से हम लोग भी चौंके और उसको डांट कर बोले क्या बोल रहा हैं। जिस व्यक्ति ने कभी शराब को छुआ नहीं उन पर शराब पी कर नशे का आरोप लगा रहा हैं?? लेकिन पीसीओ बाला अपनी बात पर अड़ा रहकर हर्जाना मांगता रहा अन्यथा शराब पी कर काँच तोड़ने के आरोप से पीछे हटने को तैयार नहीं हो रहा था। काफी बहस-मुस्सहिबा के बात आधा-आधा हर्जाना भुगतने की बात पर सहमति बनी। इस तरह उस समय 400-500 रूपये  का हर्जाना देना पड़ा। हम सभी स्टाफ काफी दिनों तक यही बात करते रहे कि उक्त मित्र  को चोट भी लगी हर्जाना भी भुगता वो कोई बड़ी बात नहीं थी पर  इन सबसे उपर अफ़सोस इस बात का था कि उनके उपर ऐसा आरोप लगा जिस पर हम सभी स्टाफ को भी दूर दूर तक कभी विश्वास नहीं हो सकता।  जिस आदमी ने कभी शराब को हाथ भी नहीं लगाया उस पर आरोप यह लगा कि "शराब के नशे मे शो-रूम का काँच तोड़ दिया"। हमारे उक्त मित्र  के उपर  इस "इल्ज़ाम" पर जिगर मुरदाबादी का एक शेर याद आ रहा है   जिसमे हमारे मित्र  मानों "शराब" से शिकवा कर रहे हों:-  

यूँ ज़िंदगी गुज़ार रहा हूँ तिरे बगैर। 
जैसे कोई गुनाह किए जा रहा हूँ मैं॥
  
विजय सहगल

शनिवार, 12 अक्टूबर 2019

जागेश्वर (अल्मोड़ा)


जागेश्वर (अल्मोड़ा)


















3 अक्टूबर 2019 को मुंसियारी शिविर से बापसी मे यूं तो सभी परिजनों के साथ बापस हरिद्वार जाना था, पर रास्ते मे अल्मोड़ा घूमने का लोभ संवरण न कर सका। यहाँ पर तय कार्यक्रमनुसार हमारे बड़े भाई श्री शरद सहगल सपत्नीक बरेली से अल्मोड़ा पहुँच चुके थे हम भी बापसी मे शाम को  मुंसियारी से सभी परिजनों का साथ छोड़ कर अल्मोड़ा उतर गये। उत्तराखंड का एक महत्वपूर्ण केंद्र पर्यटन की द्रष्टि से अति महत्वपूर्ण है जहाँ हम पहले कभी नहीं आ पाये थे। रात्रि मे विश्राम कर अगले दिन सुबह हम लोग अल्मोड़ा से लगभग 35 किमी दूर जागेश्वर मंदिर श्रंखला देखने निकले। इन दिनों यहाँ पर पंचायत चुनाव की गहमा गहमी चारों तरफ नज़र आ रही थी। जगह जगह चुनावी पोस्टर लगे हुए थे। प्रत्याशी और उनके समर्थक जलूस, जलसों मे जीपों पर अपने कुमायूंनि  परिवेश मे प्रचार करते नज़र आ रहे थे जो पर्यटन के अलावा हमे अल्मोड़ा की सांस्कृति और रीतिरिवाज, भाषा से परिचय करा रहा था। अर्तोला से एक रास्ता धारचूल (चीनी बार्डर) के लिये जाता था जो वहाँ से 184 किमी था एवं एक रास्ता जागेश्वर मंदिर श्रंखला को जाता था जो 4-5 किमी था अतः हम लोग अर्तोला मे एक चाय की दुकान जय भोले भोजनालय पर चाय और यहाँ का प्रचलित नाश्ता बंद के साथ मटर-छोले लिये। हमारे भाई साहब ने  प्रचलित नाश्ते मे थोड़ा बदलाव कर मटर मे प्याज, धनिया और नीबू हरी मिर्च का समावेश किया जो उन्हे बड़ा प्रिय लगता है इस तरह अल्मोड़ा के नाश्ते का थोड़ा  ट्विस्ट हम सबको प्रिय लगा। चाय बनने तक हम लोगो ने चुनावी चर्चा भी की। चाय स्टॉल बाला भाजपा समर्थक था।

चाय-नाश्ते के बाद हम लोगो ने जागेश्वर के लिये प्रस्थान किया। रास्ता एकदम से नीचे की ओर घाटी मे था। रास्ते के दोनों ओर चीड़ और देवदार के ऊंचे ऊंचे पेड़ आसमान की ऊंचाई को छू रहे थे।  मौसम भी खुश गवार था। हल्की हल्की ठंड थी पर धूप भी खिली थी। 15-20 मिनिट की ड्राइव पर एक छोटी सी जल धारा जिसे "जटा गंगा" कहा जाता है के तट पर सुंदर हरे-भरे  वृक्षों से परिपूर्ण पहाड़ों की पृष्टभूमि मे बसे विशाल प्रांगण मे लगभग  125 छोटे-बड़े  मंदिरों की श्रंखला स्थित है जिसे जागेश्वर मंदिर श्रंखला कहा जाता हैं। बहुत छोटी आवादी एक छोटा गाँव पर कुछ आवास जो एक शतक पूर्व बने प्रतीत हो रहे थे अपने वैभव की कहानी सुना रहे थे किन्तु समय के थपेड़ों ने उन्हे बूढ़ा बना दिया था। जटा गंगा मंदिर के पार पंचायत द्वारा एक विशाल मैदान मे मेला, भंडारा, वाहन पार्किंग आदि के लिये निर्माण कार्य चल रहा था।

मंदिर श्रंखला 7वी-8वी शती से लेकर 14वी शती के बने हुए थे। मुख्य मंदिर जो महामृतुंजय मंदिर के नाम से जाना जाता है सबसे बड़ा और ऊंचा मंदिर था, मंदिर मे विशाल सुंदर शिवलिंग के दर्शन हुए। इस मंदिर के  सामने केदारेश्वर मंदिर जो इस श्रंखला का दूसरा मंदिर है जिसमे भगवान केदारनाथ के दर्शन होते है। उक्त दोनों मंदिर अपनी स्थापत्य कला के वेजोढ़ उदाहरण है। इस आध्यात्मिक एवं पौराणिक काल की नगरी का कुमायूं मण्डल मे अपना एक अलग स्थान हैं जिसके कारण इसे राष्ट्रिय संरक्षित स्मारक घोषित किया गया हैं। प्रांगण मे अन्य अनेक छोटे छोटे मंदिर द्रष्टिगोचर होते है जो सारे मिल कर इस प्रांगण  की दिव्यता एवं अध्यात्मिकता को चार चाँद लगाते हैं। प्रांगण  मे कार्यरत कुछ महिला मजदूरों ने अपनी फोटो लेने का भी आग्रह किया जिसे हम इंकार न कर सके।

मंदिर के दर्शन के  पश्चात मंदिर प्रांगण के बाहर-सामने छोटी छोटी मंदिर से संबन्धित वस्तुओं की    दुकाने  और खाने-चाय आदि की दुकाने थी। तभी मैंने कुछ लोगो को देखा जो अपने साथ संगीत वाध्य यंत्र लेकर जा रहे थे और शायद कुमायूं के संगीतज्ञ ग्रुप था। मैंने यूं ही उनका परिचय जानने की ईक्षा प्रकट की। उन सरल हृदय व्यक्तियों ने बताया वे स्थानीय संगीत वाध्य यंत्रों विशेषज्ञ है और एक शादी के बारात  मे अपना संगीत मंडली के साथ हल्द्वानी जा रहे हैं। उनमे से एक जो श्री भगवान चन्द  पांडे जी थे और उनके हाथ मे कुमायूंनि संगीत वाध्य "तुरही" था को हमने कुछ सेकेंड के लिये तुरही बजाने का आग्रह किया जिसको उन्होने सहज स्वीकार कर लिया और हमारे ब्लॉग के लिये विशेष रूप से बजाया भी जिसका शानदार विडियो हम संलग्न कर रहे हैं।

श्री भगवान चाँद पांडे जी की "तुरही" का संगीत सुनकर मै भी अब कुमायूंनि माहौल के रंग मे पूरी तरह रच-वस  कर कुमायूंनि हो गया था। तभी एक जीप के साथ 40-50 लोग जागेश्वर पंचायत के चुनावी जलूस के साथ प्रचार करते नज़र आए। वे सभी एक प्रत्याशी श्रीमती हेमा गेढ़ा, चुनाव चिन्ह "केतली" (मोदी बाली) के समर्थक थे। कुमायूंनि संगीत के बाद अब हमने उत्तराखंड की राजनीति मे भी अपना दखल दिया और श्रीमती हेमा गेढ़ा के समर्थन मे चुनाव प्रचार किया, हमारे चुनाव प्रचार को जगेशवर की जनता ने अपना प्यार भर प्रतिसाद दिया। हमने जागेश्वर की जनता से उन्हे विजयी बनाने का अनुरोध किया जिसका विडियो भी इस ब्लॉग मे संलग्न कर रहा हूँ। अब तक तो नतीजे आ चुके होंगे पता नहीं श्रीमती हेमा गेढ़ा जीती या नहीं? अगर जीत जाती है तो हमे वादा अनुसार उनसे एक पार्टी लेने दुबारा जागेश्वर जाना होगा और इस तरह उत्तराखंड की राजनीति मे हमारा भी  थोड़ा बहुत  दखल की शुरुआत  होगी  और अगर श्रीमती हेमा गेढ़ा  नहीं जीती??     तो क्या लिखना आप खुद समझदार हैं??

राजनीति के बाद जागेश्वर पुरातत्व संग्रहालय देखने गया। कर्मचारियों ने मुझे देखते ही मेरा  कुछ विशेष सम्मान के साथ संग्रहालय मे स्वागत किया। तभी याद आया मेरे चुनाव प्रचार को वे सभी भी संग्रहालय से खड़े होकर सुन व देख रहे थे। संग्रहालय मे मंदिरों से प्राप्त भगवान की मूर्तियों को एकत्रित कर संजो कर रखा गया है ताकि मूर्ति तस्करों से इन्हे बचा कर रखा जा सके। बहुत दुर्लभ एवं दर्शनीय मूर्तियों के दर्शन कर अपने आपको अभिभूत और धन्य माना। पूर्व मे इन पुरातत्व रूप से बेशकीमति मूर्तियों को चोरी के प्रयास देशद्रोहियों द्वारा किये जा चुके थे इसलिए इन पुरातत्व रूप से बहुमूल्य मूर्तियों को सुरक्षित सीसीटीवी की निगरानी मे रखा गया है। मैंने कर्मचारियों के सद्व्यवहार और संग्रहालय के रखरखाव, साफ सफाई  की प्रशंसा आगंतुक रजिस्टर मे दर्ज़ की।

बापसी मे डंडेश्वर मंदिर के दर्शन किये जो जागेश्वर मंदिर की ही तरह उसी वास्तु कला के आधार पार बनाये गये है जो जागेश्वर से लगभग 2 किमी दूर उसी जटा गंगा नदी के किनारे सुंदर रमणीय प्रकृतिक हरे-भरे व्रक्षों से आच्छादित पर्वत श्रंखलाओं के बीच स्थित है। इस तरह अल्मोड़ा के प्रसिद्ध जागेश्वर मंदिर के दर्शन कर हम सभी लोगो ने अपने आपको कृतार्थ समझा एवं  बापस अल्मोड़ा के लिये प्रस्थान किया।  

विजय सहगल