शनिवार, 21 सितंबर 2019

आरक्षण


"आरक्षण"






आज पड़ौस के लोगो मे कुछ गहमागहमी थी। मुहल्ले की जमादारिन विनियाँ बाई  द्वारा पिछले दो दिनों से लेट्रिन अर्थात देशी संडास (शौचालाय) को झाड़ा (सफाई) नहीं गया था। पड़ौस के सभी घरों से मर्द, औरत बच्चे  एकत्रित होकर उस बुजुर्ग महिला विनियाँ बाई को भला बुरा कह रहे थे जिसने पिछले दो दिन से संडास की सफाई नहीं की थी और उन्हे हुई परेशानी के लिये सफाई बाली महिला विनियाँ बाई को इसके लिये उलाहना दे रहे थे। पर जब मेरी माँ ने उस जमादारिन महिला विनियाँ बाई  से बात की और इसका कारण जाना तो माँ को भी कारण सुन कर उसके प्रति हमदर्दी हुई और सफाई बाली महिला के दर्द को जान कर माँ को भी वेदना पहुंची और माँ उस जमादारिन विनियाँ बाई के पक्ष मे खड़ी रही। बात वास्तव मे यह थी कि मैला ढोते समय उस सफाई कर्मी महिला को मैला को ढकने के लिये लोग घरों से चूल्हे की  राख या राखी नहीं देते थे जिसकी शिकायत बह प्रत्येक घर से बार बार कर चुकी थी, क्योंकि लोगो ने चूल्हे की लकड़ियों और उपलों की जगह केरोसिन ऑइल के  स्टोव का उपयोग शुरू कर दिया था जिससे राख का अभाव हो जाता था।  इसी राखी के अभाव मे मैला ढोने के कार्य मे होने बाले कष्ट के कारण विनियाँ ने  दो दिन मैला नहीं उठाया।   दरअसल वह सफाई बाली महिला विनियाँ  जो हमारी माँ के उम्र दराज या मेरी माँ से कुछेक  साल बड़ी रही होगी और प्रायः तीज त्योहार पर घर-घर से  पावन लेते हुए हमारे घर भी आती थी। वह महिला हर त्योहार पर एवं महीने की हर पूर्णमासी और अमावस्या पर शाम के समय "पावन" (घर पर बनी रोटी, चावल के साथ कुछ खाने आदि की वस्तु) मांगने घर आती थी। घर के दरवाजे से आवाज लगाना "पावन दे जाओ" उसका कार्य था। घर के मुख्य दरवाजों तक उसका आना निषेध था अतः वह हर घर के बाहर से  ज़ोर ज़ोर से चीख कर पावन मांगने कि गुहार लगाती। वह ऐसी आवाज प्रत्येक  घरों मे 2-3 बार से ज्यादा तो लगाती ही थी क्योंकि घर काफी लंबे हुआ करते थे जिनकी साधारणतः आवाज अंदर सुनाई नहीं देती थी।  पावन मे विनियाँ को  प्रत्येक घर से सुबह बनी हुई 4-6 रोटी के साथ कुछ सब्जी, चावल (अगर हुआ तो) हर घर से मिल जाता था। इस तरह उन  रोटियों से उस विनियाँ  को कुछ दिनों के लिये खाने के रूप मे रोटियाँ  मिल जाती जिनको धूप मे सुखा कर बह इन रोटियों से 6-8 दिन के खाने की  व्यवस्था कर लेती।  बड़े तीज त्योहार जैसे होली, दीवाली, दशहरा, राखी संक्रांति, अष्टमी  आदि पर उसे त्योहार पर घरों से रोटी या पूड़ी के साथ कुछ मिठाई या लड्डू भी मिल जाते साथ मे नगदी के रूप  चार-आठ आने भी  दिये जाते जिससे उसके परिवार मे भी त्योहारों कि खुशियाँ दिखाई देने लगती। घरों मे जब शादी-विवाह आदि मांगलिक कार्य होते तो उस बुजुर्ग महिला विनियाँ का परिवार भी बिना निमंत्रण पत्र के आमंत्रित रहता। विनियाँ के  परिवार के सदस्य भोज समारोह के दौरान फेंके गये झूठन मे से साबुत मिठाई खाने आदि की वस्तुए अपने प्रयोग के लिये एकत्रित कर बचे खाने को गाय-बैल आदि जानवरों को देते  और बाकी कचड़े जैसे  दौने, पत्तल, मिट्टी के कुल्हड़ को शहर से दूर निस्तारित करते। समारोह के अंत मे इस परिवार के भोजन का नंबर आता जो समारोह स्थल के आखिरी छोर पर बैठ कर अंत मे भोजन करता और परिवार के अन्य लोगो के लिये बांध कर ले जाता। पावन मांगने बाले दिनों मे ही उस विनियाँ  को देखते थे क्योंकि बाकी दिनों मे सुबह से देर दोपहर तक उसे मैले कि सफाई कर उसको सिर पर  ढोकर शहर से दूर फेंकने जाना पड़ता था। इस कार्य मे उसे 2-3 चक्कर से भी ज्यादा रोज लगाने पड़ते थे।   कभी कभी जब मेरी माँ फुर्सत मे होती तो पावन देने के बहाने  विनियाँ का  हाल चाल और घर परिवार के बारे मे पूंछती। वह महिला मेरी माँ को जिज्जी कह कर संबोधित करती और  हमेशा माँ से फांसला  बना कर नीचे सड़क पर बैठ माँ से बाते कर घड़ी-दो-घड़ी आराम कर लेती। मेरी माँ प्रायः हम लोगो से एक लोटा पानी लाकर उसको पिलाने के लिये कहती तो वह ओख से दोनों हाथ बांध कर पानी पीती और हम लोग चबूतरे से लोटे के  पानी की धार बना कर उसे पानी पिलाते। यध्यपि इस बात के सख्त हिदायत थी कि पानी पिलाते हुए लोटे को उससे छूना नहीं चाहिये अन्यथा लोटे को मिट्टी से मांझना, धोना पड़ेगा। मै  उन दिनों 8-10 साल का रहा हूंगा और प्रायः पानी पिलाना शुरू करने या समाप्त करने मे कई बार लोटा उसके हाथ से छू जाता तो भी मै किसी को नहीं बताता, क्योंकि मुझे लोटा धोने या मांझने मे कोई दिक्कत नहीं थी पर लोटे का उससे छू जाने के बाद लोटे को धोने  का  व्यवहार अंदर ही अंदर मन मे बड़ा  कचोटता था। ये वो महिला थी जो हर दिन हमारे शौचालय से मैले को साफ कर अपने सिर पर ढोकर ले जाती। कभी कल्पना करता हूँ कि जिस मैले को हम हाथ लगाने से भी घृणा करते हैं उस मैले को विनियाँ  ने अपनी सारी उम्र  साफ कर सिर पर ढो कर निस्तारित  किया होगा और ये कोई एक दिन कि बात नहीं थी बल्कि अनवरत चलने बाली हर दिन कि कहानी थी।  सिर पर मैला ढोने की इस  प्रथा ने, न जाने कितनी पीढ़ियों से  विनियाँ  या उस का परिवार अपनी आजीविका के रूप मे करता आ रहा होगा। न जाने कितनी पीढ़ियाँ इस कार्य को करते हुए मोक्ष को प्राप्त हो गई होंगी, जिसका कोई अंदाजा हम  आज भी नहीं लगा सकते और सबसे घृणास्पद कार्य जिसको मन मे सोचने भर से मन खिन्न  हो जाता था पर विनियाँ  हर दिन सिर्फ महीने मे दो-तीन  बार  "पावन" और चंद सिक्कों के लिये यह अपमान जनक कार्य करती थी ताकि वह और उसके परिवार का जीवन यापन हो सके। हमे याद है इस काम मे उस महिला की अगली पीढ़ी के  बेटे और बहू भी हाथ बंटाने लगे  थे।  इस सृष्टि मे सिर्फ एक माँ ही है जो बच्चे के जन्म लेने से उस बाल्य अवस्था तक, जब तक की बच्चा खुद इस काम को करने के लायक नहीं हो जाता अपने बच्चे कि गंदगी को बगैर किसी  घृणा भाव के दिन मे अनेकों बार साफ करती हैं और दूसरी तरफ उक्त बुजुर्ग विनियाँ  जो पूरे मुहल्ले के बच्चे, बूढ़े, बड़े, नौजवानों का मैला अपने हाथों से माँ की तरह साफ करती बगैर उम्र के भेदभाव किए। मेरा द्रढ़ निश्चित मत है इस सफाई बाली माँ का स्थान भी किसी भी मायने माँ से कमतर नहीं था। जब कभी उस सफाई कर्मी विनियाँ  को याद करता हूँ तो उसके कार्य को याद कर सिहर जाता हूँ कि कैसे उस  महिला न हमारे सहित समाज के सैकड़ो घरों का मैला न केबल साफ किया अपितु सिर पर ढोकर उसे घर से दूर ले जाकर निस्तारित किया। ये एक ऐसी माँ थी जिसने जन्म तो नहीं दिया पर माँ के समान अपनी ज़िंदगी के हर दिन को मैला ढो कर नरक मे अपना जीवन की आहुति दी  ताकि समाज की   संताने एक साफ सफाई से भरपूर सुखी और सम्पन्न स्वर्गिक आनंद को जी सके। विनियाँ आजकल  उम्र के अपने आखिरी पढ़ाव के दौर से गुजर रही थी। चलना फिरना कम हो गया था। कभी कभी बहू-बेटे के साथ पावन के बहाने अपने डेरे के लोगो को देखने चली आती। उसकी लाचारी और उम्र की बेबसी उसके चेहरे पर स्पष्ट देखी जा सकती थी। कभी  दूर आसमान के शून्य मे वेसुध होकर एकटक देख मन ही मन बुदबुदा कर अपने आप से ही बात करती?  

न जाने क्यों आज मै अपराध बोध से ग्रसित हूँ। ऐसा लग रहा है कि विनियाँ बाई हमे झकझोड़ रही है और  चीख-चीख कर समाज के हर व्यक्ति से  ये सवाल कर रही है "मानव मल को साफ करने और उस मैले को  सिर पर ढोने के  कार्य को  निर्वहन करना हमारे ही परिवार या    जाति की ही ज़िम्मेदारी क्यों रही??  छुआछूट और अस्पर्श्यता के श्राप से शिक्षा और अन्य रोज़गार से हमे सहस्त्रों वर्ष वंचित क्यों रखा गया?? हजारों वर्षों मे हमे समाज मे बराबरी के  दर्जे से क्यों वंचित रखा गया?? हमारे पूर्वजों ने उन्हे   सिर्फ और सिर्फ इस मैला ढोने के कार्य तक क्यों सीमित रखा?? समाज के अन्य वर्ग ने इस कार्य मे भागीदार होकर बराबरी क्यों नहीं की?? क्यों समाज के अन्य सभी वर्गों ने मानव मल को साफ कर  सिर पर ढोकर निस्तारित करने  के इस  कार्य को उसके परिवार एवं उसकी जाति के लिये "आरक्षित" कर दिया??

सैकड़ों सालों पूर्व  हमारे पूर्वजों ने इस जाति को मैला ढोने की प्रथा से मुक्ति  के लिये नहीं सोचा तो  क्या वर्तमान मे हम सभी को भी क्या जमादारिन विनियाँ और उसके परिवार/जाति के लिये "आरक्षित" इस सेवा कार्य से मुक्त करने के लिये  ठोस और  रचनात्मक प्रयास नहीं करने चाहिये?? जब कभी ये ख्याल दिल मे आता है  तब उस  माँ के प्रति मेरा सिर श्रद्धा और सम्मान से झुक जाता है और सोचता हूँ कि क्या उसके इस ऋण से एक  ज़िंदगी तो क्या कई ज़िंदगियों मे उऋण हुआ जा सकता हैं??

आज के इस प्रगतिशील वैज्ञानिक युग मे काफी जगह पुराने देशी शौचालय यध्यपि समाप्त हो गये है पर महानगरों मे सीवर की सफाई के लिये भी इसी वर्ग के लोगो से यही कार्य कराया जा रहा हैं। इस सबके बाबजूद भी ये देश का दुर्भाग्य है कि सिर पर मैला ढोने की इस कुत्सित प्रथा का पूर्णतः उन्मूलन आज  तक भी  नहीं हुआ है।

सिर पर मैला ढोने की इस अमानवीय अपमान जनक  प्रथा के बारे मे अपनी आने बाली संतानों को आज यदि हमने नहीं बताया तो हम एक बहुत बड़े अन्याय और पाप के  भागीदार होंगे। आज आवश्यकता है हमे अपने बच्चों को ये बताने और जागरूक  करने की "कि उन्होने जीवन मे जो सफलता, शिक्षा, ज्ञान हांसिल किया। जो बड़ी-बड़ी सफलता पायी दरअसल उसके पीछे विनियाँ जैसी महिला और उसकी उन अंगिनित अभागिन  पीढ़ियों का एक महत्वपूर्ण योगदान है  और हमारे पूर्वजों का इस वर्ग के प्रति भेदभाव एवं अन्याय पूर्ण व्यवहार   भी हैं जिनकी संताने इस मैला ढोने की अपमान जनक  प्रथा को अब तक करती  आ रही  है।  उक्त घृणित कार्य को करने बाले परिवार  स्वयं चाह कर भी आज के इस समता-मूलक समाज मे  अपना स्थान गाँव के आखिरी छोर पर बनी अपनी झोपड़ी की ही तरह देखते हैं क्योंकि सैकड़ो वर्षों से इस नरकीय जीवन को जीने बालों ने इस कार्य को ही अपने जीवन की "आखिरी नियति" मान लिया हैं !! कानूनी प्रावधानों के कारण वेशक आज हम इनको बराबरी का दर्जा दे रहे है पर ये कड़वी सच्चाई है और हमारा दुर्भाग्य भी, कि दिलों मे हम लोगो ने इन्हे आज भी बराबरी का दर्ज़ा नहीं दिया है ??

सैकड़ो साल से चली आ रही  इस अमानवीय  असमानता को सिर्फ कानून प्रदत्त उपायों से  चंद दशकों मे दूर किया जा सकता हैं??

इसके लिये एक बार अपने आप को विनियाँ बाई की जगह रख कर सोचने की महती आवश्यकता है और आवश्यकता है विनियाँ बाई द्वारा उठाये "गैर बराबरी" के प्रति उसके सवालों पर मंथन करने  की??

विजय सहगल

कोई टिप्पणी नहीं: