"चौथा आदमी"
हरेक
व्यक्ति की ज़िंदगी मे कभी न कभी ऐसे व्यक्तियों से पाला पड़ता है जिनके व्यवहार
के दंश को पीढ़ित जन्म ज़िंदगी याद रखता
हैं। ऐसे व्यक्ति आपको ज़िंदगी के किसी भी मोड़ पर मिल सकते हैं। आपके कार्यालय, आपके पड़ौस, बस या रेल यात्रा मे, स्कूल या कॉलेज के साथी के
रूप मे कहने का तात्पर्य है ज़िंदगी के किसी भी दोराहे पर आपसे इनकी मुलाक़ात हो
सकती हैं।
प्रायः
भारतीय शास्त्रों मे व्यक्तियों के स्वभाव के आधार पर व्यक्तियों को तीन वर्गों मे
विभक्त किया है पर आज से 6-7 सौ
साल पूर्व हमारे देश मे एक बहुत ही महान ऋषि हुए है श्री भर्तृ हरि जिनहोने आदमियों को चार वर्गों मे विभाजित किया हैं। उन्होने
अपने नीति शतक मे इन व्यतियों के स्वभाव को
एक श्लोक मे लिखा है:-
एके सत्पुरुष: परार्थघटकाः स्वार्थम
परित्यज्य ये,
सामान्यास्तु परार्थ मुध्यमभृतः, स्वार्थाविरोधन ये,
तेsमी मानुष राक्षसाः परिहितं
स्वार्थाय निघ्नन्ति ये,
ये निघ्नन्ति निर्थकं परहितं, ते के न जानीमहे . (भर्तृ हरि -नीति शतक, श्लोक-६५)
अर्थात
१. वे "मनुष्य उत्तम कोटि" के है जो स्वार्थ का परित्याग करके दूसरे की भलाई करते है.
२. अपना हित करते हुए जो दूसरे का भी हित करते है, वे "मध्यम कोटि के मनुष्य" कहलाते है.
३. जो मनुष्य स्वार्थ सिद्धि के लिए दूसरे का अहित करते है, वे" मनुष्य के रूप में राक्षस" है.
४. किन्तु जो मनुष्य बिना किसी स्वार्थ के दूसरे का अहित करते है, उन्हें क्या नाम दिया जाय हम नहीं जानते?
ऋषि भर्तृ हरि जिन्होने उक्त चौथे वर्ग के व्यक्ति की खोज तो की परन्तू स्वयं
भी निष्कर्ष न निकाल पाये कि इस चौथे वर्ग के व्यक्ति को क्या कहा जाये, नहीं
जानते?? ऋषि भर्तृ हरि को
कितना चिंतन-मनन, गहन अध्यन करना पड़ा होगा इस चौथे व्यक्ति के
स्वभाव की खोज मे। "उत्तम कोटि", "मध्यम कोटि", "मनुष्य के रूप मे राक्षस" पर इस चौथी कोटि के मनुष्य के बारे
मे ऋषिवर को कितनी वेदना, कष्ट और कितने दर्द को सहना पड़ा
होगा कि इस निम्नतम कोटि के व्यक्ति की व्याख्या को उन्होने शब्दों से परे रखा।
पिछले दिनों एक ऐसे ही चौथे आदमी के स्वभाव बाले मित्र श्री का उल्लेख कर रहे है जिनकी बजह से हमे एक रात कष्ट
और वेदना के साथ बगैर भोजन के भूखा सोना पड़ा।
ग्वालियर पदस्थापना के समय
एक बार ऐसा बाक्या हुआ कि मेरी पत्नी बच्चों के साथ अपने माता-पिता के घर गई हुई
थी। पहले भी ऐसा अनेकों बार हुआ था, खाने कि व्यवस्था यहाँ-वहाँ से हो जाती थी या कभी
उल्टा-सीधा कुछ बना कर खा लेने से भी उदारपूर्ति हो जाती थी। परन्तू उस दिन बैंक
के दूसरे कार्यालय मे पदस्थ हमारे साथी मैनेजर ने कहा चूंकि आपकी पत्नी अपने मायके
गई है अतः आज शाम का खाना आप हमारे साथ हमारे घर पर ग्रहण करेंगे। ऐसे समय इस तरह
के आमंत्रण बड़े सुखद लगते है। पहले तो
हमने इसके लिये मित्र और उनके परिवार को अनावश्यक कष्ट उठाने को मना किया, पर उनके आग्रह करने पर अंततः मैंने उनके इस आमंत्रण को स्वीकार तो कर लिया पर
उनको बहुत ही सादा दाल,चावल, रोटी ही
बनबाने का आग्रह किया। रात के 8 बजे उक्त मित्र महोदय ने हमे हमारे घर से ले लेने
का कार्यक्रम तय किया था। बात चीत शाम के 4-5 बजे हुई थी अतः 6 बजे तक शाखा से आने
के बाद मै भी रिलैक्स मूड मे था क्योंकि शाम के खाने की व्यवस्था हो ही चुकी थी। फ्रेश बगैरह होने के
बाद टाइम पास के लिये हम टीवी देखने लगे कि अचानक हमारे पड़ौस मे रहने बाले बैंक
स्टाफ भाई राजेंद्र सिंह भी आ गये, उनको भी मालूम था कि
श्रीमती जी मायके गई हुई है, तो सौजन्यता वश खाने-पीने का
पूछने चले आये। मै मन ही मन भगवान का स्मरण कर सोचने लगा "प्रभु तेरी लीला
कितनी अपरंपार है कहाँ मै खाना खाने कि जुगाड़ मे चिंतित था कहाँ तूने एक नहीं
दो-दो आथित्य निमंत्रण भेज दिये"!! राजेंद्र जी से बात-चीत मे मैंने उन्हे
धन्यवाद देते उनके आमंत्रण को स्वीकारने मे खेद जताते हुए उक्त मित्र श्री के आमंत्रण के बारे मे बताया। राजेंद्र जी के आथित्य
को फिर कभी स्वीकारने की कह कर हमने उन्हे विदा किया और पुनः टीवी देख कर समय
व्यतीत करने लगा। सांय 8 बजे के 5-10 मिनिट पूर्व हमारे उंक्त मित्र श्री का फोन आया कि वे
अभी आटा चक्की पर गेहूं पिसवाने आये है और कुछ समय मे ही आटा घर पहुंचा कर, मुझे भोजन के लिये लेने हमारे घर
पहुँचने बाले है। लगा भला आदमी है हो सकता है कुछ बिलंब हो अतः पूर्व सूचना दे दी।
जब 8.30 बज गये और नौ बजने बाले थे तो हम कुछ चिंता हुई कि क्या बात है मित्र श्री
को भोजन के लिये ले जाने के लिये आ जाना चाहिये था? जब उनके
घर फोन किया तो कोई रिसपोन्स नहीं मिला। इंतज़ार करते करते समय 9 बजे से 9.30 फिर
10.00 और 10.30 के पार हो गया फिर भी कोई
सूचना नहीं मिली और न ही मित्र श्री हमे भोजन के लिये ले जाने को हमारे घर पधारे तो मन ही मन कुछ क्रोध मिश्रित पीढ़ा हुई कि इससे तो अच्छा भाई राजेंद्र जी का आमंत्रण
स्वीकार कर लेते तो बेहतर रहता। पर भोजन पर ले चलने के लिये मित्र श्री अब आते होंगे, तब आते होंगे, अब-तब मित्र का इंतजार करते करते जब
आँखें पथरा गई तो 11.30 बजे हमने अपने मित्र श्री और भोजन कि आश छोड़ दी और भूखा ही
सो गया।
जब सुबह ऑफिस मे हमने कुछ लोगो को खाने की इस
घटना की आप बीती सुनाई तो पता चला कि उक्त मित्र श्री तो इस तरह के कारनामे करने
के लिये पूर्व से ही कुख्यात रहे है!! ग्वालियर
आने के पूर्व अन्य शहरों मे जहां भी उनकी पोस्टिंग रही बो किसी न किसी स्टाफ के साथ उक्त क्रत को कर चुके थे। बाद मे ऐसा ही एक
किस्सा उक्त मित्र श्री के बारे मे हमे
हमारे परम मित्र परमानंद अग्रवाल ने भी कह सुनाया। हमे हमारे साथ हुई इस घटना से दु:ख तो अवश्य हुआ और आज तक उस घटना के बारे मे
सोचता हूँ, कैसे
और क्यों कर एक आदमी को अकारण ही सताना, दुःख या कष्ट देने से उस मित्र श्री को क्या सुख या लाभ मिला होगा????
लेकिन ऋषि भर्तृ हरि द्वारा सैकड़ो वर्ष पूर्व खोजे इस "चौथे
आदमी" रूपी महापुरुष के साक्षात दर्शन हमे जरूर हो गये जिसके अनुसार
" जो मनुष्य बिना किसी स्वार्थ के दूसरे का अहित करते या कष्ट देते है, उन्हें क्या नाम दिया जाय हम नहीं जानते?"
विजय सहगल

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