दिये
की लौ
अंधियों
मे जूझ जैसे, चलें समुद्र मे कश्तियां।
तिमिर
के छँटने को काफी एक माटी का दिया॥
जब
घिरी तम की घटाएँ सेतु के संसार मे।
जल
रही थी लौ दिये की दूर कश्ती धार मे॥
दूर
वेशक न करे प्रकाश के अवसान को ।
टिमटिमा
संदेश देती अपनी सत्ता शान को॥
दिया
रोशन करे जब, कुबेर का कोषालय भी।
देव
का देवालय भी, शिव का शिवालय भी।
तमस
क्यों संग है प्रबल, दम्भ और अन्याय के।
लौ
दिये की है समर्पित, सत्य और पथ न्याय के॥
धुंध
को जब चीर कर, लौ दिये की जली।
घमंड
झंझावात का, पवन-प्रचंड लेकर चली॥
नृशंस-मिथ्याचार
के संग, तमस क्यों होता बड़ा।
"सत्य
की लौ" साथ जैसे, ओट बन तिनका खड़ा॥
है
नहीं अवश्य ही हर, रोशनी सूरज सी हो।
घोर
काली रात मे नन्ही-किरण-ज्योति की हो॥
स्याह
आंधी युद्ध मे जब, हवा "लौ" को खा गयी।
काल
के इतिहास मे, "दिये की लौ" समा गयी॥
क्यों
"दिये" होम होते, घुप्प अंधेरी रात मे।
दो
घड़ी जीवन बिताते हाथ लेकर हाथ मे॥
सार्थक
जीवन उन्ही का, जो दूसरों के काम आयें।
रश्मि
बन जैसे दिये की, पथिक को रस्ता दिखाये॥
राह
मंजिल की पाने, प्रकाश पथ मे चाहिये।
डिगाने
श्याम रैन को, लौ दिये
की लाइये॥
विजय
सहगल

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