माँ का आंचल
पेड़ों की
डाली पे सावन का झूला।
आंगन के कोने मे मिट्टी का चूल्हा।
भोर मे कौए का कौ-कौ बुलाना।
इंगित करता घर, मेहमा का आना॥
उठके बुहारे माँ,
पहले घर आँगन।
नहा के करती, ईश्वर आराधन॥
घर के हर कोने मे बरसे बरक्कत।
झलके माँ तेरी मेहनत मशक़्क़त॥
करे दूर घर
के कष्टों को सारे।
भरदे जीवन मे, फूलों से उजियारे॥
लकड़ी मे उपले से चूल्हा जो दहके।
चूल्हे की सौंधी मिट्टी बो
महके॥
चकला-वेलन से रोटी बनाना।
परथन लगा के रोटी पकाना।
माँ की ममता है रोटी मे अर्पित।
पहली रोटी, माँ गौ को समर्पित॥
बचपन से चेहरे पे देखा जो माँ के।
खुश होती बच्चों का खाना बनाके॥
बटरी की दाल और चूल्हे की रोटी।
खिला के बच्चों को, माँ खुश होती॥
बचपन से अब तक देखा जो माँ के।
झटपट "शाला" का डिब्बा बनाके॥
माँ के आंचल मे जो संसार देखा।
नन्ही सी लगती है वैकुंठि रेखा॥
विजय सहगल

1 टिप्पणी:
बचपन याद दिलाता माॅ का आंचल ।।।
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