मंगलवार, 30 जुलाई 2019

"अनिल समाधिया- रिटायरमेंट"


"अनिल समाधिया- रिटायरमेंट"



हमारे परम मित्र श्री अनिल समधिया जो कि बैंक ऑफ बड़ौदा, झाँसी मे कार्यरत थे जिनका आज अधिवार्षकी पर सेवानिव्रति थी पर इस वर्ष 1 जनवरी 2019 को उनका  आकस्मिक निधन हो गया था। आज उनके रिटायरमेंट  बाले पर हम उन्हे विनम्र भवांजलि अर्पित करते हैं।   

अनिल आज तुम्हारी सेवानिव्रत्ति का दिन है। प्रत्येक सेवारत व्यक्ति के जीवन मे 60 साल की उम्र मे रिटायरमेंट बाला दिन बढ़ा महात्व्पूर्ण दिन होता हैं। इस दिन व्यक्ति और संस्थान मे कार्यरत उसके कनिष्ठ और वरिष्ठ साथी एक दूसरे को धन्यवाद और आभार ज्ञापित कर संस्थान का सहयोग और सेवानिव्रत्त साथी की सेवाओं का आभार जताते हैं। प्रायः अधिवार्षकी सेवानिव्रत्ति पर एक बात जरूर सुनने को मिलती है कि संस्थान मे नौकरी कभी भी शुरू करो पर सेवानिव्रत्ति का दिन निश्चित होता हैं। यानि कि आपने जिस दिन नौकरी जॉइन की उसी दिन आपकी रिटायरमेंट की तारीख निश्चित हो जाती हैं। पर तुमने कब नियम माने? तुमने हमेशा नियमों और  वर्जनाओं को तोड़ा हैं। तुम्हने   हमेशा लोगो की सहायता और मदद के लिए अपने हाथ बढ़ाने मे कभी नियमों और सिद्धांतो को इसके लिए आढ़े नहीं आने दिया। तुम लोगो से ऐसे जुड़े और एक ऐसा अटूट  रिश्ता बनाया कि लोग इस संबंध को और प्रगाढ़ बनाने का प्रयास करते लेकिन यहाँ भी तुमने नियमों को उल्लंघन कर रिश्तों को इस तरह तोड़ा जो टूट कर भी सदा के लिये अमर हो गया। आज तुम होते तो  तुम्हारी सेवानिव्रत्ति की तैयारियां सभी लोग अपने तरीके से  अलग अलग तरह से कर रहे होते। शायद तुम भी इस 38-39 साल की सेवा पर अपने बैंक के साथियों, अपने परिवार के लोगो, इष्ट मित्रों  के सहयोग का स्मरण करते अधीनस्थों के प्रति अपने प्यार का प्रदर्शन करते अपने उच्च अधिकारियों के प्रति सम्मान को ज्ञापित करते। तुम्हारा हर साथी तुम्हारे प्रति अपनी भावनाओं को प्रदर्शित करता एवं अपनी तरह से आपके साथ बिताये क्षणों का स्मरण करता। दिल मे अनेक अंतर्द्वंद चलते हैं ऐसे मौके पर। मै  ये कहूँगा या मै  बो बोलूँगा ताकि बैंक मे बिताए 38-39 साल की सेवा को सबके बीच व्याँ कर सके।  प्रायः ऐसे मौके पर बहुत सी सोची हुई बाते बिदाई के समय भूलकर जहन मे ही रह  जाती  हैं। हर सेवानिवृत्त सदस्य की यही दिली तमन्ना होती है कि उसकी अपने संस्थान  से बिदाई यादगार हो।  यही तो होता है इस विशेष महात्व्पूर्ण  दिन जब हम अपने प्यारे संस्थान को  संस्थान की सेवा के आखिरी दिन अधिवार्षिकी पर आभार जता कर अलविदा कह  कर जाते है। तुमने यहाँ भी नियमों को तोड़ा और सेवानिव्रत्ति की एक "निश्चित तारीख" के पूर्व ही उसे अनिश्चिता के मझधार मे छोड़ महाप्रयाण कर गये। हो सकता हैं ये तुम्हारा स्वभाव हो पर इस आभाव को  हम सभी ने कभी नहीं सोचा था।  

मुझे याद आता हैं, हमारी मित्रता के लगभग 50 साल मे कुछ तो था, सोच, विचार पारवारिक संस्कार जो हमे इतने लंबे समय तक जोड़े रखा,  एक दिन या एक पल भी  कभी कोई मतांतर इस भौतिक जीवन मे  नहीं हुआ पर इस जीवन  से इतर अलौकिक दुनिया की कुछ घटनाये भी हम दोनों के  जीवन मे समान रूप से घटित हुई।  ईश्वर की इस नियति को  घटित होते देख उस अद्रश्य शक्ति के निर्णय पर "आश्चर्य मिश्रित हंसी" अनायास ही आज ताजा हो गई।        
यूं तो हर उस व्यक्ति का जो इस दुनियाँ मे आया है जाना निश्चित हैं। कुछ पहले या कुछ बाद मे। पर तुम जैसे लोगो का असमय जाना कही न कही दिल को कचोटता हैं। मेरा मानना है कि हर सेवारत व्यक्ति की ज़िंदगी मे दो बार विदाई होती हैं और दोनों अवसरों पर लोग, शुभ चिंतक मित्र एकत्रित होते है बस फर्क इतना होता है कि सेवानिव्रत्ति की विदाई  पर हम लोगो की राय, भावनाओं, उद्गारों, विचारों और ख़्यालों को सुन और देख सकते है पर दूसरी बिदाई  मे ये सब मुमकिन नहीं। नियमों की परवाह किये बिना "जिसे तुमने  चुना"!!   

कुछ ऐसी ही अनुभूति मुझे भी 39 साल 6 माह बैंक की सेवा के बाद बैंक की सेवा के आखिरी दिन सेवानिव्रत्ति पर हुई थी। दिन भर इस ऊहा-पोह की  स्थिति दिल मे रही कि आज अधिवार्षिकी पर ये कहूँगा या ये बोलूँगा।  इस तरह के विचार उमड़-घुमड़ कर दिन भर  आते रहे, लगभग 40 साल कि सेवा के बाद ऐसा होना स्वाभाविक भी था। उस दिन मै निरीक्षण कार्य के कारण अपने मुख्य कार्यालय कनॉट प्लेस  से बाहर नोएडा मे था।  दोपहर तक भी मुख्य कार्यालय या कार्यालय प्रमुख से कोई आदेश मेरे लिये   सेवानिव्रत्ति पर बापस मुख्य कार्यालय कनॉट प्लेस आने के लिये नहीं आया।  तब कुछ बेचैनी हुई और मन ही मन हंसी आई  कि कही किसी दूसरे कार्यालय से तो ही नहीं मुझे कार्यमुक्ति पत्र दे कर बिदा कर दिया जायेगा?? तब मैंने 4 बजे साँय अपने कार्यालय प्रमुख को कहा कि मै साँय 4 बजे नोएडा से   कनॉट प्लेस के लिये प्रस्थान करूंगा ताकि महात्व्पूर्ण अधिवार्षिकी सेवानिव्रत्ति "कार्यमुक्त पत्र" प्राप्त  कर सकू। जब कुछ भी संवाद न हुआ तो हमने ध्रष्टता पूर्वक अपने कार्यालय के "व्हाट्सप्प ग्रुप" मे एक शेर की दो लाइन लिख कर अपना दर्द व्याँ किया:-

"बड़े बेआबरू हो कर तेरे कूचे से हम निकले"

पर वही "ढाँक के तीन पात" कही कोई प्रत्युत्तर नहीं।  मुझे  जानकार हैरानी हुई 39.5 वर्ष की बैंक की सेवा के आखिरी दिन सेवानिव्रत्ति पर 23-24 स्टाफ के बाबजूद कार्यालय प्रमुख सहित कोई भी व्यक्ति कार्यालय मे नहीं था। टेलीफ़ोन पर संदेश दे कर  मेरा सेवानिव्रत्ति कार्यमुक्ति पत्र हमारे एक मित्र द्वारा नोएडा स्थित सिटि सेंटर मेट्रो स्टेशन के नीचे सड़क पर पावती प्राप्त पश्चात हमारे सुपुर्द किया गया। मुझे जीवन के बहुमूल्य 39.5 साल इस प्यारे बैंक की सेवा मे अर्पित कर  ऐसी बिदाई की उम्मीद कदापि न थी पर शायद नियति को ये ही मंजूर था। तुम्हारी सेवानिव्रत्ति के इस दिन  आज हमे हमारी सेवानिव्रत्ति वरवश याद आ गयी।

प्रिय अनिल  इस "वेमिशाल-यादगार" सेवा निव्रत्ति पर एक महत्वपूर्ण  समानता देखने को मिली  कि तुम्हारी सेवानिव्रत्ति कार्यक्रम इस लिये नहीं हो सका क्योंकि कार्यक्रम मे  स्टाफ प्रमुख के साथ अन्य सदस्य तो थे पर  तुम नहीं थे  और हमारा सेवानिवृत्त कार्यक्रम इस लिये न हो सका क्योंकि इस कार्यक्रम मे हम तो थे पर हमारे विभाग प्रमुख सहित अन्य स्टाफ सदस्य नहीं थे। आज तुम्हारी इस  अधिवार्षकी  सेवानिव्रत्ति पर हम तुम्हें तहे दिल से याद कर सादर नमन कर अपने श्रद्धा सुमन अर्पित करते हैं।  

विजय सहगल    


रविवार, 28 जुलाई 2019

"बचपन के दिन "


"बचपन के दिन "



















बचपन  की  यादें।   
भूली-विसरि बातें॥  
वो किस्से कहानी।
जो याद है जुबानी॥  

"लू-लपट", दिल लागे ठंडा।
भरी दोपहरी, गिल्ली डंडा।
गुच्चू, पिद्दू , लाल नापना
पिदा-पिदा के हाड़ तापना॥
डंडे पर गिल्ली  को  ताना।
चुन्नू का था गज़ब निशाना॥  
एक बार, जब धाम गंवा दी।
धाम दुबारा कसम चढ़ा, ली॥
"खो-खो" मे भागे  और आये।
"आइस-पाइस" मे छुपे छुपाये॥
कंचे "गल्ल" मे खूब निशाना।
लूट, मार "बंटों" का खजाना॥
"चंदा-पउवा", "कट्टस - विंदी"।
खेल जमीं पर नहीं थी गिनती॥ 
"कैरम" सफ़ेद और काली गोटें।
पाने  "रानी", सब लड़े लपोटें॥   
ताश के पत्ते,  जद् न जद्दू।  
बड़ी अजब थी "भद्द" की भद्दू॥ 
"सीप", "कोट-पीस", के क्या कहने।
हारने  बाला  "कोट"  को  पहने॥
"माँझे" और "सद्दे" की "चरखी"।
पतंग उड़ाना "कला" थी परखी॥
बाँधके "कन्ना" पतंग उड़ाना।
पतंग उड़ाके  "पेंच" लड़ाना।
पेंच, पतंग का फाटम-फाटा।
कटी पतंग चीखें "वो काटा"॥         
हरे, गुलाबी लाल "चपेटा"।
हाथ एक से, सबै  समेटा॥           
लंगड़ी, गिप्पी, गैणी गानी।
मछ्ली-मछ्ली कितना पानी। 
छुक-छुक दानी।
बड़े घर जानी॥   
भरे "घाम" मे मुन्नी-मुन्ना।
खेला करते, "चूल्हा-पन्ना"॥
बीते बचपन के दिन सारे।
आज भी लगते कितने प्यारे॥

विजय सहगल

रविवार, 21 जुलाई 2019

"रिमझिम-बरसात"



"रिमझिम-बरसात"
















नन्हें मुन्ने बच्चो आओ।
वर्षा आई,  खुशी मनाओ॥
पानी उड़ कर मेघ बनाता,
आसमान मे जब टकराता।  
नन्ही-नन्ही जल की बूंदे,
बन कर धरा की प्यास बुझाता॥ 
मन्द-मन्द शीतल पुरवाई।
काली घटा नभ मे छाई॥
गरजे बादल, भर कर पानी।
कड़के बिजली, काँपे प्राणी॥
जैसे बूंदे नभ से आती।
धरती हरी भरी हो जाती॥
कोयल कूंके राग सुनाये।
मोर "मेयो-मेयो" कर गाये॥  
दादाजी  बच्चों को डांटे।
बच्चे छोड़ वस्ता ओं छाते॥
भीग रहे थे  कर मनमानी।
रिमझिम-रिमझिम बरसे पानी॥
    
विजय सहगल


बुधवार, 17 जुलाई 2019

WORLD EMOJI DAY





विश्व "इमोजी" दिवस


विश्व की पहली इमोजी आज से लगभग 900 वर्ष पूर्व म॰प्र॰ के जिला टीकमगढ़, तहसील निवारी के ग्राम तरीचा कलाँ मे गढ़ कुड़ार के किले मे बनाई गई थी। 9 दिसम्बर 2018 को गढ़ कुढ़ार की यात्रा के समय जिस इमोजी को देखा था वह किले मे प्रवेश के समय जैसे ही आप मुख्य द्वार से प्रवेश कर उपर की तरफ प्रांगण मे प्रवेश करेंगे तीनों दिशाओं मे एक समान इमोजी बनी है जैसा की फोटो मे दिखाया गया हैं। चौथी तरफ मुख्य प्रांगण मे प्रवेश के लिये सीढ़ियाँ जाती हैं। इन इमोजी को आज भी उक्त किले मे जीवंत वास्तु के रूप मे देखा जा सकता हैं। गढ़ कुड़ार किले की विस्तृत यात्रा विवरण एवं फोटो निम्न लिंक पर उपलब्ध है।


https://sahgalvk.blogspot.com/2018/12/blog-post_11.html


विजय सहगल

मंगलवार, 16 जुलाई 2019

गुरुपूर्णिमा पर स्कूल की "तिमाही रिपोर्ट"


गुरुपूर्णिमा पर स्कूल की "तिमाही रिपोर्ट"




आज क्लास को शुरू हुए 3 माह हो गये। ये क्लास उन मजदूरों के  बच्चों के लिये शुरू की  थी जो निर्माण कार्यों मे लगे हैं और लगातार 4-6 महीने मे स्थान परिवर्तन के कारण जिनके बच्चे स्कूल न जाने के कारण पढ़ाई से बंचित रह जाते हैं। ऐसे बच्चों को पढ़ाने का जो सिलसिला तीन माह पहले शुरू किया था वह आज तक जारी रखते हुए प्रसन्नता हैं।  यध्यपि इस छोटे से कालखंड को बहुत ज्यादा मानना उचित न होगा।  इस दौरान क्लास मे  बच्चों का पढ़ने मे  उत्साह और उमंग ने तथा प्रतिदिन क्लास की शुरुआत ईश्वर की प्रार्थना "इतनी शक्ति हमे देना दाता........" से करने से  मिली शक्ति और प्रेणा ने हमे हर दिन क्लास को जारी रखने मे हद दर्जे की ऊर्जा दी। हमने कुछ ही दिन मे महसूस किया कि हमे इन बच्चों के स्तर को उठा कर अपने स्तर पर लाने की अपेक्षा हमे इनके स्तर पर आने की आवश्यकता हैं, जिसके लिये हमने ओढ़े हुए छद्म पद, प्रतिष्ठा, शिक्षा के आवरण को उतरना आवश्यक समझा,  क्योंकि इनके बगैर उतारे इनके साथ बच्चों के वास स्थान, इनके वातावरण मे जाना कठिन ही नहीं बल्कि नामुमकिन था।  "जैसा देश वैसा भेष" अर्थात हमे बच्चों के "देश-काल और पात्र के अनुसार ढलना था"।  इस दौरान रास्ते मे तमाम दिक्कते आयी पर बच्चों के मुस्कराते चेहरों और उनके उत्साह ने हमे कभी निराशा को नजदीक नहीं फटकने दिया। इस दौरान हमे क्लास का स्थान  7 बार बदलना पड़ा लेकिन बच्चों के उत्साह ने मिलकर नये स्थान की तलाश को बगैर समय गवाये  तुरंत ही नये स्थान की खोज को  पूरा कर दिया।   पिछले दिनों जब यहाँ वर्षात हुई और हमे एक दिन फुटपाथ पर क्लास लगानी पड़ी पर पता नहीं उपर बाले ने किस फरिश्ते को भेजा उसने सुंदर कक्षा का निर्माण टीनशेड के साथ बच्चो के बैठने की व्यवस्था कर दी। निर्माण सड़क के किनारे सड़क से 1-1.5 फुट उपर  इस तरह कराया कि क्लास मे बरसात का  पानी न भरे। "धन्यवाद हे अनाम फरिश्ते"!! बच्चों से सुबह मिलने पर अभिवादन हमेशा "नमस्ते सर" से होता  हैं।   अधिकतर  बच्चों को स्कूल की प्रार्थना अब याद हो चुकी हैं, जब वे सब हमारे साथ  सस्वर ऊंची आवाज मे गाते है तो मन को अति प्रसन्नता होती है जो देखते ही बनती हैं।  ऐसा महसूस  होता हैं मानो "बच्चों का ईश्वर से सीधा साक्षात्कार" हो रहा हैं।  निश्छल, निस्वार्थ, निर्विकार!!

प्रायः हर बच्चे को हिन्दी वर्णमाला याद हो चुकी है बगैर रटंत विध्या के, घुमा फिरा कर, उल्टे सीधे पूंछ कर हर दिन की परीक्षा मे  बच्चों से वर्णमाला पूंछी जाती हैं। गिनती का पढ़ना बही पुरानी पध्वति के अनुसार रटने की स्टाइल मे जारी हैं। उनसठ, उनहत्तर, ऊन्यासी, नवासी मे बच्चे अभी भी कन्फ्युज हैं, प्रयास जारी है। लिखने मे चाहे वर्णमाला हो या गिनती बच्चे जी चुरा रहे हैं जिसका मुख्य कारण क्लास मे ब्लैक बोर्ड और स्लेटस की कमी लगती हैं। ब्लैक बोर्ड इस अस्थाई कच्ची जगह मे बन पाना  शायद संभव नहीं। बीच बीच मे जब कभी   लेप-टॉप से  बच्चों को "मछ्ली जल की रानी हैं......" या "नानी तेरी मोरनी को मोर ले गये......" के  विडियो दिखाते हैं   तो  बच्चे बहुत खुश होते हैं।  प्रयास है ऐसे कुछ और विडियो मिले तो बच्चों का क्लास के प्रति आकर्षण और बढ़ेगा। अभी पिछले 8-10 दिन से "एबीसीडी" का चार्ट भी लाये है पढ़ने, बोलने का प्रयास शुरुआती चरण मे हैं। कुछ बच्चे इस प्राइमरी शिक्षा से उपर के है, उनकी ये शिक्षा उन्होने अपने गाँव मे कर ली थी अतः इन  बच्चों को जो तीसरी, चौथी कक्षा मे जाते थे उनको गणित के सवाल "जोड़ना-घटाना" दिये जा रहे हैं उनमे से कुछ पारंगत और निपुण है पर  कुछ "हासिल" के जोड़ना-घटना के सबालों मे  भ्रमित हैं, पर कॉपी चेक कराना और उस पर "good" लिखवाना नहीं भूलते। उनका ये वर्ताव अच्छा लगता है, जिससे शायद हम बचपन मे प्रायः कहीं वंचित रहे।

बच्चे प्रायः धूल-धूसरित रहते हैं पर सफाई के लिए वेहद जागरूक और चिन्तित, क्लास मे प्रातः 10 बजे एकत्रित होने के पूर्व कक्षा को साफ रखने की होड़ रहती हैं। अलग अलग दिन अलग बच्चे का नंबर सफाई के निरीक्षण के लिये रहता हैं। इस चाहत को देख कर सफाई के प्रति उनका आकर्षण देख कर अच्छा लगता हैं। सफाई निरीक्षण करने बाले बच्चे के प्रति प्रार्थना के बाद सभी बच्चे एक साथ उस बच्चे का नाम लेकर उस के प्रति क्रतज्ञता-धन्यवाद ज्ञापित कर कहते हैं जैसे "थैंक यू राकेश भैया" या "थैंक यू निशा" या इमरान, सोनू, परवीन आदि आदि।  अभी तक 35 के लगभग बच्चे पंजीक्रत हुए है पर कुछ बच्चे अपने माता-पिता के साथ अपने घर या किसी नये  शहर मे मजदूरी करने चले गये, "कभी न बापस आने के लिये"।  लेकिन उनकी मीठी यादें हर दिन क्लास मे उनका साथ होने का अहसास कराती है जब उनका नाम  हाजरी रजिस्टर मे बुलाया जाता हैं। इन बच्चों के लिये कोई दिन विशेष हो जाता जब कोई अनाम व्यक्ति अपने जन्मदिन या यूं ही कुछ खाने की वस्तु चॉकलेट, या फल उनको वितरित कर उनके चेहरों पर कुछ अतरिक्त खुशी ला देते हैं।

क्लास मे आती हर दिन कोई एक नयी समस्या, नया संघर्ष, नयी कठिनाई पर बच्चों की मुस्कान, उत्साह और उमंग, तो मानो तैयार बैठे है उस समस्या-संघर्ष-कठिनाई को बल पूर्वक चुनौती देकर परास्त करने के लिये, बताने के लिये, कहने के लिये कि "हमसे टकराना मत" "क्योंकि कि हम है, "अपराजित योद्धा""!! 
                   

गुरु पूर्णिमा पर स्कूल के जाँबाज़-बहादुर  विध्यार्थियों को समर्पित। 

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विजय सहगल     

रविवार, 14 जुलाई 2019

कानून व्यवस्था- (सब कुछ ठीक-ठाक हैं)


"कानून व्यवस्था"
(अर्थात सबकुछ ठीक ठाक है)

अभी कुछ दिन पूर्व एक राष्ट्रीय राजनैतिक दल  के एक बाहुबली विधायक का विडियो टीवी पर देखा, हाथ मे तीन-तीन रिवोल्वर, एक राइफल के साथ  शुद्ध "शाकाहारी शराब" के साथ सांस्कृतिक नृत्य करते  नज़र आये। उन्हे अपने आचरण पर कुछ भी अजीब नहीं लगा। लगना भी नहीं चाहिये, जब उनके प्रदेश से ले कर अखिल भारतीय स्तर के अध्यक्षों  और शासन के सर्वोच्च पदों  पर आसीन उस दल के सज्जनों को कुछ भी  अजीब या गलत  नहीं लगा। तब इन टीवी चैनल बालों और आम जनता को क्यों कर कुछ अजीब या गलत  लगना चाहिये?? उक्त साक्षात्कार  मे विधायक महोदय ने कहा भी  "कि उनकी विधान सभा क्षेत्र के किसी मतदाता को जब उनसे कोई शिकायत नहीं हैं तो मीडिया बाले क्यों हल्ला गुल्ला कर रहे हैं"?? कितने सुंदर और उत्तम  विचार हैं  और कितना प्यार  हैं उन्हे  अपने क्षेत्र की जनता के लिये, ऐसे सेवा भावी विधायक आजकल कम ही देखने मिलते है। (बैसे भी तीन रिवोल्वर और एक राइफल देख लेने के बाद किसकी मजाल है या किस की शामत आई है  कि कोई मतदाता उनसे शिकायत करे!!) और जब रियाया की कोई  शिकायत ही नहीं है। अतः सिद्ध होता हैं हुकूमत  मे सब कुछ ठीक ठाक शांति पूर्वक चल रहा हैं। चारों तरफ ठकुरसुहाती छाई है फिर तो  "महाराज की जय हो" बनता है!!!!

सरकारों का रवैया "कानून व्यवस्था" के ऊपर  कुछ ऐसा ही होता है। कुछ लोग सरासर, खुले आम कानून व्यवस्था की धज्जियां उड़ाते दिखेंगे, महसूस करेंगे पर जब चर्चा करेंगे  तो जबाब यहीं मिलेगा कहीं कोई लिखित शिकायत नहीं है अर्थात  सब कुछ ठीक ठाक शांति पूर्वक चल रहा हैं और "शिकायत" लिखने की हिम्मत आम जनता मे है नहीं। (क्योंकि उसने सोशल मीडिया पर महाराज का  तीन रिवोल्वर और एक राइफल के साथ सांस्कृतिक नृत्य करते तो देख ही लिया)।  "महाराज की जय हो"!!!!
देश मे कुछ क्षेत्र विशेष ऐसे है जहां की स्थिति कमोबेश  ऐसे ही हैं "तीन रिवॉल्वर और एक राइफल के साथ "भरत नाट्यम" यानि सब कुछ ठीक-ठाक शांति पूर्वक"। ऐसे ही एक बार जब मैं भोपाल मे निरीक्षण कार्यालय से भिंड शाखा मे निरीक्षण करने गया था। ग्वालियर के होटल मे ठहरा था, चूंकि रुकने की ठीक ठाक व्यवस्था भिंड मे उन दिनों नहीं थी। एक दिन शाम के 6.30-7.00 बजे शाखा से कार्य समाप्त कर मैंने भिंड से ग्वालियर के लिये बस से प्रस्थान किया। साधारणतयः लगभग 80 कि॰मी॰ की दूरी 1.30 से 2.00 घंटे मे पूरी हो जाती हैं। बस अपनी सामान्य गति से जा रही थी, सर्दी का समय था। बस छोटे गाँव कस्बो से होती हुई, जहां आवश्यक था सवारियों को उतारती या बैठाती ग्वालियर की दिशा मे सरपट जा रही थी। हम लोग भिंड के औध्योगिक क्षेत्र महाराजपुर  को पार कर गये थे, ग्वालियर 15-20 कि॰मी॰ रह गया था,   अंधेरा भी घिर गया था। महाराजपुर औध्योगिक क्षेत्र से 5-6 किमी आगे अंधेरे को चीरती एक मोटर-साइकल अचानक बस के सामने आ कर रुकी। टायरों की  ची-ची की आवाज के साथ ड्राईवर ने ब्रेक लगा के बस को झटके से रोका। सभी यात्री उनींदे थे अचानक बस के रुकने से सकपकाते हुए जागे कि आखिर क्या मांजरा है। बस अकस्मात क्यों रुकी,  ये जानने सभी उत्सुक थे। कही कोई दुर्घटना का अंदेशा लग रहा था। किसी को कुछ समझ नहीं आया। तभी यात्रियों ने मोटरसाइकल चालक से ड्राईवर की  बातचीत के बाद बस ड्राईवर को उसकी सीट से खींच कर नीचे  उतारते देखा। बस रुक गई थी मेरे सहित कुछ अन्य यात्री भी बस के नीचे उतरे तब पता चला कि मोटरसाइकल चालक ने महाराजपुर औध्योगिक क्षेत्र मे बस को हाथ के इशारे से रोका था चूंकि बस नहीं रुकी तो मोटरसाइकल चालक ने महाराजपुर औध्योगिक क्षेत्र से बस का पीछा कर बस को 5-6 कि॰मी॰ आगे रोक लिया। मोटरसाइकल चालक के  अचानक बस के सामने आ जाने से बस ड्राईवर ने इमरजेंसी ब्रेक लगा कर बस को रोका था अन्यथा बस यात्रियों की  जानमाल के साथ मोटरसाइकल चालक की  जान भी खतरे मे हो सकती थी। अब उस मोटरसाइकल चालक की  जिद थी कि बस को बापस महाराजपुर औध्योगिक क्षेत्र मे लेके  चले। उसने बस को इशारे के बाबजूद क्यों नहीं रोका? बस ड्राईवर को इस गुस्ताखी की सजा मिलेगी?  मेरे सहित अन्य यात्रियों ने उस मोटर साइकल चालक को भरसक समझाने का  प्रयास किया कि बैसे ही हम सभी यात्री लेट हो रहे थे,  उनमे से कुछ को आगे कि यात्रा के लिये ग्वालियर से  ट्रेन पकड़नी है पर बह मोटरसाइकल चालक टस-से-मस नहीं हुआ और आखिर बस को बापस 5-6 किमी मोटरसाइकल के पीछे-पीछे चला कर  महाराजपुर औध्योगिक क्षेत्र मे लेकर जाने से ही माना। चलो यहाँ तक भी ठीक होता तो चलता पर बाहुबली मोटर साइकल चालक ने बस को मुख्य सड़क से हट कर 100-150 मीटर अंदर  एक गली मे ले जाकर रोका। रात मे ये सब देख कर हम जैसे सभी यात्रियों ने चुप रहने मे ही अपनी भलाई समझी। वहाँ पर बस ड्राईवर को उतारकर एक बहुत बड़े लोहे के गेट के अंदर  चारों ओर से बंद हाते मे ले जाया गया। सभी यात्री किसी अनिष्ट की आशंका और  चिंता मे बाहर खड़ी बस मे बैठे इंतजार करते रहे। किसी यात्री ने बताया कि यहाँ इस क्षेत्र मे आये दिन बड़ी मात्रा मे असामाजिक तत्व गुंडई कर बस बालों के साथ मारपीट करते है, बगैर किराये के यात्रा करते हैं और अवैध बसूली भी करते हैं। लगभग आधा घंटे बाद बस ड्राईवर उस मोटरसाइकल चालक साथ-साथ बापस उस हाते से बाहर निकले, ड्राईवर बस की  सीट पर बैठा और उस मोटरसाइकल चालक ने अपनी मोटरसाइकल बही पर छोड़ परिचालक की सीट पर ऐसे अकड़ के बैठा जैसे कोई बहुत बड़ा युद्ध जीत लिया हो और ठाठ से बस मे  बस मालिक की तरह बैठा। बस ड्राईवर का हुलिया बता रहा था उसके साथ भी कुछ शारीरिक हिंसा हुई हो। अब तक रात के 9.30 बज चुके थे। बस पुनः ग्वालियर कि दिशा मे अंधेरे के बीच मध्यम गति से जा रही थी। मुझे रह-रह कर "जॉर्ज बर्नार्ड शॉ" का वह सदवाक्य याद आ रहा था जो कि मैं सुबह भ्रमण मे प्रायः "विविध भारती" के प्रातः भजनों के कार्यक्रम  "वंदनवार"   (6.05 बजे) के पूर्व "महापुरुषो की वाणी" मे   सुनता रहा  हूँ कि  "बहादुर ज़िंदगी मे सिर्फ एक बार मरते हैं जबकि कायर ज़िंदगी मे अनेकों बार मरता हैं" और महसूस कर रहा था हिंदुस्तान मे विशेषतः उत्तर भारत की  जनता  "कायरों" कि तरह ज़िंदगी मे अनेकों बार मरती हैं कभी बस ड्राईवर के रूप मे और  कभी आम बस यात्रियों के रूप मे क्योंकि सरकारों का तो स्पष्ट नजरिया हैं, "कहीं कोई लिखित शिकायत नहीं है अर्थात  सब कुछ ठीक ठाक शांति पूर्वक चल रहा हैं' और हम शिकायत कर भी नहीं सकते क्योंकि हमने सोशल मीडिया पर माननीय विधायक जी  का  "तीन रिवोल्वर और एक राइफल के साथ "शाकाहारी शराब" का पान करते हुये  सांस्कृतिक नृत्य" करते तो देखा ही हैं।
"इति सिद्धम" अर्थात यही सिद्ध करना था।

विजय सहगल