"अनिल समाधिया- रिटायरमेंट"
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हमारे परम मित्र श्री अनिल समधिया जो कि बैंक
ऑफ बड़ौदा, झाँसी मे कार्यरत थे जिनका
आज अधिवार्षकी पर सेवानिव्रति थी पर इस वर्ष 1 जनवरी 2019 को उनका आकस्मिक निधन हो गया था। आज उनके रिटायरमेंट बाले पर
हम उन्हे विनम्र भवांजलि अर्पित करते हैं।
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अनिल आज तुम्हारी सेवानिव्रत्ति का दिन है। प्रत्येक
सेवारत व्यक्ति के जीवन मे 60 साल की उम्र मे रिटायरमेंट बाला दिन बढ़ा
महात्व्पूर्ण दिन होता हैं। इस दिन व्यक्ति और संस्थान मे कार्यरत उसके कनिष्ठ और
वरिष्ठ साथी एक दूसरे को धन्यवाद और आभार ज्ञापित कर संस्थान का सहयोग और
सेवानिव्रत्त साथी की सेवाओं का आभार जताते हैं। प्रायः अधिवार्षकी सेवानिव्रत्ति
पर एक बात जरूर सुनने को मिलती है कि संस्थान मे नौकरी कभी भी शुरू करो पर
सेवानिव्रत्ति का दिन निश्चित होता हैं। यानि कि आपने जिस दिन नौकरी जॉइन की उसी
दिन आपकी रिटायरमेंट की तारीख निश्चित हो जाती हैं। पर तुमने कब नियम माने? तुमने हमेशा नियमों और वर्जनाओं को तोड़ा हैं। तुम्हने हमेशा लोगो की सहायता और मदद के लिए अपने हाथ
बढ़ाने मे कभी नियमों और सिद्धांतो को इसके लिए आढ़े नहीं आने दिया। तुम लोगो से ऐसे
जुड़े और एक ऐसा अटूट रिश्ता बनाया कि लोग
इस संबंध को और प्रगाढ़ बनाने का प्रयास करते लेकिन यहाँ भी तुमने नियमों को
उल्लंघन कर रिश्तों को इस तरह तोड़ा जो टूट कर भी सदा के लिये अमर हो गया। आज तुम
होते तो तुम्हारी सेवानिव्रत्ति की
तैयारियां सभी लोग अपने तरीके से अलग अलग
तरह से कर रहे होते। शायद तुम भी इस 38-39 साल की सेवा पर अपने बैंक के साथियों, अपने परिवार के लोगो, इष्ट मित्रों के सहयोग का स्मरण करते अधीनस्थों के प्रति अपने
प्यार का प्रदर्शन करते अपने उच्च अधिकारियों के प्रति सम्मान को ज्ञापित करते।
तुम्हारा हर साथी तुम्हारे प्रति अपनी भावनाओं को प्रदर्शित करता एवं अपनी तरह से
आपके साथ बिताये क्षणों का स्मरण करता। दिल मे अनेक अंतर्द्वंद चलते हैं ऐसे मौके
पर। मै ये कहूँगा या मै बो बोलूँगा ताकि बैंक मे बिताए 38-39 साल की
सेवा को सबके बीच व्याँ कर सके। प्रायः
ऐसे मौके पर बहुत सी सोची हुई बाते बिदाई के समय भूलकर जहन मे ही रह जाती हैं। हर सेवानिवृत्त सदस्य की यही दिली तमन्ना
होती है कि उसकी अपने संस्थान से बिदाई
यादगार हो। यही तो होता है इस विशेष
महात्व्पूर्ण दिन जब हम अपने प्यारे
संस्थान को संस्थान की सेवा के आखिरी दिन
अधिवार्षिकी पर आभार जता कर अलविदा कह कर
जाते है। तुमने यहाँ भी नियमों को तोड़ा और सेवानिव्रत्ति की एक "निश्चित
तारीख" के पूर्व ही उसे अनिश्चिता के मझधार मे छोड़ महाप्रयाण कर गये। हो सकता
हैं ये तुम्हारा स्वभाव हो पर इस आभाव को
हम सभी ने कभी नहीं सोचा था।
मुझे याद आता हैं, हमारी मित्रता के लगभग 50 साल मे कुछ तो था, सोच, विचार पारवारिक संस्कार
जो हमे इतने लंबे समय तक जोड़े रखा, एक दिन या
एक पल भी कभी कोई मतांतर इस भौतिक जीवन
मे नहीं हुआ पर इस जीवन से इतर अलौकिक दुनिया की कुछ घटनाये भी हम दोनों
के जीवन मे समान रूप से घटित हुई। ईश्वर की इस नियति को घटित होते देख उस अद्रश्य शक्ति के निर्णय पर "आश्चर्य
मिश्रित हंसी" अनायास ही आज ताजा हो गई।
यूं तो हर उस व्यक्ति का जो इस दुनियाँ मे आया है
जाना निश्चित हैं। कुछ पहले या कुछ बाद मे। पर तुम जैसे लोगो का असमय जाना कही न
कही दिल को कचोटता हैं। मेरा मानना है कि हर सेवारत व्यक्ति की ज़िंदगी मे दो बार
विदाई होती हैं और दोनों अवसरों पर लोग, शुभ चिंतक मित्र एकत्रित होते है बस फर्क इतना
होता है कि सेवानिव्रत्ति की विदाई पर हम
लोगो की राय, भावनाओं, उद्गारों, विचारों और ख़्यालों को सुन और देख सकते है पर दूसरी बिदाई मे ये सब मुमकिन नहीं। नियमों की परवाह किये
बिना "जिसे तुमने चुना"!!
कुछ ऐसी ही अनुभूति मुझे भी 39 साल 6 माह बैंक की
सेवा के बाद बैंक की सेवा के आखिरी दिन सेवानिव्रत्ति पर हुई थी। दिन भर इस
ऊहा-पोह की स्थिति दिल मे रही कि आज
अधिवार्षिकी पर ये कहूँगा या ये बोलूँगा। इस तरह के विचार उमड़-घुमड़ कर दिन भर आते रहे, लगभग 40 साल कि सेवा के बाद ऐसा होना स्वाभाविक भी
था। उस दिन मै निरीक्षण कार्य के कारण अपने मुख्य कार्यालय कनॉट प्लेस से बाहर नोएडा मे था। दोपहर तक भी मुख्य कार्यालय या कार्यालय प्रमुख
से कोई आदेश मेरे लिये सेवानिव्रत्ति पर बापस मुख्य कार्यालय कनॉट
प्लेस आने के लिये नहीं आया। तब कुछ
बेचैनी हुई और मन ही मन हंसी आई कि कही किसी
दूसरे कार्यालय से तो ही नहीं मुझे कार्यमुक्ति पत्र दे कर बिदा कर दिया जायेगा?? तब मैंने 4 बजे साँय अपने
कार्यालय प्रमुख को कहा कि मै साँय 4 बजे नोएडा से कनॉट
प्लेस के लिये प्रस्थान करूंगा ताकि महात्व्पूर्ण अधिवार्षिकी सेवानिव्रत्ति "कार्यमुक्त
पत्र" प्राप्त कर सकू। जब कुछ भी
संवाद न हुआ तो हमने ध्रष्टता पूर्वक अपने कार्यालय के "व्हाट्सप्प
ग्रुप" मे एक शेर की दो लाइन लिख कर अपना दर्द व्याँ किया:-
"बड़े बेआबरू हो कर तेरे कूचे से हम
निकले"
पर वही "ढाँक के तीन पात" कही कोई
प्रत्युत्तर नहीं। मुझे जानकार हैरानी हुई 39.5 वर्ष की बैंक की सेवा
के आखिरी दिन सेवानिव्रत्ति पर 23-24 स्टाफ के बाबजूद कार्यालय प्रमुख सहित कोई भी
व्यक्ति कार्यालय मे नहीं था। टेलीफ़ोन पर संदेश दे कर मेरा सेवानिव्रत्ति कार्यमुक्ति पत्र हमारे एक
मित्र द्वारा नोएडा स्थित सिटि सेंटर मेट्रो स्टेशन के नीचे सड़क पर पावती प्राप्त पश्चात
हमारे सुपुर्द किया गया। मुझे जीवन के बहुमूल्य 39.5 साल इस प्यारे बैंक की सेवा
मे अर्पित कर ऐसी बिदाई की उम्मीद कदापि न
थी पर शायद नियति को ये ही मंजूर था। तुम्हारी सेवानिव्रत्ति के इस दिन आज हमे हमारी सेवानिव्रत्ति वरवश याद आ गयी।
प्रिय अनिल
इस "वेमिशाल-यादगार" सेवा निव्रत्ति पर एक महत्वपूर्ण समानता देखने को मिली कि तुम्हारी सेवानिव्रत्ति कार्यक्रम इस लिये
नहीं हो सका क्योंकि कार्यक्रम मे स्टाफ
प्रमुख के साथ अन्य सदस्य तो थे पर तुम
नहीं थे और हमारा सेवानिवृत्त कार्यक्रम
इस लिये न हो सका क्योंकि इस कार्यक्रम मे हम तो थे पर हमारे विभाग प्रमुख सहित अन्य
स्टाफ सदस्य नहीं थे। आज तुम्हारी इस अधिवार्षकी
सेवानिव्रत्ति पर हम तुम्हें तहे दिल से
याद कर सादर नमन कर अपने श्रद्धा सुमन अर्पित करते हैं।
विजय सहगल









