मंगलवार, 29 जनवरी 2019

चंट मौड़ा



चंट मौड़ा

परीक्षा मे एक सवाल पूंछा गया कि निम्न श्लोक का भावार्थ और उदाहरण सहित व्याख्या अपनी भाषा मे  करो:-

अज्ञः सुखमाराध्यः सुखतरमाराध्यते विशेषज्ञः ।
ज्ञानलवदुर्विदग्धं  ब्रह्मापि  नरं न रञ्जयति ॥
                                                                       (भर्तहरि नीतिशतकम श्लोक न॰ 3)

परीक्षा मे चंट बुंदेलखंडी मौड़ा ने जबाब लिखा :- महोदय श्लोक का भावार्थ निम्न हैं:-

भावार्थ - "एक अज्ञानी, मुर्ख व्यक्ति को समझाना आसान है, एक बुद्धिमान व्यक्ति को समझाना उससे भी आसान है, लेकिन एक अधूरे ज्ञान से भरे व्यक्ति को भगवान ब्रम्हा भी नहीं समझा सकते।"
उदाहरण के रूप मे हमाये देश के एक युवा नेता हते अबई बे दुबई गये हते। उते उने चंट बुंदेलखंडी मौड़ा मिलो, बोलो:- "दद्दा" लेओ तुमओं  मिठाई खाओं"
युवा नेता  बोले, - "का खुशी मे बड्डे"॰
चंट मौड़ा बोलो, - "इंडिया मे घर से खबर आई, घर बाली पेट से हैं"
युवा नेता बोले - "तुम कब से घरे नई गए"
चंट मौड़ा बोलो, -  "साल एक खाड़ हो गई"
अब तो युवा नेता  लाल पीले, - बोले मूरख हो,  "बगैर घर जाये घरवाली कऊं  प्रगनेंट होउत का? इतनोई नईं  जानत"
चंट मौड़ा बोलो, - "बोईं तो हम इते दिन से तुमसे कैरएं पप्पू :- बगैर इंटरनेट के कऊं ईवीएम  हैक होउत  का?, तुम इतनोई नईं   जानत?
-विजय सहगल 

रविवार, 20 जनवरी 2019

वर्षगांठ


वर्षगाँठ

आज बेबी वानप्रस्थ की उम्र  मे प्रवेश पर अपनी पुरानी यादों मे खोया हुआ था। रह-रह कर उसके मन मे बारबार बुआ की याद कौंध रही थी।  "माँ के प्रति इतना समर्पण और कर्तव्यनिष्ठा का ऐसा उदहारण कम ही देखने के मिलता हैं जब माँ जाया एक पुत्र अपनी वृद्ध माँ को प्रति माह एक निश्चित रकम देता हो जबकि दोनों एक ही छत्त के तले रहते हैं। लेकिन इस दी जा रही धनराशि को......... "।  

अचानक वह अपने ख्यालों और यादों के खोल से बाहर आता हैं क्योंकि  आज उसका जन्मदिन था। संयुक्त परिवार के छः भाई बहिनों बाले घर मे भाई बहनों को अपना या दूसरे भाई बहिनों का जन्मदिन शायद ही याद रहता हो। माँ-पिता को भी अपनी संतानों का जन्मदिन याद रखना  कठिन बात थी। आज की तरह मोबाइल या टेलीफ़ोन का जमाना  तो था नहीं जिसके रिमाइंदर द्वारा महत्वपूर्ण दिनों की  सूचना को याद रखा जा सके। पर बेबी के  साथ बात कुछ और थी उसकी बुआ को उसका जन्मदिन हमेशा याद रहता। हर साल "बाबू की दोज" त्योहार पर शाम को जब बुआ गरमा-गर्म इमरती  मिठाई लेकर आती तब घर मे एक खुशी के माहौल मे पता चलता कि आज बेबी की वर्षगाँठ हैं। फौरन ही मंदिर मे तिलक की थाली तैयार की जाती जिसमे रोली, अक्षत/चावल सजाये जाते। मंदिर मे भगवान के सामने उसको बैठा कर दीपक जलाया जाता और बुआ, बेबी को  तिलक लगा, इमरती खिला कर  वर्षगांठ का आशीर्वाद देती। बेबी भी सभी बड़ो के पैर छू कर उन्हे प्रणाम करता।  आज के समय के विपरीत बर्थडे  केक काटने की प्रथा तो उन दिनों नहीं थी।  सभी भाई-बहिन भी खुश होते पर बेबी वर्षगाँठ से ज्यादा अपनी पसंदीदा इमारती मिठाई खाकर खुश होता। उम्र के इस पढ़ाव मे आज उसे एकाएक  बुआ की याद आ गई कि वो उसे कितना प्यार करती थी। आज यदि वर्षगांठ  के दिन वे होती तो निश्चित ही गरम-गरम इमरती लेकर जरूर आती और वर्षगांठ पर तिलक लगा कर ढेरों आशीर्वाद देती।  बुआ उसके घर की एक अटूट अंग तउम्र रही। जब से बेबी ने होश  सम्हाला उसने देखा कि बुआ रोज रात मंदिर की आरती के बाद प्रसाद लेकर घर आती, बेबी अपने भाई-बहिनों के साथ पढ़ने से कम पढ़ने का नाटक ज्यादा कर रहा होता। उसका मन पढ़ने से ज्यादा माँ-बुआ-पिता और चचेरी बहिन, दादा  की बातों मे ज्यादा रमता। बाते घर परिवार, रामायण-महाभारत की कहानियों से होती हुई भूत-प्रेत की कहानियों, गांधी-नेहरू के किस्सों तक कहीं से  किसी भी दिशा तक जा सकती थी। आंखों मे नींद भरी होने के बाबजूद नींद को भगाने की भरसक कोशिश होती। इस प्रिक्रिया मे कभी बेबी सफल और कभी असफल होता। इस दिनचर्या मे मौसम की भी अपनी  एक अलग पर अहम भूमिका रहती। गर्मी के मौसम मे सभी लोग घर की खुली छत्त पर चारपाई बिछा लेटते थे। अड़ौस-पड़ौस मे भी यही स्थिति होती। दूर-दूर तक सभी की छत्तों पर लाइट जल रही होती। रात मे कही कहानियों के भूत-प्रेत, डाकू-बदमाश, खब्बीस-डायन के पात्र कही रात की नींद मे न आ जाए इस डर की बजह से बेबी की यही कोशिश होती कि वह किनारे की चारपाई छोड़ कर बीच की चारपाई पर सोये, ताकि इन खलनायकों से बचा रहे।  पर सर्दियों मे जब सभी लोग खपरैल की अटारी मे कंबल-रज़ाई ओढ़ कर  सोते तो बेबी, उक्त भूत-प्रेतों  के डर की बजह से अटारी के दरवाजे के सामने, सोने से बचने की भरसक कोशिश करता।  
      बेबी ने कभी अपने फूफाजी को नहीं देखा था, सुना था उनका देहांत असमय हो गया था जबकि बुआ  का एक मात्र पुत्र की उम्र 1-2 वर्ष की रही होगी। बुआ की ससुराल शहर के एक प्रभावशाली राजनैतिक परिवार मे हुआ करती थी।  उनके जेठ स्वतंत्र भारत मे प्रदेश के पहले विधायक थे। उनके सयुक्त परिवार ने  न केवल बुआ और उनके पुत्र को परिवार का एक अभिन्न सदस्य माना बल्कि बुआ को घर के मुखिया की तरह   उनका हमेशा सम्मान किया। यहाँ तक कि उक्त परिवार ने एक अलग मकान लेकर बुआ के नाम किया ताकि उन्हे या उनके बेटे को ये न लगे कि भविष्य मे उनको संयुक्त परिवार के घर से वेघर कर दिया,  क्योंकि अब तक बुआ के बेटे कि शादी हो चुकी थी, परिवार एक से दो और दो से तीन-चार  होकर बड़ा हो गया था। पर बक्त  कुछ ऐसा बदला, बड़े हुए परिवार मे बुआ के लिये जगह कुछ कम होती चली गई और आखिर बुआ उम्र के अंतिम पढ़ाव मे पुनः उसी परिवार मे बापस आने को मजबूर हो गई। पर धन्य थे उस परिवार के लोग जिन  लोगों ने चाची  का पहले से ज्यादा मान सम्मान देकर अपने परिवार के मुखिया की तरह प्रतिष्ठित  कर उनका स्वागत किया। इसे समय का फेर  ही कहेंगे जब अपने जाये, इतने दूर हो गये कि सड़क पार, पुत्र, प्रपौत्रों  की आवाज सुनने को वे तरस गई। भावनात्मक दूरी इतनी हो गई कि माँ-बेटे को एक दूसरे की आवाज सड़क के पार  न कानों को सुनाई देती, न आँखों को दिखाई देती।

बात ये नहीं थी कि बुआ को किसी आर्थिक या सामाजिक सम्मान की कमी थी या उनके परिवार के लोग चाची का ध्यान नहीं रख रहे थे। बस एक माँ के  स्वाभिमान का प्रश्न था और हो भी क्यों न बहुत कष्टों और तकलीफ़ों के बाद पाला था उसने अपने लाडले बेटे को। वैधव्य के दु:खों और संकटों को अपने हिस्से मे समेटे उसने अपने बेटे के हिस्से मे सदा प्यार और खुशियाँ उड़ेली थी, फिर क्यों कर एक बेटा शादी के बाद अपनी माँ के साथ ऐसा व्यवहार कर सकता था कि माँ को अपने भरण-पोषण के खर्च  के लिए न्यायालय का दरवाजा खटखटाना पड़े। पर हे केशव!, हे बासुदेव! ऐसा दुर्योग शायद अवश्यसंभावी था अतः होनी को नहीं टाला जा सका!! समय स्थिर था काल की चित्कार और करुण रुंदन वातावरण मे चारों ओर व्याप्त। एक अवला अपने सम्मान के लिये लाठी टेक कर  धीरे-धीरे न्याय के लिये कचहरी की चौखट की तरफ बढ़ रही थी। ये दु:ख उसकी छोटी बहन से देखा न गया वह भी अपनी बड़ी बहन के साथ उनके संघर्ष मे साथ हो ली। जज को देख छोटी बहन की आँखों मे आंसुओं की अविरल धारा बहने लगी। शायद  कभी ऐसे दुर्भाग्य की कल्पना दोनों बहनो ने नहीं की थी?  जज साहब ने  दोनों बहिनों की ओर इशारा करते हुए एक छोटी लेकिन तीखी टिप्पड़ी की, जो गहरे ज़ख्म देने  बाली थी, कहा "तुम लोग  क्यों रोती हो रोना तो उन्हे चाहिये जो इस कृत के लिये दोषी हैं? और इस तरह न्यायालय के आदेशानुसार पुत्र को एक निश्चित  रकम की अदायगी ताउम्र  माँ के भरण-पोषण के लिये प्रति माह देना निश्चित हुआ।

"माँ के प्रति इतना समर्पण और कर्तव्यनिष्ठा का ऐसा उदहारण कम ही देखने को मिलता हैं जब माँ जाया एक पुत्र अपनी वृद्ध माँ को प्रति माह एक निश्चित रकम देता हो जबकि दोनों एक ही छत्त के नीचे रहते हों। लेकिन इस दी जा रही धनराशि को...... मनीऑर्डर के माध्यम से प्रेषित किया जाता था ताकि न्यायालय को मनीऑर्डर की रसीद प्रति माह प्रेषित की जा सके। "सनद रहे, ताकि वक्त पर काम आवे।"

अंतिम दिनों मे बुआ को अपने संयुक्त  परिवार के साथ, पेशागत कारणो से घर से बहुत  दूर जाना पड़ा। जहां उनका निधन हुआ। उनके परिवार के बेटों ने उनका अंतिम संस्कार अपनी दादी समझते हुए  किया और शोक मनाया।

और इस तरह मनी ऑर्डर बन्द करने की खबर की ज़िम्मेदारी बुआ की छोटी बहन ने फोन कर कुछ इस तरह निभाई कि सोते हुए इंसान के पैरों के नीचे से भी जमीन खिसक जाये। उन्होने कहा "जिज्जा अब इस दुनियाँ मे नहीं हैं, बेटा अब तुम्हें  माँ के बोझ से मुक्ति मिल गई"।

विजय सहगल



सोमवार, 14 जनवरी 2019

बी॰ एस॰ पी॰ और एस॰ पी॰ समझौता






बी॰ एस॰ पी॰  और एस॰ पी॰ समझौता


इतिहास इस बात का गवाह हैं नारी अस्मिता के लिये महाभारत का युद्ध हुआ और इस धर्म युद्ध मे हजारों लोग मारे गये और  नारी अस्मिता की रक्षा  के लिये राज्य को दाँव पर लगा दिया। हे बसुदेव ये कैसा दुर्योग राज्य और राजनीति की अस्मिता के लिये आधुनिक युग मे नारी ने स्वयं ही अपनी अस्मिता से समझौता कर लिया। वो धर्म युद्ध था ये अधर्म समझौता हैं।

-विजय सहगल     

शनिवार, 12 जनवरी 2019

व्हाट्सपयेँ


"व्हाट्सपयें"

सूचना - कृपया इस लेख के विचारों को बिलकुल भी गंभीरता पूर्वक न ले, इस लेख को एक हल्के फुल्के हास-परिहास के रूप मे लिखा गया हैं।

पुराने जमाने मे सूचना का मुख्य स्रोत चिट्ठी हुआ करती थी पर आज सूचना तकनीक के इस दौर मे  नए नए माध्यम जैसे  व्हाट्सप, फ़ेस बुक, ट्विट्टर दुनियाँ के नक्शे पर आ गये। इनको प्रयोग करने बालों के अनुसार उनका नामकरण हुआ हैं जैसे फ़ेस बुक का प्रयोग करने बाले "फ़ेसबुकिये", ट्विट्टर का उपयोग करने बालें ट्विटरिये और व्हाट्सप का प्रयोग करने बाले "व्हाट्सपये"  कहे गये। इन सभी सोशल माध्यमों मे सबसे ज्यादा पोपुलर माध्यम व्हाट्सप हैं। जिस पर कुछ प्रकाश डालूँगा। व्हाट्सप मे सबसे ज्यादा संख्या हैं गुडमोर्निगयों की हैं। जो सुबह-सुबह ऐसे गुड मॉर्निंग करते हैं जैसे पुराने जमाने की  एक कहावत कही जाती थी कि गाँव मे यदि  मुर्गा बांग नहीं देगा तो क्या सबेरा नहीं होगा? लोग अपने मोबाइल की मेमोरी फुल हो जाने के डर से इन गुडमोर्निगयों से परहेज करने की कोशिश करते हैं।  इनमे कुछ सुबह 11-12 बजे सो कर उठेंगे और गुड्मोर्निंग की पोस्ट डालेंगे जबकि सारी दुनियाँ उठ चुकी होती हैं। एक मैसेज तो समझ मे आता हैं ये  गुडमोर्निगये कभी कभी   2-3 गुड्मोर्निंग मैसेज एक साथ डालते हैं। सोचो जब कोई आदमी आपको 2-3 बार गुड्मोर्निंग करे तो कैसा लगेगा। काश ये गुड्मोर्निंगये जो 10-12 से लेकर 50  हजार तक के स्मार्ट फोन अपने पास रखते हैं सिवाय नकल (कॉपी) मार कर चिपकाने (पेस्ट) के खुद अपना बनाया हुआ गुड्मोर्निंग मैसेज भेजे तो कितना अच्छा हो, वे अपने मोबाइल कैमरे से  कोई सुंदर फोटो जैसे उगते सूरज की, या किसी सुंदर फूल की या सुंदर पक्षी या किसी स्कूल जाते बच्चे की या उन्हे जो भी अच्छा लगे उसकी फोटो भेजे "सिवाय अपने चेहरे की सेलफ़ी" के।  "ये गुड्मोर्निंगयें कभी कभी बड़े सुंदर सुंदर उपदेश पूरक  वाक्य लिख कर ग्रुप मे डालते हैं जो इंटरनेट पर हजारों की तादाद मे पड़े होते हैं।  जब तक व्हाट्सप मे फॉरवर्ड मैसेज का निशान नहीं आता था तब तक हम यही समझते रहे कि यार फलां आदमी बड़ा विद्वान और पढ़ा लिखा हैं जो इतने  सुंदर-सुंदर  विचार लिखता हैं जैसे कभी  स्वामी विवेकानंद या कोई अन्य संत या साधु-महात्मा लिखा करते थे।  वो तो भला हो व्हाट्सप का जो अब "मुड़ा हुआ तीर" (फॉरवर्ड मैसेज) बता देता हैं कि "माल चोरी का हैं"।

एक अन्य प्रकार के "व्हाट्सपये" जो बड़े धार्मिक किस्म के होते हैं पुराने जमाने मे जैसे पहले पर्चे छपवा कर लोगो को बाँटते या बंटवाने का चलन था कि 50 पर्चे छपवा कर आगे लोगो को बांटो तो माता रानी  आपकी मानो कामना पूरी करेगी  और अगर पर्चे नहीं छपवाये तो इतना-इतना नुकसान होगा। आजकल इसी  तरह के मैसेज नये रूप मे  व्हाट्सप पर आ जाते हैं कि इस मैसेज को आगे दस लोगो को भेजों, माता रानी आपकी मनोकामनायें पूरी करेंगी। मैंने भी उनकी आज्ञा को सिरोधर्य कर उनके ही व्हाट्सप नंबर पर दस बार कॉपी पेस्ट कर दिया और ग्रुप के सदस्यों को  लिख दिया कि हमने तो 10 बार निवेदक को  फॉरवर्ड कर दिया आपलोगो ने किया क्या?  हमारी  मनोकना बेशक पूरी नहीं हुई  पर मैसेज को भेजने बालों कि तो हो ही गई, जब बही मैसेज उन्होने अपने मोबाइल पर  10 बार पढा।   

एक "व्हाट्सपये" बड़े दयालू किस्म के होते हैं, इन लोगो को फॉरवर्डये कहते हैं। ये फॉरवर्डये, आव न देखा ताव तुरंत ही मैसेज को  आगे दूसरे  ग्रुप मे बढ़ा देते हैं। ।   जैसे ये एक "आठ साल की लड़की खो गई हैं (फोटो के साथ) कृपया अपने सभी ग्रुप मे शेयर करे ताकि उसके बिछुड़े माँ-बाप से मिलाया जा सके। कोई छानवीन नहीं कोई जांच पड़ताल नहीं बस मैसेज लपका और आगे धकेल दिया, उन्हे कौन समझाये कि मैसेज तब का हैं  जब बह 8 साल की बच्ची थी, माँ-बाप से मिले उसे सालों हो गये अब तक तो उसकी शादी भी हो गई और बच्चे भी हो गये पर बह व्हाट्सप मे अभी भी "गुमशुदा बच्ची" की तरह ही चल रही हैं।

पुराने जमाने मे जैसे शादी विवाह मे लड़के या लड़की सज-सम्हर कर बारात मे जाते थे और सिर्फ अपने आप को ही निहारा करते। बारात मे और दूसरा कौन क्या पहने-ओढ़े हैं उन्हे कुछ नहीं पता बैसे ही ये "व्हाट्सपये" सिर्फ अपनी भेजी पोस्ट को निहारा करते हैं और ताकते हैं की उन की पोस्ट पर किन-किन लोगो के कमेंटस आये,    उन्हे नहीं मालूम कि ग्रुप मे इससे पहले तीन बार बही पोस्ट भेजी जा चुकी है उन्हे तो बस उठा (कॉपी) कर पटक (पेस्ट) देने से मतलब।

बेशक देश के प्रसिद्ध एवं सबसे अच्छे  डॉक्टर त्रेहन हो पर डॉक्टरी व्हाट्सपये हर मर्ज का इलाज जानते हैं। ये सिरदर्द, पीठ का दर्द, दांत का दर्द से लेकर  टी॰बी॰, कैंसर, का इलाज गर्म पानी, शहद, अमरूद के पत्ते, वेल के पत्ते, बारह मासी का फूल, गुड़हल के फूल से आपका शर्तियाँ इलाज करने के नुक्से भेजते हैं और आग्रह करते हैं कि अपने सारे ग्रुप मे फॉरवर्ड करे ताकि लोगो को बीमारियों से बचाया जा सके। सरकार बड़े-बड़े हॉस्पिटल खोलने की जगह  क्यों नहीं इन डॉक्टर व्हाट्सपयों को जगह जगह मुहल्ला क्लीनिक खोल कर इनकी सेवायें लेती?  

लाखों व्हाट्सपये आज हजारों ग्रुप के सदस्य हैं और इन ग्रुप के मालिक एडमिन कहे जाते हैं। कुछ मालिक तो कई-कई व्हाट्सप ग्रुप ऑफ कंपनीस के मालिक (एडमिन) हैं। ऐसे ही एक ग्रुप की मालकिन (एडमिन) को मैं जानता हूँ। जो कई व्हाट्सप ग्रुप को संचालित करती हैं और इन ग्रुप्स की मालकिन (एडमिन) हैं।  बड़े ही सुंदर-सुंदर उपदेश परक मैसेज डालती हैं। ऐसे ही एक दिन एक मैसेज पढ़ा,  लिखा था "माता-पिता की सेवा से बड़ कर कोई दूसरा  कार्य नहीं हैं", पर उनके पिताजी बिजली के बिल, टेलीफ़ोन का बिल, रेल्वे रिज़र्वेशन के लिए गर्मी, सर्दी, बरसात मे  लाइन लगाए खड़े रहते हैं।  मालकिन साहिबा को या तो कंपनी के कार्य  से फुर्सत नहीं या उन्हे नहीं मालूम कि इंटरनेट से खाली व्हाट्सप या फ़ेस बुक ही नहीं चलते बल्कि ऑनलाइन सेवाओं से बिजली, टेलीफ़ोन के बिल और रिज़र्वेशन के साथ अन्य सुविधाये भी मिलती हैं। ऐसे ही एक ग्रुप मे सदस्यों को मेडिकल इंसयोरेंस कार्ड के लिए  निवेदन करते देखा!  
  
आप माने या न माने पर ये सच हैं कि आपके दुवारा व्हाट्सप पर डाली गयी हर पोस्ट आपके भविष्य के बारे मे वेशक कुछ न बताए पर आपके भूत काल (past) के बारे मे अवश्य सबकुछ बताती हैं। ग्रुप के सदस्य वेशक एक दूसरे को नहीं जानते हों पर आपकी पोस्ट आपके दुवारा अपने संस्थान के प्रति और अपने अधीनस्थों के प्रति किये गये कार्य और व्यवहार को जरूर  दर्शाती  हैं। एक सुंदर कमेंट एक सेवानिवृत लोगो  के ग्रुप मे देखने को मिला जब एक उच्च पद से सेवानिव्रत्त अधिकारी ने अपने पद का कुछ रौव दिखाया तो एक अन्य सदस्य ने लिखा श्रीमान हम सभी अब शतरंज के पिटे हुए मोहरे हैं जो पिटने के बाद एक ही डिब्बे मे पड़े हैं। इन तमाम कमेंटस मे एक बहुत खूबसूरत कमेंट एक बार हमारे सम्मानीय मित्र श्री जोसफ साहब ने लिखा जिसका सार था कि "निरर्थक पोस्ट से बेहतर हैं कि बिना  कोई मैसेज का ग्रुप ज्यादा अच्छा हैं। काश ऐसा होता??   

विजय सहगल

मंगलवार, 8 जनवरी 2019

शैलेंद्र सिंह गोड़


शैलेंद्र सिंह गोड़

जी हाँ उस अधीनश्त  स्टाफ का नाम शैलेंद्र सिंह गोंड था। अति चुप रहने बाला। लाल खैनी खाने का बेहद शौकीन। बड़ी तन्मयता से काम  करने बाला बेहद मेहनती एवं इन सबसे बढ़ कर ईमानदारी की पराकाष्ठा का प्रतीक वह आदिवासी समाज से आता था। कलेक्ट्रेट और जिला न्यायालय रायपुर  के लगभग हर विभाग के सबस्टाफ और अन्य लिपिक स्टाफ से उसने अपनी अच्छी जानपहचान  बनाली थी। जिसका बैंक के व्यवसाय  को बढ़ाने मे बड़ा योग दान रहा।  कलेक्टर कार्यालय रायपुर  की शाखा मे शैलेंद्र की पोस्टिंग से हम हमेशा उस को दिये गए कार्य की तरफ से निश्चिंत रहे।  
कुछ दिनों से शाखा मे नगदी जमा मे कुछ कैश शॉर्ट होने की शिकायत आ रही थी जिससे बैंक की छवि मे धब्बा लग रहा था। एक दो ग्राहकों ने मुझे व्यक्तिगत तौर पर कहा कि उन दिनों जब भी उन्होने कैश खाते मे जमा कराने गये तो कैश  कुछ कम बताया। एक दिन अपरहान कलेक्टर के स्टेनो शाखा मे कुछ नगदी जमा कराने आये उन्होने स्लिप भरकर नगदी के साथ  स्लिप स्टाफ  के माध्यम से कैश कैबिन की तरफ जमा करने हेतु कैशियर के पास बढ़ा दी। उस समय शाखा मे हम 4-5 स्टाफ एवं श्री झा  के अलावा कोई और व्यक्ति नहीं था अतः हम सभी कुछ रिलैक्स मूड मे थे यहाँ बहाँ की बातों मे मशगूल हो गये, अफ़सोस इसी बीच जमा स्लिप मे से रुपये गायब थे और मात्र जमा स्लिप ही वहाँ पर पड़ी थी। शुरू मे तो मामले को हल्के मे लेकर   मज़ाक मे लिया गया। जब गंभीरता पूर्वक कैश की पूंछताछ हुई तब भी कैश नहीं मिला।  शाखा मे सारी जगह छानबीन करने पर भी कैश नहीं मिला। यध्यपी श्री झा ने मामले को यूं ही छोड़ने की बात कही लेकिन ये बैंक की छवि का सवाल था? हमे जिन स्टाफ पर शक था किन्तु बिना किसी पुख्ता सबूत को उन पर दोष नहीं मढ़ा जा सकता था।
एक अन्य घटना मे एक महिला ग्राहक ने एक दिन हमे शिकायत कर बताया कि उसने खाते मे 600/- रुपये  जमा कराये हैं, जिसका नगदी  विवरण उसने अपनी जमा पर्ची के पीछे लिखा हैं, पर गलती से  उसने जमा पर्ची पर शब्दो और अंकों मे 400 रुपये लिख दिये थे पर वास्तव मे उस महिला ने बताया कि उसने 600/- रुपये जमा किये हैं। जब उसने पास बुक को अपडेट कराया तो पता चला कि उसके खाते मे 400/- रूपये ही जमा हुए हैं। उस महिला की बात सुनकर हमने कहा  कोई विशेष समस्या नहीं हम उस जमा पर्ची की जांच कर कार्यवाही करेंगे इस आशय का भरोसा हमने उस महिला को दिया। पर अफ़सोस उसदिन के वाउचर मे जांच करने पर पता चला कि उस दिन के वाउचर मे वह  जमा स्लिप नहीं थी। हमने आगे-पीछे  के दिनों के वाउचर भी चेक किये पर उक्त वाउचर नहीं मिला तब हमे कुछ शंका हुई कि मामले मे कुछ गड़बड़ हैं। उन दिनों शाखा की कार्यप्रणाली  मैनुअल थी, शाखा कम्प्योट्रीकरण नहीं हुआ था। फिर हमने उस लेजर को मंगाया जिसमे उक्त महिला का खाता था। हमने देखा कि लेजर से उस विवादित नगदी वाउचर को तत्कालीन कैशियर ने अपने हस्ताक्षर से पास कर निकाला था जिसकी एंट्री भी 400/- रूपये के रूप मे थी।  कैश प्राप्ति रजिस्टर और कैश बुक  मे भी  वाउचर की प्रीविष्टि  400/- रुपये के रूप मे कैशियर ने दर्ज की थी। जब हमने इस बारे मे कैशियर से पूंछा तो उसने  बताया कि वह उस दिन विशेष सहायक की ओफिसियेटिंग कर रहा था इसलिए खुद ही पोस्टिंग कर खुद ही चेक कर वाउचर को रिलीस किया था।  लेकिन वाउचर कहाँ हैं उसको नहीं पता था। हमे उक्त कैशियर महोदय पर कुछ शक हो रहा था।  उस दिन शाम तक वाउचर की खोजबीन हुई पर व्यर्थ, वाउचर नहीं मिला। पर कहते है झूठ के पैर नहीं होते, हमने इस बारे मे अपने सव-स्टाफ से इस मामले मे विचार किया जिनकी ईमानदारी और कर्तव्यनिष्ठा  पर हमे हमेशा पूरा भरोसा रहा। उन दोनों स्टाफ ने शाम के एकत्रित कचरे मे उस वाउचर की ढूंढाई शुरू कि और आश्चर्य उस कचरे मे उक्त वाउचर कई छोटे-छोटे टुकड़ों मे मिल गये। उन सभी टुकड़ो को जोड़ कर पुनः  आरिजिनल फोरम मे लाना एक दुरूह एवं कठिन कार्य था क्योंकि उस वाउचर को अनेक टुकड़ो मे किसी ने फाड़ कर दुकड़े-टुकड़े कर दिया था। बड़ी मेहनत के बाद जब सभी टुकड़ों को जोड़ा गया तो स्पष्ट था कि वह महिला सही कह रही थी पीछे नगदी का विवरण सही दर्ज 600/- रूपये था पर उसने गलती से शब्दो और अंको मे भूलवश 400/- रूपये लिख दिये अर्थात  राशि दो सौ रुपये से कम लिख दिये थे, और उक्त 200/- की  राशि  को  कैशियर ने अपने पास रख लिया था। बाद मे हमे उक्त स्टाफ ने बताया कि बे बैंक मे निकले कागजों के कचरे को एकत्रित कर एक-दो हफ्ते बाद ही जला कर नष्ट करते हैं न कि हर  रोज जला कर नष्ट करना। हमे उनकी बुद्धिमानी और दूरद्र्ष्टि पर बड़ा गर्व हुआ।  प्रादेशिक प्रबन्धक ने भी उक्त स्टाफ को सख्त लहजे मे चेतावनी दे कर सुचारु रूप से कार्य करने की नसीहत दी। हमारे दो साथी कर्मचारियों श्री लोमेश और श्री शैलेंद्र ने अपने कौशल और बुद्धिमत्ता से  न केवल एक बार फिर बैंक की छवि को टूटने से बचाया बल्कि उस सक्स को उसकी गलती का  अहसास कराया।
हम सभी उस महिला खाताधारी को पिछले लगभग 2 साल से जानते थे क्योंकि उसका वेतन खाता हमारी शाखा मे था। हमे उस महिला के साथ हुए इस कृत पर काफी दु:ख और ग्लानि थी। सबसे आश्चर्य और दु:ख इस बात का था कि उक्त शिकायतकर्ता महिला के दोनों हाथ किसी दुर्घटना मे  कंधे से नीचे कट गये थे  और वह महिला बिना हाथों के अपना कार्य और सारा लिखत पढ़त का कार्य अपने पैर से करती थी और कलेक्टर स्थित आदिवासी विकास विभाग  द्वारा संचालित स्कूल मे अध्यापक के पद पर कार्यरत थी।  

विजय सहगल

शनिवार, 5 जनवरी 2019

स्व. श्री अनिल सामधिया – एक अधूरी श्रद्धांजलि


स्व. श्री अनिल सामधिया – एक अधूरी श्रद्धांजलि
स्व॰ श्री  अनिल समधिया हमारे मित्र नहीं, घनिष्ठ मित्र नहीं अभिन्न मित्र थे। वे कब मित्र से शुरू होकर घनिष्ठ होते हुए  अभिन्न मित्र की श्रेणी मे आ गये समय के इस अंतराल का हमे  भान ही नहीं हुआ। हमारी मित्रता को  समय ने अपनी हर कसौटी पर कसा होगा लेकिन हमे कभी अहसास नहीं कराया। इस अभिन्नता का अहसास भी उन लोगो दुवारा कराया गया जिनको  हम लोग देवतातुल्य मानते हैं। हमे याद हैं जब कभी हम अनिल के घर पर जाते और उन के घर पर कोई अन्य मेहमान या अन्य कोई रिश्तेदार होता तो अनिल के पिताजी हमारा परिचय अनिल के मित्र के रूप मे नहीं बल्कि बेस्ट फ्रेंड या क्लोज़ फ्रेंड या अभिन्न मित्र के रूप मे कराते थे। उस बेस्ट-क्लोज़ और अभिन्न शब्द कहते समय जो  चमक  हम उन की आँखों मे देखते थे तो हमारा सिर गर्व और खुशी से ऊंचा हो जाता था। हमारे परिवार मे भी हमारी माँ-पिता, बहिन-भाइओं या बाद मे बच्चों  ने भी  सदा हम लोगो को इस  अभिन्न मित्रता का अहसास हमे कराया। हर किसी व्यक्ति के जीवन मे कुछ सबसे अहम रिश्ते होते हैं। माता-पिता तो उनमे सर्वोपरि हैं ही लेकिन मामा, मौसी और बुआ का रिश्ता भी उनके समतुल्य पीढ़ी मे गिना जाता हैं। समान पीढ़ी मे भाई बहन चाहे बे सगे, ममेरे-मौसेरे या फुफेरे हों और अगली पीढ़ी मे सभी भतीजे-भतीजी, भांजे-भांजी आते हैं। यहाँ ये सब लिखने का एक विशेष अभिप्राय हैं। हमारे और अनिल के इन रिश्ते मे एक गहरी समानता थी बो यह कि इन सभी एक दूसरे के रिशतेदारों मे हम दोनों  समान रूप से जुड़े  थे  सिवाय हम लोगो के चाचा के क्योंकि हम दोनों के पिता अपने पिताओं की इकलौते पुत्र थे।  हम लोगो की  3 पीढ़िया हमारे  इस मित्रता के रिश्ते से जुड़ी थी।  1973 मे  क्लास 9वी से हमारी मित्रता शुरू हुई जो समय के साथ प्रगाढ़ से प्रगाढ़तम होती गई। हम लोगो ने लखनऊ मे नौकरी की शुरुआत की और जहां पर अविवाहित जीवन के सुनहरे और मस्त जीवन को जिया, साथ साथ एक साइकल पर लखनऊ भ्रमण करना, फिल्मे देखना, खाना बनाना उनमे मुख्य था। इस हेतु अनेकों बार मिट्टी के तेल के लिया चारबाग और पान दरीबा  के आसपास भटकना तो आए दिन की बात थी। स्व॰ श्री राजेंद्र अगीहोत्री जी जो उस समय झाँसी के विधायक थे, के उस छोटे से किराए के मकान मे बिताये सघर्षपूर्ण जीवन के  सुनहरे पल की यादें आज भी ताजा है। वैवाहिक जीवन मे प्रवेश करने पर  कुछ नए रिश्तों के रूप मे भी हम समान रूप से पहचाने जाते।  बच्चो के साथ रायपुर, भुवनेश्वर, जग्गनाथ पुरी, भोपाल,ग्वालियर, मुरेना भ्रमण मे बिताये क्षण और अनेक यादे  चारों बच्चो को आज भी याद हैं।            
आज जब  तुम इस असमय हमसे अभिन्न मित्र से भिन्न हो गये इस दु:खद  अहसास को हम  रह रह कर महशूस कर रहे हैं।  आज जब लोग तुम्हें श्रद्धा सुमन अर्पित कर नमन कर  रहे हैं हम कैसे तुम्हें मित्रता के इस टूटे रिश्ते और टूटे मन से पुष्पांजलि अर्पित करें। ये अधूरी श्रद्धांजलि हम तुम्हारी यादों की  पोटली मे अपने पास तब तक सँजो रख अर्पित करेगे जब हम तुम से भिन्न होंगे।
तुम्हारा अ–भिन्न मित्र
विजय सहगल