शुक्रवार, 26 अक्टूबर 2018

दोहरे नक़ाब

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-:दोहरे नकाब:-
कल टी॰ वी॰ पर एक समाचार देखा, देख कर काफी निराशा और महाराष्ट्र सरकार के प्रति बहुत  क्रोध और क्षोभ हुआ।  उक्त समाचार मे एक राजनैतिक पार्टी के कार्यकर्ता एक उत्तर भारतीय परिवार के पुरुष एवं महिला सदस्यों  को बहुत बुरी तरह पीट रहे थे और अंधेरी मुंबई स्थित उनके आवास को खाली  कर अपने गृह नगर बिहार जाने के लिये धमका रहे थे। उनका कसूर मात्र ये था कि ये  लोग अपनी आजीविका के लिये सिद्ध विनायक मंदिर के पीछे खाने पीने की रेहड़ी लगा कर अपना जीवन यापन कर रहे थे। आखिर महाराष्ट्र सरकार का पुलिस/प्रशासन ने दिन-दहाड़े हुए हुई इस मारपीट की घटना पर इन राजनैतिक गुंडों के विरुद्ध  क्यों कोई कार्यवाही नही की? पूर्व मे भी ये तथाकथित  हिन्दू सेना सेवक मुंबई मे इस तरह की घटनाओं को अंजाम दे चुके है।
हमे जून 2018 मे  अमरनाथ यात्रा के दौरान ये देख कर सुखद आश्चर्य हुआ था, जब जम्मू कश्मीर के  पहलगाम, अनंतनाग जैसे आतंक प्रभावित क्षेत्रों मे  दिल्ली, हरियाणा और पंजाब के बहादुर सेवादार हमारे बहादुर सेना के सैनिकों के सुरक्षा घेरे मे आतंकियों को चुनौती देते हुए  लंगर लगा कर अमरनाथ यात्रा के यात्रियो को नि:शुल्क भोजन प्रसाद खिला रहे थे या  ये उत्तर भारतीय जो सुदूर उत्तर प्रदेश और बिहार से आकार अमरनाथ यात्रा के समय सुबह 5-6 बजे अपनी जान जोखिम मे डाल कर यात्रियों को रेहड़ी लगा कर चाय नाश्ता आदि खिला कर धर्म और देश की सेवा कर सच्ची देशभक्ति का परिचय दे रहे थे,  बहीं महाराष्ट्र के ये राजनैतिक समाज विरोधी तत्व सिर्फ इन निरीह गरीब और कमजोर वर्ग के उत्तर भारतियों लोगो के विरुद्ध तोड़-फोड़ करने या मारपीट करने मे  ही अपनी ताकत दिखाते हैं। इनकी मर्दानगी दाऊद इब्राहिम और उनके गुर्गों या उन जैसे लोगो के विरुद्ध इस तरह की कार्यवाही करने मे काफ़ूर हो जाती है जो इनकी नाक के नीचे आतंक का राज्य चलाते हैं। महाराष्ट्र जब मुंबई हमले से जूझ रहा था सारा देश मुंबई के साथ खड़ा होकर आतंकवाद के विरुद्ध निर्णायक लड़ाई लड़ रहा था तब ये कायर  तथाकथित राजनैतिक सेना के लोग दुवक कर  अपने बिलों मे छुप हुए थे। इन राजनैतिक गुंडों और आतंकवादियों मे कोई फर्क नही है।
हमारे देश का दुर्भाग्य है हजारों साल पहले से अब तक  हम विदेशी आक्रांताओं से या आज के दोगले धर्म के ठेकेदारों से  सदा इसलिये हारे और सताये गये  क्योंकि हम धार्मिक रूप से तो एक थे परंतु  महाराष्ट्र, गुजरात और देश के अन्य जगहों पर  इसी तरह के दोगले चरित्र के राजनैतिक  लोगो द्वारा  अपने निजी स्वार्थ के कारण भाषायी क्षेत्रीयता और  जातीयता  के आधार पर अपने लोगो को ही मारते  या सताते रहे। किसी शायर ने बहुत सुंदर लाइन इस प्रसंग पर कही हैं: -
"मुझे अपनों ने मारा, गैरों मे कहाँ दम था ।
मेरी  कश्ती बहाँ डूबी, जहाँ पानी बहुत कम था"।।  

हम न केवल महाराष्ट्र के लोगो से बल्कि देश के अन्य सभी लोगो से अपील करते है कि वे इस क्षेत्रीयता और भाषाई आधार पर मुंबई के कुछ देशद्रोही राजनैतिक व्यक्तियों द्वारा की गई हिंसा के विरुद्ध अपनी आवाज उठाये और महाराष्ट्र सरकार से अपील करे कि इन असामाजिक तत्वों के विरुद्ध शीघ्र और सख्त कार्यवाही करे।  
विजय सहगल, नोएडा॰ 

बुधवार, 24 अक्टूबर 2018

दीवार



"दीवार"



इतिहास इस बात का गवाह है कि दीवार हमेशा झगड़े, वैमनस्य  या मनमुटाव का कारण रही है। जब जब दीवार बनी है उसने आदमी से आदमी को अलग ही नही किया बल्कि मतभेदों, विवादों के साथ दो व्यक्तियों, दो सभ्यताओं, दो देशों, दो समाजों और दो धर्मो को भी आपस मे बांटा हैं फिर चाहे वो दीवार  चीन की रही हो, जर्मनी, या घर, पड़ोस मे खींची दीवार हो। लेकिन इस मामले मे मैं बहुत खुश नसीब हूँ कि मेरे साथ ठीक इस के विपरीत हुआ है।
जब मैंने ग्वालियर मे मकान खरीद तो बो एक रो-हाउस था जिसका निर्माण म.प्र. हाउसिंग बोर्ड  ग्वालियर दुवारा किया गया था। मिरर इमेज की तरह दो घरों की एक संयुक्त  दीवार थी।  दो तरफ की तो बाउंड्री बाल बगल और पीछे बाले मकानों के साथ लगी थी किन्तु एक तरफ पूरे मकान की दीवार कॉमन थी जो हमारे पड़ौसी के मकान से लगी हुई थी। सिंगल स्टोरी के मकान तक तो ठीक रहा पर  जब अतिरिक्त गृह ऋण सुविधा आई तो मैंने अपने  मकान के उपर एक नई मंजिल बनाने का विचार बनाया  और मकान निर्माण का कार्य शुरू किया। पर जब कॉमन दीवार के निर्माण का काम शुरू हुआ तो एक नई समस्या खड़ी हो गई। दोनों  मकानों की कॉमन दीवार जो हमारे पड़ोसी के मकान से लगी थी 14 इंच चौड़ी थी। उस दीवार का निर्माण 9 इंच लंबाई की ईट  और और 4 इंच चौड़ाई की ईटों को रख कर बनाया गया था और आधा-आधा इंच का प्लास्टर दीवार के दोनों ओर किया गया था इस तरह वो कॉमन दीवार 14 इंच की थी।   उसी समय हमे मकान निर्माण के दौरान दीवार के निर्माण का ज्योमिति भी समझ मे आई, ईट की लंबाई- चौड़ाई 9"X4" इंच के कारण कोई भी  दीवार या तो 4 इंच  की होगी या 9 इंच की या  9 और   4 इंच  के जोड़ या गुणक मे होगी।  इस तरह उस संयुक्त 14 इंच की दीवार मे 7 इंच दीवार हमारे हिस्से मे थी और 7 इंच हमारे पड़ोसी के हिस्से मे। चूकि ईट की लंबाई 9 इंच होती है तो प्रथम मंजिल की दीवार बनाने मे  सारी ईंटों को दो इंच तोड़ना पड़ता जिससे दीवार कमजोर और एक सीध या बराबरी से  नही बनती।  इस दुविधा मे एक - दो दिन निकाल गए।  इस के लिये दो  रास्ते थे। नंबर एक या तो उस  14 इंच की दीवार पर हर ईट को 2 इंच  तोड़ कर दीवार बनाये जो कि कमजोर और बराबर न होने के कारण संभव नही थी। दूसरा रास्ता था कि हम पूरी ऊंचाई तक दीवार 14 इंच तक बनाये और उसके बाद 7 इंच की जगह अपने पड़ौसी रावत जी के लिये खाली छोड़ शेष 7 इंच का उपयोग हम अपने मकान निर्माण के लिये करे पर उस अतिरिक्त  निर्माण की  लागत को हमे वहन करना पड़ता। चूंकि दीवार निर्माण मे इस समय हमारा स्वार्थ था क्यों कर कोई दूसरा इस निर्माण के  व्यय का सहभागी बने? हमने घर मे बात-चीत कर अपने पड़ौसी से इस संबंध मे बात करने का निश्चय किया।
पर कहते हैं न कि वो लोग भाग्यशाली होते है जिनको अच्छे पड़ौसी मिलते है। इस मामले मे वास्तव मैं बहुत सौभाग्यशाली हूँ कि मुझे श्री यू. एस. रावत जी जैसे अच्छे पड़ौसी मिले। वे सीमा सुरक्षा बल से कममांडेंट के पद से सेवानिवृत्त हुए थे। सेना मे रहते हुए उन्होने 1965 व 1971 की लड़ाई देश के लिए लड़ी थी। उन्हे इस  बहादुरी के लिए "गालण्ट्री"   पुरुस्कार मिला था। जब हमने अपनी दुविधा अपने पड़ौसी श्री यू. एस. रावत जी से की और उन्हे दीवार निर्माण मे आ रही समस्या के बारे मे बताया। मुझे जान कर सुखद आश्चर्य हुआ कि जिस दीवार के निर्माण के लिए हम दो दिन से चिन्तित था उस समस्या को उन्होने मिनटों मे सुलझा दिया। उन्होने हमसे पूरी दीवार के निर्माण मे आ रही लागत की गणना करने को कहा और निर्माण की लागत का आधा खर्चे का चैक मुझे दे दिया। उन दिनों उस कॉमन दीवार का खर्च 6-7 हजार रूपय था। आज 16-17 साल तक भी उन्होने उस दीवार का उपयोग नही किया। पिछले दिनों लिखे  "गैंग ऑफ होशियारपुर " मे उल्लेखित ऋषि भर्तृ हरि -नीति शतक  श्लोक ६५" एक बार फिर हमारे दिमाक मे  कौंध गया  जिसकी प्रथम लाइन मे उत्तम कोटि के मनुष्य की परिभाषा इस तरह कही गई है "वे मनुष्य उत्तम कोटि के है जो अपना स्वार्थ का परित्याग कर दूसरे कि भलाई करते है" वास्तव मे उन्होने वगैर अपने किसी स्वार्थ के उस दीवार का आधा खर्च वहन किया जो उनके महान व्यक्तित्व को परिचायक है।  इस घटना के  लगभग 16-17 साल बाद भी  जब हम उस घटना को याद करते है तो हमारा सिर रावत जी जैसे व्यक्ति के प्रति श्रद्धा से झुक जाता है। श्रीमती रावत एवं उनके दोनों पुत्र श्री भास्कर एवं डा. श्री रवि आज हमारे परिवार के सदस्य जैसे है। इस घटना के बारे मे हमारे बच्चे भी शायद नही जानते होंगे। हमे नही लगता इस घटना या उस दीवार के निर्माण पर किये  खर्च का आधा हिस्सा उनके द्वारा वहन करने के बारे मे रावत जी ने  अपने परिवार या बच्चों को बताया होगा। अतः इस घटना के बारे मे यहाँ लिख दिया ताकि" सनद रहे और वक्त पर काम आवे"।  श्री यू. एस. रावत जी यध्यपि आज इस दुनियाँ मे नही है परन्तू हम उस  दिवंगत महान  आत्मा को आदर सहित अपने अन्तःकरण से नमन करते है।

विजय सहगल 



रविवार, 21 अक्टूबर 2018

गैंग ऑफ होशियारपुर


"गैंग ऑफ होशियारपुर"



मैं कई महीनों से अपनी होशियारपुर शाखा मे हमारे साथ घटित अनुभव के बारे मे लिखने की सोच रहा था पर उसकी क्या या कैसे शुरुआत करे "रूप-रेखा" सूझ नहीं रही थी।  अचानक एक दिन एक कागज पर एक सुंदर श्लोक भावार्थ सहित मुझे हमारे एक मित्र पी पी शर्मा ने हमे दिखाया जो हमारी कॉलोनी मे ही रहते है। उक्त कागज पर लिखित श्लोक उनको  श्री जी. बी. सिंह द्वारा दिया गया था जो ग्वालियर संस्कृत कॉलेज के  सेवनिबृत्ति प्रधानाचार्य है । हमे बाद मे पता चला कि श्री सिंह का ये स्वभाव  है कि वे जब मिलने के लिए किसी के घर जाते है तो एक हस्तलिखित कोई श्लोक   या नीति वाक्य लिख कर मेजबान को भेट करते हैं।
कागज पर सुंदर हस्तलेखनी से भर्तहरि का श्लोक भावार्थ सहित निम्नानुसार है:-

एके सत्पुरुष: परार्थघटकाः स्वार्थम परित्यज्य ये
सामान्यास्तु  परार्थ  मुध्यमभृतः, स्वार्थाविरोधन ये,
तेsमी मानुष  राक्षसाः परिहितं स्वार्थाय निघ्नन्ति  ये
ये निघ्नन्ति निर्थकं परहितं,ते के न  जानीमहे .             (भर्तृ हरि -नीति शतक  ६५)

अर्थात 

वे मनुष्य उत्तम कोटि के है जो स्वार्थ का परित्याग करके दूसरे की भलाई करते है.
अपना हित करते हुए जो दूसरे का भी हित करते हैवे मध्यम कोटि के मनुष्य कहलाते है.
जो मनुष्य स्वार्थ सिद्धि के लिए दूसरे का अहित करते हैवेमनुष्य के रूप में राक्षसहै.
किन्तु जो मनुष्य बिना किसी स्वार्थ के दूसरे  का अहित करते हैउन्हें क्या नाम दिया जाय हम नहीं जानते?

 इस घटना क्रम मे गैंग शब्द जैसी कोई बात नही है ये तो  यू ही फिल्म  "गैंग ऑफ वसेपुर" से बसीभूत शीर्षक में लिख दिया किन्तु घटनाक्रम मे होशियारपुर सही है।  मै उन दिनों रिटेल असेट ग्रुप (खुदरा अस्ति समूह) नोएडा  का निरिक्षण कर रहा था और रिहाइश दिल्ली के टैगोर गार्डेन से नोएडा मे शिफ्ट की थी। चूंकि अधिकतर समय प्रादेशिक निरीक्षालय कनॉट प्लेस न्यू दिल्ली मे बैठने के कारण नोएडा की शाखाओं मे परिचय न होने के कारण  मैंने  खुदरा अस्ति समूह, नोएडा के ऑफिस में कार्यरत प्रबन्धक  श्री प्रभात पाराशर से लॉकर की आवश्यकता के विषय में बताया, तो उन्होने तत्काल शाखा होशियारपुर के प्रबन्धक को लॉकर के  सन्दर्भ में चर्चा की। चूंकि  हमारे निवास होशियारपुर शाखा के पास था तो  उन्होने होशियारपुर शाखा प्रबंधक को हमारी लॉकर की  आवश्यकता पूर्ती  मे सहयोग  करने का निवेदन किया । हमारा  कुछ दिन बाद ही नॉएडा से परिवार सहित कुछ दिनो के लिए बहार जाने का कार्यक्रम था अतः कुछ मूल्यवान वस्तु आदि को लॉकर मे रखने के लिया पूर्वनिर्धारित कार्यक्रम के तहत हम  शाखा होशियारपुर मे लॉकर  लेने के लिया पहुंच गये। चूँकि उस दिन शनिवार को बेटे का अवकाश था और लॉकर बेटे के साथ मुझे संयुक्त नाम से लेना था।   मैंने शाखा पहुँच कर वरिष्ठ प्रबंधक महोदय को अपना परिचय देते हुए लॉकर  देने का निवेदन किया।

यद्यपि शाखा में बहुत भीड़-भाड़ ज्यादा नहीं थी फिरभी प्रबंधक महोदय ने कुछ अनमने ढंग से अन चाहे अंगान्तुक की तरह  हमें चार बजे के बाद आने के लिए बोला। चूंकि मैं बेटे के साथ  ज्वेल्लेरी आदि सामान लॉकर मे रखने के उद्देश्य  लेकर ही शाखा मे आया था। अतः अपने इस आशय को स्पष्ट कर उनसे सारी औपचारिकताएं करने का पुनः निवेदन किया। तब उन्होने मुझे बेमन से शाखा-हाल  में बैठने को कहा।  मैंने उन्हें लॉकर रजिस्टर, लीज़  रजिस्टर आदि स्वयं भर  कर सहयोग करने के लिये आश्वस्त किया और ऐसा हमने किया भी. यध्यापि शाखा प्रबन्धक का व्यवहार उस समय तक एक स्टाफ के नाते कुछ अजीब या यूं कहे  ठीक ठाक नही था। सावधि जमा, रेंट आदि की समस्त औपचारिकताओं मे कुछ ज्यादा ही समय लग रहा था तब मैंने प्रबन्धक महोदय से एक सहयोग करने का पुनः निवेदन किया कि पहले आप मुझे लॉकर दे दे ताकि सामान आदि रखने के बाद मैं अन्य औपचारकिताओं पूरी  कर लूँ। लेकिन उन्होने प्रिक्रिया  पूर्ण करने तक धैर्य रखने को कहा। हाल मे बैठे अन्य स्टाफ का रवैया सहयोगात्मक रहा और उन्होने हमे और बेटे को समुचित आदर देते हुए बैठाला एवं चाय-पानी के बारे मे पूंछा।  जब प्रबन्धक महोदय ने मुझे लॉकर जारी किया तो लॉकर कैबिनेट के सबसे निचली लाइन का लॉकर दिया। हमने उनसे लाकर कुछ मध्यम उचाई तक देने का निवेदन ताकि बहुत अधिक झुकना न पड़े क्योंकि उन दिनों मेरें गॉलब्लेडर में स्टोन  के कारण  ऑपरेशन हुआ था जिसका जिक्र मैंने शाखा प्रबन्धक से भी किया। परन्तू   उन्होंने हमें बताया की शाखा में मात्र दो लॉकर ही खाली है। सबसे नीचे की लाइन और उसके ऊपर की लाइन में ही लाकर की उपलब्धता है और अन्य कोई लॉकर शाखा मे खाली नही है। इस पूरी प्रिक्रिया के दौरान उनका व्यवहार कुछ अनमने मन का रहा. चूँकि मध्यम उचाई पर लाकर को ऑपरेट करने में थोड़ा आसानी रहती है लेकिन मजबूरी थी लॉकर सबसे नीची दो लाइन में ही था मैंने निचली लाइन का लॉकर ले लिया और अपना सामान रख कर अन्य औपचारिकताओं के लिये स्ट्रॉंग रूम से बाहर आ गया। सावधि बनने, आइ. डी.  ट्रान्सफर करने के बाद जब मैंने उन्हे पूंछा कि कोई अन्य औपचारिकता तो नही रह गई? तो उन्होने स्टैम्प पेपर के लिये 150/- रूपय नगद देने को कहा और स्वयं ही विवरण देते हुए  बताया कि स्टैम्प पेपर 50/- रूपय का लगेगा और 100/- रूपय चपरासी को आने जाने का कन्वेएंस चार्ज लगेगा। मुझे 150/- रूपय देने
की  कोई दिक्कत या ऐतराज नही था परन्तू उनके 150/- रूपय के विवरण सुन कर काफी हैरानी हुई, उस विवरण को सुन कर मेरा बेटा धीरे से मुस्कराया और उसने 150/- रूपय प्रबन्धक महोदय को दे दिये। बेटे की उस तीखे कटाक्ष भरी मुस्कराहट से आज भी मैं नही उबर पाया हूँ। मैं उक्त विवरण सुन कर सन्न था और इस सम्मानीय बैंक मे अपनी 38  साल की सेवाओं  पर एक प्रश्न चिन्ह लगा महसूस कर रहा था। यह व्यवहार यदि शाखा मे मैं अकेला होता तो कोई बात न होती परन्तू बेटे की उपस्थिती मे शाखा प्रबन्धक के इस व्यवहार को देख कर अब हमारी हिम्मत शायद अपने बैंक की किसी भी अन्य शाखा मे कम से कम परिवार के साथ जाने की नही होगी। 

घटना के दूसरे दिन जब मैं पुनः अपने कार्य पर खुदरा अस्ति समूह सैक्टर 62 नोएडा मे पहुंचा तो श्री पाराशर ने मुझसे शाखा होशियारपुर मे  लॉकर जारी करने के बारे मे पूंछा,  मैंने उन्हे घटित सारा घटना  विवरण बताया। उन्होने जब ये विवरण सुना तो कुछ क्रोधित होते हुए शाखा होशियारपुर की लॉकर रिपोर्ट निकाली मुझे भी ये जान कर हैरानी हुई कि  उस शाखा मे 28 लॉकर खाली थे!! उन्होने शाखा प्रबन्धक के इस व्यवहार के लिये उन्हे फोन करना चाहा परन्तू मैंने ही उन्हे ऐसा करने को मना कर दिया मेरा मानना था "कि सोते हुए व्यक्ति को तो जगाना आसान है पर जागे हुए व्यक्ति को जगाना मुश्किल ही नही असंभव है"। लेकिन लॉकर होते हुए भी इच्छित लॉकर न देना और 150/- रूपय का विवरण देने  पर प्रबन्धक महोदय के इस व्यवहार के लिये मुझे आज भी टीस व हैरानी है। 

इस घटना के 6 माह बाद से आज तक भी मैं समझ नहीं पाया कि उन "सज्जन" प्रबन्धक महोदय ने हमारे अनुरोध के बावजूद उपर की पंक्ति मे  लॉकर की उपलब्धता होते हुए भी सबसे नीचे की पंक्ति मे लॉकर क्यों दिया !!??
हालांकि आश्चर्य और संतोष इस बात का  ज्यादा  है कि ऋषि भर्तहरि ने ऐसे व्यक्तियीं की पहचान हजरों साल पहले कैसे करली !!!
अंत मे अब मैं इस बात का निर्णय अपने सम्माननीय पाठकों पर छोड़ता ही कि वे उन प्रबन्धक महोदय को उपर्युक्त श्लोक की किस कोटि मे रखेंगे? आपके ऑप्शन है श्लोक की लाइन क्रमांक 1, लाइन क्रमांक 2, लाइन क्रमांक 3 अथवा लाइन क्रमांक 4 और आपका समय शुरू होता है
"अब" ॥

विजय सहगल  

गुरुवार, 11 अक्टूबर 2018

"जंगल की आग"


"जंगल की आग"


मैं एक व्हाट्स ऐप ग्रुप का सदस्य हूँ जिसे हमारे एक वरिष्ठ साथी श्री शर्मा जी बहुत ही सुचारु रूप से मैनेज करते हैं। ग्रुप मे इन दिनो हैल्थ इन्शुरेंस के ऊपर चर्चा चल रही थी। एक ओर  इन्शुरेंस प्रीमियम बहुत  ज्यादा है बही दूसरी ओर प्रीमियम के  ऊपर  GST 18% की मार उसको और भी महंगा कर रही है। कुछ सदस्यों की राय थी GST वरिष्ठ नागरिकों से न लिया जाय। राय अच्छी थी हमने भी सुझाव दिया की इस हेतु प्रधान मंत्री और वित्त मंत्री को उनके टिवीटर अकाउंट पर ट्वीट कर GST न लगाने की  मांग की जाय, हमारे एक साथी  का सुझाव था उससे कोई फ़ायदा नही होगी यह महज एक परंपरा का निर्वहन मात्र होग। हमारे एक और साथी दिनेश महरोत्रा जी ने " नमो ऐप" पर अपनी बात प्रधान मंत्री को लिखने का सुझाव दिया जो की प्रधान मंत्री का आधिकारिक ऐप है। दूसरे अन्य लोगो ने उनके सुझाव का समर्थन किया पर कुछ लोगो ने ऐसे प्रयासों को निरर्थक बताया।  कहने का तात्पर्य यह है कि जब कोई समस्या या शिकायत या सुझाव  हो तो  हमे संबन्धित व्यक्ति या संस्था को लिखना चाहिये या नहीं इस की चर्चा हो रही थी। यध्यापि ये भी सत्य है कि 99% मामलों मे शिकायत या सुझाव पर कोई सुनता नही है (बैंन्को विशेषतया: OBC को छोड़ कर जहाँ तत्परता से सुनवाई होती हैं ) जैसा कि मेरे अन्य  मित्रों ने ग्रुप मे लिखा था। मेरा मानना है हमे अनासक्त भाव से अपना काम करना चाहिये जैसा कि श्रीमद्भगवत गीता के श्लोक मे लिखा है:-

कर्मण्येवाधिकारस्ते माफलेषुकदाचन ।
माकर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोस्त्वकर्मणि ।। (भगवद्गीता अध्याय 2 श्लोक 47).

अभी दो दिन पूर्व मे शाम को घूमने निकला मैं प्रस्तावित मेट्रो स्टेशन सैक्टर 50 के नीचे 1 नंबर गेट पर वैठा आने जाने वाहनों की भीड़ देख रहा था अचानक सड़क के पार एक बच्चे की चीखने की आवाज ज़ोर से सुनाई दी। एक व्यक्ति उसे प्लास्टिक के पाइप से पीठ रहा था। तमाम वाहन, लोग वहाँ से आ, जा  रहे थे। बच्चे की चीख सड़क के इस पार हमे साफ सुनाई दे रही थी। तुरंत  समझ नही आया क्या करें पर  अचानक मैं ज़ोर से चीख कर चिल्लाया "ए ए !!!!!!!!!!........" । आवाज सुनकर दूर वैठा व्यक्ति चौंका और इधर उधर देख कर मेरी तरफ देखा।  इसी वीच उसने बच्चे को मारना बंद कर दिया था। "हिंसा के विरुद्ध इस तरह आवाज देना"  का विज्ञापन काफी समय पूर्व दूरदर्शन पर दिखाया जाता रहा था जिसकी याद हमे सहसा इस घटना को देख कर चिल्ला कर  आवाज  देने के रूप मे आई । मैंने जाकर इस तरह पब्लिक प्लेस पर बच्चे को पीटने के विरुद्ध चेताया, यध्यपि अंदर ही अंदर मुझे डर लग रहा था कि कही प्रतिक्रिया स्वरूप वह मेरे साथ भी हिंसा न कर दे जो कि दिल्ली NCR की सांस्कृति है!!  
हाल ही की गुजरात मे उत्तरी भर्तियों के साथ हिंसा, मारपीट की गई। कुछ गुंडों द्वारा अचानक ही हजारों मजदूरों, गरीब परिवारों को गुजरात से घर वापस जाने को  मजबूर कर दिया जो  अपने जीवन यापन के लिये अपने घर से हजोरों किलो मीटर दूर गुजरात के शहरों मे मजदूरी करने आये थे। दुर्भाग्य देखिये गुजरात सरकार ने देश के सबसे पुराने राजनैतिक दल के विधायक को इस मामले मे उत्तर भर्तियों के विरुद्ध लोगो को भड़काने बाले विडियो देखते हुए भी उसके विरुद्ध कार्यवाही नही की वही दूसरी ओर उस सबसे पुराने दल के नौजवान अध्यक्ष  ने भी उस विधायक के विरुद्ध कोई एक्शन नही लिया। इसे देश का दुर्भाग्य कहें या हम आम जनता की जागरूकता मे कमी कि सरकार और विपक्ष दोनों ही गुजरात मे हुई इस नृशंस घटना पर दुखी एवं चिन्तित है और दोनों ही अपनी जिम्मेदारियों से बचते नजर आते है और एक दूसरे पर दोषारोपण कर रहे है। हमने अपने आक्रोश को गुजरात के मुख्यमंत्री को उनके ट्वीटर अकाउंट पर लिख कर किया। राहुल गांधी के ट्वीटर पर भी उनके विधायक द्वारा वाइरल विडियो के माध्यम से फैलाई जा रही हिंसा पर कार्यवाही करने को कहा। विवेक तिवारी हत्या कांड पर भी योगी आदित्यनाथ जी को कानून व्यवस्था के हालत पर ट्वीट कर लिखा। हमे मालूम है हमारे लिखने से इनमे से किसी एक पर भी कुछ फर्क पड़ा होगा।
 कुछ दिन पूर्व भी इस तरह की घटनायें हरियाणा मे घटित हुई थी जब एक जाति विशेष के लोगो ने हरियाणा मे  बुरी  तरह लूटपाट और आगजनी कर हाईजैक  कर लिया था और किसी के विरुद्ध कोई कार्यवाही नही हुई। अपने राजनैतिक स्वार्थ के लिये राजस्थान मे भी इस तरह की घटनाये हुई है जब एक जातिविशेष दुवारा महीनो जन जीवन को रोक कर व्यवस्था को अंगूठा दिखाया।  महाराष्ट्र मे भी ऐसी घटनायें आम हो गई है जब धार्मिक या भाषाई आधार पर छोटे-छोटे मजदूर, ऑटो ड्राईवर, रेहड़ी लगाने बाले यू. पी., एम. पी., बिहार, राजस्थान के गरीब लोगो पर अत्याचार कर उनके साथ मारपीट की गई  और उन्हे अपने गाँव जाने को मजबूर किया जाता रहा। कुछ साल पूर्व उत्तर भारत से गये हजारों बेरोजगार युवकों को लातों, डंडों, से वुरी तरह पीट कर उन परीक्षा केन्द्रों से भगाया गया था जब बे रोजगार की प्रवेश परीक्षा देने हेतु आये थे। महाराष्ट्र और गुजरात मे तथाकथित हिंदुवादी सेनाओं एवं वर्गविशेष जाति संगठनों  द्वारा जहाँ एक ओर अपने आप को क्रमशः हिन्दू हितैषी दल  और अनुसूचित जतियों  का हितैषी बताती  है बही दूसरी ओर  इन्ही वर्गो के लोगो के साथ मारपीट कर इन्हे डरा - धमका कर रोजगार से विस्थापित कर अपने दोगले चरित्र को दर्शाती है।  ऐसे व्यक्ति राजनैतिक लाभ और सत्ता के लिये किसी भी हद तक गिर सकते है और ऐसे दोमुहे व्यक्तियों को वड़े वड़े राजनैतिक दलों का संरक्षण मिला हुआ है जो इन प्रदेशों मे मजदूरी करने आये लोगो पर अत्याचार करते है। हमे ऐसे लोगो की निंदा और भर्त्स्ना करना चाहिये।
हमने  एक कहानी अखंड ज्योति मे पड़ी थी "एक बार जंगल मे बहुत तेज आग लगी, सभी जानवर अपने-अपने तरीके और शक्ति से आग पर काबू करने का प्रयास कर रहा था। एक छोटी चिड़िया भी बारबार अपनी चोंच मे पानी भर कर उड़ कर जाती और आग के उपर चोंच मे भरे पानी को आग पर डालती। तभी वहाँ खड़े हाथी ने उससे पूंछा नन्ही चिड़िया तेरी छोटी से चोंच मे भरे पानी से जंगल की आग कैसे बुझेगी?? चिड़िया ने हाथी को जबाब दिया "माननीय हाथी जी सभी अपनी शक्ति और क्षमता से आग बुझाने का प्रयास कर रहे है, यध्यापि जंगल की आग बड़ी विकराल है फिर भी  मैं भी अपनी शक्ति अनुसार आग बुझाने की कोशिस कर रही हूँ। ये मायने नही रखता कि किसका प्रयास बड़ा या किसका प्रयास छोटा था। मायने ये रखता है कि जब कभी "जंगल की आग" का इतिहास लिखा जायेगा मेरा नाम आग  बुझाने बालों मे लिखा जायेगा न कि मूक दर्शक बन जलती आग देखने बालों मे"।  
कहानी छोटी है पर संदेश बड़ा है कि देश की स्वतन्त्रता से पूर्व मुग़ल साम्राज्य से लेकर ईस्ट इंडिया कंपनी के आगमन तक, स्वतन्त्रता के पश्चात भारत विभाजन से लेकर धार्मिक, जातिगत, क्षेत्रीयबाद तक की  सभी घटनाओं मे जिससे  देश मे कटुता, वैमनस्य, दंगे लड़ाई आदि फैली इस देश  का "बुद्धिजीवी वर्ग मौन" क्यों रहा ????

विजय सहगल


मंगलवार, 9 अक्टूबर 2018

वेल पत्री का पेड़


" वेल पत्री का पेड़ "

हम जब कभी कोई शुभ कार्य करते है तब हम अन्य दूसरे देवताओं के साथ स्थान, ग्राम, एवं वन देवता का भी भी आवाहन कर उनको शुभ कार्य मे शामिल होने की प्रार्थना करते है जो अपरोक्क्ष रूप से पेड़ों/ वृक्षों  की ही पूजा हैं।
हमारे धार्मिक ग्रन्थों मे, हमारी सांस्कृति मे वृक्षों का महत्वपूर्ण स्थान रहा है जिनमे एक वृक्ष को लगाना, बड़ा करना सौ पुत्रों के समान कहा गया है जो वास्तव मे सही भी है। वैज्ञानिक द्रष्टि से भी वृक्षों के विना मानव जीवन की कल्पना संभव नहीं हैं। लेकिन आज के युग मे किसी पेड़ को लगाना तो आसान है पर  लगा कर बड़ा करना कोई आसान काम नही हैं। जहाँ एक ओर हम  प्रत्येक धार्मिक कार्यों के समापन पर शांति पाठ मंत्रों के उच्चारण से करते हुए  उन  मंत्रों  मे हम ईश्वर से विश्व मे हर जगह शांति की प्रार्थना करते हुए  "रोषधयः शान्तिः, वनस्पतयः शांतिर्विश्वे देवाः"  अर्थात हे प्रभु- औषधि, वनस्पति, वन उपवन मे शान्ति कीजये  और बही दूसरी ओर हम निरीह वृक्षों के साथ बलात्कार कर उन्हे वचपन मे ही रौंद कर नष्ट कर देते है।
हम बात ऐसे लोगो की कर रहे है जो अपने स्वार्थ और लाभ के लिए छोटे छोटे पेड़ो से फूल, पत्तियाँ, तनो के लिये उन पेड़ो को नोचते और तोड़ते है जिसे हमने अपने घर के सामने रोपे गए पेड़ो की परवरिश के दौरान महसूस किया। हमारा ये मानना है जब वृक्ष  पूर्ण रुपेण बड़ा हो जाए तो उसमे से अपनी आवश्यकता अनुसार फल, फूल, पत्तियाँ, लकड़ी हम प्राप्त करे, जैसा कि कबीर दास जी ने अपने दोहे मे कहा है :-
"वृक्ष कबहुँ नहिं फल भखै, नदी न संचै नीर । 
परमारथ के कारने, साधुन धरा शरीर ॥
अर्थात  Top of Form
 वृक्ष अपने फल स्वयं नही खाते, नदी अपना पानी स्वयं नही पीती  इसी तरह साधु पुरुष स्वयं अपने लिये नही जीते बल्कि  वह तो समाज के कल्याण के लिये अपना जीवन जीते है।
विशेष कर हम भारतीय जो जन्म से ही पेड़ों, वृक्षों, वनस्पतियों को देवताओं के रूप मे पूजते है लेकिन वास्तविक जीवन मे यदि किसी पेड़ से हमे धार्मिक या स्वास्थ से जुड़ा कोई भी लाभ या स्वार्थ नज़र आता है तो कुछ लोग  उस पेड़ को नष्ट करने या नुकसान पहुचाने मे  एक भी  क्षण  नहीं गवाते। किसी के घर की बाउंड्री  वाल से दीख रहे फूलों को तोड़ने के पूर्व किसी पूर्व  से अनुमति लिये बिना उन्हे हम ऐसे तोड़ लेते है जैसे उनपर उनका  जन्मजात अधिकार है। यदि फूल/पत्ती  सार्वजनिक जगहों, पार्को या बगीचों मे लगी  हों तो जैसे उनको तोड़ना उनका जन्मजात ही नही कानूनी अधिकार भी है। अगर किसी ने उनके तोड़ने पर सवाल कर दिया तो भगवान या स्वास्थ का वास्ता दे कर अपने फूल तोड़ने के क्रत को न्यायिक ठहराने का प्रयास करेंगे। इस प्रवर्ति से पीढ़ित फूलों के पौधों की समस्त प्रजाति शामिल है।  धतूरे के फूल से गुलाब के फूलों तक, गूढहल से लेकर गेंदे तक सभी फूल इसमे शामिल है। जहाँ तक पेड़ों की बात है सभी फलदार पेड़ों के अलावा  सबसे ज्यादा पीढ़ित नीम, आम, और वेलपत्री और थोड़ा कम पीढ़ितों मे  बबूल का पेड़ है।

हमारे घर के सामने एक छोटा सा उजाड़ मैदान था। नौकरी के दौरान बाहर रहने के कारण जब मैं सन 2000 मे ग्वालियर आया तो हम और हमारे पड़ौसी रावत जी, पांडे जी, बुंदेला जी, नागर और सोनी जी ने मिल कर उस उजाड़ मैदान मे और हरियाली लगाने का निर्णय लिया। हम लोगो ने पौध शाला से कुछ पेड़ जैसे  अमलतास, शहतूत, कठहल, अशोक, सौजना, करंजी, हरसिंगार एवं वेलपत्री के लाकर उस मैदान मे लगाये। इन वृक्षों का रोपना कोई आज की तरह का राजनैतिक  वृक्षा रोपण  कार्यक्रम नही था। हम सभी की अब गहन  ज़िम्मेदारी थी की इन छोटे छोटे पौधो की परवरिश कर इन को वृक्ष बनाये। इन की रक्षा करना एक सबसे बड़ा चैलेंजे था क्योंकि मैदान चारों तरफ से खुला था। सभी ने मिलकर मैदान की बाउंड्री पर कुछ बड़ी-बड़ी लकड़ियाँ लगा कर उन पर कँटीले तार बांध कर फेंसिंग की, दूसरी जगह से "राजनैतिक वृक्षारोपड़" (ऐसे वृक्षारोपण जहाँ वृक्ष लगाये, फोटो खींची, समाचार पत्रों  मे छपाई और वृक्षारोपण की ईतीश्री हुई) के कुछ समय बाद न तो वृक्ष बचा और न ही ट्री गार्ड बचा, टूटा हुआ ट्री गार्ड यहाँ वहाँ लुढ़कता हुआ एक "सफल राजनैतिक वृक्षारोपण" की  एक असफल वास्तविक कहानी कहता हैं। ऐसे बचे खुचे, टूटे फूटे ट्री गार्ड हम लोगो ने जहाँ-तहाँ  से मिल कर उन्हे  एकत्रित किया  और उनको  पेड़ो की सुरक्षा  पर लगाया। आये दिन भैंसों के झुंड फेंसिंग को तोड़ देते, ट्री गार्ड को गिरा देते या बकरियों का समूह पेड़ो को खा लेता या नष्ट कर देता। यदि हममे से किसी ने देख लिया तो उन्हे दूर कर कही हांक देते कभी डंडे से मारते तो भैसों/बकरियों के मालिक से झगड़ा होता। हम लोग बार बार अपनी बाउंड्री बाल फेंसिंग  और ट्री गार्ड को  दुरुस्त कर पौधों की रक्षा करते। चूंकि हमारा  घर मैदान के बीच मे होने के कारण पौधों को पानी देने की ज़िम्मेदारी हमारी थी। वृक्षा रोपण के दौरान भी हम कुछ कुछ प्रयोग करते थे, जैसे छोटे पेड़ की कुछ पत्तियाँ तोड़ कर गाय, बकरी, भैसों को खिलाते। जिन पत्तियों को ये जानवर खा लेते उन पेड़ो की सुरक्षा हम लोग ट्री गार्ड कंटीली झड़ियों आदि लगा कर  करते और जिन पत्तियों को जानवर नही खाते उन पर तोड़ा कम सुरक्षा का ध्यान करते। इस अनुभव के आधार पर मैं  कह सकता हूँ कि करंजी, अमलतास का पेड़ जिन्हे जानवर नही खाते, लगाना, उनकी परवरिश करना थोड़ा आसान था। बहीं वेल-पत्री के पेड़ को जानवरों से कम आदमियों से ज्यादा खतरा है और नीम के पेड़ को जानवर और आदमियों से समान खतरा है ।   कुछ स्वास्थ के प्रति जागरूक मूर्ख  इंसान नीम की नर्म और छोटी कोपलों को तोड़ कर वैध्यजी या बाबा जी  की सलाह पर उन पत्तियों का सेवन करने के लिए  दो-तीन फुट लंबे पेड़ से उन नन्ही  कोपलों को तोड़ने मे कोई संकोंच नही करते जिन्हे अभी तोड़ना पेड़ की हत्या करने के बराबर हैं।  हमने ऐसे दरिंदों को देखा है जो नीम की दातौन तोड़ने के लिये नीम के छोटे -छोटे पेड़ों की मुख्य शाखा को तोड़ कर दातुन की तरह इस्तेमाल करते हुए अपनी भद्दी सूरत लेकर मॉर्निंग वॉक करते हुए दातौन से दाँत साफ करते।  इनका बल और पौरुष बड़े-बड़े वृक्षों से दातुन तोड़ने मे या नर्म कोपलों को तोड़ने मे जबाब दे जाता है क्योंकि उन की टहनियाँ उनकी पहुँच से दूर होती है।
हम लोगो द्वारा लगाये गये वेल पत्री के पेड़ को छोड़कर लगाये गये अन्य पेड़ आज पूर्ण वृक्ष बन गए है जिनकी संख्या लगभग 20-22 से ऊपर होगी।  पर वेल पत्री का पेड़ इन मानव रूपी दानवों से आज भी संघर्ष कर रहा है। वेल पत्री का पेड़ आज भी अपने अस्तित्व के लिये संघर्ष कर रहा है। आज लगभग 18 साल बाद भी उस वेल पत्री का पेड़ के साथ हर साल सावन के महीने मे तथाकथित कुछ शिव भक्त,  साधारण तयः हर दिन और विशेष तयः सोमवार को,  समूहिक चीरहरण करते है। मुझे याद है जब उक्त वेल पत्री के पेड़ को रोपे हुए लगभग एक साल भी नही हुआ था हमे इन्सानो से उसे बचाने मे काफी संघर्ष करना पड़ा था। एक बार एक उम्रदराज महिला ने उसकी पहुँच के अंदर करीब 100 से ज्यादा  पत्तियाँ तोड़ ली जब मैंने देखा तो उनसे कहा माताजी पौधे को बड़ा तो हो जाने दीजिये सभी आप की तरह इतनी पत्तियाँ तोड़ लेगा तो पेड़ मर ही जायेगा? उन्होने कहा कि भगवान को चढ़ाने के लिये वेल पत्री ली है। हमने कहा चढ़ना है तो 2-4 पत्तियाँ चढ़ा ले लेकिन  108 पत्तियों को इस तरह तोड़ने से तो पेड़ कभी बड़ा ही नही होगा। इतना सुनते ही क्रोध मे उन्होने हमे अधार्मिक बताकर  सारी पत्तियाँ हमारे घर के दरवाजे पर फैंक दी और मुझे बहुत बुरा-भला कह कर कोसते हुए   चली गई। एक सज्जन बड़े धार्मिक भाव का प्रदर्शन करते हुए वेल पत्री तोड़ने लगे जब मैंने उन्हे टोका तो पूजा मे भगवान का वास्ता देकर अपने आपको सही ठहराने का प्रयास करने लगे।    मुझे मजबूरी बश उन्हे कहना पड़ा कि बाजार मे कुछ पैसे खर्च कर वेल पत्री लेलें मुफ्त मे पुण्य क्यों कमाना चाहते है बैसे भी पेड़ अभी पूर्णतयः बड़ा नही है? हमे उनके कोप का भाजन बनना पड़ा। पार्क मे हमलोगो ने एक छोटा शिव मंदिर बनाया हुआ है अतः कुछ लोगो से हमे कहना पड़ा कि ये वेल पत्री सिर्फ यहाँ इसी  मंदिर मे चढ़ाने के लिये ही है कही और भगवान या मंदिर के लिये नही।
आये दिन होने बाली इस कलह से मैं काफी व्यथित होने लगा। कुछ लोगो ने तो पेड़ काटने की धमकियाँ भी दी। हमे कई बार वेल पत्री के पेड़ के लगाने के निर्णय पर बड़ा  पछतावा भी होने लगा। इन सभी घटनाओं से दुखी होकर और स्थानीय लोगो के व्यवहार के कारण आज इस लेख के माध्यम से मैं  एक प्रयश्चित 18 सालों बाद कर रहा हूँ कि मैंने घर के सामने उस मैदान  पर रोपे अन्य पेड़ों के साथ लगाये उस एक  कठहल रूपी पेड़ की भ्रूण हत्या की।   यध्यापि कठहल का वह  पेड़ एक साल मे  बहुत ज्यादा बड़ा नही हुआ था पर  मुझे पूर्ण विश्वास था कि मैं कठहल के उस पेड़ को  भी अन्य पेड़ों के साथ बड़ा कर लूँगा। परन्तू लोगो के  ऐसे  व्यवहार ने हमे चिंतित कर दिया  कि पेड़ के बड़े होने पर उस पर आने बाले "फल" झगड़ो का कारण बनेगे हमने बहुत ही कठोर निर्णय लेते हुए उस पेड़ को एक दिन बड़े बे मन से उखाड़ दिया, लेकिन वेल पत्री के पेड़ के साथ लगभग 18 साल बाद भी  हो रहे व्यवहार को देख कर हमे लगता है कि हमारा निर्णय कड़वा जरूर था पर ठीक था।    यध्यापि मैं भी बड़ा धार्मिक हूँ जब तक 10 वर्ष मैं  ग्वालियर प्रवास पर  रहा,  मंदिर को प्रातः सबसे पहले झाड़ू लगा कर साफ करना मेरी दिनचर्या का हिस्सा  रहा,  पर आज तक मैंने इसी कारण मैदान मे बने शिव मंदिर मे वेल पत्री नही चढ़ाई कि पूर्ण वृक्ष बन जाने पर ही वेल पत्री और  वेल का फल  चढ़ाऊँगा। इसी उधेड़ बुन मे मैं ऐसा उपाय खोजने लगा ताकि तथाकथित शिव भक्त इस वेल पत्री के पेड़ से घ्रणा करने लगे और और पेड़ पर की जा रही हिंसा के बगैर पेड़  बड़ा हो जाए।
इसी क्रम मे मैंने पेड़ की पत्तियों पर गोवर-मिट्टी का कीचड़ को घोल बना कर छिड़क दिया किन्तु भक्तगढ़  उसे धोकर घर ले जाते और पुण्य लाभ कर ईहलोक और परलोक का सुधार करते । मैंने एक छोटा लकड़ी का  साँप जो बाजार मे बिक रहा था उसको पेड़ पर लटकाया पर चोरी पकड़ी गई और वह साँप भी कोई वेल पत्री के साथ ले गया। मैं लगातार प्रयास करता रहा, मैंने पेड़ पर पुराने जूते-चप्पल और पुराने  गंदे कपड़े पेड़ पर लटकाये पर उसका भी कोई बहुत ज्यादा असर नही पड़ा। पेड़ के नीचे काँटों के झाड़ डाले ताकि लोग पेड़ के पास तक  न पहुँच सके पर लोगो ने झाड़ो को किनारे कर वेल-पत्री तक पाहुचने का  रास्ता बना लिया। एक आखरी प्रयास के रूप मे मैंने जो घिनोना प्रयास किया उसे करने मे हमे खुद भी खराब लग रहा था किन्तु मजबूरी थी इसे भी आज़माना था क्योंकि हमारे सारे प्रयास वेल-पत्री के पेड़ को बचाने मे असफल रहे थे। चूंकि ये उस देश मे एक वृक्ष के अस्तित्व की लड़ाई थी जिसमे हम वनो, वृक्षों को देवता मानते है पर कुछ न समझ,  मूढ   लोग हमारी सांस्कृति और सभ्यता पर कुठराघात करते है।
 इस प्रयास के अंतर्गत हमने महिलाओं द्वारा उपयोग किये जाने बाले एक नए सेनेट्री नेपकिन  पैड को लाल मिट्टी से रंग कर उसमे शक्कर छिड़क कर उस वेल पत्री के पेड़ पर टांग दिया जिसका तत्काल प्रभाव देखने को मिला। पेड़ पर टंगे लाल रंग के पैड पर जिसपर अनेकों मखियाँ भिन-भिना रही थी, मैंने देखा जो व्यक्ति/महिलायें वेल पत्री के पेड़ से वेल पत्री तोड़ने आये और वे रुमाल  से नाक ढक कर उल्टे पाव बापस लौट गए और इस घिनोनी हरकत करने बाले को तमाम लानत मलानत करते रहे, मैं स्वयं मन ही मन खुश होकर उन की हाँ मे हाँ मिलकर ऐसी हरकत करने बाले व्यक्ति को कोसता रहा।   उस गंदे पैड को देख कर उनके चेहरे पर घ्रणा के भाव स्पष्ट देखे जा सकते थे। किसी भी व्यक्ति ने उस पैड को पेड़ से हटाने, छूने का तो दूर लकड़ी आदि से हटाने का प्रयास भी नही किया और न ही पैड की चर्चा आपस मे या किसी दीगर आदमी से की।  उक्त पैड महीनों पेड़ पर टंगा रहा और महीनों वेल-पत्री का पेड़ उन अदयालू लोगो के कहर से अपनी रक्षा कर सका। परन्तू 11 साल बाद मेरे ग्वालियर से भोपाल/नई दिल्ली  स्थानांतरण के बाद वो वेलपत्री का पेड़ पुनः  अपनी पुरानी स्थिति  मे है।  लोग आज भी उस निरीह द्रोपदी रूपी पेड़ की पत्तियाँ टहनियों को  तोड़ कर उसका चीर हरण कर रहे है  और वह वेल पत्री का पेड़  अपने बजूद की लड़ाई लड़ कर अपने  अस्तित्व के लिये संघर्ष कर रहा है!!    


विजय सहगल