"अमेरिका - भारत टैरिफ डील"
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फरवरी, सोमवार की देर रात अमेरिका और भारत के बीच बहुप्रतीक्षित व्यापार समझौते की
अंततः घोषणा हो गयी। अमेरिकन राष्ट्रपति डॉनाल्ड ट्रम्प ने इस व्यापार
समझौते की घोषणा करते हुए तत्काल प्रभाव से अमेरिकन टैरिफ 18% होने की घोषणा की।
अमेरिका ने अनेकों हथकंडे और दबाव की नीति के तहत भारत पर रूस से तेल खरीदने पर
25% की पेनल्टी एवं 25% अमेरिकन टैरिफ इस तरह कुल 50% का टैरिफ लगाया था। अमेरिका
को उम्मीद थी कि भारतीय प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी, अमेरिका
सरकार से, इस टैरिफ को कम करने के लिए अमेरिका से अनुनय-विनय
कर याचना करेंगे परंतु उनकी अपेक्षा के विपरीत भारत ने उनकी धमकी और दबाव के
विरुद्ध उनकी घुड़कियों को नज़रअंदाज़ करने की नीति पर अमल किया। प्रधानमंत्री मोदी
ने कनाडा मे 16-17 जून 2025 को जी7 शिखर सम्मेलन की बापसी के दौरान ट्रम्प के मिलने के आमंत्रण को ठुकरा दिया
क्योंकि उन्हे उड़ीशा मे पवित्र महाप्रभु की भूमि की पूर्वनियोजित यात्रा करनी थी।
यहाँ तक कि प्रधानमंत्री मोदी ने कुछ अवसरों पर ट्रम्प के टेलिफोन कॉल को भी अटेंड
करना आवश्यक नहीं समझा। बड़बोले ट्रम्प की हर बात पर कोई प्रतिक्रिया व्यक्त न करने
की प्रधानमंत्री मोदी की नीति ने आखिरकार
ट्रम्प को मजबूरन भारत के अपने स्वाभिमानी
निर्णयों पर अडिग रहकर अमेरिका को घुटनों पर ला दिया और पूर्व मे अपनी 50% टैरिफ
को 18% पर ला दिया।
प्रधानमंत्री
मोदी के, पूर्व प्रधानमंत्री स्व॰ मनमोहन सिंह से कितने भी मत-मतानंतर रहे हों, लेकिन स्व॰ मनमोहन सिंह ने 27 अगस्त 2012 को संसद भवन के बाहर एक प्रसिद्ध
शेर कहा था जो कि इस अमेरिका और भारत के बीच हुए इस व्यापारिक समझौते पर पूरी तरह
से फिट बैठती है:- हजारों जवाबों से अच्छी
है मेरी खामोशी, न जाने कितने सवालों की आबरू रखी"। अमेरिका के राष्ट्रपति के हर डींग हाँकने और
बड़बोलेपन पर प्रधानमंत्री मोदी की खामोशी ने अमेरिका को भारत से समझौते के लिए
मजबूर करना एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है। पिछले एक वर्ष से अमेरिकन राष्ट्रपति द्वारा
अपने टैरिफ आतंक से दुनियाँ भर के देशों की अर्थव्यवस्था को हिला कर रख दिया परंतु
प्रधानमंत्री मोदी की आपदा मे अवसर तलाशने की अपनी नीति पर चलने के कारण भारत की
अर्थव्यवस्था इन सभी संकटों से अछूती रही। जिस भारतीय आर्थिक विकास को अमेरिकन
राष्ट्रपति ने मृत ईकोनोमी बताया था और उनके वक्तव्य पर भारत के विपक्षी दलों
ने अपने देश के अर्थशास्त्रियों को कमतर आँकते
हुए, अमेरिका के
राष्ट्रपति के सुर मे सुर मिला कर अपनी सहमति जतलायी और सरकार के अर्थशास्त्रियों की योग्यता, श्रेष्ठता और
पात्रता पर सवालिया निशान लगाये, अब अमेरिका से हुए व्यापारिक समझौते पर बगले झांक
रहे है। राष्ट्रपति ट्रम्प और भारत के राहुल गांधी जिस भारतीय अर्थव्यवस्था को डैड
ईकोनोमी बतला कर भारतीय अर्थव्यवस्था का मखौल उड़ा रहे थे उसी भारतीय अर्थव्यवस्था
की विकास की दर को विश्व बैंक ने वित्त वर्ष 2025-26 के लिये 7.2% की दर से विश्व
मे सर्वाधिक गति से बढ्ने वाली अर्थव्यवस्था बतलाया है। यह विश्व बैंक की पूर्व के
6.3% के अनुमान से बढ़ी बढ़ोतरी है, जो मजबूत घरेलू मांग और
उपभोग को दर्शाता है।
अमेरिका के इस टैरिफ युद्ध के
संकट का आभाष भारत सरकार को था। इसलिए अमेरिका से व्यापारिक समझौते की वार्ता के
समानान्तर भारत ने जापान, दक्षिण कोरिया आसियान क्षेत्र के देशों, दक्षिण
सार्क देशों, मॉरिशस, संयुक्त अरब
अमीरात, आस्ट्रेलिया सहित 13 अन्य देशों के साथ मुक्त
व्यापार समझौते किए और हाल ही मे 27 जनवरी 2026 को भारत और यूरोपियन यूनियन के 27
देशों के बीच मुक्त व्यापार समझौते पर हस्ताक्षर किए गये। यूरोपियन यूनियन की
प्रमुख उर्सला वॉन डेर लेयेन ने इस समझौते को सभी व्यापार की जननी ("मदर ऑफ
ऑल डील्स") कह निरूपित किया। अमेरिका और भारत से हुआ ये व्यापारिक समझौता इस बात का उदाहरण है कि भारत अपने आत्मसम्मान और
नीतियों से सम्झौता किए बिना, बगैर किसी दबाव मे समझौता करने वाला देश है। इस आशय की खबरें अमेरिकी समाचार एजेंसी ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के
अनुसार सितम्बर 2025 मे राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार की अमरीका के विदेश मंत्री
मार्को रूबियों से मुलाक़ात के दौरान ये स्पष्ट संदेश दे दिया गया था कि यध्यपि
भारत अमेरिका के साथ व्यापारिक कड़वाहट दूर कर दोबारा व्यापारिक ट्रेड डील पर
बातचीत करने को तैयार है लेकिन भारत किसी भी दबाव मे नहीं आयेगा। यदि अमेरिका इस
सबके बावजूद सख्त रुख अपनाता है तो भारत मौजूदा ट्रम्प सरकार के कार्यकाल की
समाप्ति तक इंतज़ार कर सकता है। ऐसा नहीं था कि सिर्फ अमेरिका ही व्यापारिक समझौते
पर टैरिफ बढ़ा रहा था भारत ने भी दालों पर 30% का शुल्क लगाकर ये दर्शा दिया कि
भारत अपने हितों से कोई समझौता करने वाला नहीं है। अमेरिका द्वारा भारत पर 50%
टैरिफ बढ़ाने का प्रभाव भारत के निर्यात पर तो था ही लेकिन इस टैरिफ का असर अमेरीकन
नागरिकों पर भी हो रहा था क्योंकि उन्हे भी इस बढ़े हुए टैरिफ के कारण वस्तुए महंगी
मिल रही थी। अमेरीकन नागरिकों मे भी ट्रम्प के इस टैरिफ के विरुद्ध अमेरिका मे
असंतोष व्याप्त है।
जहां एक ओर इंडि गठबंधन
अमेरिका के साथ हुई इस व्यापारिक डील पर संदेह और सवाल खड़े कर भारतीय कृषि और
किसानों के लिये आत्मघाती कदम बता रहा था। राहुल गांधी ने इसे जल्दीबाजी भरा कदम
बताते हुए अमेरिका के सामने मोदी का घुटने टेकने वाला कदम बताया। उन्होने कहा कि
इस समझौते ने किसानों की मेहनत, खून पसीने को बेच दिया। समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने इस
डील को देश के हितों से की गई ढील बताया। आम आदमी पार्टी के संजय सिंह ने तो इस
समझौते को भारतीय किसानों की पीठ और पेट पर छुरे से हमला बता कर कृषि और डेयरी
उत्पाद के दरबाजे अमेरीकन कंपनी के हितों के लिये खोल देने के सरकार के निर्णयों
की आलोचना की। वही दूसरी ओर कृषि और किसान कल्याण मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने
विपक्षी दलों के आरोपों को निरधार बतलाते हुए कहा कि समझौते मे खेती-बाड़ी और डेयरी
सेक्टर के हितों से सम्झौता नही किया गया। मुख्य अनाज, फल, मिलेट्स डेयरी उत्पादकों के हित पूरी तरह सुरक्षित बताए।
भारत अमेरिका व्यापारिक समझौते
पर अभी तमाम चीजें साफ होना बाकी है। कृषि और डेयरी सैक्टर को लेकर जो गतिरोध बना
हुआ था उस का हल कैसे निकाला गया यह देखने वाली बात होगी। रूस से तेल की खरीद के
कारण जो 25% पेनल्टी लगाई थी वह भी एक अहम मुद्दा है? विपक्ष भी आक्रामक तरीके से सरकार पर
हमलावर है इन मुद्दों पर स्पष्टता आना बाकी है। वही वाणिज्य एवं उद्धयोग मंत्री
पीयूष गोयल ने कहा है कि भारत अमेरिका व्यापारिक समझौते के संयुक्त बयान 4-5 दिन
मे आने की उम्मीद है, पहले चरण पर मध्य मार्च तक हस्ताक्षर
होने की संभावना है।
विजय सहगल



1 टिप्पणी:
10% ho gaya tarrif for the whole world. Supreme court has quashed Dost ke manmani.
But still Mitter says India par deal wala tarrif rahega Jo ki 10% se bahut jayada hey. Hum dost se import par koi tarrif nahi laga sakte Dosti ke khatir.
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