शनिवार, 31 जनवरी 2026

ज्योतिसर तीर्थ-कुरुक्षेत्र-श्रीमद्भगवत गीता की जन्मभूमि

 

"ज्योतिसर तीर्थ-कुरुक्षेत्र-श्रीमद्भगवत गीता की जन्मभूमि"










29 नवंबर 2025 को मुझे गुरुग्राम से  हरियाणा के कुरुक्षेत्र जिले के पवित्र "ज्योतिसर तीर्थ" जाने का सौभाग्य प्राप्त हुआ जो सनातन हिन्दू धर्म की सबसे पवित्र, प्राचीन और पठनीय  पुस्तक श्रीमद्भगवत गीता की जन्मभूमि होने का सौभाग्य प्राप्त है। 196 किमी का जीटी रोड का रास्ता बहुत ही शानदार और सुगम था। ऐसी मान्यता हैं कि इसी स्थान पर भगवान श्रीकृष्ण ने महाभारत युद्ध के दौरान शोक और विषाद से ग्रसित अपने प्रिय शिष्य  अर्जुन को उपदेश देते हुए  

तस्मादज्ञानसंभूतं हृत्स्थं ज्ञानासिनाऽऽत्मनः।
छित्त्वैनं संशयं योगमातिष्ठोत्तिष्ठ भारत।।4.42।।   अर्थात इसलिए हे भरत वंशी अर्जुन! हृदय में स्थित इस अज्ञान से उत्पन्न अपने संशय का ज्ञानरूप तलवार से छेदन करके योग में स्थित हो जा और युद्ध के लिये खड़ा हो जा।

का उपदेश देकर धर्म युक्त युद्ध के लिये प्रेरित किया। श्रीमद्भगवत गीता के 18 अध्याय मे वर्णित  700 श्लोकों से,  अर्जुन के माध्यम से विश्व और मानवता को कर्म योग का  संदेश दिया।   

4/42 श्रीमद्भगवत गीता को राज्याश्रय के बिना (राज्याश्रय के बिना से तात्पर्य जैसे अन्य धर्मों की पवित्र पुस्तकें अपकों निःशुल्क मिल जाएंगी किन्तु श्रीमद्भगवत गीता और सनातन धर्म  की अन्य पुस्तकों के लिए आपको उनकी कीमत का भुगतान करना पड़ेगा) दुनियाँ की सबसे अधिक अनूदित, अनुवादित और भाषांतरित पुस्तक का दर्जा प्राप्त है। कुछ स्रोतों के अनुसार 300 से अधिक भाषाओं मे इस पुस्तक का अनुवाद हुआ है। अंतर्राष्ट्रीय कृष्णभवनामृत संघ (ISCON- International Society for Krishna Consciousness) द्वारा स्वयं 80 से अधिक भाषाओं मे श्रीमद्भगवत गीता का अनुवाद प्रकाशित किया गया है। श्रीमद्भगवत गीता का अध्यन लगभग 186 देशों मे किया जा रहा है, इसके अलावा दुनियाँ के अनेकों विश्व विध्यालय और कॉलेजों मे दर्शन, धर्म और साहित्य विभागों मे गीता का अध्ययन और पठन पाठन शामिल है इसके अतिरिक्त श्रीमद्भगवत गीता पर हजारों शोध पत्र प्रकाशित हो चुके है।

मुरुथल मे अमरीक सुखदेव के आलू पराठे और दही का नाश्ता करने के बाद हम लोग जीटी रोड पर कुरुक्षेत्र की ओर बढ़े। बैसे तो इस ज्योतिसर की इस धरा को  पवित्र ग्रंथ श्रीमद्भगवत गीता  के जननी होने के कारण करोड़ो भक्तों की श्रद्धा और सम्मान के कारण तीर्थ का दर्जा प्राप्त है परंतु स्वयं श्रीमद्भगवत गीता  का नित्य पाठक होने के कारण मुझे इस स्थान के दर्शन, आराधना, उपासना और पूजा का परम सौभाग्य मानता हूँ। कुरुक्षेत्र से लगभग 12-15 किमी दूर पहोवा मार्ग पर स्थित इस छोटे लेकिन अत्यंत महत्वपूर्ण ज्योतिसर तीर्थ का मार्ग अच्छी तरह से जुड़ा है।

ज्योतिसर मंदिर के प्रांगण के  संगमरमर के भव्य प्रवेश द्वार मे प्रवेश करते ही सबसे पहले दर्शन होते है उस प्राचीन वट वृक्ष के जो गवाह है भगवान श्री कृष्ण और अर्जुन के बीच हुए मे  संवाद का जिसे आज हम श्रीमद्भगवत गीता के रूप मे जानते हैं। इस तरह के इस स्थान पर बरगद के  5-6 वृक्ष है जिनकी हवाई जड़े वृक्ष के चारों ओर जमीन के नीचे गहरे तक जमी हैं। प्रशासन ने इन वट वृक्षों और उनकी हवाई जड़ों को बड़ी अच्छी तरह सहेज कर एक चबूतरे का रूप दिया हैं। साफ सुथरे चबूतरे पर ज्योतिसर मे आने वाले श्रद्धालुओ को इन चबूतरों पर बैठे देखा जा सकता हैं जो श्रीमद्भगवत गीता का स्वाध्याय करते हुए अपने को भगवान श्री कृष्ण के साथ एकाकार का प्रयास करते हुए देखा जा सकता है। पूरे क्षेत्र मे साफ सफाई की बहुत अच्छी व्यवस्था थी। ऐसी मान्यता है कि आदि शंकराचार्य ने ईसा पूर्व नौवीं शताब्दी मे अपनी हिमालय यात्रा के दौरान इस परम पवित्र स्थान की पहचान की थी। सन् 1850 ई॰ इस स्थान पर कश्मीर के राजा ने एक शिव मंदिर का निर्माण कराया था। 1924 मे दरभंगा के महाराज ने इस पवित्र वट वृक्ष के चारों ओर संरक्षित कर एक चबूतरा बनवाया था। कालांतर मे कांची कमकोटि के शंकराचार्य ने 1967 मे संगमरमर के चबूतरे पर पूर्व मुखी मार्बल के पत्थर से निर्मित एक खूबसूरत रथ स्थापित किया जिसमे भगवान श्री कृष्ण, हाथ जोड़े अर्जुन को श्रीमद्भगवत गीता का उपदेश देते हुए दिखाई देते हैं। इस पूरे प्रांगण मे किसी स्कूल से आए बच्चों का समूह और उनके अध्यापक भजन करते दिखलाई दिये। कुछ लोग श्रीमद्भगवत गीता के श्लोकों का उच्चारण करते दिखलाई दिये। भगवत गीता का विध्यार्थी होने के कारण मैंने मे अपने मोबाइल मे संरक्षित गीता के मुख्य श्लोकों का सस्वर वाचन किया तत्पश्चात महर्षि वेदब्यास द्वारा पद्म पुराण मे वर्णित गीता महात्मय का पाठ किया जो मुझे कंठस्थ है और जिसका उच्चारण मुझे अतिसय प्रिय है।

ज्योतिसर मंदिर के पूरे क्षेत्र मे एक दिव्य और अलौकिक वातावरण को महसूस किया जा सकता है। कुछ आगे बढ़ने पर स्वर्णिम आभा से आलोकित एक विशाल लगभग 40 फुट ऊंची अष्टधातु की प्रतिमा दिखलाई दी। श्रीमद्भगवत गीता के अध्याय 11 मे वर्णित विराट  विश्वरूप दर्शन योग के दिव्य दर्शन इस प्रतिमा मे होते हैं। इस प्रतिमा मे भगवान के नौ रूपों के दर्शन होते है जो शेष नाग के छत्र के नीचे हैं। इन नौ रूपों मे विष्णु, शिव, गणेश, नरसिंह अवतार, परशुराम, हनुमान, सुग्रीव, अग्निदेव और स्वयं भगवान श्री कृष्ण शामिल हैं। इस मूर्ति के निर्माता मूर्तिकार राम वन जी सुतार हैं जिन्होने स्टैच्यू ऑफ यूनिटी सहित अनेक मूर्तियों का निर्माण किया। शाम के समय हरियाणा पर्यटन विभाग इस स्थान पर लेजर लाइट एंड  साउंड शो का आयोजन हिन्दी और अँग्रेजी भाषा मे किया जाता है। प्रवेश द्वार के बाएँ ओर एक सरोवर हैं निश्चित ही मुख्य पर्वों और त्योहारों पर यहाँ स्नान पर बड़ी भीड़ रहती होगी। सरोवर के परे शायद औडीटोरियम और संग्रहालय का कार्य प्रगति पर था। एक सीमित दायरे मे वसे इस क्षेत्र मे फैली दिव्यता को अनुभव किया जा सकता है। मंदिर परिसर मे अन्य देवी देवताओं के भी मंदिर बने हुए है। मंदिर से बापसी पर परिसर के बाहर भी छोटे छोटे गुमटी और ठेलों पर खान पान सहित विभिन्न वस्तुओं की विक्रय हो रहा था। उन्ही मे से एक पर चाय पान कर हम लोग बापस कुरुक्षेत्र होते हुए अपने गंतव्य के लिए प्रस्थान किया।  

बैसे तो श्रीमद्भगवत गीता अपने अताह समुद्र से परिपूर्ण ज्ञान और आलोक का भंडार है और जिसे किसी प्रमाण की आवश्यकता नहीं। भगवत गीता के  नित्य पठन पाठन से इह लोक और परलोक सुधरता  है ऐसा हम अपने पूर्वजों से सुनते आए हैं लेकिन श्रीमद्भगवत गीता मे तो स्वयं भगवान श्री कृष्ण अपने श्रीमुख से कहते है कि भगवत गीता शास्त्र के संदेश को  प्रचार प्रसार करने वाले मनुष्य को अपना सर्वाधिक प्रिय बताते हैं-

न च तस्मान्मनुष्येषु कश्िचन्मे प्रियकृत्तमः।
भविता न च मे तस्मादन्यः प्रियतरो भुवि।।18.69।।  अर्थात उसके समान मेरा अत्यन्त प्रिय कार्य करनेवाला मनुष्योंमें कोई भी नहीं है और इस भूमण्डलपर उसके समान मेरा दूसरा कोई प्रियतर होगा भी नहीं।

बैसे तो श्रीमद्भगवत गीता के श्लोक और उनकी शिक्षाएं देश, काल, पात्र भाषा, धर्म और संप्रदाय के परे हर मनुष्य के जीवन मे उतनी ही प्रासंगिक है जैसे आज से लगभग पाँच हजार वर्ष पूर्व भगवान कृष्ण द्वारा अर्जुन को उपदेश के समय थी। लेकिन अपने सुधि पाठकों से भी आग्रह करते हैं कि अपने घरों मे श्रीमद्भगवत गीता की स्थापना कर नित्य पठन पाठन करें।

विजय सहगल  

 

 

                    

       

शनिवार, 24 जनवरी 2026

घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग, वेरुल, संभाजी नगर, महाराष्ट्र

 

"घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग, वेरुल, संभाजी नगर, महाराष्ट्र"







बचपन मे भारत के 12 पवित्र ज्योतिर्लिंग का स्तोत्र संस्कृत मे  पढ़ा था जो पवित्र ज्योतिर्लिंग को कंठस्थ करने का सरल और सुंदर माध्यम था।

॥ द्वादश ज्योतिर्लिंग स्तोत्रम् ॥ 

सौराष्ट्रे सोमनाथं च श्रीशैले मल्लिकार्जुनम् ।
उज्जयिन्यां महाकालमोंकारं ममलेश्वरम् ॥१॥

परल्यां वैद्यनाथं च डाकिन्यां भीमशंकरम् ।
सेतुबन्धे तु रामेशं नागेशं दारुकावने ॥२॥

वाराणस्यां तु विश्वेशं त्र्यम्बकं गौतमीतटे ।
हिमालये तु केदारं घुश्मेशं च शिवालये ॥३॥

एतानि ज्योतिर्लिङ्गानि सायं प्रातः पठेन्नरः ।
सप्तजन्मकृतं पापं स्मरणेन विनश्यति ॥४॥

सनातन धर्म और हमारी भारतीय सांस्कृति मे ऐसी मान्यता हैं कि भारत के विभिन्न स्थानों मे स्थापित ज्योतिर्लिंग के दर्शन करना एक पवित्र कार्य है। 12 पवित्र ज्योतिर्लिंगों का भारत के भिन्न भिन्न  क्षेत्रों मे स्थित होने के कारण  वहाँ की सांस्कृति, सभ्यता भाषा और रहन सहन से भी परिचय होता है। इस प्रकार मै इस तीर्थ यात्रा मे पूरे 12 ज्योतिर्लिंगों के दर्शन के पुण्य का भागी हूँ। स्तोत्र के क्रमानुसार शुरुआत न सही लेकिन समाप्ती महाराष्ट्र के संभाजी नगर मे स्थित इस घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग से हुई।

13 जुलाई 2025 को पूना से प्रातः 8 बजे  चलकर, राजणगाँव महागणपति के दर्शन लाभ लेते हुए,  260 किमी॰ दूर संभाजी नगर के  वेरुल गाँव मे स्थित  घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग के दर्शन का सौभाग्य प्राप्त हुआ। होटल मे कुछ क्षण  विश्राम पश्चात लगभग 3 बजे घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर के प्रवेश द्वार पर पहुंचे। मंदिर से 1-1.5 किमी॰  पहले एलोरा गुफाओं का दिखलाई देने पर हार्दिक प्रसन्नता हुई, क्योंकि एलोरा गुफाओं का  इतनी नजदीक होने का अहसास हमे ने था। इसलिए सर्वप्रथम भगवान घृष्णेश्वर महादेव के दर्शन का सद्कार्य करने तत्पश्चात अगले दिन सुबह एलोरा गुफाओं को देखने के निश्चय के साथ घृष्णेश्वर महादेव मंदिर की ओर बढ़े। पूछते पांछते मंदिर के प्रवेश द्वार पर पहुंचे क्योंकि रास्ते को फल-फूल, प्रसाद और अन्य वस्तुओं के दूकानदारों ने सारा रास्ता अवरोधों से घेर रक्खा था। जूते चप्पल आदि की समुचित व्यवस्था नहीं थी पुष्प-पत्र वाले दुकानदार के पास ही उन्हे रख कर आगे बढ़े। अव्यवस्था मंदिर के प्रवेश द्वार तक थी। प्रवेश द्वार पर त्वरित दर्शन और साधारण दर्शन हेतु अलग अलग प्रवेश द्वार थे। पूंछने पर उपस्थित कर्मचारियों ने सुझाव दिया कि दर्शनार्थियों की भीड़ ज्यादा नहीं है साधारण निशुल्क  दर्शन आधा घंटे मे हो जाएंगे। समयाभाव न था, कुछ स्थानीय सांस्कृति सभ्यता को नजदीक से महसूस करने के वशीभूत साधारण निशुल्क दर्शन की लाइन मे लग गए। अंदर घुसते ही मंदिर आयताकार प्रांगण की परधि के किनारे किनारे,  लंबी लंबी लोहे की रैलिंग मे लोगो की भीड़ देख कर लगा कि शायद मेरा निशुल्क दर्शन का निर्णय गलत था। ज़िग-ज़ैग लाइनों मे आगे-पीछे फिर आगे घूमना, इंतज़ार करना, थोड़ा कष्ट प्रद लग रहा था, लेकिन श्रद्धालुओं का तेज गति से आगे बढ्ने के कारण उत्साह बना रहा। तेज गति से लाइन बढ्ने के कारण लगभग आधा घंटे मे ही हम मंदिर के मंडपम के नजदीक थे। अंदर व्यवस्था अनुशासित थी। साफ सफाई की समुचित व्यवस्था थी कहना अतिसन्योक्ति न होगी कि मंदिर प्रांगण के अंदर और मंदिर के बाहर व्यवस्था और अनुशासन मे जमीन आसमान का फर्क था। प्रवेश द्वार के पहले जैसा कि मंदिर प्रबंधन का नियम है कि पुरुषों के लिए ऊपर के वस्त्र उतारकर सिर्फ अधो वस्त्र धोती, पाजामा या पेंट मे ही प्रवेश की अनुमति है। महिलाओं को भारतीय परिधान मे प्रवेश की अनुमति है। इन नियमो का पालन करते हुए हम मंदिर के बहु आयामी मंडपम से होते हुए गर्भ गृह मे पहुंचे। सभी श्रद्धालुओं ने क्रमानुसार घृष्णेश्वर ज्योतिलिंग महादेव के दर्शन और स्पर्श कर अपने को धन्य मानते हुए दर्शन किए। पत्र पुष्प अर्पित कर हम भोले नाथ को दंडवत कर मंदिर के गर्भ गृह से बाहर निकले। दर्शन पश्चात मंदिर भवन के भाहर बने आँगन मे जाने के प्रयास किया ताकि मंदिर की पूर्ण अर्ध परिकरीमा कर कुछ यादगार फोटो ले सके। कुछ व्यवसायिक फोटोग्राफर भी वहाँ लोगो की फोटो मंदिर भवन के साथ ले रहे थे। बड़े जद्दो-जहद के बाद कुछ मिनिट के लिए मंदिर प्रांगण मे जाने की अनुमति मिली। यदि वाराणसी के विश्वनाथ मंदिर के आँगन की तरह यहाँ घृष्णेश्वर ज्योतिलिंग के आँगन प्रांगण मे सुरक्षा व्यवस्था के पैमानों का अनुपालन करते हुए प्रांगण मे दर्शन और कुछ ध्यान आदि की अनुमति हो तो और भी अच्छा होगा। मंदिर का स्थापत्य भीमाशंकर मंदिर की तर्ज़ पर ही था। गर्भ गृह के पूर्व छोटा मंडपम। एक ऊंचे चबूतरे पर दक्षिण भारतीय सनातन हिन्दू मंदिरों और मराठा शैली का अनूठा मिश्रण है। 18वीं सदी मे रानी अहिल्या बाई होल्कर ने इस मंदिर का पुनर्निर्माण कराया था। मंदिर का निर्माण लाल ज्वालामुखीय पत्थरों से किया गया है। 5 स्तरीय शिखर जिसके शीर्ष पर स्वर्ण कलाश स्थापित है,   24 नक्काशीदार स्तंभों वाले सभा मंडपम की नक्काशी देखते ही बनती है।   

मंदिर परिसर के बाहर निकलने का एक बहुत ही छोटा दरबाजा था जो ठीक मंदिर के प्रवेश द्वार के  सामने था। मुझे ऐसा लगता है व्यवस्था की दृष्टि से इस छोटे कम ऊंचाई वाले दरवाजे को निकासी द्वार कहा जा रहा है वह वास्तव मे प्रवेश द्वार ही है क्योंकि प्रायः मंदिर के प्रवेश द्वार इसलिये छोटे और कम ऊंचाई के रक्खे जाते है ताकि मंदिर मे प्रवेश करते हुए चाहे राजा हो या रंक भगवान के दरबार मे झुक कर ही प्रवेश करें। मंदिर के बाहर आते ही अतिक्रमण अव्यवस्था से पुनः आमना-सामना हुआ। कदम कदम पर दुकानों के अतिक्रमण भिखारियों की भीड़ दिखलाई दी।

बापसी मे मंदिर के नजदीक ही छत्रपति शिवाजी महाराज के दादा मालोजी राजे भोसले की भव्य और सुंदर कमल के फूल की आकृति लिए हुए गुंबज छोटी किन्तु आकर्षक समाधि बनी हुई है। इस एतिहासिक समाधि को और भी आकर्षक और भव्य रूप शासन को दिया जाना चाहिए जो छत्रपति शिवाजी महाराज के दादा की शान और स्वाभिमान के अनुरूप नहीं किया गया। समाधि के चारों ओर और आसपास अतिक्रमण और गंदगी नज़र आ रही थी जो सर्वथा अनुचित थी। शासन को इस ओर त्वरित कार्यवाही करना चाहिए।

वेरुल गाँव के नजदीक एक सुखद संयोग भी देखने को मिला जहां धर्मांध, निर्दयी, निष्ठुर क्रूर और कठोर औरंगजेब की कब्र है। मैंने उसकी कब्र पर जाना तो उचित नहीं समझा परंतु उस दिशा मे उस शैतानी आत्मा को धिक्कारते हुए उसे कोसा कि, हे! क्रूर तानाशाह जिस सनातन धर्म पर जज़िया लगा कर तूने हिंदुओं का  नरसंहार किया, हे दुष्ट!!, उपद्रवी!!  औरंगजेब, देख!! सनातन आज और भी मुखर होकर पहले से ज्यादा पुष्पित और पल्लवित होकर फल फूल रहा है और विश्व कल्याण के लिए वसुधैव कुटुंबकम का संदेश फैलाने की ओर अग्रसर है।     

विजय सहगल                  

रविवार, 18 जनवरी 2026

हैरिटेज स्टीम लोको शेड-रेवाड़ी,

 

"रेवाड़ी - हैरिटेज स्टीम लोको शेड, हरियाणा"






















गुरुग्राम के अपने प्रवास पर रविवार दिनांक 07 दिसम्बर 2025 को यूं ही अचानक हरियाणा के रेवाड़ी स्थित भाप के इंजिन का संग्रहालय देखने का कार्यक्रम बना। इस हैरिटेज लोको शेड के बारे मे पहले सुन रक्खा था कि रेवाड़ी  के लोको शेड मे पुराने भाप के रेल इंजिन के साथ उस समय के प्रचलित अन्य रेल उपकरणों का एक म्यूजियम है। गुरुग्राम से लगभग 50 किमी दूर इस मध्यम श्रेणी  शहर मे पहुँचने मे लगभग डेढ़ घंटा लगा। रेल्वे स्टेशन रेवाड़ी के पास स्थित इस भाप के इंजिन की विरासत संग्रहालय को देखने का अनुभव बहुत अच्छा रहा। काफी बड़े क्षेत्र मे फैले  इस लोको शेड का रखरखाब साफ सुथरा और अच्छा था। सोमवार को अवकाश वाले इस म्यूजियम का प्रवेश  शुल्क अलग अलग प्रदर्शनीयों   के लिए अलग अलग था। कुल सौ रुपए के शुल्क के साथ सभी प्रदर्शनी शामिल थी जिसमे बड़े और बच्चों का आकर्षण टोय ट्रेन की सवारी भी शामिल थी। मुझे लगता है रेल, रेल गाड़ी को देखना मेरी तरह ही हर भारतीय का प्रिय शौक रहा होगा। जब बात पुराने भाप इंजिन को देखने को ही तो क्या कहना। लेकिन बात जब देखने के साथ इंजिन मे चढ़ने, देखने वीडियो और फोटो खींचने को हो तो बात सोने पे सुहागा की हो जाती है। रेवाड़ी के इस संग्रहालय इन सभी अभिलाषाओं, इच्छाओं की पूर्ति बड़े ही सहज और सरल ढंग से हो जाती है। जिन लोगों को सवारी गाड़ी मे बैठने के अलावा  कभी इंजिन या माल गाड़ी के गार्ड के डिब्बे को देखने, बैठने, कभी सवारी करने या चढ़ने का मौका नहीं मिला उनकी आकांक्षाओ की पूर्ति बड़ी आसानी से यहाँ हो जाती है क्योंकि इस म्यूजियम मे यहाँ रखे इंजिन मे चढ़ कर आपको  अंदर से इंजिन का अवलोकन कर बारीकी से  देखने की अनुमति है।   

प्रायः हर भारतीय का रेल मे यात्रा करने, रेल स्टेशन पर जाने और रेल यात्राओं के खट्टे-मीठे अनुभवों की एक लंबी फेहरिस्त होगी जिनके स्मरण मात्र से आज भी रोमांचित हुआ जा सकता है। मैंने रेल इंजिन के उस दौर को देखा है जहां भाप के दो तरह के इंजिन हुआ करते थे। इन दोनों तरह के रेल इंजिन को इस संग्रहालय मे फिर से देखना रेल विभाग की अपनी धरोहर और उसके  इतिहास पर दृष्टिपात करना जैसा था। गोल और नुकीले इंजिन को बचपन मे रेल यात्रा करते और देखते बड़ा हुआ। गोल इंजिन को मै दूसरे आयाम की श्रेणी मे रखता था जो मालगाड़ी और साधारण पैसेंजर गाड़ियों मे उपयोग होते थे और अपनी सुस्त और धीमी गति के लिए जाने जाते थे, जबकि नौक दार इंजिन उन दिनों ताज एक्स्प्रेस मे उपयोग होता था शायद ये ही पूर्वाग्रह था जो नुकीले इंजिन को गोल मुंह वाले इंजिन से श्रेष्ठता की श्रेणी मे रखता था। 1893 मे स्थापित रेवाड़ी  भाप इंजिन लोको शेड मे लगभग 100 साल पुराने 13 भाप इंजिनों  को रखा गया है जो कभी भारतीय रेल यातायात मे अपनी  महत्वपूर्ण भूमिका निभाते थे। 2001 मे इस लोको शेड को विरासत श्रेणी का दर्जा दिया गया। यध्यपि  इस लोको शेड के एक बोर्ड पर बॉलीबुड़ और अन्य भारतीय फिल्मों मे इस शेड मे रखे गए इंजिन और उनके फिल्मांकन की फिल्मों के नाम दर्शाये गए है।  पर भारतीय फिल्मों की चकाचौंध से अप्रभावित मेरा दृढ़ मत है कि वास्तविक हीरो तो हमारी विरासत के ये भाप इंजिन ही हैं जिनकी चकाचौंध उन फिल्मी सितारों से कहीं से भी कभी भी कम नहीं हुई। समय की मार ने बेशक फिल्मी सितारों के ग्लैमर और उनकी शक्लों सूरत को विरूपित कर दिया हो पर यहाँ रखे भाप के इंजिन की खूबसूरती और आकर्षण आज भी बरकरार है, जिनको रेल विभाग के रेवाड़ी लोको शेड के सक्षम और कार्यकुशल  प्रबंधन और इंजीनियरों ने इन इंजिन का भलिभांति रखरखाव कर इस को दर्शनीय और जीवंत बनाने मे अपनी क्षमता का प्रदर्शन किया है। रेवाड़ी का लोको शेड प्रबंधन इसके लिए बधाई का पात्र है।

कुछ अद्भुत और अभूझ सूचनाएँ यहाँ पर लगे सूचना पट मे दर्शाई गई हैं। आम बोलचाल की भाषा मे रेल पटरियों के बीच की दूरी का वर्गीकरण का वर्णन "गेज़" के आधार पर करते हैं। सामान्यतः ब्रॉड गेज़, मीटर गेज़, और नैरो गेज़ की चर्चा होती है।  रेवाड़ी के इस लोको शेड मे यह  तकनीकि जानकारी भी प्रदर्शित की गयी है जो सामान्य ज्ञान की दृष्टि से अद्भुत है। एक बोर्ड पर दो पटरियों के बीच की दूरी के आधार पर रेल के वर्गीकरण को पाँच वर्गो मे विभक्त कर  दर्शाया गया है।  एक अन्य बोर्ड पर रेल इंजिन का वर्गीकरण इंजिन मे आगे, बीच मे और पीछे लगे हर छोटे बड़े पहियों की जोड़ी के आधार पर किया गया है जो अद्भुत और निराली जानकारी है। लेकिन यहाँ संचालित टोय ट्रेन की सवारी मे उपयुक्त सवारी डिब्बे और इंजिन का वर्गिकरण और गेज़ अनोखा और बेमिसाल है। ऐसा प्रतीत होता हैं कि हम जैसे बरिष्ठ वयस्क बच्चों की साइकल पर बैठ यात्रा कर रहे हों। इस ट्रेन की बेमिशाल सवारी शायद दुनियाँ मे इकलौती हो। छोटे से क्षेत्र मे प्लेटेफ़ोर्म, ओवर ब्रिज, नदी, क्रोससिंग आदि सब बहुत ही सुंदर तरीके से बनाया गया। छोटे बच्चों, किशोरों  को इस संग्रहालय मे और भी आनंद आयेगा।   

चूंकि उन दिनों उपयुक्त भाप के इंजिन के लिए कोयला और पानी आवश्यक तत्व थे जिनके बिना इंजिन का गतिमान होना असंभव था। कोयले और पानी के भंडार इंजिन के पिछले भाग मे भंडारित कर रखे जाते थे। मै बचपन मे देखा करता था कि कैसे एक सहायक ड्राईवर बेलचे की सहायता  से आवश्यक मात्रा मे पत्थर कोयले को पीछे से इंजिन की भट्टी मे डालते थे। ये एक श्रम साध्य काम था जिसमे बलिष्ठ और सामर्थ्य की आवश्यकता होती थी। इंजिन मे कोयले के भंडार चढ़ाने का कार्य लोको क्षेत्र मे होता था जहां मजदूर कोयले को बांस की टोकरियों मे भरकर एक लंबे पटरे पर चढ़ कर इंजिन के पिछले हिस्से मे डालते थे ताकि रेल की यात्रा मे कोयले की लगातार पूर्ति होती रहे। एक निश्चित दूरी तय करने के बाद हर भाप इंजिन को लोको शेड मे लाया जाता था। लेकिन इंजिन मे भाप के निर्माण हेतु पानी का भंडारण मुख्य स्टेशन के अगले भाग मे बने एक मोटी पानी की पाइप लाईन से होता था। ट्रेन के स्टेशन पर आते ही एक कर्मचारी पानी की इस पाइप लाइन को 90 डिग्री घुमा कर इंजिन की पानी की टंकी को पूरा भरता था। रेवाड़ी की इस लोको शेड मे इसका भी प्रदर्शन किया गया जो अद्भुत है। पुराने सिग्नल का दर्शन भी इस लोको शेड मे किया गया है। सिग्नल यदि 90 डिग्री की दिशा मे सीधा है तो इसका मतलब होता था कि ट्रेन को स्टॉप करो और यदि 45 डिग्री की दिशा मे सिग्नल नीचे होता इसका तात्पर्य होता कि ट्रेन को चलाइए! ये ही दिशा रात्रि मे हरी और लाल लाइट के  रूप मे ड्राईवर का मार्गदर्शन करती थी।

मालगाड़ी के गार्ड का एक आधुनिक डिब्बे का प्रदर्शन भी इस शेड मे किया गया है जिसको देख कर मुझे हार्दिक प्रसन्नता और खुशी हुई। चूंकि मै भावनात्मक रूप से मालगाड़ी के गार्ड के डिब्बे से बहुत ही नजदीक से जुड़ा हुआ हूँ क्योंकि मेरे पिताजी भी रेल विभाग झाँसी मे गार्ड के रूप मे कार्यरत थे। उन दिनों मालगाड़ी के गार्ड के डिब्बे मे सुविधाओ का घोर अभाव था। बैठने के लिये लोहे की चादर की शीट और बैसी ही लोहे की शीट की टेबल। खिड़की तो थी पर काँच की कोई व्यवस्था नहीं होती थी।  गार्ड के डिब्बे मे टॉइलेट का कोई प्रावधान नहीं होता था। जब टॉइलेट नहीं थी तो लाइट और पानी का तो सवाल ही नहीं था। सर्दी की ठंड हो या गर्मी की तपिश या लू। बचाव का कोई इंतजाम नहीं। लेकिन मालगाड़ी के इस डिब्बे मे गार्ड के बैठने के लिये घूमने वाली प्लास्टिक/रैगजीन की कुर्सी दोनों दिशाओं मे देखने हेतु दो  कुर्सी देख कर अच्छा लगा कि तकनीकि ने यात्री की सुवधाओं के साथ रेल्वे ने अपने स्टाफ की सुविधाओं का भी ध्यान रक्खा।  बगल मे टॉइलेट और बाहर और आगे-पीछे देखने के लिये काँच की खिड़की को देख कर रेल विभाग द्वारा न  केवल यात्रियों अपितु अपने स्टाफ के लिये दी  जा रही  सुविधाओं को देख कर सकून का अनुभव हुआ।  

रेवाड़ी रेल संग्रहालय मे एक भाप इंजिन चालित रोड रोलर भी रखा है जो नायाब वस्तु की श्रेणी का है। रेल संग्रहालय मे इंजिन का एक मोडल रक्खा है जो बहुत सुंदर लगता हैं। रेल विभाग मे उपयोग होने वाली टिकिट मशीन जिसमे दिनांक और समय पंच करते थे। रेल गार्ड और ड्राईवर द्वारा उपयोग मे लाये जाने वाले लैम्प, वस्तुओं को तौलने वाली मशीन, ऑफिस टाइप राईटर और कुछ चित्र जिनमे घोड़े और बैलों से चलने वाली रेल दर्शाई गयी  हैं। सुंदर हरे भरे पार्क के बीच इस हैरिटेज लोको शेड को देखना एक सुखद अनुभव था, टॉइलेट और कैंटीन की व्यवस्था भी है पर चाय कॉफी उस दिन उपलब्ध नहीं थी। यदि संभव हो तो अपने परिवार के साथ इसे देखने अवश्य जाना चाहिये।

विजय सहगल                  

                

शनिवार, 10 जनवरी 2026

जगन्नाथ मंदिर ग्राम बेहटा-कानपुर

 

"जगन्नाथ मंदिर ग्राम बेहटा-कानपुर"










बैसे तो मुझे  जगन्नाथ भगवान का मंदिर ओड़ीशा राज्य के पुरी नगर मे होने की जानकारी थी और मुझे वहाँ चार-पाँच बार जाने का सौभाग्य मिला, पुरी शहर और भगवान जगन्नाथ मंदिर के साथ पुरी के समुद्र तट मेरे प्रिय स्थानों मे से एक रहे हैं जहां पर मै  हमेशा जाना पसंद करता हूँ। लेकिन 4 नवंबर 2025 को घाटमपुर के  भीतरगाँव मे गुप्तकालीन मंदिर के दर्शन के दौरान वहाँ के पुरातत्व विभाग के कर्मचारी शाही जी ने मुझे वहाँ से 3-4 किमी दूर स्थित ग्राम बेहटा, कानपुर  मे भगवान जगन्नाथ के मंदिर जाने का आग्रह किया जो भगवान विष्णु के अवतार जगन्नाथ के साथ ब्रह्मा और भगवान शिव को भी समर्पित है।  

इस मंदिर के बारे मे शाही जी ने बताया उक्त प्राचीन मंदिर की एक चमत्कारिक विशेषता भी है कि इस मंदिर से मानसून के पूर्व आने वाले मानसूनी वर्षात की भविष्यवाणी होती हैं इसलिए इसे मानसून मंदिर भी कहते हैं। मंदिर मे भेंट हुई इस मंदिर के पुजारी पीताम्बर वस्त्र धारी पंडित श्री दिनेश  शुक्ला जी से जिन्होने  बतलाया मानसून आने के पूर्व  कानपुर शहर के लोगों के साथ समाचार पत्र और टीवी मीडिया के लोग भी मंदिर के अंदर की  छत्त पर लगे पत्थर पर भरी जून की गर्मी मे भी उभरी पानी की बूंदों के देख कर मानसून के  पहले की जाने वाली भविष्यवाणी देखने और सुनने के लिए भरी संख्या मे इस प्राचीन मंदिर मे एकत्रित होते हैं। मंदिर की छत्त पर जितनी अधिक पानी की बूंदे उभरती हैं मानसून भी उतना अच्छा आता हैं। इस वर्ष पानी की बूंदों से टपकते पानी के संदेश इस बात की ओर इशारा कर रहे थे  कि मानसून मे  बाढ़ के से  हालात आ सकते हैं, और ऐसा हुआ भी।  ये तो रही इस मंदिर से जुड़े मौसम और मानसून से जुड़ी चमत्कार की बात। प्रशासन के लोगो को कहना हैं कि मंदिर से जुड़े इस चमत्कारिक रहस्य जानने के लिये अनेकों बार प्रयास किए गए लेकिन इस रहस्य को नहीं जान सके। लेकिन मौसम की इस भविष्यवाणी को क्षेत्रीय किसान अवश्य लाभान्वित होते हैं।  

11वीं सदी मे निर्मित  मंदिर के वास्तु निर्माण भी अद्व्तिय आश्चर्य जनक है, मंदिर के बाहर और मंदिर के अंदर की वास्तु निर्माण शैली और निर्माण मे प्रयुक्त सामाग्री भी अलग अलग है, क्योंकि ऐसी  बेसर वास्तु शैली साधारणतः मंदिरों मे  देखने को नहीं मिलती। एक विशाल समतल आयताकार चबूतरे पर मंदिर अर्धगोलाकार रूप मे बौद्ध स्तूप जैसी शैली मे मंदिर बना है। प्रायः मंदिर का मंडप मंदिर के ऊपरी भाग का वह हिस्सा होता हैं जो अर्ध गोलाकार गुंबद या पिरामिड की स्टाइल मे ऊंचा होता हैं और आम तौर पर पत्थरों के स्तंभों पर अभिलंबित होता है, पर इस जगन्नाथ मंदिर की विशेषता जो मैंने देखी पूरा मंदिर ही अर्ध गोलाकार रूप मे बना हैं और उक्त गुंबज बिना किसी स्तंभों या दीवारों के आधार के सीधा ही धरातल पर बना है जो गुवाहाटी मे माँ कामाख्या मंदिर जैसा दिखलाई देता है।  मंदिर के प्रवेश द्वार की वास्तु शैली कुछ कुछ ओरछा मे बने महलों के प्रवेश द्वार से मिलती जुलती है जिसे बुन्देली शैली कहा जाता है। (फोटो संलग्न) प्रवेश द्वार या गोपुरम, तत्पश्चात मंडप कक्ष प्रदक्षिणा पथ आदि इस मंदिर मे दिखलाई नहीं देते, सीधे ही अर्ध वल्याकार गुंबज मे ही प्रवेश द्वार के माध्यम से मंदिर मे प्रवेश का प्रावधान है। मंदिर के शिखर पर ध्वज पताका के साथ ही जगन्नाथ मंदिर का प्रतीक चिन्ह धातु से बना अष्ठ फ़लक की  गोल आकृति लगी है जैसा की पुरी के मंदिर मे दृष्टिगोचर होता है। मंदिर की बाहरी दीवारे चूने गारे से बनी प्रतीत होती हैं पर मंदिर का आंतरिक कक्ष पत्थरों से बने पिरामिड की तरह है जो बहुधा उत्तर भारतीय मंदिरों मे दिखलाई पड़ता है। मंदिर का रख रखाब उत्तम था। पूरा परिसर साफ सुथरा दिखलाई दिया जिसे देख कर मन प्रफुल्लित हो उठा। मंदिर परिसर मे प्राचीन कुआं और तालाब भी है।

मंदिर की आंतरिक रचना मे एक छोटा सामान्य आकार का गर्भगृह है जो एक छोटे से दालान से होकर गुजरता हैं।  इस दालान मे मुख्य दरवाजे के अतिरिक्त दायें एवं बाएँ दो प्रवेश द्वार और हैं पर जो स्थायी रूप से बंद है।  मंदिर का आंतरिक निर्माण चारों तरफ बने  कलात्मक पाषाण स्तंभों से बना हैं। मंदिर के गर्भगृह मे एक ढाई-तीन फुट ऊंचे चबूतरे पर काले पत्थरों से बनी  भगवान जगन्नाथ की 5-6 फुट ऊंची प्रतिमा आसमानी रंग की पोशाक मे सुंदर दिखलाई पड़ रही थी। उनके नीचे उसी आसमानी रंग के वस्त्रों से सुसज्जित उनके अग्रज बलदाऊ की छोटी  प्रतिमा है। इस प्रतिमा के चारों ओर समान काले पत्थरों से ही बनी भगवान के दशावतार की प्रतिमाएँ चारों ओर बनी हैं। मंदिर मे बने सामान्य चबूतरे के उत्तरी दिशा मे भगवान शिव की झलारी बनी है और मंदिर के ऊपरी भाग मे भगवान ब्रह्मा जी की प्रतिमा है और स्वयं भगवान विष्णु, जगन्नाथ जी के रूप मे मंदिर के मुख्य देवता के रूप मे विराजमान हैं।

पुजारी जी श्री दिनेश शुक्ल जी ने पुराणों की कथा को उद्धृत करते हुए बताया कि इस मंदिर की स्थापना का काल ओड़ीशा के जगनाथ मंदिर से भी पूर्व का हैं और ये क्षेत्र बड़ा पवित्र और पूज्यनीय हैं क्योंकि जब भगवान शिव देव लोक से साधारण मानवी के रूप मे पृथ्वी लोक पर अवतरित हुए तो उन्होने अपनी दिव्य, दैवीय और आलौकिक शक्तियों को भगवान विष्णु को सुपुर्द किया ताकि संसार का पालन पोषण सुचारु रूप से चल सके। यही कारण है कि भगवान विष्णु जो कि जगत के स्वामी हैं और जिन्हे  जगत के पालन हारे के रूप मे जगन्नाथ कहा जाता हैं। यही वो पवित्र स्थान है जहां भगवान शिव और विष्णु के बीच  दिव्य शक्तियों का आदान प्रदान हुआ था।    

किंवदंतियाँ,  कहावते और कहानियाँ कुछ भी हों पर इस मंदिर की भव्यता, दिव्यता, तेज और गौरव अद्व्तिय है। मंदिर का वास्तु निर्माण और रख रखाव उत्तम होने के साथ ही साथ शांत वातावरण मन को लुभा लेता है। मंदिर के बाहर किसान शिव नाथ, जिस तरह धान की उड़ावनी कर धान को अलग अलग कर  रहे थे वे एक सुंदर, शांत और सुरम्य ग्रामीण परिवेश  उत्पन्न कर रहे थे जो नारायण को नर के रूप मे देखने का सुखद संयोग जैसा प्रतीत हो रहा था।

जय जगन्नाथ!!  

विजय सहगल