"पोतनी
मिट्टी"
आज की नयी पीढ़ी शायद ही मिट्टी के इस नाम से
परिचित होगी। लेकिन झाँसी, बुंदेलखंड के
साठ-सत्तर के दशक या उसके पूर्व जन्मी पीढ़ी का हर व्यक्ति इस पोतनी मिट्टी के नाम
से भलीभाँति परिचित था। गाँव, शहर या कस्बे से
परे पोतनी मिट्टी घर का एक आवश्यक अभिन्न अंग हुआ करती थी। जैसा कि नाम से विदित
है, हल्के पीले रंग की इस मिट्टी से घर आँगन की
पुताई होती होगी? लेकिन ये आंशिक रूप से
सही हो सकता था, पर इसके विपरीत इस
पोतनी मिट्टी का उपयोग रोगाणुमुक्त मिट्टी
के रूप मे घर के हर सदस्य द्वारा, दीर्घशंका
अर्थात शौंच आदि से आने के बाद हाथ धोने या यूं कहें कि मिट्टी को गीला करके साबुन
की तरह हाथ माँजने के लिए करते थे। घर के
एक निश्चित स्थान जो छोटे आले, पत्थर या सूखे
स्थान पर होता था। आजकल की तरह कमरे मे ही अटैच लैट्रीन/बाथरूम तो होते नहीं थे
और न ही शौञ्च के बाद साबुन से हाथ धोने का चलन था।
शौंचालय प्रायः घर के बाहर एकांत मे होते
थे। मेरे घर के मुख्य प्रवेश द्वार से शौचालय लगभग 400 फुट दूर था। रात मे यदि
शौंच की आवश्यकता हुई तो घर का कोई बड़ा सदस्य साथ न हो तो शौच तो होने से रहा?
उन दिनों घरों मे भी बिजली नही थी तो घर से दूर शौचालयों मे क्या होती?
घर से तीन आँगन पार जब घुप्प अंधेरे से सामना होता तो घिग्घी बंध जाती,
हमेशा ये ही अंदेशा बना रहता कि कहीं कोई भूत,
पिशाच शौचालय के आने के पूर्व ही कहीं कोई रायता न फ़ैला दे!! इसलिए फटाफट!!,
जल्दी मिट्टी के तेल का दिया, लालटेन या
मोमबत्ती लेकर, लैट्रीन की ओर भागते कि
कोई हास्यास्पद स्थिति न बनने पाये?
उन दिनों पोतनी मिट्टी को घर घर पहुंचाने के
लिए एक कुम्हार गधे की पीठ के दोनों ओर समान
रूप से, रस्सी की जालियों मे
भरकर बेचा करते थे।आवाज लगते हुए कुछ इस अंदाज मे बोलते- पोतनी मिट्टी ले-लो sssss...पोतनी
मिट्टी........। छोटी फ्रूट ट्रे के आकार की तीन टोकरी भरके पोतनी मिट्टी की कीमत 10 पैसे मे मिला करती थी। कुछ मोल-भाव
करके चार आने या -आठ आने की मिट्टी को एक
टीन के खाली कनस्तर मे भरके रख दिया जाता था। हम जितने "स्यानपन" पैसे
के मोल भाव मे करते,
कुम्हार भी हमसे ज्यादा चालाकी से मिट्टी मे कंकर-पत्थर का लेप लगा मिट्टी के साथ
अनुपयोगी कंकड़-पत्थर भर देता जिस पर कई बार कहा-सुनी भी होती थी।
पोतनी मिट्टी से भरे कनस्तर से आवश्यकतानुसार
थोड़ी-थोड़ी मिट्टी को लेकर उपयोग मे लाया जाता था। चूंकि उन दिनों शौचालयों मे पानी
की उपलब्धता तो होती नहीं थी, तो लोटे मे पानी
लेकर जाना पड़ता था। शौच से आने के बाद पोतनी मिट्टी से हाथों को धोने के साथ साथ लोटे को भी रगड़-रगड़ के माँजा और धोया जाता था। जब कभी छोटे आले या
तक्खे मे रखी मिट्टी समाप्त हो जाती तो हमे सीधे कनस्तर से दो मुट्ठी पोतनी मिट्टी
लाने की इजाजत नहीं थी। झूठे-जूंठे/सुच्चे
के छुआ छूट के भावों कारण कनस्तर को छूने की मनाही थी। किसी दूसरे व्यक्ति से ही,
कनस्तर से मिट्टी मँगवा कर छोटे आले मे रक्खी
जाती थी। इसका मुख्य कारण पोतनी मिट्टी से रोज चूल्हे की लिपाई जो होती थी। उसी कनस्तर से
पोतनी मिट्टी के एक हिस्से को एक अलग वर्तन मे हमेशा पानी से भिगो के रक्खा जाता
था और मिट्टी के उसी तरल लेप से चूल्हे को रोज भोजन बनने के पश्चात लीप दिया जाता था। चूल्हे की गर्मी से उक्त लेप,
कुछ ही मिनटों मे सूख कर चूल्हे को एक नयी
चमक और नया रूप दे जाता और चूल्हा ऐसे
दिखाई देता जैसे रंगाई-पुताई के बाद घर नया-नया सा दिखाई देता हो। कई बार ऐसी स्थिति बनती कि
शौच के बाद कनस्तर से पोतनी मिट्टी लाने वाला कोई न दिखाई देता तब लोगो की नज़रों से बचके,
चुपचाप एक मुट्ठी पोतनी मिट्टी कनस्तर से खुद ही उठा कर आले मे डाल देता। बैसे
गाँव देहात मे कच्चे मिट्टी के घरों को आज भी पोतनी मिट्टी से पोता जाता है जो दिखने
मे आकर्षण पैदा करते है और घर भी अंदर से ठंडे रहते हैं,
लेकिन पोतनी मिट्टी की उपलब्धता भी न के बराबर और महंगी हो गयी है।
उन दिनों हिंदुस्तान लीवर कंपनी के दो साबुन
उत्पाद खूब मशहूर हुए। सन लाइट जो कपड़े धोने का साबुन था और लाइफ बॉय साबुन जिसका
इस्तेमाल नहाने, स्नान करने मे किया
जाता था। सिनेमा घरों, समाचार पत्र और
पत्रिकाओं मे उसके विज्ञापन "लाइफ बॉय है जहां,
तंदरुस्ती हैं वहाँ......" छाए रहते थे। सनलाइट और लाइफबॉय के अलावा शेष साबुन
के ब्रांड विलासता की श्रेणी या उसके नजदीक ही थे। अनेकों साल तक नहाने के दौरान लाइफ बॉय साबुन का
पानी आँखों मे छू भर जाने से,
उत्पन्न हुई जलन के बावजूद घरों मे इस्तेमाल होता रहा पर स्वच्छता की प्रति
जागरूकता के कारण, धीरे धीरे शौचालय के
पश्चात पोतनी मिट्टी से हाथों की सफाई की परिपाटी बंद होने लगी और पोतनी मिट्टी का
स्थान घर मे स्नान के बाद बची साबुन की पतली छोटी खपच्चियों ने ले लिया। पर घिसे-घिसाए साबुन को कब तक और कितना घिसा जा
सकता था। अंततः लाइफ बॉय साबुन ने,
पोतनी मिट्टी और साबुन की बची हुई खपच्चियों का स्थान ले लिया। समाज की आर्थिक
प्रगति के कारण बाज़ारों मे हमाम, रेक्सोना,
नीम और लक्स जैसे साबुन के नए-नए उत्पादों के कारण भी लाइफ बॉय साबुन को अघोषित
तरीके से टट्टी का साबुन घोषित कर दिया,
जो साबुन मे तमाम परिवर्तनों, विज्ञापनों के
बावजूद अब तक जारी है।
कालांतर मे पोतनी मिट्टी की स्थिति मे सुधार
हुआ और नयी पीढ़ी के बच्चों ने उस अछूत पोतनी मिट्टी के गाढे
पेस्ट को मुंह मे लगाकर फ़ेस पैक के
रूप मे इस्तेमाल करना शुरू कर, चेहरे पर निखार
लाना शुरू कर दिया। बाबा रामदेव ने पोतनी मिट्टी को सौन्दर्य उत्पाद की श्रेणी मे
स्थापित कर एक नयी पहचान दिलाने मे महत्वपूर्ण भूमिका निभायी। लेकिन लाइफ बॉय
साबुन की ऐसी दुर्गति हुई कि वह "टट्टी के साबुन" की अपनी पहचान को
तोड़ने मे नाकामयाब रहा और आज तक "टट्टी
के साबुन" की अपनी शिनाख्त से
बाहर न निकल सका। आज भी यदि हम अपने घर मे लाइफ बॉय साबुन की नयी बट्टी से
नहा लें तो घर मे सभी लोग ऐसी हिकारत और
तिरिस्कार की नज़र से देखेंगे मानों हमने,
उपयोग मे ला रहे लैट्रीन के साबुन से नहा लिया हो!!
विजय सहगल




7 टिप्पणियां:
सहगल साहब आपका जबाब नहीं आपने बड़े सुंदर शब्दों में पोतनीं मिट्टी के इतिहास तथा इसके वर्तमान स्वरूप से परिचित कराया ।
सही है समय के साथ बदलाव आया है पर आप इतने अच्छे से विवरण कर हमें उस समय में ले जाते हैं बचपन की पुरानी यादें ताजा हो जाती हैं
बहुत बढ़िया। बचपन के कुछ नजारे सामने आ गये
Sehgal ji ye lekhan se Hindi padne ka mouka Mila, bahaut koshish kar ke aada pade, phir be aap ka abinandan
Hanumantha Reddy Hyderabad
सच आज 40साल पहले झांसी में हमारे घर में भी पोतनी का इस्तेमाल होते हुए देखा हे
Sehgal ji , yah lekh dalkar aapane sachmuch bachpan ki yadon ko taja kar diya. Aap ka prayas bahut hi sarahneey hai. Asha hai ki aap bhavishya me hum logo ko aise hi nai nai jankariyo se avgat karayeng
*आपने पोतनी अर्थात पीली मिट्टी के विषय का साहसिक चयन कर सचमुच चौंका दिया और पुराने दिनों की यादें ताजा कर दी।*
*चूल्हे को लीपने से लेकर थोडा़ गोबर मिलाकर आंगन लीपने तक पीली मिट्टी का योगदान महत्वपूर्ण था। दूरदराज गांवों-कस्बों में आज भी पीली मिट्टी की उपयोगिता अब भी प्रासंगिक है।*
*साथ ही आपने सनलाइट व लाइफ़ब्वाय साबुन का जिक्र किया है। प्रमुख रुप से बहुतायत में कपड़े धोने के लिए सनलाइट साबुन व हाथ धोने-नहाने के लिए लाइफब्वाय साबुन का प्रचलन था।*
*ऐसे अछूते विषय को चुनने,उस पर जानकारियां जुटाना और फिर कलमबद्ध करना प्रशंसनीय है।*
🌹🌹🙏🌹🌹👍👍👍
सुरेन्द्र सिंह कुशवाहा, ग्वालियर
एक टिप्पणी भेजें