शुक्रवार, 5 अप्रैल 2024

ईवीएम (इलेक्ट्रोनिक वोटिंग मशीन) से रार

 

"ईवीएम (इलेक्ट्रोनिक वोटिंग मशीन) से रार"



आज जबकि 2024 के लोकसभा चुनावों की घोषणा हो चुकी हैं काँग्रेस सहित देश के तमाम राजनैतिक दलों ने इलेक्ट्रोनिक वोटिंग मशीन की विश्वसनीयता पर पुनः सवाल उठाने शुरू कर दिये हैं। 1999 से लगातार चुनाव आयोग द्वारा इलेक्ट्रोनिक वोटिंग मशीन का उपयोग लोकसभा निर्वाचन और राज्य की विधान सभाओं के निर्वाचन मे किये जाने और  इस दौरान वोटिंग मशीन मे कोई भी गड़बड़ी न पाये जाने के बावजूद भारत के विपक्षी दलों द्वारा ईवीएम पर शक और संशय उस कहावत को चरितार्थ करता है कि "अंधा बांटे रेबड़ी और चीन चीन के देय"!! अभी 2023 मे कुछ राज्यों मे हुए मतदान पर काँग्रेस हिमाचल और तेलंगाना राज्य के चुनावों मे ईवीएम पर  प्रश्न नहीं उठाती  जहां पर इनकी सरकारें निर्वाचित हुई हैं सवाल और संदेह छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और राजस्थान  राज्यों की वोटिंग मशीन पर है जहां पर इन्हे बुरी तरह मुँह की खानी पड़ी और सत्ता से वंचित होना पड़ा। एक बार फिर से काँग्रेस सहित इंडि गठबंधन के अन्य सदस्यों ने मुख्य निर्वाचन आयुक्त द्वारा 16 मार्च 2024 को लोकसभा चुनाव की पृक्रिया के घोषणा के साथ ही इलेक्ट्रोनिक वोटिंग मशीन से मतदान पर संदेह उठा कर इसकी  जगह मत पत्रों से चुनाव कराने की मांग शुरू कर दी है।

यूं तो काँग्रेस के वरिष्ठ नेता और मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्य मंत्री श्री दिग्विजय सिंह इंजीनियरिंग विषय से स्नातक  है पर उनका  ये कथन कि उन्हे ईवीएम पर भरोसा नहीं, वे 2003 से ही मांग कर रहे हैं कि चुनावी मतदान ईवीएम की जगह मत पत्रों से किया जाय? उनका मानना है कि किसी भी चिप वाली मशीन को हैक किया जा सकता है? उनका ये ज्ञान और  कौशल ने   विज्ञान और तकनीकी विषय पर बड़ा सवालिया निशान लगाया  है। बसपा से  अमरोहा के सांसद 2019 मे स्वयं वोटिंग मशीन से हुए चुनाव मे जीते लेकिन ईवीएम के बारे मे बारे मे लंबे समय से उठाए जा रहे सवाल के समर्थक हैं।  

ये बात भी उतनी ही सही है कि 2009 मे जब केंद्र मे काँग्रेस की सरकार थी भारतीय जनता पार्टी के नेता श्री लाल कृष्ण अंडवाणी ने कई राज्यों मे चुनावी हार के बाद ईवीएम पर सवाल किये। इसी तरह 2014 मे जब भाजप रिकार्ड मतों से चुनाव जीती तो असम के तत्कालीन काँग्रेस मुख्यमंत्री ने सबसे पहले ईवीएम पर शंका जाहीर की। 2017 मे आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल ने तो ईवीएम पर चुनाव आयोग को घेरा, उनके विधायक सौरभ भारद्वाज ने ईवीएम को खुले आम हैक का डेमो दिया पर चुनाव आयोग की चुनौती का सामना न कर सके। 2017 मे उत्तर प्रदेश के विधान सभा के चुनावों मे हार का मुँह देखने के बाद बसपा सुप्रीमो मायावती और सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने भाजप की जीत के लिए ईवीएम मे छेड़-छाड़ को ठहराया। 2017 मे ही गुजरात के विधानसभा चुनावों के नतीजों के पूर्व ही राजनीति मे नए नए आए पाटीदार नेता हार्दिक पटेल ने तो भाजप की जीत का श्रेय ईवीएम को देने का हल्ला ज़ोर शोर से उठाया। नेशनल कॉन्फ्रेंस के श्री फारुख अब्दुल्ला ने ईवीएम को चोर कह कर सवाल उठाया? ये सभी राजनैतिक दल देश को क्या आदिमानव युग मे ले जाना चाहते है?

विभिन्न राजनैतिक दलों के नेताओं के आरोपों के जबाब मे चुनाव आयोग द्वारा  सभी दलों को मई 2017 मे अपने दावों को साबित करने तथा वोटिंग मशीन को हैक करने की खुली चौनौती दी। 12 मई 2017 को ईवीएम के बारे मे मिली शिकायतों के संबंध मे आयोजित सर्वदलीय बैठक के बाद चुनाव आयोग ने खुली चुनौती देते हुए मई माह के 10 दिनों तक किसी भी राजनैतिक दल, उसके विशेषज्ञ, इंजीनियर या तकनीशियन  को मशीन हैक करने के प्रदर्शन करने का खुला आमंत्रण दिया यही नहीं  चुनाव आयोग ने मशीन को खोलकर उसमे काँट-छाँट कर छेड़-छाड़ कर के हैक करने की चुनौती दी। इस हेतु 12 विधान सभाओं मे इस्तेमाल की गयी 14 मशीनों को हैक करने के लिए उपलब्ध कराया था।  लेकिन चुनाव आयोग की इस चुनौती को स्वीकार करने के लिए काँग्रेस सहित ज़्यादातर राजनैतिक दल तैयार नहीं हुए हाँ, दो दलों, एनसीपी और सीपीएम  ने चुनौती तो स्वीकार की पर हैक करने मे अपनी अक्षमता और असमर्थता प्रकट की।

जब सपा और अनेक राजनैतिक दल ईवीएम मे किसी भी तरह की गड़बड़ी पकड़ने मे असफल रही तो अब ईवीएम मशीन के स्टोर करने, स्ट्रॉंग रूम मे रखने की प्रिकरिया पर ही सवाल शुरू कर दिये। अभी तक हर जिले की कुछ ईवीएम  मशीनों पर वीवीपीएटी अर्थात  मतदाता द्वारा प्रमाणित मत पत्र पर्ची का मिलान ईवीएम मशीन से कराये जाने का प्रावधान चुनाव आयोग द्वारा किया जाता हैं। पिछले चुनावों मे इन मत पत्र पर्ची का मिलान ईवीएम मशीन के मतदान आंकड़ों से 100% तक सही पाया गया लेकिन विपक्षी दलों का 100% ईवीएम मशीन के आंकड़ों का मिलान वीवीपीएटी से कराने की मांग बेतुकी और अव्यवहारिक है क्योंकि तब चुनावी प्रिक्रिया  मे मशीन के आंकड़ों और मतदान पर्ची दोनों से ही मतदान की गिनती कराई जाएगी अर्थात वही पुरानी प्रिक्रिया जो कि काफी समय लेनी वाली प्राचीन चुनावी कार्यप्रणाली ही होगी।

छत्तीसगढ़ राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री, काँग्रेस के श्री भूपेश बघेल ने तो नकारात्मकता की सभी हदें पार करते हुए अपने दिमागी खुरफ़त का भौड़ा प्रदर्शन करते हुए कुछ दिन पूर्व कांकेर मे अपने कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए एक नई तरकीब को उजागर किया। उन्होने कार्यकर्ताओं से आवाहन किया कि लोकसभा 2024 के चुनाव मे हर लोकसभा क्षेत्र से 384 से ज्यादा नामांकन दाखिल करें क्योंकि ऐसा करने से चुनाव मत पत्रों से किया जाएगा! क्योंकि ईवीएम की अधिकतम क्षमता सिर्फ 384 उम्मीदवार को ही वोटिंग मशीन मे समाहित करने की क्षमता हैं। श्री भूपेश बघेल ने क्या अपनी  इस सनक, बावलेपन और उन्मादी मानसिकता से लोकतन्त्र को बेपटरी करने कुत्सित प्रयास नहीं माना जाना चाहिये? क्या देश को मानना चाहिये कि यही काँग्रेस की विध्वंसकारी  सोच और मानसिकता है? क्या आज के आधुनिक तकनीकी और  कम्प्युटर युग मे इस तरह की नकारात्मक सोच और मानसिकता को स्थान दिया जाना उचित है? क्या ऐसी अविवेकशील और अतार्किक सोच के राजनैतिज्ञों को सत्ता मे लाना उचित है? क्या इस मानसिकता के लोग देश को विकास के पथ ले जाने मे सक्षम होंगे? ये विचारणीय प्रश्न हैं। आइये इस विषय मे विचार मंथन कर अपना मतदान करें।

विजय सहगल           

    

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