"आधिकारी आवास
गृह"
आज
16 सितम्बर 2023 को अपने सुबह की सैर के दौरान जब मैं हैदराबाद विश्व विध्यालय के
सामने स्थित स्टेट बैंक के विशाल परिसर मे स्थित सुंदर, साफ-सुथरे
और हरियाली से आच्छादित अधिकारी आवास गृह के
सामने से निकला तो मुझे अपने बैंक के अधिकारी आवास गृहा, भोपाल की याद हो आयी। उन दिनों तत्कालीन ओरिएंटल बैंक
ऑफ कॉमर्स के कुछ अधिकारी आवस, भोपाल स्थित अरेरा कॉलोनी मे
थे शायद उनकी संख्या 8-9 थी। परिसर छोटा पर सुंदर और जिसका रखरखाव काफी अच्छा था।
अधिकारी आवास प्रादेशिक प्रबन्धक, भोपाल के अधीन था और आवासीय परिसर मे बैंक के अधिकारियों
हेतु आवास का आवंटन, प्रादेशिक प्रबंधन के ही अधिकार क्षेत्र मे था।
2010-11 तक, आवासीय परिसर का आवंटन प्रादेशिक कार्यालय के वरिष्ठ अधिकारियों, प्रादेशिक निरीक्षालय और कर्मचारी प्रशिक्षण विध्यालय के प्रमुखों के
अतिरिक्त भोपाल के वरिष्ठतम् अधिकारियों को आवंटित करने की ही प्रथा थी। लेकिन उन दिनों राष्ट्रीय
स्तर पर अधिकारी और कर्मचारी संघों के बीच आपसी वैमनस्य और प्रतिद्वंद्ता चरम सीमा
पर थी। अधिकारी और कर्मचारी नेतृत्व के
इसी आपसी घृणा और नफरत के चलते धीरे-धीरे प्रबंधन ने बैंक को एकतरफा तरीके
से चलाने की एक तरह से खुली छूट हांसिल कर ली। इसके दुष्परिणामों को बैंक के विभिन्न शाखाओं और
कार्यालयों के माहौल को तत्कालीन स्टाफ ने
देखा और महसूस किया होगा।
2011-12
मे एक सहायक महाप्रबंधक स्तर के अधिकारी
की प्रादेशिक कार्यालय, भोपाल मे पदस्थपना के पश्चात कार्यालय की कार्य सांस्कृति और माहौल का
जितना क्षय, पतन और ह्रास हुआ वैसा पहले कभी नहीं देखा गया।
कुछ आर्थिक कदाचार की अपुष्ट काना फूसी भी
सुनाई दी गयी थी। संस्था के प्रति निष्ठा और समर्पण का स्थान उच्च
अधिकारियों की चापलूसी, चाटुकारता और ठकुर सुहाती ने ले ली थी। जहां एक ओर चुन चुन कर निष्ठावान
अधिकारियों और कर्मचारियों को ईर्ष्या और द्वेष भावना के चलते प्रोन्नति से वंचित
कर असमय, दूर दराज़ स्थानातरण किया गया वही कुछ कुपात्र,
दीर्घसूत्री और भ्रष्ट अफसरों को
प्रोन्नतियाँ भी दी गयी। कुछ ऐसी ही अनैतिकताएँ अधिकारी आवास के आवंटन मे भी हुई।
यध्यपि मैंने कभी अरेरा कॉलोनी स्थित कामायनी परिसर मे कभी बैंक के आवास की इच्छा जाहिर तो नहीं की थी, पर मेरे आवेदन को दरकिनार कर एक ऐसे
अधिकारी को आवास आवंटित कर दिया जो कार्यालय
मे वरिष्ठता क्रम मे सबसे निचले क्रम मे था पर प्रादेशिक प्रबन्धक को आवासीय परिसर
के आवंटित करने को मिले विशेषाधिकार को कौन
चुनौती देता? मै ऐसे
आवसीय परिसर मे बैंक अधिकारियों की
मानसिकता से और परिसर के माहौल से भलीभाँति परिचित था इसलिये इन परिसरों मे मनाए जाने
वाले नव वर्ष, होली और दिवाली मिलन कार्यक्रम मे कभी शामिल नहीं
हुआ। यदि आप किसी एक अधिकारी के घर अपने पारवारिक सम्बन्धों के चलते सहज भले मे
मिलने चले गये तो अन्य सभी घरों से निगाहें आपके उपर घूर रहीं होती हैं कि यह स्टाफ
हमारे घर मिलने क्यों नहीं आया? अगले अन्य अधिकारियों के अपरोक्ष कटाक्ष आपकी, "कार"
को परिसर मे देखे जाने की चर्चा ऐसे करेंगे कि वे आपके आने से अंजान हों? हर एक गुट आपकी परिसर मे उपस्थिति के बारे मे काना-फूसी कर आने के उद्देश्य मे षड्यंत्र की बू को सूंघेंगे!! अधिकारियों की वरिष्ठता के स्केल तो समझ आते है पर
इन आवासीय परिसरों मे अधिकारियों की
घरवालियों मे समानता के भाव से विलग अपना मान सम्मान उनके पतियों के पदानुरूप देना की अपेक्षा
भी करेंगे। आपकी पत्नी के आचार-विचार या
व्यवहार से मेमसाहब की शान मे थोड़ी भी उंच-नीच या गुस्ताख़ी हुई या वरिष्ठता के मान
सम्मान का ध्यान नहीं रक्खा गया तो कार्यालय मे उस अधिकारी के व्यवहार मे भी आपको
परिवर्तन देखने को मिल जाएगा। गुट-बाजी होना आम बात थी। रहने वाले परिवारों की पहचान नाम से
नहीं अपितु बंगला नंबर से होती है। महिलाओं की शाम की बैठक मे होने वाली राजनीति
से जब नौकरी के बाद, घर आए पति को, दिन
भर के फीड-बैक से पाला पड़ता तो बेचारे को अगली सुबह को कार्यालय मे सामंजस्य
बैठाने की चिंता सताने लगती। राजमहलों के षड्यंत्र जैसा हाल उन दिनों उस परिसर मे था।
दुर्भाग्य से प्रसाशनिक कार्यालयों मे आप
निर्गुट तो रह ही नहीं सकते!! सिर्फ और सिर्फ कार्यालय प्रमुख की जी हजूरी वाले
गुट से अलग आपका कोई अस्तित्व ही नहीं रह जाता!! आपकी बुद्धि, ज्ञान, कौशल
और योग्यता कितनी भी अच्छी क्यों न हो!!, कार्यालय प्रमुख की
जी हजूरी और चापलूसी के बिना निरर्थक थे। एक से एक निष्प्रयोज्या, गैर निष्पादन कारी और दीर्घसूत्री अधिकारियों को अपने चापलूस रूपी सिर्फ
एक सूत्र के बलबूते मैंने मटरगस्ती और मौज करते हुए कार्यालयीन षडयंत्रों मे शामिल
होते और पीठ पीछे निंदा करते हुए देखा।
इस
अधिकारी आवास मे अमानवीयता, अनैतिकता और अधम सोच की
पराकाष्ठा तो तब हुई जब संघटन से जुड़े एक वरिष्ठ अधिकारी की पत्नी के आकस्मिक देहावसान पर बैंक के आवासीय परिसर के
सारे स्टाफ के परिवार भी, अंतिम संस्कार मे शामिल नहीं हुए!!
मानवीय संवेदनाओं का ऐसा बेरहम, निर्दयी, निर्जीव मृतप्राय और कुटिल पतन कदाचित
ही मुझे देखने को मिला!! मानवता को
शर्मसार करने वाली ऐसी घटना मैंने पहले कभी नहीं देखी!! एक ही संस्थान मे वर्षो से
साथ मे कार्यरत और एक दूसरे से पारवारिक रिश्तों के बावजूद,
संकट की ऐसी घड़ी मे हम यदि चंद मिनटों के लिये भी अपने साथी की पत्नी के
आकस्मिक देहावसान जैसे दारुण दुःख मे सहभागी न हो सकें तो धिक्कार है
हमे अपने होने पर?
एक
दूसरे के घरों मे ताका-छांकी की अधम सोच की ऐसी पराकाष्ठा थी कि यदि कोई अधिकारी 7-8
दिन के अवकाश पर घर से बाहर गया तो बैंक द्वारा अधिकारी के आवास पर मिलने वाली समाचार पत्रों के बिल की प्रतिपूर्ति
मे से 7-8 दिन का पैसा कट लिया जाता भले ही
उसके घर समाचार पत्र लगातार आता रहा हो। एक अधिकारी तो मुझ से इसलिये रूठ गए क्योंकि
मैंने धमतरी शाखा से 40 किलो की चावल बोरी को भोपाल लाने से मना कर दिया। प्रादेशिक
कार्यालय और प्रादेशिक निरीक्षालय एक ही परिसर मे होने के बावजूद निरीक्षालय के स्टाफ
को एक दूसरे से आत्मीयता प्रकट करने मे अपरोक्ष रूप से रोका जाना अधम सोच और घटिया
मानसिकता को परिलक्षित करता था जो बड़ा वेदना और कष्टदायक था।
ओबीसी
के अवसान मे सरकार और प्रबंधन से अपेक्षा तो व्यर्थ थी, पर बैंक के
समस्त स्टाफ की आशाओं और उम्मीदों पर बैंक
के अधिकारी और कर्मचारी संगठन के तत्कालीन
नेतृत्व से अपने अहम, अहंकार दंभ को त्याग कर एक साथ संगठित हो
कर बैंक के अस्तित्व को बचाने के लिए संघर्ष करने की अपेक्षा पर भी ये नेता खरे उतरे? क्या दोनों संगठन के शीर्ष नेतृत्व, अपने
स्वार्थों और निजी लाभ के के कारण बैंक के मर्जर के लिए उत्तरदायी नहीं थे? ये एक बड़ा सवाल हैं, जिस पर विचार मंथन अवश्य होना चाहिए?
विजय
सहगल



3 टिप्पणियां:
Sehgal ji you have presented the factual position and it was the same all over India in our so called OBC family. In fact, the people like us have no existense. I was threatened by the Regional Head to be trsnsferred to Madhya Pradesh so many times while I was posted in R.O. Chandigarh. But I did not cared neither T.O. nor Union who were in collusion with the management. Anyhow, we have spent good time in the bank on the strength of our competency and hard work and nobody dared to transfer me thereafter as I have superannuated from R. I. Chandigarh in 2016.
🙏🏻🙏🏻🌹🌹
I S Kadiyan Chandigarh
आपकी उल्लेख बहुत सही है। यूनियन की गुटबाजी एवं स्वार्थ उच्च अधिकारियों की महात्वकांक्षी स्वभाव बैंक की शान एवं शाख को खतम करने का कारण रहा। ईमानदार अधिकारियों को मुश्किलों का सामना करना पड़ा।
आर आर पैरी विशाखापट्टनम
सहगल जी ओबीसी के अंदर चरम तक गुटबाजी पढ़कर ह्रदय दहल गया। आपसी घृणा मानव का इगो जन्य दुखदायी भाव है और प्रेम की अपेक्षा तीव्र धावक है और इसमें उत्तरोत्तर वृद्धि हो रही है और अब व्यापक हो चला है।
आनंद, सेवानिवृत्ति डिप्टी कलेक्टर, रायपुर
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