शुक्रवार, 22 दिसंबर 2023

राज्यसभा के सभा पति का अपमान

 

"महामहिम उपराष्ट्रपति एवं राज्यसभा के सभा पति  का अपमान"





लोकतन्त्र मे राजनैतिक दलों और व्यक्तियों मे मतभिन्नता और मतांतर होना साधारण और स्वाभाविक हैं और होना भी चाहिये पर अपने बोलने की "अभिव्यक्ति की आज़ादी" का उपयोग अपने विरोधी की भावनाओं, स्वाभिमान और सम्मान को ठेस पहुंचाये बिना शालीनता और विनम्रता से व्यक्त करना चाहिये। संवैधानिक पदों, क़ानूनों का सम्मान करना, हर नागरिकों का उत्तरदायित्व हैं, तब विधियाका के चुने हुए सदस्यों की तो अतिरिक्त ज़िम्मेदारी बनती हैं कि संवैधानिक नियमो और विधि सम्मत कार्यों को अपने आचरण मे ला कर देश के नागरिकों के समक्ष एक उत्तम उदाहरण रक्खे। परंतु देश का दुर्भाग्य हैं कि सभी राजनैतिक दलों के नेतृत्व कारी नेता चाहते हैं कि उन्हे और उनके दल के सदस्यों को छोड़कर सभी लोग नियम कानून का पालन करें। उनपर कोई कानून लागू न हो। आर्थिक अपराधों, भ्रष्टाचार और बेईमानी के लिए देश की स्वतन्त्रता के बाद से अब तक राजनैतिक दलों मे ये अलिखित सहमति थी कि भ्रष्टाचार और घोटालों पर वे कभी एक दूसरे के विरुद्ध कोई कार्यवाही नहीं करेंगे, जिसके दुष्परिणाम आज देखे जा रहे हैं। यही कारण हैं कि आज जब 350 करोड़ के घोटाले पकड़े जाते हैं, तब भी यही कहा जाता हैं कि सरकार दुर्भावना और बदले की कार्यवाही कर रही हैं।

ऐसा नहीं हैं कि आज से पूर्व सांसदों का निलंबन नहीं हुआ था। इससे पहले 15 मार्च 1989 को लोकसभा के 63 सांसदों का निलंबन इंदरा  गांधी हत्याकांड की जांच आयोग की रिपोर्ट संसद के पटल पर रखने की मांग पर हुआ था। इस वर्ष 2023 मे नयी संसद मे प्रवेश के पूर्व सभी राजनैतिक दलों ने आपसी सहमति से ये नियम स्वीकार किया था कि सभी सदस्य अपने विरोध करते हुए संसद के आंतरिक घेरे मे या सभापति की आसिन्दी के निकट  पोस्टर, बैनर झंडे आदि लेकर नहीं जाएंगे। जब सर्वसम्मति से ये नियम बनाया गया तो इसका अनुपालन क्यों नहीं होना चाहिये था। 14 दिसम्बर को 13 सांसदों का निलंबन हुआ था। इस घटना को विपक्ष ने अपनी प्रतिष्ठा का प्रश्न बना, सुनियोजित ढंग से संसद की सुरक्षा पर गृह मंत्री के ब्यान की आढ़ लेकर जान बूझ कर हटी रुख अपनाते हुए, अपने ही बनाए अनुशासन को भंग कर, सभापति को निलंबन जैसे कठोर निर्णय लेने को मजबूर किया। इसी क्रम मे आगे 33 और अब तक 143 सांसदों का निलंबन हो चुका हैं। इस विषय मे सरकार द्वारा पहले ही स्पष्ट किया जा चुका है कि जब लोकसभा अध्यक्ष के अधिकार क्षेत्र मे हुई इस घटना के जांच के आदेश माननीय ओम बिड़ला जी द्वारा दिये जा चुके हैं,  तब जांच रिपोर्ट के आये बगैर सरकार दूसरी जांच या उस पर वक्तव्य  कैसे दे  सकती हैं? जब विपक्ष द्वारा अनुशासन की अनुपालना सुनिश्चित नहीं की गयी तो फिर विपक्ष की मांग के लिए सरकार को भी कैसे मजबूर किया जा सकता हैं?           

दिनांक 19 नवम्बर 2023 को संसद भवन के प्रवेश द्वार पर, विपक्ष के सांसदों द्वारा लोकसभा और राज्य सभा के 141 सदस्यों के निष्कासन के विरोध प्रदर्शन के दौरान एक अशोभनीय, अफसोस जनक और शर्मनाक घटना घटी, जब तृणमूल के लोकसभा सांसद कल्याण बैनर्जी द्वारा  अन्य सांसदों के समक्ष भारत के उपराष्ट्रपति और राज्यसभा के सभापति श्री जगदीप धनखड़ की नकल और स्वांग करते हुए उनका मखौल और मज़ाक उड़ाया। खेद और अफसोस तो इस बात का हैं कि कल्याण बैनर्जी के इस भौड़े, भद्दे और बेहूदे नाटक मे विपक्ष के अनेकों सांसदों के साथ आरजेडी सांसद मनोज झा एवं अपने विचित्र और विलक्षण वक्तव्यों और अजीब, अनोखें   व्यवहार से स्वयं अपने आपको और काँग्रेस को संकट मे डालने वाले माननीय सांसद  राहुल गांधी भी कल्याण बैनर्जी की अधम और निम्न स्तरीय मिमिक्री मे उनकी  हौसला अफजाई,  तालियाँ बजा कर, हंस-और मुस्कराकर, कर रहे थे। यही नहीं कल्याण बैनर्जी की इस बेहयाई, धृष्ट और शर्मनाक कृत को राहुल गांधी द्वारा रोकना तो दूर स्वयं वीडियो बनाकर इस कुकृत्य को बढ़ावा देना और इसमे सहभागिता, न केवल अपतिजनक हैं बल्कि  निंदनीय भी हैं।       भारतीय लोकतन्त्र के तीन पवित्र  स्तंभों मे से एक "विधायिका" के दूसरे सबसे बड़े  संवैधानिक पद "उपराष्ट्रपति" का, संसद के प्रवेश द्वार के बाहर इस तरह खुले आम उपहास उड़ाना न केवल संविधान अपितु देश की 140 करोड़ जनता का अपमान हैं। ये तो सरासर "चोरी और सीना जोरी" हैं!! इस पापकर्म मे प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से संलिप्त लोगो की   जितनी भी  आलोचना और निंदा की जाय कम हैं। इसके पूर्व भी कॉंग्रेस और विपक्षी दलों ने एक अवसर पर प्रधानमंत्री जी के अभिवादन के प्रत्युत्तर मे झुक कर अभिवादन करने के सवाल पर माननीय उपराष्ट्रपति महोदय का, उनकी शालीनता, सौजन्यता का मज़ाक उड़ाया था। हमारे संस्कार और सांस्कृति मे शिष्ट और गुणवान व्यक्ति के नम्रता पूर्वक झुकने का उल्लेख एक संस्कृत श्लोक मे किया हैं:-                      नमन्ति फलनो वृक्षा:, नमन्ति गुणतोजना:,

                          शुष्क कास्ठानि मुर्खाश्च नमति कदाचन:'.      अर्थात फल वाले वृक्ष और गुणवान व्यक्ति नम्रता पूर्वक झुक जाते हैं, वही सूखे वृक्ष और मूर्ख लोग कभी नहीं झुकते!! उम्मीद हैं कल्याण बैनर्जी और इस विरोध मे संलिप्त, माननीय आर्यश्रेष्ठ  इस श्लोक के  अर्थ को आत्मसात करेंगे? भारतीय राजनीति के वर्तमान परिदृश्य मे राजनैतिज्ञ महारथियों मे  सत्ता की छटपटाहट, सरकार का विरोध करते हुए, कब देश विरोध की सीमा लांघ जाते हैं पता नहीं चलता। महामहिम उपराष्ट्रपति का मिमिक्रि के माध्यम से उपहास और अपमान इसी मानसिकता और सोच का दुष्परिणाम हैं।     

  

ऐसा नहीं है कि काँग्रेस और राहुल गांधी ने पहली बार संवैधानिक पद पर बैठे लोगो का अनादर और असम्मान किया हो? राहुल गांधी ने 2013 मे अपनी ही डॉक्टर मनमोहन सिंह सरकार के एक विधेयक को फाड़ कर प्रधानमंत्री को असहज और अपमानित किया था। राहुल गांधी के गैर जिम्मेदारन वक्तव्य पर पूर्व मे भी सूप्रीम कोर्ट द्वारा फटकार लगाई गयी थी। कल्याण बैनर्जी और राहुल गांधी के उपराष्ट्रपति श्री जगदीप धनखड़ से  इस अमर्यादित और निरंकुश व्यवहार की निंदा महा माहिम राष्ट्रपति श्रीमती द्रोपदी मुर्मु ने भी की हैं।

एक जिम्मेदार और गणमान्य सांसद कल्याण बैनर्जी की  निर्लज्जता, अशिष्टता और अनैतिकता   की पराकाष्ठा देखिये कि वे इस स्वांग और मिमिक्री को एक कला और आर्ट निरूपित  कर चोरी और सीनाजोरी कर रहे हैं, जो अप्रशंसनीय असुखद और अस्वीकार्य हैं। निश्चित ही उन्हे अपने दूषित कर्म के लिए देश सहित राज्य सभा के सभापति से क्षमा मांगनी चाहिये।

विजय सहगल      


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