रविवार, 26 नवंबर 2023

दिव्यांग ऑटो चालक

 

"एक बहादुर दिव्यांग ऑटो चालक-उदय सिंह"





27 अक्टूबर 2023 के प्रातः भ्रमण की बापसी मे शारदा बाल ग्राम के रामकृष्ण विध्या मंदिर  के गेट पर मैंने एक ऑटो को देखा जो स्कूल के बच्चों को उनके घर से लाकर स्कूल मे छोड़ने आया था और ऑटो ड्राईवर ने अपने दाहिनी तरफ एक बड़ा डंडा रक्खा हुआ था। यूं तो चंबल क्षेत्र मे कंधे पर बंदूक, जेब मे कट्टा रखना और देखना आम बात हैं तो डंडे को रखना और  देखना कोई अजूबा न था, पर उस ऑटो ड्राईवर के बगल मे रखे एक डंडे को देखना मेरे लिए अनोखा और अनूठा था। बच्चों को छोड़कर बापस जा रहे ऑटो को जब मैंने हाथ के इशारे से रोका और उस  25-26 साल के ऑटो ड्राईवर से उसके बगल मे रक्खे डंडे के बारे मे पूंछा? लेकिन अचानक  उसके पैरों को देख शंका का समाधान होते देर न लगी क्योंकि उस नौजवान का  बाएँ पैर मे लकवा अर्थात पक्षघात हुआ था। उस युवा के बारे मे कुछ और जानने की जिज्ञासा के वशीभूत मैंने उससे बातचीत के सिलसिले को आगे बढ़ाते हुए अपने बारे मे बताने का आग्रह किया। उसने अपना नाम उदय सिंह धाकड़ और पोरसा, जिला मुरैना का रहवासी  बताया, उसने बताया कि बचपन मे ही उसके पैर मे लकवा लगने  के कारण शारीरिक विकलांगता को प्राप्त हुआ। जब मैंने उसे  बताया कि मै भी अपनी बैंक सेवा के दौरान पोरसा मे पदस्थ था, तो हम दोनों के बीच एक नई आत्मीयता ने स्थान ले लिया। अब हम दोनों कुछ और सहज और अपनत्व महसूस कर रहे थे।

जब मैंने उदय से पैरालिसिस के कारण पैर मे चलने-फिरने मे होने वाली परेशानी और उसके ऑटो चालन के व्यवसाय के विपरीत संयोजन और संयोग के बारे मे पूंछा?  ऑटो चालन आपकी शारीरिक विकलांगता मे अबरोध या आड़े नहीं आता? तब उदय के चेहरे पर आए आत्मविश्वास और साहस के भाव को मैंने स्पष्ट रूप से उसकी आँखों मे देखा। उसने उत्साह पूर्वक बताया कि वह इसके पूर्व मुंबई के शांताक्रूज क्षेत्र मे साढ़े चार तक ऑटो चला चुका हैं। उसकी एक बात ने मुझे और भी आश्चर्य और अचंभा हुआ कि उसने ऑटो चालन के पूर्व लगभग दो साल अहमदाबाद मे रंगाई-पुताई और पेंटिंग का काम किया। मै हैरानी और विस्मय से उसकी तारीफ किए बिना न रह सका और उदय से बोला, किस मिट्टी के बने हो तुम!! जहां सामान्य लोग भी पेंटिंग जैसे मेहनती काम मे दीवार पर चढ़ने-उतरने जैसे कठिन और श्रम-साध्य काम से बचते हैं और तुम हो कि  शारीरिक विकलांगता के चलते रंगाई-पुताई का काम कैसे कर पाये  होगे? लेकिन उदय तो कुछ अलग ही मिट्टी का बना नज़र आया जिसमे हिम्मत  जज़्बा, साहस और दिलेरी कूट-कूट कर भरी थी।   नियमानुसार उसके पास क्षेत्रीय परिवहन कार्यालय से प्राप्त वाहन चालन का लाइसेन्स और ऑटो चलाने का परमिट भी हैं। उसे अपनी शारीरिक विकलांगता से कभी कोई भी परेशानी नहीं हुई और न ही सरकार, समाज से किसी तरह की शिकायत!! उसे ऑटो चालन के रोजगार ने  जीवन मे  मिलने वाली प्रसन्नता और खुशी दी साथ ही  उसे इस अध्यवसाय से  होने वाली आय से जीवन यापन मे ठीक ठाक आर्थिक आमदनी से मिलने वाली आत्म संतुष्टि भी दी।

10वी पास उदय ने बताया बचपन मे यार दोस्तों ने कभी उसकी शारीरिक दिव्यांग्ता का कभी उपहास नहीं उड़ाया अपितु हमेशा एक दोस्त की तरफ हमारे साथ खड़े रहे। मुंबई के शांताक्रूज क्षेत्र मे ऑटो चालान से लगभग दो हज़ार रुपए तक के अच्छी कमाई हो जाती थी। महाराष्ट्र पुलिस ने भी ऑटो चालन मे कभी "चालान" या रुपए के  लेन देन मे कभी परेशान न करने की बात कही क्योंकि मुंबई मे ऑटो चलाने का लाइसेन्स सिर्फ मुंबई परिवहन विभाग द्वारा जारी लाइसेन्स के आधार पर ही दिया जाता हैं जो उसने मुंबई मे रहते हुए प्राप्त किया क्योंकि देश के अन्य परिवहन विभाग द्वारा जारी  लाइसेन्स के आधार पर ऑटो/टैक्सी चलाने की  अनुमति मुंबई मे नहीं हैं।  

जैसा कि इस व्यवसाय मे प्रायः होता हैं, ऑटो चालकों को आए दिन क्षेत्र की पुलिस से सामना करना पड़ता हैं और प्रायः उनके दुर्व्यवहार और अपमान का कोपभाजन बनना ऑटो ड्राईवरों के जीवन का हिस्सा हैं। जब उदय से मैंने ऐसी किसी घटना के बारे मे पूंछा? जिसने शायद  उसके मन के  दुःख और अंतर्मन को कष्ट दिया हो? सहसा उसने आसमान की तरफ देखा, मानों कहीं इस अनंत  आकाश की गहराइयों मे खो गया हो!!  उदय ने बताया कि एक बार ड्राईवर की यूनीफ़ोर्म न पहनने पर एक पुलिस कर्मी ने ये जानते हुए भी कि वह विकलांग हैं, बिना चालान काटे,  रिश्वत के रूप मे पाँच सौ रुपए ले लिए। उसके हाव भाव और चेहरे पर लिखी  इबारत को  देख इस बात का सहज ही अंदाज़ लगाया जा सकता था कि उस दिन उसके आत्मसम्मान और स्वाभिमान को कितनी चोट पहुंची होगी!!       

जब मैंने उदय से शारीरिक रूप से दिव्यांग के लिए चलाई जा रही योजनाओं के लाभ तथा उसके द्वारा चलाये जा रहे  ऑटो की योजना आदि का बारे मे पूंछा तो उसने बताया के उसने ये ऑटो बिना किसी सरकारी योजना या अनुदान के सीधे बैंक से ऋण ले कर लिया हैं क्योंकि सरकारी योजनाओं मे लाल फीताशाही और भ्रष्टाचार के चक्कर मे पड़ने से समय की बर्बादी को देखते हुए सीधे ही बैंक से ऋण लिया यध्यपि इस ऑटो ऋण मे ब्याज आदि की कोई छूट उसे नहीं मिली और पाँच वर्ष मे लगभग तीन लाख के ऋण के लिए ब्याज सहित उसे पाँच लाख रुपए चुकाने पड़ेंगे। ये जानकार दुख तो होता हैं कि सरकारी सुविधाओं और योजना का लाभ आज भी सुपात्र व्यक्तियों को मिलने मे कदम कदम बाधाए और अवरोध,  राग दरबारी की याद दिलाते नज़र आते हैं। लेकिन खुशी इस बात की हैं कि उदय सिंह जैसे नौजवान बिना किसी शिकायत और  प्रत्याशा के, दिव्यांग्ता का रोना रोने से दूर अपने पुरुषार्थ के भरोसे  जीवन  की राह पर निर्भीकता और निडरता से संघर्ष की राह पर आगे बढ़ रहा  हैं।

जब मैंने उदय सिंह से सोश्ल कई घुम्मकड़ी, पर्यटक ग्रुप से जुड़े होने की बात बताई और उससे पूंछा कि यदि हमारे घुम्माक्कड़ी ग्रुप के सदस्यों का  ग्वालियर भ्रमण का कार्यक्रम बने तो तुम्हें उन सदस्यों को ग्वालियर के पर्यटक स्थलों के दर्शन कराने मे कोई दिक्कत तो नहीं होगी? उसने कहा नहीं सर! मुझे खुशी होगी कि उन आए हुए अतिथितियों को ग्वालियर दर्शन कराने मे सहभागी हो सकूँ। मैं उसकी अनुमति से उसका मोबाइल नंबर 9664772156 आपके सब के साथ इस अपेक्षा के साथ सांझा कर रहा हूँ कि ग्वालियर प्रवास के दौरान इस बहादुर नौजवान की सेवाओं का लाभ  ग्वालियर भ्रमण के दौरान अवश्य लेंगे।       

अपनी शारीरिक अक्षमता के बावजूद जीवन के पथ पर मेहनत और ईमानदारी से जीवकोर्पाजन करने वाला उदय निश्चित ही मेरे जीवन के किसी महानायक से कम नहीं हैं। मै उदय की जिजीविषा और बहादुरी को नमन करता हूँ।

विजय सहगल   

4 टिप्‍पणियां:

बेनामी ने कहा…

Courage and confidence both in u

बेनामी ने कहा…

उदयसिंह के जज़्बे और प्रतिबद्धता को सलाम। साथ ही सहगल जी आपको भी सलाम जो आप इस तरह के लोगों के प्रेरणा प्रसंगों को बहुत ही सुंदर शैली में लिपिबद्ध कर लोगों के बीच पहुँचाते हैं ।
N K Dhavan, LUCKNOW

बेनामी ने कहा…

जनता द्वारा चुने हुए प्रतिनिधि विधायक और सांसद जो लाखों करोड़ों रुपए में बिक जाते हैं उन्हें ऐसे मेहनत कश इन्सान से सबक लेनी चाहिए 🙏
दिलीप नेगी, दिल्ली

बेनामी ने कहा…

Instead of waiting for Govt to provide job it is better to be self employed and Atamnirbhar. Govt employees are a burden on the country in many ways.
Ranjeet Singh, Noida