"पनौती
अर्थात अशुभ या मनहूस"
21 नवंबर 2023 को राजस्थान के जालौर की एक चुनावी
सभा मे बोलते हुए कॉंग्रेस के नेता श्री राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र
मोदी का नाम उद्धृत करते हुए उन्हे विश्व कप मे भारतीय टीम के फ़ाइनल मुक़ाबले मे
पराजय के लिए जिम्मेदार ठहराते हुए स्थानीय भाषा के शब्द "पनौती" कह
संबोधित किया जिसका अर्थ होता है एक ऐसा व्यक्ति जो "आसपास के लोगो के लिए
दुर्भाग्य या बुरी खबर लाता हैं"। शाब्दिक अर्थों मे कहें तो "मनहूस",
"अशुभ" या "अपशगुनी"।
ये शब्द आज के समय, जब एक साधारण मनुष्य के
लिए भी स्वीकार नहीं हो सकते तो ऐसे नकारात्मक,
अनैतिक और गाली गलौज भरे अपशब्द का प्रयोग
देश के प्रधानमंत्री के लिए प्रयुक्त करना अत्यंत निंदनीय और घोर आपत्तीजनक हैं।
किसी सभ्य और संस्कारित व्यक्ति से ऐसे व्यवहार की उम्मीद कदापि नहीं की जा सकती।
जैसे जैसे चुनाव की समाप्ती अपने अंतिम चरण की ओर बढ़ रही हैं राजनैतिक दलों की
शीर्ष नेतृत्व द्वारा भाषा की मर्यादाओं
का उल्लंघन बढ़ता जा रहा हैं जो हमारे लोकतान्त्रिक देश के लिये अच्छा शगुन नहीं
हैं।
शायद किसी दुर्बुद्धि और नकारात्मक सोच के
सलाहकार द्वारा पनौती शब्द का उपयोग करने का
सुझाव श्री राहुल गांधी को दिया
गया होगा अन्यथा आज के वैज्ञानिक और सूचना
प्रौद्योगिकी प्रधान, युग मे इस तरह
के अंधविश्वास और कुपढ़ सोच के लिये सभ्य और प्रगतिशील समाज मे कदाचित ही कोई जगह हो,
तब कैसे दुनियाँ के प्रतिष्ठित हार्वर्ड और कैम्ब्रिज विश्विध्यालय से शिक्षित
राहुल गांधी विश्वकप क्रिकेट मे भारतीय टीम की पराजय के लिये,
क्रिकेट खेल के ज्ञान, कौशल और तकनीकि
के विपरीत देश के प्रधानमंत्री को मनहूस
व्यक्ति कह, हार के लिये दोषी ठहरा
सकते हैं। स्वतन्त्रता के पूर्व, सुदूर गाँव/देहातों
मे बैगा और झाडफूंक करने वाले बाबाओं द्वारा देश मे झाड़-फूंख,
टोने-टोटके और अंधविश्वास के चलते लोगो को डायन,
मनहूस और पनौती कह समाज से बहिष्कृत कर समाज
मे अंधविश्वास और कुप्रथाओं को बढ़ावा दिया जाता था। 21वीं सदी के काल मे,
आज के विकसित समाज मे श्री राहुल गांधी देश
के प्रधानमंत्री के लिये पनौती शब्द का इस्तेमाल कर,
क्या संदेश देना चाहते हैं? "पनौती"
जैसे अंधविश्वास, कुप्रथा और कुरीति को बढ़ावा दे कर वे देश को किस दिशा मे ले जाना चाहते
हैं? ये विचारणीय प्रश्न हैं।
यूं तो खेल भावना का तकाजा हैं कि किसी भी
खेल मे खेलने वाली दो प्रतिद्वंदी टीमों मे से अपना श्रेष्ठ प्रदर्शन करने वाली
टीम ही जीतती हैं और फ़ाइनल मुक़ाबले मे तो निश्चित ही दो सर्वश्रेष्ठ टीमों के बीच
कड़ा मुक़ाबला होता हैं और जीत का सेहरा,
विजयी टीम के सिर पर बांधा जाता है लेकिन इसका ये मतलब नहीं होता कि पराजित टीम
किसी भी मामले मे विजयी टीम से कमतर हो! यही कारण हैं कि किसी भी खेल की प्रथम दो
टीमों के फ़ाइनल मैच मे एक टीम को विजेता और दूसरे को उपविजता का खिताब दिया जाता
हैं न कि पराजित टीम!! इसलिए जिन भारतीय क्रिकेटरों ने लगातार 10 मैच जीतकर
क्रिकेट विश्वकप के फ़ाइनल मे प्रवेश किया हो और जिसका मुक़ाबला विश्व की जानीमानी
टीम आस्ट्रेलिया से हुआ हो तब जीत-हार का
ठीकरा क्रिकेट के खेल कौशल को न देकर किसी व्यक्ति को "पनौती" या "मनहूस"
बता हार के लिये जिम्मेदार ठहराना मूढ़ता की पराकाष्ठा ही कहा जायेगा। ऐसा वक्तव्य किसी
बुद्धिजीवी, विद्वान या विषय विशेषज्ञ
का कदापि नहीं हो सकता।
भाषा के उपयोग की खूबसूरती तभी है जब उसके
प्रयोग से किसी व्यक्ति को उद्धृत किए
बिना ही उसे संदेश स्पष्टता से प्रेषित हो जाय,
तभी तो कहा जाता हैं "साँप भी मर जाय और लाठी भी न टूटे" या तीर निशाने
पर लगना, लेकिन श्री राहुल गांधी
या उनके सलाहकार, शायद इस ज्ञान मे माहिर नहीं हैं,
तभी तो उन्हे उनके वक्तव्यों, ब्यानों और
कथनों के कारण संकट की स्थिति का सामना करना पड़ता हैं जैसा कि "सभी मोदी को
चोर" कहने पर उनको सूरत, गुजरात के एक न्यायालय
द्वारा दो साल की सजा दिया जाना शामिल हैं।
जैसा कि विदित था राहुल गांधी के
"पनौती" वाले वक्तव्य पर भाजपा और उनके समर्थकों की तरफ से कड़ी प्रतिक्रिया होनी ही थी। भाजपा
समर्थक एक छुटभैये समर्थक ने ट्वीटर पर ट्वीट करते हुए लिखा,
पनौती, "पहले देवर को खा गयी,
फिर सास को खा गयी, फिर पति को खा गयी।
निश्चित तौर पर इस तरह के घटिया रिमार्क असभ्य,
अशिष्ट और अशिक्षित व्यक्ति का ही हो सकता है,
जो निंदनीय हैं। चुनावी दौर मे राजनैतिक दलों के छुटभैये नेताओं और समर्थकों का
रवैया तो उनके बुद्धि कौशल के हिसाब से समझ आता हैं पर राजनैतिक दलों के स्टार
प्रचारकों, पार्टी प्रमुखों
को इस तरह की अमर्यादित,
अशिष्ट और अनुचित भाषा पर लगाम लगाना होगा
अन्यथा क्रिया और प्रतिक्रिया के चलते या यूं कहें कि "काँच के महलों मे रहने
वालों को दूसरे के घरों मे पत्थर नहीं फेंकना चाहिये" वाली कहावत के चलते,
एक दूसरे पर पत्थरबाजी से सिर फुटौअल,
सामाजिक सौहार्द, आपसी भाई चारा समरसता को
ठेस पहुंचाएंगे।
विजय सहगल


3 टिप्पणियां:
Sahi kaha ☑️ Such type of statememt is not expected from a fellow who is dreaming of becoming next P.M.
It is very unfortunate on the part of a leader of an opposition party.
🙏🏻🙏🏻with regards.
I S Kadiyan, Chandigarh
आपने सही विश्लेषण किए हैं। निश्चित ही कोई मूर्ख सलाहकार ही आजकल कांग्रेस का शकुनी बने बैठे हैं। शकुनी ने धर्म के विरुद्ध दुर्योधन को उक्सा कर कौरवों का नाश का अपनी प्रबल इच्छा को पूर्ण किए थे।
आपने सही विश्लेषण किए हैं। यह लगता है जैसा की शकुनी ने दुर्योधन को धर्म के विरुद्ध कार्य करने के लिए उकसाकर कौरवों का ही नाश करवाए थे वैसे ही कोई शकुनी राहुल गांधी का सलाहकार बने बैठे हैं और अपना इच्छापूर्ति के लिए राहुल का इस्तेमाल कर रहे हैं
RR Peri, विशाखापट्टनम
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