शुक्रवार, 6 अक्टूबर 2023

पाला पित्त साइकल पार्क, हैदराबाद

 

"पाला पित्त साइकल पार्क, हैदराबाद"









आज हिन्दी दिवस के पवित्र दिन, प्रातः 14 सितम्बर  2023 को अपने रूटीन भ्रमण से हटके  मैंने तेलंगाना वन विभाग  द्वारा संचालित साइकल पार्क जाने का निश्चय  किया, जिसके लिए मुझे लगभग 2.5 किमी॰ पैदल चलना था। महानगरों मे सुबह से ही जीवन की भाग दौड़ और आपा-धापी शुरू हो जाती है, यहाँ भी देखने को मिली। वाहनों के शोर-गुल मे मेरे मोबाइल पर विविध भारती के गानों की आवाज भी सुनना मुश्किल हो गया। आप सोच रहे होंगे तब मै एफ़एम रेडियो सुनते समय ईयर फोन का इस्तेमाल क्यों नहीं करता तो मै यहाँ स्पष्ट करना चाहता हूँ कि ईयर फोन के कारण आये दिन होने वाली दुर्घटनाओं से बचाव के लिए ही मैंने भ्रमण के दौरान कभी ईयर फोन का उपयोग नहीं किया। हाँ वो बात अलग हैं कि घर के अंदर और एकांत मे मै भी ईयर फोन का इस्तेमाल करता हूँ लेकिन भ्रमण के दौरान मै समुचित आवाज मे विविध भारती का आनंद लेता हूँ।

लगभग 25-30 मिनिट की पैदल यात्रा के बाद मै साइकल पार्क के सामने था। आकर्षक प्रवेश द्वार के पहले प्रभाव ने ही एक अच्छी छाप छोड़ी। पार्क सुबह साढ़े पाँच बजे ही खुल जाता हैं। पार्क के अधिकारी श्री रमेश रेड्डी अपने अधीनस्थ स्टाफ के साथ मुस्तैदी से अपने कर्तव्य निष्ठा के पालन मे रत दिखे। मैंने साइकल किराए के सामान्य नियम और शर्ते पूंछी। 50/- रुपए प्रति घंटा और 18% जीएसटी टैक्स अर्थात 59/- रुपए कुछ ज्यादा तो था  लेकिन एक-दो बार के अनुभव के लिए इतनी कीमत तो दी ही जा सकती थी। 500 साइकल की क्षमता के स्टोर के साथ साइकिलों का रख रखाव भी अच्छा दिखा। 59/- रुपए के डिजिटल भुगतान के साथ अब एक साइकल हमारे सुपुर्द कर दी गयी। छोटी-मोटी साइकल सवारी को छोड़ दें तो  आज लगभग 42-43 साल बाद इस साइकल यात्रा ने मुझे झाँसी मे कॉलेज के दिनों और लखनऊ मे बैंक की सेवा के दौरान साइकल के उपयोग की  यादें ताजा करा दी। 10 जुलाई 2021 के अपने ब्लॉग  "साईकिल" की (https://sahgalvk.blogspot.com/2021/07/blog-post_10.html) भी याद  ताज़ा कर दी, जब झाँसी के अपने कॉलेज मे साइकल को भूल से छोड़ आया था जो सारी रात कॉलेज के साइकल स्टैंड पर ही पड़ी रही। 1980 मे बैंक की सेवा   ग्रहण करने के दौरान कैसे  साइकल मेरे जीवन का हिस्सा थी जब आलमबाग, लखनऊ  से लगभग 8-9 किमी॰ दूर, लीला थिएटर, हज़रत गंज स्थित रीजनल ऑफिस और बाद मे मेफयर थिएटर के पास स्थित हजरतगंज शाखा जाया करता था।

प्रातः 7.24 बजे जब मैने 2॰71 किमी॰ के साइकल ट्रैक पर चलना शुरू किया जो एक कच्चे पगडंडी नुमा पर साफ सुथरा था  और रास्ते के दोनों ओर पेड़ों से आच्छादित एवं पूर्णतः शांत  और प्रदूषण से मुक्त था। चंद मिनटों की साइकिलिंग के साथ ही हैदराबाद शहर के वाहनों का कोलाहल और शोर शराबा मानो छू मंतर हो गया। प्रदूषण का नामो निशान नहीं था। वाहनों के हॉर्न और दो पहिये तथा चार पहिया वाहनों से निकलने वाले धुआँ दूर दूर तक अदृश्य था, इसकी जगह पक्षियों का कोलाहल और सुरीली आवाज़े वातावरण मे सुनाई देने लगी। शहर के कंक्रीट  जंगल के इस साइकल पार्क मे स्वतंत्र रूप से विचरती मोर को देखना एक सुखद अनुभव था। अन्य तरह के  पक्षियों मे कोयल, फाख्ता तोता आदि पक्षियों का कलरव की कल्पना ऐसे महानगरों मे कदाचित ही की जा सकती हो।  सुबह सुबह आज  यहाँ पार्क मे  ज्यादा साइकल सवार तो नहीं थे लेकिन सप्ताहांत यानि शनिवार और रविवार को पार्क मे ज्यादा साइकल सवार नज़र आते है। कई  जगहों पर  मैंने कभी मोबाइल से फोटो लेने  और कभी थकावट के कारण साइकल को यदा कदा रोका। रास्ते मे एक झील, और एक बड़ी ऊंची चट्टान जो बिलकुल ऐसे दिखाई दे रही थी मानों एक विशालकाय हाथी, पीठ दिखाते हुए बैठा हो!! सुंदर फूलवारी और रंग बिरंगे फूलों के झाड़ों से गुजरना मन को सुखद अहसास करने वाला था पर  हरी काई से भरे जल से भरे एक छोटे से पॉण्ड मे अपनी जिज्ञासा वश साइकल के साथ पहुंचा तो वहाँ पड़ी प्लास्टिक की बोतलों, थैलियों, खाली सीमेंट की बोरी, पुराने कपड़ों के ढेर और  अन्य कचड़े को देख दुःख हुआ। इस कचरे को  हटा कर इस जगह को प्रकृतिक रूप दिया से सुंदर बना कर किया जा सकता था। एक जगह झील का रास्ता दिखाता एक बोर्ड और उस पर  साँपों से सावधान होने की सूचना ने क्षणिक डर तो उत्पन्न किया, पर साइकल का रास्ता चौड़ा और साफ था अतः इस तरह साँपों के आने का कोई अंदेशा नहीं था। झील का पानी शांत और साफ था। बगुला जैसे  कुछ जलचर पक्षी विचरते नज़र आये लेकिन इस झील मे नहाने की सख्त मनाही थी। इस हेतु मैंने मोटर साइकल पर वन विभाग के एक गार्ड को निगरानी करते देखा और उसके कर्तव्य पारायण की प्रशंसा भी की। गोलाकार साइकल पथ को के बीच मे धन (प्लस, +) के आकार के रास्ते बनाए गए थे जो बच्चों की साइकिलिंग और साइकल सीखने वालों के आरक्षित थे। जगह जगह स्टील की बेंच भी लगाई गयी थी जिस पर मैंने भी बैठ कर आठ बजे का समाचार बुलेटिन सुना। कुछ मिनटों तक रागम चैनल पर शास्त्रीय संगीत का आनंद लिया। अब तक 8॰21 बज चुके थे। एक घंटे का समय भी हो रहा था। तब प्रवेश द्वार के पास बने स्टोर पर कर्मियों को बापस साइकल सुपर्द कर दी। यहाँ इस बात का उल्लेख भी करना आवश्यक है कि पार्क के अंदर ही महिला और पुरुषों के लिए अलग-अलग  साफ सुथरे प्रसाधन कक्ष उपलब्ध थे जिसमे पानी की व्यवस्था थी और हाँ पीने के पानी की भी समुचित व्यवस्था वन बिभाग ने उपलब्ध कराई हुई थी। ये बात सही है कि यदि ये जगह वन विभाग के अधीन न होती तो इस पर बिल्डरों की कभी कुदृष्टि पड़ चुकी होती और यहाँ भी हरे भरे पेड़ों के जगह  कंक्रीट का जंगल खड़ा हो चुका होता लेकिन ये भी उतनी ही सच्चाई है कि पार्क की चाहरदीवारी से सट कर बने बहुमंजिले भवनों मे निवासरत् लोग अत्यंत ही सौभाग्यशाली होंगे जिनको घर के पिछवाड़े सहज ही एक प्राकृतिक और सुंदर वातावरण रूपी जंगल और साइकल पार्क  मिला जिसे वो लाखों रुपए खर्च कर भी नहीं पा सकते थे। 

कुल मिलाके भीड़ भाड़ वाली जगह मे शांत, साफ-सुथरी और प्रदूषण मुक्त जगह मे एक घंटा साइकल से शरीर के व्यायाम और  हरे भरे वृक्षों के बीच बेंचों पर बैठ कर विश्राम करने  की ऐसी सुविधा मात्र 59/- रुपए मे कोई महँगी नहीं कही जा सकती जैसा कि शुरू मे मैंने उल्लेख किया था। निश्चित ही तेलंगाना सरकार का वन विभाग इस हेतु बधाई का पात्र है।      

विजय सहगल

1 टिप्पणी:

बेनामी ने कहा…

सहगल जी नमस्कार आप के प्रत्येक ब्लॉक में हम में से बहुत लोगों ने जिन स्थानों का भ्रमण नहीं किया है उसका चित्रण आप बखूबी करते हैं जिससे बेशक वहां गये नहीं होते हैं पर वहां का वातावरण और माहौल की जानकारी आप उपलब्ध करवाते हैं जो काबिले तारीफ है
दिलीप नेगी, दिल्ली