शनिवार, 14 अक्टूबर 2023

कहानियाँ

 

"कहानियाँ"






मै प्रायः अपने ब्लॉग के लिये कहानियों का पीछा करता हूँ पर आज तो ऐसा लगा मानों  कहानियाँ ही मेरा पीछा कर रही हैं। मैंने अपने हैदराबाद प्रवास के दौरान विश्व विध्यालय मार्ग को सैर के लिये सर्वोत्तम जगह के रूप मे चुन रक्खा है, जब तक कि सैर के लिए  इससे अच्छा कोई वैकल्पिक स्थान नहीं मिल जाता। आज 15 सितम्बर 2023 को अपने उसी मार्ग का अनुसरण करते हुए जब स्टेट बैंक के प्रशासनिक कार्यालय के सामने से निकला तो एक सफाई कर्मी बड़े ही तन्मयता से नाले से निकले कचरे को अपनी ठेली मे रख नाले के चारों ओर सफ़ेद चूना पाउडर का छिड़काव कर रहा था। चूने के पाउडर से उड़े कणों से बचने के लिए जैसे ही मैं रुमाल मुंह पर रख आगे बढ़ा ही था कि मुझे एकाएक उस सफाई कर्मी के चेहरे पर उभरे  भाव से उस पर लिखी इबारत को स्पष्ट ढंग से पढ़ सका!! मानों बगैर बोले ही वह कह रहा हो, साहब!! ये तो हम गरीबों के भाग्य मे लिखा हैं कि जिस गंदगी को आप देखना भी नहीं चाहते उस गंदगी को हम  अपने हाथों से उठा कर साफ करते है? मुंह पर रुमाल रख के हम लोगो से  किनारा करना तो आप लोगो की फितरत मे हैं?? सुबह सुबह मेरे अंतरात्मा ने धिक्कारते   हुए कहा "तुम्हारे एक छोटे से कृत्य ने उस सफाई कर्मी  का दिल दुखया, ये ठीक नहीं किया? मैंने अपने मन की आवाज को तुरंत पढ़ उस सफाई कर्मी को नमस्कार!! कह संबोधित किया और अपने अनजाने मे किए व्यवहार को ठीक करते हुए उसकी ओर बढ़ा। वह कुछ अचकचा सा गया था,  जैसे उससे कोई भूल  हो गयी हो!! बैसे मै  हमेशा से ही इन दबे, कुचले, गरीब वर्ग को अपने  परिवार का हिस्सा मान अपने अनुभव यदा कदा  सांझा करता रहा हूँ।  मैंने उसका हौसला बढ़ाते हुए, पीठ थपथपा कर कहा, "कि हैदराबाद नगर ऐसे ही साफ-सुथरा और सुंदर दिखाई नहीं देता, इसमे आप जैसे लोगो का बहुत बड़ा  योगदान  हैं"। "अभी जब लोग अपने घरों मे सो रहे है और आप सड़क की सफाई के लिये सड़कों पर झाड़ू लेकर उतर आए!! बात चीत मे उस कर्मी ने अपना नाम हनुमंता बताया। प्रायः भाषा की संवाद हीनता यहाँ नहीं आयी क्योंकि वह महाराष्ट्रा का रहने वाला था और हिन्दी अच्छी तरह समझ और बोल सकता था।

जब मैंने उसके सफाई कार्य की प्रशंसा करते हुए पीठ थपथपाई तो वह कृतज्ञता  और आभार से झुक गया। उसे शीघ्र सवेरे किसी अंजान व्यक्ति से शायद ऐसे सकारात्मक व्यवहार की अपेक्षा नहीं थी। उसने बताया, कि वह  सुबह चार-साढ़े चार बजे उठ कर, दैनिक कार्यों से निव्रत्त होने के पश्चात छह बजे अपने सफाई के कार्य मे लग जाता है और दोपहर एक बजे तक अपने काम का निष्पादन करता है।  जब मैंने उससे पूंछा कि क्या वह हैदराबाद महा नगर पालिका का नियमित और स्थायी कर्मचारी हैं तो उसने इंकार करते बताया कि वह ठेकेदार के अंडर मे काम करने वाला सफाई कर्मी है और उसे मात्र 15000/- रुपए ही महवारी वेतन मिलता हैं। भविष्यनिधि भी उसके वेतन से कटती हैं। वह 12/- रुपए प्रतिवर्ष राशि की  प्रधानमंत्री जीवन  दुर्घटना बीमा योजना से अनिभिज्ञ था। महंगाइ के इस दौर मे परिवार को यध्यपि चलाना बड़ा कठिन था पर फिर भी पाँच बच्चों के परिवार मे उसने दो बेटियों की शादी भी कर दी। एक बेटा 12वीं मे तथा दूसरा 10वीं मे हैं। एक छोटा है जो छह वी कक्षा मे है। मैंने, उसे बच्चों को खूब पढ़ाने और उच्च शिक्षा के लिये बैंक से ऋण लेने की सरकारी योजनाओं और उनके वर्ग को मिलने वाले लाभों का भरपूर उपयोग करने  के लिये भी प्रेरित किया।

अभी कुछ कदम आगे बढ़ा ही था कि एक युवक बीच सड़क पर मोटरसाइकल मे आयी खराबी को पत्थर से ठोक कर ठीक करने का प्रयास कर रहा था। एक बारगी तो इस घटना को नज़रअंदाज़ कर, यह सोच  कुछ कदम आगे बढा कि मै 65 वर्षीय बरिष्ठ नागरिक कैसे उसकी सहायता कर सकूँगा?  पर फिर अंतर्मन से निकली आवाज ने मुझे धिक्कारा, इतने स्वार्थी मत बनो, भूल गए! एक बार यमुना एक्सप्रेस वे पर जब तुम्हारी कार का टायर उधण कर अलग हो गया था तब एक अंजान ट्रक ड्राईवर ने ट्रक रोक कर, कार का पहिया बदलने मे मेरा सहयोग किया था!! और जब उसे इस सहयोगा और अहसान के बदले कुछ पैसे देने का प्रयास किया था तो उसने विनय पूर्वक, वो राशि लेने से  इंकार कर दिया था। मै अपने अंतश्चेत्ना की आवाज को दबा न सका और मोटरसाइकल ठीक कर रहे उस युवक  को आवाज देकर सहायता करने का प्रस्ताव कर उसकी ओर बढ़ा। बाइक का पिछला पहिया जाम था। मैंने उससे कहा मै बाइक का हैंडल सम्हालता हूँ आप पिछले पहिये को कैरियर से कुछ उठा कर  पहले बाइक को,  सड़क किनारे लगा लो ताकि आ रहे वाहनों से दुर्घटना का अंदेशा न रहे। इस प्रयास मे देखा कि बाइक का अगला पहिया भी जाम हैं। तब एक बार फिर उस युवक ने मुझ से हैंडल पकड़ कर स्वयं अगले पहिये से उठा कर गाड़ी किनारे लगाने मे सहयोग का आग्रह किया। इस दौरान बाइक को पीछे से मैंने भी धक्का देकर गाड़ी को आगे घसीटा और गाड़ी को सड़क किनारे लगाया। अब तक पहिये मे भी कुछ गति आ गई थी। तब उसने गाड़ी को स्टार्ट किया जो धीमी गति से चलने लगी थी। इस तरह उस युवक ने मेरे प्रति आभार जताकर गाड़ी को मिस्त्री के वर्कशॉप की तरफ मोढ दिया। मै आज एक बार फिर कृतघ्नता से बच गया।  

हैदराबाद युनिवर्सिटी की इस रोड पर मै पहले भी कई बार आ चुका था। इस सड़क पर स्थित प्रायः हर बस स्टॉप की बेंचों पर मै  कुछ मिनटों तक विश्राम करता रहा हूँ सिवाय एक स्टॉप के! क्योंकि इस बस स्टॉप की बेंच पर जूते, कपड़े, रस्सी के सहारे लटका एक कंबल, चद्दर एक-दो झोले, पोलिथीन की थैलियों मे रक्खे  कुछ डिब्बे, फर्श पर पड़ी प्लास्टिक की चटाई आदि वस्तुएँ बेंच पर सदा रक्खी रहती।  इस बस स्टॉप के आसपास मै प्रायः एक नौजवान को घूमते देखता था। जो रोज ही लाइन वाली शर्ट के उपर नीला स्वेटर और पेंट को आधे घुटनों तक लपेटे, बिलकुल शांत हो, यहाँ वहाँ घूमता नज़र आता था। शायद उस नवयुवक ने परोक्ष रूप से उस बस स्टॉप को अपना आश्रय स्थल बना रक्खा था। निश्चित ही  वह मानसिक रोग या अवसाद  से ग्रस्त था।  आज भी वह मुझ से 20-30 कदम आगे-आगे जा रहा था। अचानक से उसने सड़क पर झुक कुछ उठाया और कुछ खाने के अंदाज के से मुंह तक ले जाकर बापस फेंक दिया। चूंकि मै भी सैर करता हुआ उसके पीछे पीछे ही था, लेकिन जब मैंने उसके द्वारा फेंका  एक छोटे प्लास्टिक का पाउच देखा जिसमे कुछ बची हुई चटनी और साँभर पड़ा थी जो शायद किसी राहगीर ने फेंकी होगी। यहाँ एक बार फिर मेरे मन ने धिक्कारा और प्रश्न किया? मिस्टर सहगल वो युवक तो मानसिक रूप से रोगी है, पर तुम तो नहीं?? युवक द्वारा खाली चटनी का पाउच फेंकने का उद्देश्य समझ नहीं आया? वो भूंखा भी तो हो सकता हैं? मेरे अन्तःकरण ने पुनः आज मुझे तीसरी बार झकझोरा!! मैंने उसे आवाज देकर पूंछा, क्या नाम है? लेकिन उसने कुछ भी समझने मे अनिभियता से कुछ बुदबुदाया, जो मै न समझ सका। शायद वो तेलगु के सिवाय कुछ नहीं जानता था!! तब मैंने हाथ की अनुगुलियों से निवाला बना कर मुंह की ओर ले जाने  के इशारे से पूंछा, कुछ खाओगे? तो उसने मौन स्वीकृति से "हाँ" मे सिर हिलाया!!, और मेरे पीछे आने लगा। अब तक मै श्रीनू (https://sahgalvk.blogspot.com/2023/09/blog-post_84.html) के दक्षिण भारतीय स्वल्पाहार गुमटी तक पहुँच चुका था। मैंने श्रीनू से कहा इसको पूंछ  कर जो ये मांगे खाने को दे दो,  शायद ये तुम्हारी बात समझ सके। ऐसा ही हुआ, श्रीनू ने जो प्रायः एक प्लेट मे छह पुंगलू (छोटे गोल बड़े) बड़े देता था आज उसने भी प्लेट मे आठ मेंदु बड़े और तीन तरह की चटनी अधिक मात्रा मे उस युवक को दे दी। युवक प्लेट लेकर  एक तरफ बैठ कर नाश्ता करता रहा। जब मैंने उसे दुबारा कुछ लेने के लिये इशारा किया लेकिन उसने फिर कुछ भी लेने से इंकार कर दिया।

विजय सहगल                  

2 टिप्‍पणियां:

बेनामी ने कहा…

सुंदर लेख

बेनामी ने कहा…

Great experiences of life happen on the road side. But
We turn our face away from them instead of engaging with them.
Ranjeet Singh, Noida