शनिवार, 21 अक्टूबर 2023

विरासत की खोज"- मोती महल, ग्वालियर

 

"विरासत की खोज"- मोती महल, ग्वालियर"








दिनांक 19 फरवरी 2023  को ग्वालियर मे प्रातः भ्रमण के साथ एक "हेरिटेज़ वॉक" अर्थात "विरासत की संपदाओं की पुनरान्वेषण यात्रा" मोती महल, ग्वालियर से शुरू की गयी। इस यात्रा मे हमारे हमराही रहे हमारे घनिष्ठ पारवारिक मित्र और हितचिंतक पड़ौसी  श्री ललित और श्री #संजय पांडे।

1825 मे 900 कमरों वाले इस मोती महल का निर्माण सिंधिया वंश के महाराजा स्व॰ दौलतराव सिंधिया द्वारा कराया गया। मोटे मोटे गोल स्तंभों और चौड़ी-चौड़ी बुनियाद पर बने इस महल की भव्यता आज भी देखते ही बनती है। इतनी अधिक संख्या मे कमरों के निर्माण के कारण बाहर से दिखाई देने वाले इस भव्य महल के अंदर कमरों की भूल भुलैया इतनी जबर्दस्त है कि आप भटके बिना नहीं रह सकते। तत्कालीन महाराजा का मोतियों के प्रति आकर्षण और मोतियों का विशाल संग्रह के कारण इस महल का नाम "मोती महल" पड़ा। भूमिगत कक्षों को यदि छोड़ दिया जाएँ तो यह पूरा महल कहीं कहीं पाँच मंज़िला है जो पूर्णतः बड़े बड़े पत्थर की  बुनियाद पर टिका है और पूरे महल की छत्त लंबी लंबी पत्थर की पटौर से बनाया गया है। कहीं कहीं तो पत्थरों की लंबाई 30 फुट से भी अधिक है।  दीवारों पर उकेरी गईं पत्थर पर कलात्मक आकृतियाँ भी देखते ही बनती हैं। चंबल क्षेत्र मे पत्थरों पर की गयी नक्काशी और कलात्मक वास्तु की अनेक प्राचीन धरोहर आपको मुरैना, ग्वालियर, शिवपुरी मे आज भी देखने को मिल सकती हैं। पर्यटन का ज्यादा प्रचार-प्रसार न होने के कारण यह क्षेत्र आज भी पर्यटन की दृष्टि से काफी अबूझा, अनजाना और अक्षूता हैं। घुम्मक्कड़ पर्यटकों से अपेक्षा हैं कि इस क्षेत्र के ककन मठ, बटेश्वर पढ़वाली, मितावली जैसे कम प्रसिद्ध और कम ख़र्चीले इन पर्यटन केन्द्रों के भ्रमण की संभावनाओं का अन्वेषण और समन्वेषण करें।     

मोती महल के बैभव और सुंदरता का वर्णन के पूर्व महल के सामने बने बैजा ताल का जिक्र न हो तो ये न इंसाफ़ी होगी। मोती महल की सुंदरता मे चार चाँद लगाने मे बैजा ताल का महत्वपूर्ण भूमिका है। पश्चिम मुखी इस महल के सामने गहराई मे एक विशाल ताल बना है जिसके चारों ओर सीढ़ियाँ बनी है जिनसे नीचे उतर कर आप पानी से भरे इस तालाब मे  नौका यान और पैडल वोट की सवारी कर सकते है। ताल के बीचों बीच एक भव्य मंच बनाया गया है जिसको एक पुल के माध्यम से सीढ़ियों से जोड़ कर रास्ता बनाया गया है। इस मंच का उपयोग शहर मे संगीत और नाटक के कार्यक्रम यदा कदा आयोजित किये जाते है। बैजा तालाब के चारों ओर पक्की सड़क बनी है इस तालाब पर कुछ कुछ दूरी पर पत्थर पर नक्काशी दार छतरियाँ बनाई गयी है जहां पर बैठ कर आप तालाब या तालाब के बीचों बीच बने तरण मंच के सौन्दर्य और कार्यक्रमों के साथ मोती महल की भव्यता और दिव्यता का आनंद ले सकते है।

तालाब से पूर्व दिशा की ओर एक अर्ध गोलाकार अति सुंदर दो मंज़िला भवन दिखाई देता है, जिसके एकदम मध्य मे ऊपरी मंजिल पर आयताकार पिल्लर पर एक रोमन घड़ी लगी है जो पूरे दिन मे दो बार सही समय दर्शाती है अर्थात सुप्तावस्था मे हैं।  जहां ग्वालियर को सन 1947 मे मध्य भारत प्रांत की राजधानी होने का  गौरव प्राप्त है वही जिस मोती महल को सिंधिया रियासत कालीन सचिवालय का दर्जा प्राप्त था उसी मोती महल को मध्य भारत प्रांत की विधान सभा होने का सौभाग्य प्राप्त हुआ था। मोती महल के मुख्य भवन को सुंदर नक्काशी दार अर्ध गोला कार दो बरामदे, एक के अंदर एक बने है। स्तंभों पर सुंदर नक्काशी से फूलदान, फूल पत्तियाँ  और पक्षियों के चित्रों को उकेरा गया है। स्तंभों के दोनों ओर पत्थर की बारीक नक्काशी दार  जालियाँ बनाई गयी है। नक्काशीदार पत्थर के  इस कॉरीडोर के अंदर ही तत्कालीन विधान सभा  अर्थात  तब के मध्य भारत की विधान सभा, जिसमे आज कल राज्य सभा के अनेकों कार्यालय कार्यरत है। मुख्य भवन के दोनों ओर बड़े बड़े प्रवेश द्वार के माध्यम से मोती महल के अंदर और ऊपरी कक्षों मे जाने के अनेकों रास्ते और सीढ़ियाँ बनाई गयी है। मोती महल के अंदर अनेकों आँगन और बरामदे बनाये गए है जिनके चारों ओर छोटे बड़े कमरों का निर्माण कराया गया है। पूरा भवन एक भूल भुलाइयाँ से कम नहीं हैं।

इन प्राचीन भवनों मे भ्रमण के बाद हम तीनों बैजा ताल से आगे सड़क की ओर बढ़े जो सिंधिया रियासत के राज निवास जय विलास पैलेस के उत्तरी  दरवाजे से होकर जाती है। जिसके अंदर सफ़ेद रंग की विशाल और भव्य महल  दिखाई दे रहा था,  जिसमे प्रवेश के लिए पश्चिम दिशा स्थित पाँच सितारा होटल "उषा किरण पैलेस" से होकर जाया जाता है। जय विलास पैलेस मे सिंधिया रियासत द्वारा संचालित रेल की पटरियों के अवशेष दिखाई देते है जो इस बात की गवाही देते है कि कभी ग्वालियर की सिंधिया रेल की लाइन राजमहल के अंदर तक जाती थी। जैसे छोटी लाइन के  प्राचीन भाँप के इंजिन को ग्वालियर स्टेशन के बाहर मॉडल के रूप मे प्रदर्शित किया गया है बैसा ही एक भाँप का इंजिन जय विलास पैलेस के बाहर भी दर्शन हेतु रक्खा हैं।

कुछ कदम आगे बढ़ने पर आज का महापौर कार्यालय जो ऐतिहासिक दृष्टि से ग्वालियर की तत्कालीन वास्तु का अनमोल नगीना है, जिसे जलविहार भी कहा जाता हैं। इस कलात्मक भवन के सामने बना वर्गाकार सरोवर इस भवन की सुंदरता मे चार चाँद लगा देता हैं। सरोवर मे बड़ी बड़ी रंग बिरंगी मछलियाँ विचरती हैं जिन्हे भ्रमण करने आए लोग आटे की गोलियां खिलाते हैं। आयताकार रूप मे निर्मित इस तालाब के चारों ओर पत्थर से निर्मित दो पतली नालियाँ पूरे वर्गाकार सरोवर के किनारे बनी हैं जिनमे पानी का बहाव निरंतर होता रहता हैं। सरोवर के बीच और किनारे की नालियों मे फब्बारे लगे हुए हैं जिन्हे मैंने कभी चलते तो नहीं देखा लेकिन जब फब्बारे चलते होंगे तो इस उस दृश्य की सुंदरता की कल्पना ही की जा सकती हैं। इस भवन के पीछे  ही एक इटालियन गार्डेन बनाया गया हैं जो वेशक आज उतना आकर्षक न हो पर ऐसा कहा जाता हैं कि इस बाग का निर्माण इटली के वास्तु पर आधारित हैं।

सुविधा की दृष्टि से घुम्मक्कड़ मित्रों को एक सलाह हैं कि ग्वालियर-चंबल के भ्रमण मे मोती महल का भ्रमण यदि सुबह 6-7 बजे करें तो पूरा महल निर्विघ्न-निर्वाध रूप से शांति पूर्वक विचरण कर देख सकते हैं अन्यथा 9 बजे के पश्चात राज्य सरकारों के अनेकों कार्यालय होने के कारण, यहाँ कर्मचारियों और आम जनों की भीड़ के बजह से न केवल आसानी घूम पाना कठिन होगा अपितु अफसरों की आवाजाही से कदम-कदम पर अवरोधों का सामना करना पड़ सकता हैं, क्योंकि यहाँ का वातावरण और रूप किसी ठेठ सरकारी कोर्ट-कचहरी की तरह दिखलाई पड़ता है ठीक श्री लाल शुक्ल के उपन्यास #राग दरबारी की तरह!!  इस तरह आज प्रातः का भ्रमण ग्वालियर राज्य की विरासत को एक सुंदर सुबह मे नजदीक से देखने की एक अविस्मरणीय यात्रा थी।

विजय सहगल   

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