"भैया
की शादी"
60-70 के दशक मे बचपन की कुछ घटनाएँ
अन्तश्चेतना पटल पर आज भी इतनी सुस्पष्ट है जैसे लगता है अभी कल की ही बात हो। गर्मियों
की छुट्टी के दौरान झाँसी मे लगभग दो दर्जन कुनबे वाले हमारे संयुक्त परिवार के घर मे हर दिन एक उल्लास और
उमंग से परिपूर्ण होता था। सुबह शाम के भोजन मे चाचा,
ताऊ के घर से सब्जी की कटोरियों की अदला-बदली नित्य का क्रम थी। तीनों आँगन मे पकने वाले शाम के भोजन बेशक अलग दालान
और पौर मे बैठ कर खाया जाता था पर भोजन
के दौरान होने वाली चर्चा का श्रवण,
चिंतन-मनन मे सभी समूहिक रूप से शामिल होते। परिवार मे चचेरी बहन "मीरा बहिन जी"
जो हम सब से बड़ी थी प्रायः भोजन की थाली के साथ हमारी ओर शामिल रहती। सुबह से लेकर
रात तक की अलग अलग दिनचर्या के विभिन्न रूप देखने मे आते। दोपहर मे सारे बच्चे
कोटपीस, छकड़ी और सीप जैसे ताश
के खेलों मे रत रहते। कुछ सदस्य इन अलग अलग खेलों मे पारंगत हो प्रवीणता की सूची
मे अपना स्थान रखते थे। इमली के बीजों को फोड़ कर जमीन पर खड़िया से चंद लकीरों को
खींच कर चंदा पउआ खेलना हम बच्चों का सबसे प्रिय खेल था।
गर्मियों की छुट्टी मे खेलों के
साथ-साथ साल भर के उपयोग के लिए खाने की
वस्तुओं के भंडार के लिये आलू के पापड़,
चिप्स, मूंग के दल के पापड़,
आम का आचार, मुरब्बा,
आचारी एवं सिमईयाँ बनाने के कार्यक्रम भी साथ साथ चलते रहते। हाँ शाम के समय हम
लड़कों का घर की छत्तों से पतंग उड़ाना कभी
नहीं छूटता। छत्तों पर पीने के पानी के लिये छोटे घड़े भर पानी लाने की ज़िम्मेदारी
भी सभी मिल कर कर लेते। आसमान मे चारों तरफ उड़ रही सैकड़ों रंग बिरंगी पतंगों से
आकाश आच्छादित हो जाता। कुछ पतंगे पुंछल्ले वाली भी होती जो पूँछ लहराती आसमान मे
एक अलग ही दृश्य उत्पन्न करती। उन दिनों बाबा का मुट्टा बड़ा प्रसिद्ध था जिसका उल्लेख
मैंने अपने ब्लॉग "बाबा का मुट्टा"
https://www.blogger.com/blog/post/edit/3862879843126919997/3521790630080511020
मे किया है।
रोजाना की
इस दिनचर्या मे तब दिन विशेष हो जाता जब हम सब मे बढ़े हमारे चचेरे भाई जिन्हे
हम सभी "हरी भैया" कह कर बुलाते, जबलपुर से छुट्टियों मे घर आते। वे वहाँ से
इंजीन्यरिंग की पढ़ाई कर रहे थे। कभी चिट्ठी से,
"पूर्व सूचना" और कभी कभी बगैर
सूचना के जब उनका तांगा सुबह सुबह स्टेशन से उन्हे लेकर घर पहुँचता तो घर मे एक
अलग उत्साह और उमंग का माहौल हो जाता। घर के बाहर से सिर्फ एक संदेश प्रसारित होता,
"भैया आ गाये"! "भैया आ गाये"!! जो भी देखता तो प्रसन्नता से
"भैया आ गाये" कह कर अपनी खुशी का इज़हार करता। हम छोटे बच्चे भी उनके
आने से खुश होते क्योंकि वे हमेश अपने साथ "रावल गाँव" की चॉकलेट का
डिब्बा लाते। सफ़ेद कागज पर हरे, लाल,
कत्थई रंग मे लिपटी विभिन्न स्वाद की चॉकलेट उनके आने की खुशी दुगनी कर देता था।
इलाइचि के स्वाद वाली चॉकलेट की खुशबू से
मन मे प्रसन्नचित्त हो जाता।
कालांतर मे भैया,
पढ़ाई के बाद नौकरी मे आ गये और कुछ समय बाद तालबेहट मे विवाह संबंध तय होने के
समाचार पर घर मे सभी हर्षित थे। सगाई के कार्यक्रम के पहले मुहल्ले की
बच्चा पार्टी उत्साहित थी। उन दिनों बाज़ार से रंग बिरंगी पतंगी कागज को
त्रिभुज आकार मे काट कर झंडियाँ काटी जाती। उन झंडियों के सिरे पर लेई लगा कर
सूतली की पतली रस्सी पर चिपकाया जाता। इस काम मे छोटे बच्चे दिलों जान से जुटे
रहते। पूरे घर मे यही एक काम चारों तरफ बिखरा दिखाई देता। सूतली मे रंगो के क्रम
का विशेष ध्यान दिया जाता। कहीं पर झंडियों की लेई सूखने के लिए कतार मे बांधा
जाता। तैयार और सूखी झंडियों को इस प्रकार लपेट कर रक्खा जाता कि कहीं उलझ ने
जाये। सगाई के एक दो दिन पहले घर के बाहर सड़क पर पंडाल बांधा हुआ था जिसके नीचे
महीने भर से तैयार की जा रही झंडियों को बांधा गया। इस दौरान पूरा ध्यान रक्खा
जाता कि सड़क से निकल रही सामान भरी बैलगाड़ी,
ठेला या नगर निगम का ट्रक उन झंडियों की लड़ी को तोड़ न डाले। हम बच्चों को सगाई आदि
के प्रोग्राम देखने मे कम कार्यक्रम के
पश्चात कागज की रंगीन थैलियों मे मिलने वाले चार बूंदी के लड्डुओं को मिलने
का इंतज़ार ज्यादा था।
शादी की तैयारियाँ महीनों से पहले शुरू हो
गई थी। घर के बड़े लोग खाने-पीने के भंडारण,
कार्ड छपवाने रिशतेदारों को बुलाने चलाने मे व्यस्त रहते। कार्ड मे पहली बार
विनीत/स्वागत अभिलाषी मे अन्य भाइयों के साथ अपना नाम पहली बार छपा देखकर मुझे जो
प्रसन्नता हुई थी शायद वर के रूप भैया को अपना नाम देख कर भी न हुई होगी। सभी लोगो
के नये नये कपड़े सिलने के लिए टेलर मास्टर को महीनों पहले दे दिये गये थे। घर के
बाहर ही भगवनदास टेलर मास्टर द्वारा सिला गया वो मेरा पहला कोट आज भी मुझे याद है जिसमे गहरे हरे,
ब्राउन और काले रंग की हल्की से धारियाँ थी। पहली बार शादी मे अपने शहर झाँसी से
दूर बस से तालबेहट जाना था। बस स्टैंड पर मुख्य सड़क के किनारे स्थित स्कूल मे
"जनवासे" अर्थात बारात मे आये मेहमानों के रुकने व्यवस्था की गई थी। मै
भी अपने मुहल्ले के मित्र मंडली और भाई बहिनों के साथ स्कूल की पहली मंजिल पर
स्थित कमरों मे से एक मे ठहरा था। जनवासे का वो स्कूल आज भी वैसे का वैसा बना हुआ
है। उस दिन शाम से ही बारात मे शामिल होने की
तैयारियाँ शुरू होने लगी। कुछ युवा
और प्रौढ़ नाई से सेविंग और चंपी मालिश करा रहे थे। पोलिश वाले से हमने भी अपने
जूते पोलिश कराये। 10-12 वर्ष की उम्र मे
बारात वाले दिन पहली बार टाई बांधी थी। टाई लंबी पूंछ वाली नहीं थी जिसमे नॉट
बांधने की जरूरत नहीं पड़ती थी अपितु प्लास्टिक के हुक मे पहले से ही नॉट बंधी हुई
थी। सिर्फ हुक को शर्ट के कॉलर मे फंसाना था। उस छोटे से कस्बे मे टाई बांध कर
बारात मे शामिल होने मे जो रुतबा बच्चों,
बाल मंडली और बारात देख रहे कस्बाइयों के बीच महसूस किया उसके क्या कहने थे मानों
खुले आसमान मे, मै हवा मे उड़ रहा हूँ।
बारात मे उस दिन मेरे सहित सारे बराती बैंड बाजे की धुन मे क्या
मस्ती से डांस कर रहे थे एक अजब ही उल्लास और आनंद का माहौल था। आज-कल की तरह उन दिनों भी नागिन डांस का खूब बोलबाला
था। बीन की धुन पर एक बराती मुंह मे रुमाल लिये बीन बजाता और दूसरा दोनों हाथों को
मिला सिर पर रख नाग/नागिन की तरह मस्त हो कर जो डांस करता उसका कहना ही क्या था?
देर रात तक कार्यक्रम चलता रहा पर हमारी बच्चा मित्र मंडली पत्तल मे बैठ भोजन करने
के बाद बापस जनवासे मे आ कर सो गयी।
रात भर की धमा चौकड़ी के बाद देर सुबह तक सोते रहे तभी जनवासे मे कमरे के बाहर कुछ कहा-सुनी की आवाज आयी तो उनींदे उठ कर कमरे के बाहर आये! तब एक रिश्तेदार जो कद काठी और रुतबे से प्रभावशाली लग रहे थे, नाराज होकर यहाँ से वहाँ चहल कदमी कर रहे थे। पता चला उनकी लैदर की चप्पल जो कमरे के बाहर रखी थी, नहीं मिल रही। कोई बाराती सुबह जाने-अनजाने उनकी चप्पल पहन कर कहीं घूमने-घामने निकल गया। ज्यों ज्यों समय बीतता गया उनकी चहल कदमी उनके क्रोध की तरह तेज होती गई। उसी समय मुझे भी अपने मित्रों संग तालबेहट के तालाब पर मस्ती करने, नहाने जाना था। लेकिन उन रिश्तेदार के पारा चढ़े तेवर को देख सभी ठिठक कर एक कोने मे चुप-चाप खड़े रहे। हम लोग भी सोच-सोच कर बेचैन थे कि आज किसी गरीब की शामत आने वाली है? सारा गुस्सा उस पर फट पड़ेगा जो उनकी चप्पल पहन कर गया होगा!! लगभग आधा-पौना घंटे बाद हमारे कुछ रिश्तेदार सीढ़ियों से चढ़ कमरे की ओर बढ़े ही थे कि क्रोधावेश मे घूम कर अपनी चप्पलों का इंतजार कर रहे रिश्तेदार ने उनकी चप्पल पहने घूम रहे सज्जन को देख जबर्दस्त ऊंची आवाज मे लताड़ना शुरू किया। नाराजी भरे लहजे मे तमाम कही-अनकही बातों से खूब डांटा!! लंबे समय से इंतज़ार करने और कहीं न जा पाने का उलाहना भी दिया। "शौक है तो खुद की चप्पल ख़रीदों" जैसे न जाने कितने कहे-अनकहे शब्दों से अपनी क्रोधाग्नि को शांत किया। चप्पल पहन कर गए सज्जन की तो सिट्टी-पिट्टी-गुम हो गई। किम कर्तव्य विमूढ़ की स्थिति मे मुंह से कोई बोल भी न निकलने पाये। लगातार अपने किये पर पछतावा प्रकट कर माफी मांगते रहे। अपनी लैदर की चप्पल पाकर अब तक रिश्तेदार जी का क्रोध शांत हो गया था। मै डरा सहमा बच्चा कैसे और किस मुंह से रिश्तेदार को उलाहना देता कि जिस रबर की चप्पल को पहन वे अपनी लैदर की चप्पल का इंतज़ार कर रहे थे, दरअसल वो रबर की चप्पल मेरी थी। जैसे ही रिश्तेदार जी ने अपनी लैदर की चप्पल पहनने के लिये पुरानी रबर की चप्पल उतारी मै तुरंत ही अपनी रबर की चप्पल की ओर लपका और उन्हे पहन कर अपनी मित्र मंडली की ओर दौड़ा जो तालाब जाने के लिये मेरा इंतज़ार कर रही थी। पर उस दिन मेरे साथ मेरी चप्पल पहन के जो जुल्म ज्यादती मेरे साथ हुई उसे किसी ने न देखा। "छोटा बच्चा जान के मुझ ना समझाना रे"............. .......... डिग्गी डिग्गी डम डम......... ।
कुछ दिन पूर्व हरी भैया की शादी की सालगिरह थी
और आज उनका जन्मदिन है इस अवसर पर उन्हे हार्दिक बधाई और शुभकामनायें।
विजय सहगल




4 टिप्पणियां:
आपकी यह रचना मुझे बहुत अच्छी लगी आप लिखने में दिन-प्रतिदिन पारंगत हो रहे हैं ऐसा मेरा विश्वास है
आपके ऊर्जास्पद संदेश हेतु धन्यवाद, सक्सेना जी।
आपकी भाषा शैली रोचक व प्रशंसनीय है किन्तु कुछ शब्दों के लेखन में हुई त्रुटियां शूल-सी चुभती हैं।
महोदय यदि आप उन त्रुटियों को हमारे संज्ञान मे लाएँ तो निश्चित ही मै उनको ठीक करने का प्रयास करूंगा। आपके संदेश हेतु आभार।
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