"मौलिन्नोंग-गाँव"
(एशिया का सबसे साफ गाँव)- मेघालय"
बचपन मे एक कहानी पढ़ी थी। कि जब एक बहेलिये
के जाल मे बहुत सारे कबूतर फंस गए तो सभी अपनी अपनी ताकत लगा कर खुद को बचाने मे
लगे रहे तो सफल न हुए। तब कबूतरों के नायक ने कहा यदि हम सिर्फ अपने बचाने का
प्रयास करेंगे तो सभी निरर्थक प्रयास कर पकड़े जाएंगे। क्यों न हम एक दिशा मे
समूहिक प्रयास कर अपनी ताकत लगाए तो इस जाल को उखाड़ सकते है। ऐसा ही हुआ सभी
कबूतरों ने एक सकारात्मक सोच के साथ एक ही दिशा मे उड़ने के लिए बल लगाया तो
बहेलिये का जाल उखड़ गया और सारे कबूतर जाल सहित एक दूर स्थान की ओर उड़ गए। वहाँ पर
अपने मित्र चूहे की सहायता से जाल को काट कर मुक्त हो गए। ऐसे ही समूहिक श्रम और शक्ति का एक आदर्श उदाहरण
मौलिन्नोंग गाँव मे देखने को मिला जो एशिया का सबसे साफ सुथरा गाँव है। इस गाँव के
बारे मे काफी सुन रखा था पर जब आज 03 नवम्बर 2022 को गाँव और ग्राम वासियों से
रु-ब-रु हुए तो जैसा सुना था कल्पना से परे उससे भी अच्छा पाया। देश के अन्य
गाँवों की तरह अपने सीमित संसाधनों का भरपूर दोहन कर यहाँ के निवासियों ने इस बात को चरितार्थ कर दिया कि
यदि एक समूह मे सारे ग्राम वासी सकारात्मक सोच के साथ किसी दिशा मे बढ़े तो सफलता
निश्चित ही उनके कदम चूमेंगी।
मेघालय राज्य के पूर्वी ख़ासी हिल्स जिले के
पिनिर्स्ला खंड मे स्थित ग्राम मौलिन्नोंग पंचायत के निवासियों की जितनी भी तारीफ
की जाए कम होगी। ये सिद्ध करता है कि सिर्फ गाँव की साफ सफाई के बल बूते कोई गाँव पूरी दुनियाँ मे अपनी
पहचान भी बना सकता है। इसी साफ सफाई के आधार पर न केवल देश मे अपितु पूरे विश्व मे
अपनी पहचान बना इस गाँव ने पर्यटन की दृष्टि से एक अहम मुकाम हासिल किया। पूरे
गाँव को अपनी इस पहचान के कारण न केवल गाँव के लोगो को रोज़गार के साधन मिले अपितु आर्थिक दृष्टि से भी मौलिन्नोंग गाँव ग्राम वासियों को आर्थिक रूप से सम्पन्न बनाने
मे अहम भूमिका निभा रहा है। बमुश्किल 1000 की आबादी वाले गाँव मे अनेकों होम स्टे
बने हुए है जिनमे पूरी दुनियाँ से पर्यटकों की आमद बनी रहती है। गाँव के हर घर मे हरियाली और फूलों के पेड़ चारों तरफ
दिखाई देते है। हर घर के बाहर और गाँव की सड़कों पर जगह जगह बांस की तिकोनी
टोकरियाँ कचरा एकत्रित करने हेतु रक्खी है। नाली से नाली तक गाँव मे पक्की डम्मर
की सड़क बनी हुई है। अंदर गलियों मे भी पत्थर और सीमेंट की पगडंडियाँ बनी है। ख़ासी महिलाओं
द्वारा संचालित 7-8 साफ सुथरे रेस्टुरेंट गाँव मे कार्यरत है जो पर्यटकों को स्वच्छ
और स्वस्थ भोजन परोसते है। रेस्टुरेंट के अतिरिक्त गाँव मे जगह जगह प्रसाधन केंद्र
बनाए गयें है जिनका उपयोग आप निशुल्क कर
सकते है। मुझे पूरे प्रवास के दौरान एक भी
मानव निर्मित कचरा तो क्या प्रकृति के द्वारा उत्सर्जित फूल पत्ती का कचरा भी कहीं देखने को नहीं मिला। गाँव की पूरी अर्थव्यवस्था पर्यटकों पर
आधारित होने के कारण सारे ग्राम वासी भी बड़े मृद भाषी और व्यवहार कुशल थे। चाय पान,
उपहार केंद्र, पारंपरिक मेघालय के उत्पाद
एवं कपड़े आदि की दुकानों पर कहीं कोई आपसी व्यापारिक स्पर्धा देखने को नहीं मिली। लोग
शांत और संतुष्टि के भाव से ओतप्रोत थे। गाँव के सफाई कर्मी और उनके घर की साफ सफाई और उनके
बच्चों को भी नजदीक से देखने को मिला।
सारे ग्रामवासियों के चेहरों पर एक संतुष्टि का भाव उनकी समृद्धि और शांति को
दर्शा रहा था।
गाँव मे चुनौती पूर्ण रोमांचक गतिविधियां भी
चलाई जा रही थी। जमीन से लगभग 100 फुट ऊंचे
बांस से निर्मित ऊंचे मचान पर चढ़ने की ऐसी ही एक चुनौती पूर्ण कार्य देखने
को मिला। जिस पर चढ़ना तो बहदुरी का कार्य था ही पर वहाँ पर पर चढ़ कर बंगला देश की
सीमा को देखना भी रोमांच, उत्साह और उमंग पैदा करने वाला था। अन्य गाँव वासी जो
पर्यटन की गतिविधियों से विलग थे बांस के अपने कार्य को निर्लिप्त भाव से करते नज़र
आए। जब सुदूर पूर्वोत्तर राज्य मे कुछ नवयुवक पानी के गोलगप्पे बेचने की तैयारी
करते नज़र आये तो आम लोगो के बीच उत्तर भारत की प्रसिद्ध पानी पूरी देखने को मिले
तो मुंह मे पानी आना स्वाभाविक था।
मौलिन्नोंग गाँव के प्रवेश द्वार पर एक भरी
भरकम चट्टान को एक बहुत छोटे पत्थर पर टिके होना किसी आश्चर्य से कम न था। लगभग 10-12
फुट लंबी, 6-7 फुट चौड़ी और लगभग
5-6 फुट ऊंची चट्टान मात्र 2-3 फुट चौड़ी चट्टान के उपर प्राकृतिक रूप से टिकी थी। जो अपने आप मे एक
अचरज था। हमारे ग्रुप के कुछ सदस्यों ने उस चट्टान को उठाते हुए चित्र खींचे मानो
चट्टान का सारा बोझ उनके कंधे पर आ गया
हो।
मेरे यात्रा कार्यक्रम मे मौलिन्नोंग गाँव
एक पढ़ाव के रूप मे था पर मै अपने सुधि पाठकों से कहूँगा कि वे कम से कम एक दिन इस
गाँव मे जरूर प्रवास करें। अरे कुछ दिन तो गुजरों......... मौलिन्नोंग में!! मैं 5-6 होम स्टे के नाम और मोबाइल नंबर दे रहा
हूँ, इस
वैधानिक घोषणा के साथ कि मेरा इन होम स्टे
मे कोई भी व्यापारिक हित निहित नहीं है।
मेघालय मेघों (बादलों) का आलय (आवास) यूं ही
नहीं है। कुछ तो प्रकृति ने मेघालय को अपनी सुंदर कृतियों से झरनों,
पहाड़ों, गुफाओं आदि के रूप मे श्रंगारित किया है और कुछ यहाँ के निवासियों ने
अपने श्रम, उद्धयम,
आचरण और व्यवहार से ईश्वर प्रदत्त उपहारों को रख रखाव,
सलीके और समर्पण से कर इन्हे और भी सुंदर बना दिया है। मौलिन्नोंग गाँव वहाँ के निवासियों
की श्रमशीलता का एक जीता जागता, अनुपम उदाहरण है।
विजय सहगल







3 टिप्पणियां:
अरे वाह sir ji. I heard and read a lot about this village and always thought of visiting.. You r very lucky enough to visit there. आपके द्वारा इतना सजीव चित्रण किया गया है कि मानो हम स्वयं ही वहाँ घूम आये हों l मुझे भी अपने ग्रुप में शामिल कर लें कृप्या l
It's not benami... It's me sir.. Deepti Datta
मेडम, very sorry, नाम न होने के कारण ऐसी त्रुटि हुई। आप हमेशा मेरे ब्लॉग पर हौसला अफजाई करती है। बहुत बहुत आभार।
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