"सिंधिया
स्कूल-फोर्ट ग्वालियर"
न तो मै इस स्कूल मे पढ़ा हूँ और न मेरे बच्चे
इस विध्यालय के छात्र रहे इसलिए इस ब्लॉग मे मै कोई सिंधिया स्कूल के वैभव,
उच्चा आय वर्ग के बच्चों की विलसता और ख़र्चीले रहन सहन या स्कूल की फीस आदि की
चर्चा नहीं करने जा रहा अपितु ग्वालियर
सहित देश के इस सबसे महंगी फीस वाले स्कूल से जुड़ी एक घटना का जिक्र करने
के लिए ब्लॉग लिख रहा हूँ।
2000-01 की शायद बात थी। मै उन दिनों शाखा नया
बाज़ार मे शाखा प्रबन्धक के पद पर कार्यरत था। बैंक के व्यवसाय विस्तार हेतु मुझे
ग्वालियर किले पर स्थित सिंधिया स्कूल जाना था क्योंकि उक्त स्कूल की गिनती देश के
समृद्ध शाली स्कूलों मे गिनी जाती है। स्वाभाविक था जो संस्था आर्थिक रूप से मजबूत
और समृद्ध शाली थी तो एक दूरदर्शी बैंक प्रबन्धक की नैतिक और सांविधिक ज़िम्मेदारी
थी कि बैंक के विकास हेतु शास्त्र सम्मत व्यवसाय प्राप्त करने का प्रयास करें। मै अपनी
मारुति 800 से किले पर स्थित सिंधिया स्कूल के प्राचार्य और वित्तीय अधिकारी से
मिलने के उद्देश्य से निकला। स्कूल के वित्तीय अधिकारी श्री गुप्ता जी थे जो कि
भारतीय स्टेट बैंक के सेवानिवृत्त सहायक महा प्रबन्धक थे जिनसे मेरी एक दो बार
दूरभाष पर वार्तालाप हो चुकी थी।
ग्वालियर किले,
सिंधिया स्कूल या ऐतिहासिक दाता बंदी छोड़ गुरद्वारे के दर्शन हेतु पहुँचने का मार्ग
दुरूह, दुष्कर और कठिन है। ग्वालियर किले पर जाने
हेतु वाहन चलाने मे पारंगत व्यक्ति ही कुशलता पूर्वक किले की कठिनतम चढ़ाई को वाहन
की गति और दिशा के लय मे संतुलन बना कर ही चढ़ा सकता है अन्यथा वाहन चढाने मे
परेशानी या कभी कभी दुर्घटना के शिकार की संभावना भी होने का भय बना रहता है।
सुरक्षित और सुगम यातायात के संचालन के लिए किले के दोनों छोर पर हॉट लाइन से
सुसज्जित केन्द्रों का संचालन किला प्रबंधन द्वारा किया जाता है। एकल मार्ग संचालन
नीति के तहत वाहनों का आवागमन संचलित किया जाता है अर्थात जब वाहन ऊपर से आ रहे
हों तो कोई भी वाहन नीचे से ऊपर नहीं जा सकता ठीक ऐसी नीति का पालन जब वाहन नीचे से ऊपर जाते है। हॉट लाइन टेलीफ़ोन
केन्द्रों से छोड़े जाने वाले वाहनों की गिनती बताई जाती है। जैसे यदि वाहन नीचे
उतार रहे है तो कितनी कार, बस या दो पहिया
वाहन छोड़े है। जब तक नीचे वाले निकासी द्वार से उतनी कार या बस पास नहीं हो जाते
दूसरी तरफ से वाहन नहीं छोड़े जाते। लगभग एक-डेढ़ किमी॰ घुमावदार रास्ते मे एक बड़ा
गेट (उरवई गेट), अंधा मोड़ और तीव्र
60-65 डिग्री की सीधी कठिन चढ़ाई शामिल है।
यदि वाहन की गति और लय मे तनिक भी उंच नीच हो जाए तो आपकी गाड़ी गुरुत्वाकर्षण के
कारण विपरीत दिशा मे अनियंत्रित हो दुर्घटना ग्रस्त हो सकती है साथ ही साथ-साथ
पीछे चल रहे वाहनों को आपके वाहन से समस्या या दुर्घटना होने का डर बना रहता है।
इसलिए इस छोटी लेकिन कठिन चढ़ाई वाली सड़क पर गाड़ियों के मध्य दूरी बनाये रखने का सुझाव भी दिया जाता है। वाहन
के इंजिन को बंद कर उतारना दुर्घटना को अवश्य संभावी आमंत्रित करने के समान है इसलिए अनुभवी वाहन
चालक प्रथम गेयर मे ही वाहन उतारते या चढ़ाते है।
उस दिन भी जब मै सिंधिया स्कूल जाने हेतु
किले के प्रवेश द्वार पर, उपर जाने हेतु
गार्ड के संकेत का इंतज़ार कर रहा था तभी अचानक से एक ऑटो तेजी से आकार ठीक मेरी
कार के सामने आकार रुका। अचानक से ही ऑटो से एक भद्र पुरुष क्रोध और उत्तेजना से
मेरी ओर बड़े। मैंने उनके रोष और क्षोभ को स्पष्ट रूप से उनके चेहरे पर देखा।
तमतमाया चेहरा!! गुस्से से लाल था!! मै कुछ समझ पता इसके पूर्व ही उन्होने मुझे
बुरा भला कह, "वाहन ठीक से न
चलाने का" उलाहना दिया। क्रोध और रोष के बावजूद,
उनके बोलने का लहजा शालीन और नियंत्रित था। मै धैर्य पूर्वक उनके कोप का भाजन बना
रहा। कार से उतर कर शांति पूर्वक बिना किसी प्रीतिक्रिया या प्रतिवाद के उन
महानुभाव को सुना!! मेरी ओर से कोई विरोध न होने के कारण उनका स्वर थोड़े शीतल और
शांत हो गये थे!! तब मैंने शिष्टिता पूर्वक,
नम्रता से उन सज्जन से कहा, "सर",
आपके क्रोधावेश से मुझे अहसास तो हो रहा है कि मुझसे कोई भारी गलती हो गयी,
पर विश्वास मानिये कि अनजाने मे हुई अपनी गलती की मुझे जानकारी नहीं?
कृपया मुझ से भूलवश हुई त्रुटि से मुझे अवगत कराएं?
ताकि आपको हुए कष्ट और क्लेश के लिए मै विधिवत खेद प्रकट कर क्षमा-याचना कर सकूँ?
बातचीत मे उन सज्जन पुरुष ने अपना नाम श्री
वर्मा बताया था जो किले पर स्थित सिंधिया स्कूल मे व्याख्याता के पद पर कार्यरत थे।
उन्होने बताया कि मै जब मुख्य मार्ग से किले जाने वाली सड़क पर कार से जा रहा था तो
श्री वर्मा जी भी, ऑटो से किले स्थित
स्कूल परिसर जा रहे थे, इसी दौरान मेरे द्वारा ऑटो को ओवर टेकिंग के दौरान सड़क पर
पानी से भरे एक गड्ढे मे कार के पहिये से उछले कीचड़ के छींटे उनके वस्त्रों और
चेहरे पर गिरने के कारण वे उत्तेजित और नाराज़ थे। उनकी नाराजी! जायज थी,
पर मेरा ऐसा कोई भी इरादा नहीं था कि उनको इस तरह अपमानित करूँ?
अनजाने मे हुई इस भूल पर मैंने खेद और अफसोस प्रकट कर माफी मांगी।
मामला समाप्त हो चुका था। गार्ड ने भी कार
को ऊपर जाने के संकेत दे दिये थे। मैंने देखा श्री वर्मा जी ने ऑटो को वहीं प्रवेश
द्वार पर छोड़ पैदल ही स्कूल की दिशा मे कदम बढ़ाये क्योंकि साधारत: ऑटो या अन्य
तिपहिया वाहन किले की चढ़ाई पर नहीं चढ़ पाते। तब मैंने श्री वर्मा जी से आग्रह किया
कि वे मेरे साथ कार मे आ जायें मै उन्हे उनके गंतव्य तक छोड़ दूँगा,
बैसे भी मै उसी दिशा मे सिंधिया स्कूल तक जा रहा हूँ?
श्री वर्मा जी को शायद इस अप्रिय प्रसंग के बाद मेरे साथ जाने मे कुछ झिझक हो रही थी। लेकिन मेरे बार बार आग्रह
को आखिरकार उन्होने स्वीकार कर मेरे साथ
कार से जाना स्वीकार कार लिया। मैंने श्री
वर्मा जी को स्कूल के पास ही स्थित उनके आवास पर छोड़ा। अब हम दोनों एक अच्छे मित्र
थे। श्री वर्मा जी के चाय के आग्रह को मैंने किसी अन्य दिन स्वीकार करने का वादा
किया।
उस दिन स्कूल मे अपना आवश्यक कार्य के
पश्चात बाद मे भी अनेकों बार ग्वालियर के किले और सिंधिया स्कूल जाना हुआ और जब-जब
भी मेरा श्री वर्मा जी के आवास से निकलना होता तो वरवश ही मुझे उस दिन की घटी घटना स्वतः ही याद हो आती और उस दिन उस
घटना से उपजे सुखांत से मिला सुख और एक अच्छे व्यक्ति मे मिलने के आनंद की मै कल्पना नहीं कर सकता।
विजय सहगल
























