शनिवार, 24 सितंबर 2022

सिंधिया स्कूल-फोर्ट ग्वालियर

 

"सिंधिया स्कूल-फोर्ट ग्वालियर"






न तो मै इस स्कूल मे पढ़ा हूँ और न मेरे बच्चे इस विध्यालय के छात्र रहे इसलिए   इस ब्लॉग मे मै कोई सिंधिया स्कूल के वैभव, उच्चा आय वर्ग के बच्चों की विलसता और ख़र्चीले रहन सहन या स्कूल की फीस आदि की चर्चा नहीं करने जा रहा अपितु ग्वालियर  सहित देश के इस सबसे महंगी फीस वाले स्कूल से जुड़ी एक घटना का जिक्र करने के लिए ब्लॉग लिख रहा हूँ।

2000-01 की शायद बात थी। मै उन दिनों शाखा नया बाज़ार मे शाखा प्रबन्धक के पद पर कार्यरत था। बैंक के व्यवसाय विस्तार हेतु मुझे ग्वालियर किले पर स्थित सिंधिया स्कूल जाना था क्योंकि उक्त स्कूल की गिनती देश के समृद्ध शाली स्कूलों मे गिनी जाती है। स्वाभाविक था जो संस्था आर्थिक रूप से मजबूत और समृद्ध शाली थी तो एक दूरदर्शी बैंक प्रबन्धक की नैतिक और सांविधिक ज़िम्मेदारी थी कि बैंक के विकास हेतु शास्त्र सम्मत  व्यवसाय प्राप्त करने का प्रयास करें। मै अपनी मारुति 800 से किले पर स्थित सिंधिया स्कूल के प्राचार्य और वित्तीय अधिकारी से मिलने के उद्देश्य से निकला। स्कूल के वित्तीय अधिकारी श्री गुप्ता जी थे जो कि भारतीय स्टेट बैंक के सेवानिवृत्त सहायक महा प्रबन्धक थे जिनसे मेरी एक दो बार दूरभाष पर वार्तालाप हो चुकी थी।

ग्वालियर किले, सिंधिया स्कूल या ऐतिहासिक दाता बंदी छोड़ गुरद्वारे के दर्शन हेतु पहुँचने का मार्ग दुरूह, दुष्कर और कठिन है। ग्वालियर किले पर जाने हेतु वाहन चलाने मे पारंगत व्यक्ति ही कुशलता पूर्वक किले की कठिनतम चढ़ाई को वाहन की गति और दिशा के लय मे संतुलन बना कर ही चढ़ा सकता है अन्यथा वाहन चढाने मे परेशानी या कभी कभी दुर्घटना के शिकार की संभावना भी होने का भय बना रहता है। सुरक्षित और सुगम यातायात के संचालन के लिए किले के दोनों छोर पर हॉट लाइन से सुसज्जित केन्द्रों का संचालन किला प्रबंधन द्वारा किया जाता है। एकल मार्ग संचालन नीति के तहत वाहनों का आवागमन संचलित किया जाता है अर्थात जब वाहन ऊपर से आ रहे हों तो कोई भी वाहन नीचे से ऊपर नहीं जा सकता ठीक ऐसी नीति का पालन जब  वाहन नीचे से ऊपर जाते है। हॉट लाइन टेलीफ़ोन केन्द्रों से छोड़े जाने वाले वाहनों की गिनती बताई जाती है। जैसे यदि वाहन नीचे उतार रहे है तो कितनी कार, बस या दो पहिया वाहन छोड़े है। जब तक नीचे वाले निकासी द्वार से उतनी कार या बस पास नहीं हो जाते दूसरी तरफ से वाहन नहीं छोड़े जाते। लगभग एक-डेढ़ किमी॰ घुमावदार रास्ते मे एक बड़ा गेट (उरवई गेट), अंधा मोड़ और तीव्र 60-65 डिग्री की सीधी  कठिन चढ़ाई शामिल है। यदि वाहन की गति और लय मे तनिक भी उंच नीच हो जाए तो आपकी गाड़ी गुरुत्वाकर्षण के कारण विपरीत दिशा मे अनियंत्रित हो दुर्घटना ग्रस्त हो सकती है साथ ही साथ-साथ पीछे चल रहे वाहनों को आपके वाहन से समस्या या दुर्घटना होने का डर बना रहता है। इसलिए इस छोटी लेकिन कठिन चढ़ाई वाली सड़क पर गाड़ियों के मध्य  दूरी बनाये रखने का सुझाव भी दिया जाता है। वाहन के इंजिन को बंद कर उतारना दुर्घटना को अवश्य संभावी  आमंत्रित करने के समान है इसलिए अनुभवी वाहन चालक प्रथम गेयर मे ही वाहन उतारते या चढ़ाते है।

उस दिन भी जब मै सिंधिया स्कूल जाने हेतु किले के प्रवेश द्वार पर, उपर जाने हेतु गार्ड के संकेत का इंतज़ार कर रहा था तभी अचानक से एक ऑटो तेजी से आकार ठीक मेरी कार के सामने आकार रुका। अचानक से ही ऑटो से एक भद्र पुरुष क्रोध और उत्तेजना से मेरी ओर बड़े। मैंने उनके रोष और क्षोभ को स्पष्ट रूप से उनके चेहरे पर देखा। तमतमाया चेहरा!! गुस्से से लाल था!! मै कुछ समझ पता इसके पूर्व ही उन्होने मुझे बुरा भला कह, "वाहन ठीक से न चलाने का" उलाहना दिया। क्रोध और रोष के बावजूद, उनके बोलने का लहजा शालीन और नियंत्रित था। मै धैर्य पूर्वक उनके कोप का भाजन बना रहा। कार से उतर कर शांति पूर्वक बिना किसी प्रीतिक्रिया या प्रतिवाद के उन महानुभाव को सुना!! मेरी ओर से कोई विरोध न होने के कारण उनका स्वर थोड़े शीतल और शांत हो गये थे!! तब मैंने शिष्टिता पूर्वक, नम्रता से उन सज्जन से कहा,  "सर", आपके क्रोधावेश से मुझे अहसास तो हो रहा है कि मुझसे कोई भारी गलती हो गयी, पर विश्वास मानिये कि अनजाने मे हुई अपनी गलती की मुझे जानकारी नहीं? कृपया मुझ से भूलवश हुई त्रुटि से मुझे अवगत कराएं? ताकि आपको हुए कष्ट और क्लेश के लिए मै विधिवत खेद प्रकट कर क्षमा-याचना कर सकूँ?

बातचीत मे उन सज्जन पुरुष ने अपना नाम श्री वर्मा बताया था जो किले पर स्थित सिंधिया स्कूल मे व्याख्याता के पद पर कार्यरत थे। उन्होने बताया कि मै जब मुख्य मार्ग से किले जाने वाली सड़क पर कार से जा रहा था तो श्री वर्मा जी भी, ऑटो से किले स्थित स्कूल परिसर जा रहे थे, इसी दौरान  मेरे द्वारा ऑटो को ओवर टेकिंग के दौरान सड़क पर पानी से भरे एक गड्ढे मे कार के पहिये से उछले कीचड़ के छींटे उनके वस्त्रों और चेहरे पर गिरने के कारण वे उत्तेजित और नाराज़ थे। उनकी नाराजी! जायज थी, पर मेरा ऐसा कोई भी इरादा नहीं था कि उनको इस तरह अपमानित करूँ? अनजाने मे हुई इस भूल पर मैंने खेद और अफसोस प्रकट कर माफी मांगी।

मामला समाप्त हो चुका था। गार्ड ने भी कार को ऊपर जाने के संकेत दे दिये थे। मैंने देखा श्री वर्मा जी ने ऑटो को वहीं प्रवेश द्वार पर छोड़ पैदल ही स्कूल की दिशा मे कदम बढ़ाये क्योंकि साधारत: ऑटो या अन्य तिपहिया वाहन किले की चढ़ाई पर नहीं चढ़ पाते। तब मैंने श्री वर्मा जी से आग्रह किया कि वे मेरे साथ कार मे आ जायें मै उन्हे उनके गंतव्य तक छोड़ दूँगा, बैसे  भी मै  उसी दिशा मे सिंधिया स्कूल तक जा रहा हूँ? श्री वर्मा जी को शायद इस अप्रिय प्रसंग के बाद मेरे साथ जाने मे  कुछ झिझक हो रही थी। लेकिन मेरे बार बार आग्रह को आखिरकार  उन्होने स्वीकार कर मेरे साथ कार से  जाना स्वीकार कार लिया। मैंने श्री वर्मा जी को स्कूल के पास ही स्थित उनके आवास पर छोड़ा। अब हम दोनों एक अच्छे मित्र थे। श्री वर्मा जी के चाय के आग्रह को मैंने किसी अन्य दिन स्वीकार करने का वादा किया।

उस दिन स्कूल मे अपना आवश्यक कार्य के पश्चात बाद मे भी अनेकों बार ग्वालियर के किले और सिंधिया स्कूल जाना हुआ और  जब-जब  भी मेरा श्री वर्मा जी के आवास से निकलना होता  तो वरवश ही मुझे उस दिन की घटी  घटना स्वतः ही याद हो आती  और उस दिन उस  घटना से उपजे सुखांत से मिला सुख और एक अच्छे व्यक्ति मे मिलने के  आनंद की मै कल्पना नहीं कर सकता।    

विजय सहगल           

रविवार, 18 सितंबर 2022

जाखू के हनुमान"-"शिमला

 

"जाखू के हनुमान"-"शिमला"








प्रायः जानकारी के अभाव मे पर्यटक ठगी और धोखाधड़ी के शिकार हो जाते है ऐसे ही कुछ हमारे साथ भी हुआ। 1 जून 2022 को शिमला के  रिज मैदान मे पीले गिरजाघर तक तो सब ठीक ठाक था। वहाँ से रिज मैदान से दिखाई देने वाली भगवान श्री हनुमान की विशाल नयनभिराम प्रतिमा के दर्शन करने का कार्यक्रम बना। हम परिवार सहित चर्च के बगल से जाखू मंदिर जाने वाले रास्ते के तरफ बड़े ही थे कि रास्ते मे टैक्सी गिरोह के झांसे मे आ गये। इन लोगो ने मारुति वेन से लगभग 2.0 किमी॰ दूर  जाखू मंदिर के दर्शन कराने हेतु 450/- रूपये मे प्रस्ताव दिया। यध्यपि जाखू मंदिर तक सरकार द्वारा नियंत्रित और संचालित "रोप वे" से भी जाने की सुविधा उपलब्ध थी। रोप वे चर्च से बहुत ज्यादा दूर नहीं था पर रोप वे और टैक्सी के किराये मे थोड़ा अंतर होने के कारण हम टैक्सी गिरोह के बहकावे मे आ गये। शिमला जैसे पहाड़ी क्षेत्र मे सड़कों की चढ़ाई, ऊंचाई ने उस स्थान  तक पहुँचने मे हमारी हालत खराब कर दी जहां पर टैक्सी खड़ी थी, तब रोप वे और टैक्सी के किराये का अंतर हमे समझ आया लेकिन तब तक देर हो चुकी थी। यही नहीं टैक्सी ने ऊपर जहां छोड़ा वहाँ से मंदिर तक तक पहुँचने वाली चढ़ाई ने एक बार फिर से हमारे हालत पस्त कर दिये! हमे एक बार फिर वो कहावत याद हो आयी, महँगा रोये एक बार, सस्ता रोये बार-बार!!

चलिये, इस घटना से मिले  सबक ले कर इस विषय को यहीं छोड़ आगे बढ़ते है। जाखू पर्वत मालाओं से घिरे शिमला मे स्थित जाखू मंदिर समुद्र तल से 2455 मीटर ऊंची शिमला की सबसे ऊंची चोटी पर स्थित एक शानदार और रमणीक स्थान है। इसी पहाड़ी पर 108 फुट ऊंची भगवान श्री हनुमान की विशाल प्रतिमा आसमान को छूती नज़र आती है। ऐसी किवदंती है कि श्री लक्ष्मण जी को मूर्छित होने पर श्री हनुमान, हिमालय से  संजीवनी बूटी को लेने जाने के पूर्व  एक ऋषि से बूटी की विस्तृत जानकारी प्राप्त करने हेतु बापसी मे पुनः रुकने के वचन के साथ  यहाँ शिमला की इस जाखू  पहाड़ी पर रुके थे। बापसी मे "कालनेमि राक्षस" के माया जाल मे उलझने के चलते देर होने के कारण हनुमान जी अपने वचन को कायम न रख सके, तब व्याकुल साधू को स्वयंभू प्रकट प्रतिमा के माध्यम से दर्शन दे उन्हे सांत्वना दी। वही स्वयंभू प्रकट प्रतिमा पर निर्मित अति आकर्षक भव्य प्राचीन जाखू मंदिर आज भी यहाँ स्थित है।    जाखू पहाड़ी की चोटी पर 108 फुट ऊंची भव्य  प्रतिमा भी कुछ वर्ष पूर्व निर्मित की गयी जो शिमला के लगभग हर क्षेत्र से दिखाई देती है और शिमला की एक भव्य पहचान बन गयी है।  इस  मंदिर मे स्थानीय और शिमला घूमने आए पर्यटक और  तीर्थ यात्री मंदिर के दर्शन लाभ हेतु मंदिर मे आते है।  जाखू पर्वत माला पर स्थित प्राचीन हनुमान मंदिर के दुर्लभ दर्शन मन को कृत-कृत करने वाले थे। जहां श्री हनुमान हों वहाँ उनकी वानर सेना न हो ऐसा संभव ही नहीं!! पूरे जाखू पर्वत माला पर वानर सेना की उपस्थिती आपको हर जगह दृष्टिगोचर होगी। जगह जगह बंदरों से सावधान रहने के  सूचना पटल भी आपको दिखाई देते नज़र आएंगे विशेषकर चश्मा मोबाइल को सुरक्षित रखने की। लेकिन हमे इस तरह किसी भी कठिनाई से सामना नहीं हुआ।

प्राचीन मंदिर के दर्शन लाभ के पश्चात हम लोगो ने खुले आसमान मे आकाश को  छूती 108 फुट ऊंची हनुमान जी की प्रतिमा के दर्शन किये। इतनी  विशाल और आकर्षक प्रतिमा के दुर्लभ दर्शन मै अपनी ज़िंदगी मे पहली बार कर रहा था। श्री हनुमान की प्रितिमा  के मुखारविंद के दर्शन करते समय रामचरित मानस के  सुंदर कांड मे वर्णित चौपाई स्वतः ही स्मरण हो आयी जिसमे सुरसा नाम की राक्षसी के अभिमान को चूर करते हुए गोस्वामी तुलसी दास जी लिखते है कि:-

"जस जस सुरसा बदन बढ़ावा, तासु दून कपि रूप दिखावा।"

(जैसे जैसे "सुरसा" ने हनुमान जी को निगलने के लिये अपना मुंह बड़ा करती हनुमान जी भी अपने शरीर को दुगने आकार मे बढ़ाते गये) आज उसी की एक झलक जाखू की पहाड़ियों के बीच हनुमान जी की विशाल प्रितिमा को देख हुई। मूर्ति को बारम्बार प्रणाम कर भारतीय देव सांस्कृति के दिव्य संदेश "सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामया....... के साथ   देश, समाज सहित विश्व के कल्याण की कामना की।  

भगवान के "चरण पद कमल"  के दर्शन भी अभिभूत करने वाले थे!! हनुमान जी की विशाल गदा संकेत थी आसुरी रावण के विनाश की जिसको  भगवान श्री कृष्ण ने  गीता के इस संदेश मे व्यक्त किया :-

परित्राणाय साधूनां, विनाशाय च दुष्कृताम्।
धर्मसंस्थापनार्थाय, संभवामि युगे युगे।।4.8।।
अर्थात साधू पुरुषों की रक्षा के लिए, दुष्टों का विनाश करने के लिए, धर्म की अच्छी तरह स्थापना करने के लिए मै युग-युग मे प्रकट होता हूँ।

हम भारतियों मे फिल्मी सितारों की चका चौंध और  आकर्षण हर काल खंड और हर वर्ग मे रहा है जो दुनियाँ मे शायद ही कहीं देखने मे आता हो।  बड़े-बड़े परिपक्व राजनैतिज्ञ भी इस मोह पाश से अछूते न रहे!!  दुर्भाग्य!! से, इस फिल्मी आसक्ति की  मूढ़ता के दर्शन यहाँ भी हुए!!  यहाँ लगी  शिला पट्टिका के अनुसार  हिमाचल के तत्कालीन मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल एवं अभिषेक बच्चन, अभिनेता ने संयुक्त रूप से इस प्रतिमा का अनावरण किया। अभिनय की  कौन सी शूरवीरता दिखा कर और कौन सी कसौटी पर "कस" कर श्री अभिषेक को  प्रतिमा के अनावरण का सहभागी बनाया गया?, मेरे समझ से परे है?  इस विशाल मूर्ति के सामने अपने श्रद्धा सुमन अर्पित करने के दौरान लगे शिला लेख से ज्ञात हुआ कि 108 फुट ऊंची प्रतिमा का प्रथम दर्शन 4 नवम्बर 2010, तदनुसार 19 कार्तिक संवत 2067 को हुए। (बैसे मै हिन्दू संवत कैलेंडर से ज्यादा भिज्ञ नहीं हूँ लेकिन ऐसा प्रतीत होता है कि शिला पट्टिका पर विक्रमी संवत को लिखने मे कुछ त्रुटि है, कृपया विद्वान गण इस पर प्रकाश डाले??)

जाखू पर्वत श्रंखला की सबसे ऊंची चोटी के चारों ओर शिमला शहर के दर्शन के प्राकृतिक दृश्यों को अपनी स्मृति मे सँजोये हम लोगो ने बापस रिज मैदान की ओर प्रस्थान किया क्योंकि अब तक सूरज भी धीरे धीरे अस्ताञ्चल की ओर अग्रसर हो प्रकाश की रश्मियों को अपने आगोश मे समेटे हुए बढ़ रहा था और शिमला के सितारों भरे आकाश के परे नीचे घाटी मे भी  चमकती बिजली की रोशनी मे नहाये एक नए आकाश का उदय हो रहा था।

विजय सहगल   

बुधवार, 14 सितंबर 2022

हीन-भावना से परे "हिन्दी दिवस"

हीन भावना से परे-"हिन्दी दिवस"







बचपन मे जब अँग्रेजी स्कूल के अपने समकक्ष बच्चों  की अँग्रेजी  की किताबे देखते थे तो हम सरकारी स्कूल के बच्चे अपने आप को हीन भावना से ग्रसित पाते थे। हमारे विध्यालयों मे अँग्रेजी विषय की शिक्षा की शुरुआत ही छठी कक्षा से होती थी तब पाँचवी कक्षा तक तो एबीसी.... काला अक्षर भैंस बराबर थी। उन दिनों के कुछ  माता-पिता अपने बच्चों को अँग्रेजी विध्यालय के स्कूल मे सिर्फ इसलिये पढ़ने भेजते थे कि उनका बच्चा आगे चलकर "फर्राटेदार अँग्रेजी" अर्थात अंग्रेजों की तरह  "गिटिर-पिटिर" करेगा!!, बोलेगा? और सरकारी स्कूल मे पढ़ने वाले स्कूल से ज्यादा योग्य और समझदार होगा। अँग्रेजी जानने और बोलने के श्रेष्ठता के भाव  को प्रकट करने के लिये उन दिनों मात्र दो ही शब्द होते थे, "फर्राटे दार अँग्रेजी  बोलना" और "अंग्रेजी मे "गिटिर-पिटिर" करना" !!   कमोवेश यही हीन भावना की सोच हू-ब-हू बहुत से  माता-पिताओं के मन-मस्तिष्क मे आज भी है। दुर्भाग्य देखिये यही हीन भावना जब आज की तथा कथित कल्याण कारी सरकारें समाचार पत्रों मे बड़े-बड़े विज्ञापन देकर बच्चों को "फर्राटे दार" अँग्रेजी बोलने के सपने दिखा कर न केवल अपरिपक्व बच्चों के मन-मस्तिष्क को अपितु उनके गरीब माता-पिताओं के मानस पटल मे भी उस हीन भावना को बलवती करती है। 

पिछले दिनों देश के दो राज्यों की सरकार ने इसी अँग्रेजी भाषा के "फर्राटे दार" अँग्रेजी बोलने के बड़े बड़े विज्ञापन प्रिंट और टीवी माध्यमों मे दिखा कर उनकी दुखती रग पर हाथ रख कर राजनैतिक लाभ लेने की कुत्सित चेष्टा की। आज मनोवैज्ञानिक स्तर पर भी ये सिद्ध हो गया है कि मातृ भाषा ही एक ऐसा माध्यम है जिसमे बच्चे का मानसिक और बौद्धिक विकास     तेजी से होता है। लेकिन बचपन मे ही अँग्रेजी के अनावश्यक महत्व ने पढ़ने वाले बच्चों से ज्यादा उनके संरक्षकों को हीन भावना से ग्रसित किया है। मुझे याद है हाई स्कूल की परीक्षा  उत्तीर्ण करने के बाद जब मै रोजगार कार्यालय मे अपना नाम दर्ज़ कराने गया था तब वहाँ के एक बाबू ने हमारे आवेदन मे अँग्रेजी भाषा की कोई व्याकरण त्रुटि पर कटाक्ष किया था!! तब मैंने अपने चार साल मे अँग्रेजी  भाषा से अर्जित ज्ञान के आधार पर उसे पलट कर जबाब दिया था जिसका भावार्थ यह था कि, "श्रीमान, इंग्लैंड का एक सफाई कर्मी आप से ज्यादा अच्छी अँग्रेजी बोल और लिख सकता है, इस का तात्पर्य यह नहीं कि वह आपसे ज्यादा योग्य और बुद्धिमान है? महज अँग्रेजी बोलने और लिखने से ही योग्यता की पहचान नहीं हो जाती? बैसे भी अँग्रेजी मेरी मातृ भाषा नहीं है!!

मेरा कहने का तात्पर्य, हमे अँग्रेजी भाषा को जानने सीखने की  चेष्टा और प्रयास तो करने ही है लेकिन सब कुछ तुरत फुरत एक-दो वर्ष मे अन्य विषय छोड़ सिर्फ अँग्रेजी जानने और बोलने के दिवा स्वपन से परे यथार्थ के धरातल को लक्ष्य मान, अँग्रेजी का ज्ञानार्जन करना चाहिये। हमे बिना किसी दंभ और अभिमान के अन्य भाषा को सम्मान दे उनका अध्यन करना ही चाहिये लेकिन अन्य भाषा को सीखने और अध्यन मे अपनी मातृ भाषा और स्वयं अपने  स्वाभिमान से  बिना किसी समझौता किये इस सद्वाक्य को हमेशा याद रखना चाहिये  कि, "अपना मूल्य समझो  और विश्वास करो  कि तुम संसार के सबसे महत्वपूर्ण व्यक्ति हो!!" (युग निर्माण योजना, शांति कुंज हरिद्वार)।      

ये एक ध्रुव सत्य है कि जैसे जैसे आप उच्च शिक्षार्जन करते है आप का ज्ञान भाषा के साथ साथ चहुं ओर ज्ञान के अन्यत्र भी विस्तृत और व्यापक हो जाता है फिर "फर्राटे" और "गिटिर-पिटिर" पर ही ज़ोर देकर हमारे नौनिहालों को क्यों हीन भावना से ग्रसित किया जा रहा है??

अंग्रेजों की 200 साल की गुलामी के बाद एक अंग्रेज़ परस्त वर्ग आज भी सक्रिय है जो श्रेष्ठता की  भावना से ग्रसित हो अंग्रेजों द्वारा बनाए गए सब्ज बाग दिखा कर अपना एकाधिकार और आधिपत्य बनाये रखना चाहता है।

कल हिन्दी दिवस की पूर्व संध्या पर कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री श्री एचडी कुमारस्वामी का ट्वीट पढ़ कर हार्दिक दुःख और संताप हुआ जिसमे उन्होने कहा "कि टैक्स पेयर का पैसा अनावश्यक रूप से हिन्दी दिवस मनाने पर क्यों खर्च किया जाये? ऐसे मे उक्त ट्वीट अनावश्यक, असमय और गैर बाजिब था, जिसकी कोई आवश्यकता नहीं थी। ऐसा वक्तव्य ऐसे व्यक्ति द्वारा दिया गया जिनके पिता श्री एचडी देवेगौड़ा 1 जून 1996 से 11 अप्रैल 1997 देश के प्रधानमंत्री पदासीन रहे। इससे ज्यादा क्षोभ और दुर्भाग्य की क्या बात हो सकती है? उन जैसे सम्मानीय पर गैर जिम्मेदार व्यक्ति के वक्तव्य की मै कड़ी निंदा और भर्त्स्ना करता हूँ।  

बैसे तो आज हिन्दी दिवस है पर मै कोशिश करता हूँ कि देश की अन्य भाषाओं के कुछ वाक्य याद कर उस प्रांत, क्षेत्र मे या उन भाषा-भाषी लोगो के साथ बात-चीत मे  इस्तेमाल करूँ। गुजरती मे, "केम च्छो", (कैसे हो) का तो अंतर राष्ट्रीयकरण हो गया है,  केरला एक्स्प्रेस से दैनिक आवागमन के समय मलयाली मे "यान निन्ने स्नेही किन्नू" केरला!! (मै केरल को प्यार करता हूँ!!), मराठी मे, "मी सहगल बोलतोय"!! (मै सहगल बोल रहा हूँ), सिंधी मे, "कियाँ हो साईं"!! (कैसे हों भाई), तमिल मे, "बड्डकम, अन्ना"!! (नमस्कार, भाई साहब!!), छत्तिसगढ़ी, "मोला, छत्तिसगढ़ी नी आवे ताई!", (मुझे छत्तिसगढ़ी नहीं आती ताई!!), बंगाली मे, "अमी सहगल बोलची",(मै सहगल बोल रहा हूँ), पिछले दिनों लेह लद्धाख मे एक वृद्ध महिला को जूले-जूले कहकर अभिवादन से उसके चेहरे पर आयी खुशी का उल्लेख मैंने अपने लेह यात्रा ब्लॉग मे किया था  और पंजाबी तो इतनी सरल और सहज है कि, "साडे हिंदुस्तान बिच चंगी तरियाँ बोली जान्दी है!"! आइये हम सभी मिल कर आज 14 सितंबर 2022, को हिन्दी दिवस के अवसर पर हिन्दी सहित देश की अन्य भाषाओं को विकास और विस्तार करने का संकल्प ले।    

विजय सहगल


रविवार, 11 सितंबर 2022

खिलौना रेल-शिमला

"खिलौना रेल-शिमला"








2 जून 2022 को यूं तो हमे शिमला से प्रस्थान कर रामपुर बुशहर के लिये प्रस्थान करना था। हम परिवार सहित आगे बढ़े ही थे कि एक छोटे से दिशा सूचक पटल पर शिमला रेल्वे स्टेशन जाने के मार्ग  को देख मैंने अपने बेटे से कार की दिशा शिमला रेल्वे स्टेशन मोड़ने के लिये कहा। क्योंकि शिमला की टोय ट्रेन एवं शिमला रेल्वे स्टेशन देखने की टीस मेरे मन मे थी। चूंकि अपनी कार से सफर करने के कारण कालका शिमला ट्रेन की यात्रा के  आनंद से वंचित रह जाने के कारण मैंने शिमला रेल्वे स्टेशन पर खड़ी 52456 हिमालयन क्वीन एक्स्प्रेस ट्रेन मे बैठ कुछ फोटोग्राफी कर उस यात्रा की कसर पूरी की। सुबह के लगभग 9.30 बजे थे मैदानी रेल स्टेशन के विपरीत स्टेशन का रास्ता पतला और संकरा था। सड़क के दोनों ओर कार पार्किंग थी जिसके बीच से बमुश्किल एक कार आ-जा सकती थी। गली के एक मुहाने पर जैसे तैसे कार को पार्क कर हम लोगो ने शिमला रेल स्टेशन के प्लैटफ़ॉर्म पर प्रवेश किया। एक छोटे से गलियारे से जब हम नीचे प्लैटफ़ॉर्म की ओर बड़े तो प्लैटफ़ॉर्म की साफ सफाई देखकर चकित रह गये। ऐसा, एक दम साफ सुथरा चमकदार रेल स्टेशन प्लैटफ़ॉर्म कम ही देखने को मिलता है।

छोटा सा मुख्य प्लैटफ़ॉर्म नंबर 1 पर बहुत ज्यादा गहमा गहमी नहीं थी। हम लोगो ने तय किया कि अब नाश्ता शिमला स्टेशन की कैंटीन मे ही ले लेना चाहिये क्योंकि सुबह के 9.30 बजने को थे। जितना स्टेशन और प्लैटफ़ॉर्म साफ सुथरा था रेल कैंटीन भी उतनी ही साफ-सफाई वाली थी। रेल कैंटीन मे आलू पराँठे का ऑर्डर दिया और कुछ ही मिनिट मे गरमा-गरम स्वादिष्ट आलू पराँठे हाजिर थे। कैंटीन ठेकेदार भी वरिष्ठ सज्जन श्री अग्रवाल जी थे जो किसी एक अन्य रेल यात्री से बातों मे मगन थे। स्वल्पाहार के दौरान उनके वार्तालाप से ज्ञात हुआ कि श्री अग्रवाल जी लखनऊ से 50 वर्ष पूर्व शिमला आकार वस गये। मैंने भी उनसे परिचय प्राप्त कर उनके स्वादिष्ट आलू पराँठे और अच्छी ग्राहक सेवा की प्रशंसा की।

चूंकि कालका शिमला की मनोहारी रेल यात्रा तो नहीं कर सके थे अतः नाश्ता-पानी से निर्वृत्त हो अब बारी थी कुछ बनावटी फोटो शूट की ताकि शिमला रेल स्टेशन के भ्रमण से ही कालका शिमला यात्रा का काम चलाया जाये। सुबह 10.40 बजे शिमला से चलने वाली 52456 हिमालयन क्वीन प्लैटफ़ॉर्म पर लग चुकी थी। गाड़ी के जाने मे अभी बहुत समय था अतः हमने सोचा कि ट्रेन की बोगी मे बैठ कर कुछ फोटो यादों के रूप मे सँजोयी जाये। फिर मन मे आया जब मुफ्त मे फोटो सँजोना है तो क्यों न प्रथम श्रेणी के डिब्बे मे यादें ताजा करें? पर खाली पड़े  प्रथम श्रेणी डिब्बे की फोटो निकाल,  ये सोच कर सामान्य श्रेणी के डिब्बे की तरफ बढ़ गये कि कहीं टी॰सी॰ महोदय से भेंट हो गयी तो उलाहना न देने  लगे कि वाह! भाई वाह!! फोकट मे प्रथम श्रेणी का मजा? सामान्य श्रेणी के डिब्बे मे परिवार सहित अभिनय का स्वांग  करते हुए  फोटो शूट किया। बड़ी रेल लाइन की ट्रेन को रोकने हेतु चैन प्रणाली की लाल चैन को खींचने से ट्रेन स्वतः ही रुक जया करती है बैसा यहाँ छोटी रेल लाइन मे कुछ  अलग देखने को मिला। इस खिलौना गाड़ी की आपात कालीन चेन बड़ी रेल लाइन की रेलों से अलग थी। इस ट्रेन को  आपात स्थिति मे रोकने के लिये इलैक्ट्रिक बैल का स्वीच, कुछ कुछ दूरी पर सीटों के बीच बोगी  मे लगाया गया  था। जिसको दबाने पर घंटी ट्रेन ड्राईवर के पास बजने के संकेत पर ड्राईवर ट्रेन को रोकेगा। इस आपात स्थिति कि चैन को देख आश्चर्य होना स्वाभाविक था। ट्रेन की साफ सफाई ने यहाँ भी मन मोह लिया।

तमाम आधुनिकता और तकनीकि विकास के बावजूद शिमला रेल का संचालन 1903 की तरह ही किया जा रहा था, जब शिमला मे पहली बार ट्रेन का संचालन शुरू हुआ था। चाहे इंजिन को रखने का शेड हो या छोटा सा चलता फिरता रेल इंजिन। रेल की पटरी बदल रेल को दूसरी दिशा मे ले जाने के लिये मानविक्रित लीवर का उपयोग पुराने जमाने की रेल की तरह शिमला रेल मे आज भी उपयोग मे लिया जा रहा है। रेल इंजिन की दिशा बदलने के लिये उपयोग मे लाये जा रहे सिस्टम को देखना कौतूहल का विषय था। गोलाकार रेल की पटरी पर बनाए गये घूमते प्लैटफ़ॉर्म पर रेल इंजिन को बीचों-बीच खड़ा कर मानवीय शक्ति के संचालन से अर्धवृत्ताकार दिशा मे 180 डिग्री पर घुमा कर दिशा बदलने बाले सिस्टम को  देखना सुखद आश्चर्य प्रदान करने वाला था। हो सकता है इस उपकरण को आप मे से बहुतों ने न देखा हो? जिसकी फोटो भी इस ब्लॉग मे आपको रोमांचित करेगी।   

सन 2018 मे इस शिमला स्टेशन को संयुक्त राष्ट्र शिक्षा, विज्ञान और सांस्कृतिक संगठन (यूनेस्को) द्वारा विश्व विरासत का दर्ज़ा दिया जाना शिमला ही नहीं देश के लिये बड़े गौरव की बात है। शिमला के इस स्टेशन का उत्तम प्रकार से रखरखाव कर अतीत के वैभव को बनाये रखने के रेल प्रशासन और उसके कर्मचारी, अधिकारी बधाई के पात्र है इस हेतु उनकी जितनी भी प्रशंसा की जाये कम है।

विजय सहगल               


बुधवार, 7 सितंबर 2022

गणेश चौथ का मकर

 

"गणेश चौथ का मकर"







भारतीय सांस्कृति मे तीज त्योहार और पर्वों का बड़ा महत्व है। पूर्व से पश्चिम तक उत्तर से दक्षिण तक अलग अलग प्रान्तों और भाषा से परे विभिन्न लोकसंस्कृति, बेशभूषा  और पहनावे   की झलक इन उत्सवों और पर्व के समारोह मे स्पष्ट देखी जा सकती है। महाराष्ट्र से शुरू हुआ ऐसा ही एक त्योहार गणेश चतुर्थी या गणेश चौथ आज पूरे भारत बर्ष बड़ी धूम धाम और उत्साह से मनाया जाता है। मुझे याद है बचपन मे ये एक ऐसा त्योहार होता था जब हर घर मे गणेश चतुर्थी के इन 7 दिनों मे बच्चे अपने अपने घरों मे अपनी रचनात्मकता और सृजनशीलता का उपयोग कर विभिन्न तरह की झाकियों का प्रदर्शन किया करते थे जिन्हे हम लोग "मकर सजाना" कहते थे। इस कलात्मक प्रदर्शनी के लिये "मकर" शब्द का उपयोग मै आज तक नहीं समझ पाया। कोई ज्ञानी श्रीमान पुरुष यदि इसकी व्याख्या सांझा करे तो खुशी होगी। मकर सजाने मे बच्चों की कल्पना अनंत आकाश की तरह विशाल थी लेकिन इन प्रदर्शनीयों के केंद्र बिन्दु भगवान गणेश ही होते थे। जिनको मकर की झाकियों के मध्य मे स्थापित कर उनके चारों ओर, हर घर मे कोई विषय लेकर सजावट की जाती थी। कोई किले, कोई पहाड़, कोई नगर या जंगल की झांकी सजाता था। जब जंगल की पृष्ठभूमि होगी तो जंगली जानवरों के खिलौने शेर, भालू, तेंदुए हाथी के माटी के खिलौने भी जहां तहां बाग बगीचों से लायी हरी भरी पट्टियों और शाखाओं के बीच खड़े कर दिये जाते थे। जमीन पर घास-मंडी से लायी जानवरों की हरी घास को चारों ओर बिछा कर जंगल के दृश्य की कल्पना शीलता को धरातल पर वास्तविक रूप मे परिवर्तित कर दिया जाता था। कहीं कहीं अहिंसा का संदेश देती झाँकी मे शेर और बकरी एक ही झरने से पानी पीते नज़र आते।  किले का सृजन गत्तों पर गेरुई के लाल या काले रंग  रंग से रंग कर उन पर सफ़ेद या काले रंग से समांतर रेखाएँ के बीच आड़ी रेखाओं से ईंट का रूप दे किले के कंगूरे  की  बुर्ज का रूप देने का प्रयास कोई करता। सीधे गत्ते को गोलाकार देने के लिये गत्ते के पीछे धागों से बांध दिया जाता। इस तरह की 4-5 आकृतियाँ एक के ऊपर एक या लाइन मे फैला कर बड़े किले का रूप देखना आकर्षक और रुचिकर दिखाई देता था। जब किला हो तो गत्तों की सहायता से काले रंग की तोपों की नली, और बुर्ज पर खड़े सिपाही के खिलौने खड़े करना तो लाज़मी बनता। मकर की तैयारी के लिए पूरे साल खिलौनों के खरीद की तैयारी चलती रहती थी।

काले काले पहाड़ों का रूप देने के लिए उन दिनों घर घर मे उपयोग होने वाले पत्थर के कोयले का उपयोग कर, एक के उपर एक रख पहाड़ों को ऊंचाई प्रदान की जाती। बर्फीले पहाड़ की आकृति रुई से ढँक कर पूरी की जाती थी। बर्फीले पहाड़ पर भालू और भेड़ तथा अन्य पहाड़ों पर  शेर चीतों, हिरण के कागज की मिट्टी के खिलौनों को गुफा का रूप देकर सजाया जाता था। उन दिनों दो तीन भागों मे विभक्त नृत्यांगना को, कोई बच्चा छिप कर काले धागे से हिला कर चमत्कारिक नृत्यांगना का नृत्य प्रस्तुत करता जिसे देख बच्चे खुश होते।  हम सभी बच्चे एक दूसरे के घरों मे सजने वाले इस मकर को घंटों देख कल्पना लोक मे खोये रहते।

आज के बच्चों के विपरीत उन दिनों गणेश चौथ पर मकर सजाने के लिए बच्चों मे रचनात्मकता, नव सृजन और कलात्मकता निखारने की असीमित संभावनाएं उपलब्ध रहा करती थी। मुझे याद है हमारे पड़ौस मे एक राजू डेंगरे जी के घर मकर मे विराजित गणेश जी के पीछे एक रंग बिरंगी चक्र टेबल फैन की सहायता से बनाया जाता था। उसकी बिशेषता थी की गोल चक्र मे कई रंगो की पारदर्शी पन्नियाँ लगा उसके पीछे एक बल्ब जलाया जाता था। जिसकी चमकदार रोशनी मे चक्र घूमता था। न जाने किस तकनीकी से उनके पिता श्री, पंखे मे ऐसे ही दो चक्र लगते थे जो एक ही धुरी पर विपरीत दिशा मे घूम कर 3डी दृश्य पैदा करते थे। मानों चक्र की धुरी का केंद्र लगातार अनंत गहराई मे प्रवेश किए जा रहा हो!! आज 50 साल बाद भी मै राजू डेंगरे के पिता जी द्वारा अपनाई इस तकनीकि को न जान सका?

हमारे बचपन के साथी हेमचन्द भाई पटेल के घर  उन दिनों नीले, पीले रंग की ट्रेन का प्रदर्शन उन दिनों किया गया था। जो चाबी की सहायता से गोलाकार पटरी पर दौड़ती थी और उन दिनों की ताज एक्स्प्रेस की प्रितिकृति थी। एक बार चाबी भरने के बाद 8-10 चक्कर लगा लेती थी। मेरे सहित सभी बच्चों के बीच उक्त ट्रेन  कौतूहल का विषय थी। उन दिनों चाबी से घूमने वाले कम ही खिलौने दिखाई देते थे। भिन्न भिन्न जगहों पर  इतने खिलौनों का दर्शन/प्रदर्शन एक साथ दिखाई देना मन मे खुशी और उत्साह पैदा कर देता था। हमारे घर के आसपास और सामने के घरों के अलावा घास मंडी मे धुम्मन सेठ के घर भी मकर सजाया जाता था, जहां तमाम लोग मकर को देखने पहुँचते थे।। शायद परिवार के किसी सदस्य का उपनाम या नाम का अपभ्रंश से "धुम्मन" नाम पड़ा हो? लिखधारी परिवार के बच्चे  हमारे बचपन के सहपाठी थे।  

लेकिन सबसे ज्यादा दर्शक मुरली मनोहर मंदिर मे आते थे। एक तो यूं भी मंदिर मे नियमित दर्शनार्थी, भगवान की आरती और दर्शन मे शामिल होती ही थे साथ ही साथ पुजारी जी के बच्चों द्वारा मंदिर के पास की दालान मे मकर देखने वालों की भीड़ लगी रहती थी। पिछले साल भाई राजू गोलवलकर ने मंदिर मे सजाई झांकी की कुछ फोटो फ़ेस-बुक पर सांझा की थी जिसने मेरे बचपन की यादें ताजा कर दी थी और जिनको मैंने अपने लेपटोप मे पास सँजो कर रक्ख लिया था जिसे मै बगैर राजू की अनुमति के सांझा कर रहा हूँ।

मुझे याद है कि उन दिनों मैंने विज्ञान के एक प्रयोग को एक बार अपने घर की झांकी मे उपयोग किया था जिसमे टेबल टेनिस की गेंद को पानी की धारा पर चला कर प्रदर्शन किया था। लोगो ने पानी की धार पर नाचती टेनिस की बाल को बड़ी उत्सुकता और जिज्ञासा से जादू जैसा चमत्कार मान देखा था। कुछ तो कहते थे कि धागे से बाल को पानी की धार पर लटका दिया। लेकिन जैसे ही हम लोग पानी की धारा मे हाथ या किसे डंडे से अवरोध करते तो बाल तुरंत गिर जाती थे जिसे पुनः धारा मे स्थापित करने पर बॉल नाचने लग जाती!! लोगो ने गुरुत्वाकर्षण के इस प्रयोग को अचरज के साथ देख बड़ी प्रसन्नता व्यक्त की थी।

अनंत चौदस या डोल ग्यारस वाले दिन गणेश विसर्जन का सिलसिला दिन से शुरू हो सारी रात और देर रात तक चलता रहता था। झाँसी शहर मे श्री गणेश प्रतिमाओं को लक्ष्मी ताल मे विसर्जित किया जाता था, जिनके साथ बुन्देली लोक नृत्य "चाचर" खेलना देखते ही बनता था। बड़ा दुःख और खेद है वर्तमान मे लोगो की व्यस्तता और राजनैतिक आश्रय  न मिलने के कारण  उक्त बुंदेलखंडी नृत्य लुप्तप्राय होने की कगार पर है। कुछ लोग तालाब मे एक मात्र नाव के नाविक लंगड़ की सेवाएँ ले तालाब के बीच मे प्रतिमाएँ विसर्जित करते थे। झाँसी के अधिकांश लोगो सहित मै भी उस नाविक को लंगड़ कहता था क्योंकि शायद ही किसी को उसका नाम पता हो? उस ज़िंदादिल, संतोषी  नेक नाविक ने अपने नाम के विरूप अपभ्रंश पर शायद ही कभी प्रतिरोध या प्रितिक्रिया व्यक्त की हो!! साथ ही नाव के भाड़े या उतराई पर भी मैंने उसे कभी हीला हुज्जत करते नहीं देखा या सुना।

आज विक्रम संवत 2079 की भाद्र माह, शुक्ल पक्ष की एकादशी तदानुसार अँग्रेजी वर्ष की  6 सितंबर 2022 पर भगवान श्री गणेश की विग्रह विसर्जन करने के पूर्व मैंने बचपन के उन स्वर्णिम पलों को आज पुनर्जीवत करने का निश्चय किया। यध्यपि 54-55 वर्ष पूर्व के पलों को यादों से विलग यथार्थ मे जीना मुश्किल ही नहीं असंभव था। लेकिन जब दिल मे ठान लिया तो ठान लिया!! अपने अहम रूपी छद्मवेश को परे रख  अपनी कॉलोनी के सामने और अगल बगल के आठ दस घरों मे श्री गणेश भगवान की मूर्ति के विसर्जन की सूचना, व्यक्तिगत तौर पर और श्रीमती जी के माध्यम से  सभी घरों मे दे दी। कॉलोनी के तरुण और बच्चों को भी आमंत्रित कर प्रसाद के रूप मे मिष्ठान की  व्यवस्था भी तुरत फुरत कर ली। फिर क्या था ठीक शाम को छह बजे सभी घरों के लोग इक्कठे हो गये और बिघ्न विनाशक श्री गणेश की प्रतिमा के साथ जुलूस के रूप मे शामिल हो इन्ही घरों के सामने भ्रमण किया। लोगो से आग्रह किया गया था कि वे अपने साथ अपने घरों से  शंख, घंटी, मजीरे, झालर भी साथ ले आएं!! बच्चों ने गणपत बब्बा मोरैया, अगले वरष तू जल्दी आ!!, गणपत गणेश की जय!!, एक-दो-तीन-चार, गणपत जी की जय जय कार!! पाँच-छह-सात-आठ, गणपति जी हमारे साथ!! आदि के  जयकारों के साथ जलूस के रूप मे भगवान गणेश जी की मूर्ति के साथ कॉलोनी के पार्क मे एकत्रित हो पहुंचे।  यकीन मानिए टोली मे उपस्थित लोगो कि संख्या 28-30 के लगभग हो गयी थी। मुझे यकीन नहीं था कि इतने सूक्ष्म सूचना पर पड़ौसी इतनी जल्दी एकत्रित हो जायेंगे!! 50-60 मीटर के इस अल्प भ्रमण के बाद सामने पार्क मे ही पर्यावरण और प्रदूषण के प्रति जागरूक हमारे रहवासियों ने भगवान श्री गणेश की विधिवत पूजन-आरती  और मंत्रोच्चार के बीच मजीरों घंटी और शंख ध्वनि के साथ  एक साफ सुथरी जल से भरी बाल्टी मे सम्मान सहित श्री जी की प्रतिमा का विसर्जन किया। एक ओर जहां इस कार्यक्रम से कॉलोनी के सभी बाल-वृंद, युवा-बुजुर्ग  उत्साहित थे वहीं दूसरी ओर मैंने भी इन  यादगार पलों को आज पुनः अनुभव किया जो  मेरे लिये किसी स्वर्गिक आनंद से कम न था। जय श्री गणेश!!

विजय सहगल