"संजय
उवाच"
पिछले कुछ सालों से देश के विभिन्न हिस्सों
से सत्ताधारी सरकारों के बड़े-बड़े बल,
वैभवशाली नेताओं को भ्रष्टाचार के आरोपों मे गिरफ्तार कर जेलों मे डाला गया है। इन
महामहिम!! मंत्रियों ने अपने राजनैतिक रसूख और मंत्री पद से मिली सत्ता की शक्ति
का घोर दुर्पयोग कर काली कमाई की, लेकिन जब कानून
ने अपना काम कर इन्हे सलाखों के पीछे जेल भेजा तो जैसा कि उम्मीद थी तुरंत
संवैधानिक संस्थाओं पर आरोप लगाने मे एक मिनिट की देरी नहीं की गयी कि "राजनैतिक
दुर्भावनाओं", "प्रतिशोध की
राजनीति", "बदले की
भावना" के कारण प्रवर्तन निदेशालय ने
कार्यवाही की है।
महाराष्ट्र सरकार के मंत्री रहे अनिल देशमुख
और नाबाव मालिक दिल्ली सरकार के "कट्टर ईमानदार" मंत्री सतेन्द्र जैन पंजाब के स्वास्थ मंत्री विजय सिंगला,
पश्चिमी बंगाल के शिक्षा मंत्री पार्थ चटर्जी इनमे से कुछ प्रमुख "ईमानदार
राजनेता" है जिनके विरुद्ध प्रवर्तन निदेशालय ने प्रतिशोध और बदले की भावना
से कार्यवाही की है??
28 नवम्बर 2020 को मैंने अपने ब्लॉग मे संजय
राऊत के अहंकार और सत्ता के मद मे चूर
होकर एक महिला अभिनेत्री कंगना रनौत के मुंबई स्थित घर की ईंट गारे की चंद दीवारों
को ढहाकर अपने स्वामित्व के समाचार पत्र "सामना" मे बड़े बड़े अक्षरों के मुख्य शीर्षक "उखाड़
दिया" प्रकाशित कर एक औरत के सामने अपने पुरुषत्व का भौड़ा प्रदर्शन कर अपनी
शेख़ी बघारने के बारे मे लिखा था। (https://sahgalvk.blogspot.com/2020/11/blog-post_28.html)
और आज जब 1 अगस्त 2022 को प्रवर्तन
निदेशालय के अधिकारियों ने 1048 करोड़ के "पात्रा चॉल" घुटाले मे उन्हे
उनके घर से गिरफ्तार किया तो परिवार के लोगो से अपना तिलक और आरती उतरवाने का जो
स्वांग उन्होने किया मानों धर्म की संस्थापना,
दुर्बल और निरीह लोगो के अधिकारों के रक्षार्थ युद्ध करने के लिए प्रस्थान कर रहे
हों!!
विदित हो कि सन 2007 मे जिस 47 एकड़ मे वसी मुंबई स्थित "पात्रा
चॉल" जिसमे 647 निर्धन और मध्यम वर्गीय
परिवार रहा करते थे और जिसको महाराष्ट्र आवास विकास अभिकरण (म्हाडा),
बड़े बड़े बिल्डर और राजनैतिक गँठजोड़ के अनैतिक गिरोहों ने सपनों के घर का झांसा
देकर जगह खाली करा ली थी, उस "पात्रा
चॉल" के 647 परिवार अपने घर के छद्म
स्वप्न की आशा मे पिछले पंद्रह साल से दर दर की ठोकरे खाते हुए
यहाँ-वहाँ भटक रहे है। कुछ जो सौभाग्यशाली थे वे अपने घर की लालसा छोड़ अपने-अपने
गाँव की यात्रा पर प्रस्थान कर गये,
उनमे से "पात्रा चॉल" कुछ अभागे जो उतने सौभाग्यशाली नहीं थे अपने घर की
अभिलाषा और इच्छा मन मे लिये ही मजबूरी मे
अपनी अंतिम यात्रा पर परलोक गमन करने को मजबूर
हो गये!!
इन्ही निर्धन,
दरिद्र और कृश काया के लोगो की आहों को संत कबीर दास जी ने अपने एक दोहे मे शब्द
दे कर कहा था-:
दुर्बल को न सताइए, जाकि मोटी हाय।
बिना जीव की हाय सों, लोह भस्म हो जाए॥
जिन
छद्म और मिथ्या आश्वासनों के बल पर "पात्रा चॉल" के 647 दरिद्र नारायणो के
सिर से छत्त छीन कर जिन अपराधियों ने उनको आश्रय से वंचित किया था शायद आज उन्ही
निराश्रित परिवारों के श्राप, अभिशाप और
बददुआओं का ही परिणाम है कि पंद्रह वर्ष पश्चात संजय राऊत जैसे अहंकारी राजनेता को
जेल की सलाखों के पीछे जाने को मजबूर होना पड़ा।
जो
संजय राऊत अभी पिछले दिनों शिवसेना पार्टी मे हुई मत भिन्नता के चलते अपने ही बागी
विधायक साथियों पर हमला करते हुए मुंबई आने पर जान से मारने तक की धौंस देते थे,
विधायकों के शव मुंबई आने और उन्हे सीधे पोस्टमार्टम के लिये मुर्दाघर भेजने की
धमकी देते थे, मानों वे किसी रियासत
के राजा हों, वहीं दूसरी ओर भ्रष्टाचार
मे संलिप्त होने पर जब प्रवर्तन निदेशालय द्वारा उन्हे गिरफ्तार किया गया तब विभाग और व्यवस्था को दोष
दे कर सरकार पर "तानाशाह" होने का
आरोप लगा रहे है !!
वो
तो भला हो आधुनिक सूचना प्रौद्योगिकी और "सोश्ल मीडिया" का जिसने आज ऐसे
खलनायकों की ऐसी दोहरे चरित्र की राजनीति को बेनकाब कर दिया है। अब आम जनता ऐसे राजनैतिज्ञों के असली चेहरे को पहचान चुकी
है। तभी तो सत्ता मे रहते हुए जो संजय
राऊत अपने बड़बोले पन की शेख़ी बघार कर अपने कार्यकर्ताओं को हिंसा के लिये भड़काने,
जमीन आसमान एक कर गीदड़ भभकी देते थे,
सत्ता परिवर्तन के बाद उनकी बातों और धमकियों का कहीं कोई असर दूर दूर तक नहीं हुआ और कहीं से कोई एक भी "चूँ-चपड़ की आवाज भी सुनाई नहीं दी!!
ये
संजय राऊत ही थे जिन्होने महाराष्ट्र की जनता द्वारा बीजेपी और शिवसेना के चुनावी पूर्व
गठबंधन को दिये गये जनादेश की अवाज्ञा कर श्री उद्धव ठाकरे को मुख्यमंत्री पद की
लालच और लालसा जगा काँग्रेस, राष्ट्रवादी
कॉंग्रेस पार्टी जैसी विपरीत विचारधारा के दलों से गठबंधन कर शिव सेना को सरकार के
मुखिया बनाने का अपवित्र गठबंधन किया!! ऐसी भ्रष्ट और मौका परस्त युति का जीता
जागता परिणाम सबके सामने है कि इस अनैतिक गठजोड़ के दो बड़े मंत्री अनिल देशमुख,
नाबाव मालिक और सत्तारूढ़ दल के बड़े नेता स्वयं संजय राऊत भ्रष्टाचार के आरोप मे जेल
की सलाखों के पीछे है।
अब
तनिक विपक्ष के उन शूरवीर युद्धाभिलाषी योद्धाओं पर गौर करें जो ईडी द्वारा
गिरफ्तारी के विरुद्ध संजय राऊत के पक्ष मे खड़े है। अपनी धुर विरोधी स्वभावगत नीतियों के कारण विपरीत ध्रुवों पर खड़ी
काँग्रेस ने संजय राऊत की गिरफ्तारी का विरोध किया है। भ्रष्टाचार के अकंठ दल-दल
मे फंसी काँग्रेस का विरोध तो लाज़मी है। नेशनल हेरल्ड कांड मे जूझ रहे इस दल ने स्वतन्त्रता के इतिहास मे इस अखबार की दुहाई
और योगदान को बारंबार स्मरण करा कर सत्ता धारी दल को पानी पी पी कर कोसा। यहाँ यह
स्मरण रखना आवश्यक है कि देश की स्वतन्त्रता के संघर्ष मे मात्र कॉंग्रेस का ही
योगदान कहना नेताजी सुभाष चन्द्र बोस,
चन्द्रशेखर आज़ाद, भगत सिंह,
अश्फ़ाक उल्लाह खान, राम प्रसाद विस्मिल,
उद्धम सिंह, हेमू कलानी जैसे हज़ारों हज़ार नौजवानों का अपमान है जिन्होने
अंग्रेज़ो से लड़ते हुए अपने प्राणों की आहुति दी थी। दूसरी,
स्वतन्त्रता के बाद से ब्लॉक काँग्रेस कमेटी से लेकर राष्ट्रीय काँग्रेस कमेटी के
अधिकतर पदाधिकारियों, राज्यों और केंद्र के तमाम मंत्रियों ने देश को स्वतंत्र कराने हेतु जो श्रम,
त्याग और बलिदान किया था उसकी पूरी-पूरी
कीमत आज़ादी के पश्चात,
भ्रष्टाचार, बेईमानि भाई भतीजा बाद,
लाइसेन्स, कोटा,
परमिट के रूप मे बसूल की।
जहां
तक जया भादुड़ी जी का संजय राऊत की गिरफ्तारी पर विरोध करने का सवाल है,
समाजवादी पार्टी की दया और कृपा से राज्य सभा मे राजनीति करने वाली महोदया का
राजनैतिक जीवन कोई बहुत बड़ी उपलब्धियाँ भरा नहीं रहा और न ही कोई ऐसी उपलब्धि हांसिल की जिसके कारण देश,
और समाज मे क्रांतकारी परिवर्तन आया हो?
या जिसका उल्लेख किया जा सके? जिस दल को
पश्चिमी बंगाल मे मेडम भादुरी ने अपनी पूरी क्षमता के साथ अपने मन,
वाणी और कर्म से समर्थन किया था उसके पार्थ चट्टर्जी जैसे मंत्रियों,
कट मनी, टोलाबाजी बसूलने वाले कार्यकर्ताओं
की करतूतों को कौन नहीं जनता? इस अनैतिक कमाई को कौन सा रंग दिया जाय,
शायद वह बेहतर जानती और समझती होंगी?
ये उस कथित महान नायक परिवार से आती है जिन्होने कोरोना काल मे ज़िंदगी और मौत से जूझ रही देश की
जनता को संकट के समय सोश्ल मीडिया पर एक
करोड़ की कार को क्रय करने के जश्न का भौड़ा और घिनौना प्रदर्शन कर पीढ़ित और दुखी जनता का मखौल उड़ाया
था!! इनकी निर्धन और दुर्बल लोगो के प्रति सोच का अंदाज़ आप इसी से लगा सकते है।
टीएमसी,
एनसीपी के विरोध को तो सिर्फ एक कहावत के माध्यम से समझा जा सकता है कि,
सूप तो सूप छलनी जिसमे छत्तीस छेद है वह कहती है सुई तेरे पेट मे छेद है!! इन दलों
के महान योद्धा!! अनिल देशमुख, नाबाव मालिक,
पार्थो चटर्जी प्रकृति और ईश्वर द्वारा निर्मित शास्वत,
अनादि, अनंत सत्य को भी चुनौती देते नज़र आते है
मानों अवैध, अधम और अनीति पूर्वक
कमाये काले धन को का उपभोग ईहलोक के बाद परलोक मे भी ले जाने मे सक्षम है! मुझे एक
सुभाषित सूक्ति याद आ रही है जिसे मैंने मध्य प्रदेश के डबरा मे,
एक माननीय न्यायाधीश की कोर्ट मे पढ़ा था:-
"बीती हुई इस घड़ी को कौन लौटा पाएगा।"
"इस धरा पर, इस धरा का सब धरा रह जायेगा।"
यहाँ
एक बात सभी दलों और नेताओं के वक्तव्यों मे समान थी कि भ्रष्टाचार के आरोप मे
गिरफ्तार संजय राऊत के प्रति संवेदना,
सहानुभूति, हमदर्दी और दया रखने
वाले थे। इनमे से एक भी दल और नेता को "पात्रा चॉल" के उन 647
दुर्बल, निर्धन,
गरीब परिवारों के प्रति कोई दया भाव नहीं
था जिनकी झोपड़ियों को 2007 मे झूठ और फरेब के चलते संजय राऊत और उनके काकस गिरोह
ने पिछले पंद्रह वर्षों से दर-दर भटकने के लिए छोड़ दिया था। काश इन विरोधी दलों के शूरवीरों को "पात्रा
चॉल" के उन 647 अकिंचन, दरिद्र नारायणों,
निर्धन नागरिकों के प्रति भी अपने
कर्तव्यों और दायित्वों के बारे मे विचार किया होता??
विजय
सहगल