मंगलवार, 30 अगस्त 2022

नग्न सत्य

"नग्न सत्य"

 



हमारे मित्र श्री अरविंद शर्मा जी ने पिछले दिनों सन 1896 मे  श्री जीन लियोन जेरोम  द्वारा रचित निम्न रचना "झूठ-सच" प्रेषित की। 

The Lie & The Truth


The Lie said to the Truth:
"Let's take a bath together,
the well water is very nice."

The Truth, still suspicious,
tested the water and
found out it really was nice.

So they got naked and bathed.

But suddenly, the Lie
leapt out of the water and fled,
wearing the clothes of the Truth.

The Truth, furious,
climbed out of the well
to get her clothes back.

*But the World,*
*upon seeing the naked Truth,*
*looked away,*
*with anger and contempt.*

Poor Truth returned to the well and
disappeared forever,
hiding her shame.

Since then,
_*the Lie runs around the world*_,
_*dressed as the Truth, and*_
_*society is very happy...*_
_*Because the world has no desire*_
_*to know the naked Truth.*_

( _*Jean-Léon Gérome*, wrote the above in 1896_ )


मेरे लगभग उनतालीस वर्ष के बैंक सेवाकाल मे यूं तो मेरे अनेकों मित्र और सहचर रहे है पर उनमे श्री मुकेश महेन्द्रा, श्री सतीश शर्मा, श्री सुबोध आनंद और  श्री अरविंद शर्मा मेरे सम्मानीय मित्रों और शुभ चिंतकों मे से कुछ है जिनका मै व्यक्तिगत तौर पर दिल से आदर और सम्मान रखता हूँ।  क्योंकि ये सभी  उम्र, अनुभव शिक्षा और चातुर्य मे मुझ से ज्यादा अनुभवी और ज्ञानी है। इन सभी मे कविता मे वर्णित  स्पष्टवादिता, सत्यवादिता  और निर्भीकता जैसे गुण सामान्य थे पर शायद आज के संदर्भ मे इन्हे सद्गुण कहें या दुर्गुण जिनके  के कारण ये सभी सफलता के उन पायदानों तक  न पहुँच सके जिन तक अन्यथा लोग पहुँच पाते है और जिसके वे हकदार थे। ऐसे अन्य अनेकों साथी निश्चित ही हमारे-आपके संपर्क मे बैंक सेवा के दौरान आये होंगे। इनके प्रति सेवानिव्रत्ति के बाद भी आदरभाव, सम्मान  मन मे उपजता है।  

रचना सार्वकालिक होने से मुझे भी अच्छी लगी।  उनका ये भी  आग्रह था कि मै इस रचना को हिन्दी अनूदित भी करूँ। मै  कह नहीं सकता कि इस उद्देश्य मे मै कहाँ तक सफल रहा? इस का निर्णय मै अपने सुधि पाठकों के उपर छोड़ता हूँ:-

"नग्न सत्य"

सच और झूठ थे दो नाम,
अलग अलग है आते जाते।
पर एक दिन कहा झूठ ने,
चलो आज एक साथ नहाते।

देख!!,
कुएं का पानी अच्छा है।
शंका के संग।
किया आचमन॥
सच ने बोला,
"हाँ", जल मीठा और सच्चा है॥

लगे नहाने वस्त्र त्याग कर,
झूठ संग थे साथ-साथ पर॥
तभी डाह, झूठ मन आई।
पानी से छलांग लगाई॥
पहन वस्त्र, सच के, वह भागा।
रहा देखता, सच, हतभागा!!

जब तक सच, बाहर आ पाता।
हा! हा!! लाज बचाना पाता?
"नग्न सत्य" को देख सामने,
दुनियाँ ने, उपहास उड़ाये।
तब से ये दस्तूर बन गया,
सच संकट, झूठा मुस्काये॥

झूठ पहन, सच के गणवेश।
घूमे दुनियाँ, बन दरवेश॥
देख हँसाई, जग की, खुद पर,
"सच", मन ही मन पछताया॥
गहरी लाज़ शरम के कारण,
कूप से फिर, बापस न आया॥

"कूट" बखान की महिमा न्यारी।
निजी स्वार्थ "सच" पर है भारी।
हर्षित जन है, हर्षित गण-मन।
"सत्य घिनौना", क्या प्रयोजन?
हम कृतघ्न झूठ को हेरें।
"कटु सत्य" से आंखें फेरें॥
स्याह रात के पथ अँधियारे।
"नग्न सत्य" कैसे स्वीकारें?
"नग्न सत्य" कैसे स्वीकारें?

उक्त रचना की ही तरह  सत्य की महिमा हमारे ऋषियों और महात्माओं ने  "सत्यवादी राजा हरिश्चंद्र" की ईमानदारी और सत्यवादिता पर गहराई से प्रकाश डाला है वही दूसरी ओर कुटिल और धूर्त व्यक्तियों के बारे मे भी विस्तार से लिखा है। लेकिन ये रचना कुछ अलग हट के है। एक सौ छब्बीस वर्ष बाद भी आज के दौर मे विशेषतः भारतीय राजनैतिक परिदृश्य मे ये रचना सम-सामयिक और प्रांसंगिक है। मेरी और श्री शर्मा जी की भी ये इच्छा थी कि इस रचना मे वर्तमान समय के अनुरूप देश मे झूठ के रूप मे "कुख्यात पात्र" का नाम भी लिखू?  पर चूंकि व्हाट्सप्प के अनेकों समूह मे राजनैतिक पोस्ट का प्रेषण निषेध होने के कारण हमने उस व्यक्ति का नाम न लिखने का निर्णय लिया!! 

हाँ, बाकी, आप समझ तो गये होगे!!

विजय सहगल 


शुक्रवार, 26 अगस्त 2022

अछूता घड़ा

 

 "अछूता घड़ा"




13 अगस्त 2022 को राजस्थान के जालोर जिले के सुराणा गाँव से एक दिल दहला देने वाली घटना समाचार पत्रों की सुर्खियों मे छायी हुई थी। जिसने राजस्थान सहित देश के अनेक क्षेत्रों मे लोगो को आहत किया। मैंने भी जब उक्त घटना की विस्तृत जानकारी समाचार पत्रों मे पढ़ी तो मन शोक और क्षोभ से भर गया।  20 जुलाई 2022 को एक दलित वर्ग के 9 वर्षीय बालक इन्द्र मेघवाल को उसके अध्यापक ने सिर्फ इसलिये बुरी तरह पीटा क्योंकि उस दलित मासूम ने एक अध्यापक के पानी के घड़े अपनी प्यास बुझाने हेतु घड़े का उपयोग कर लिया अर्थात उसको  छू लिया था!! उस घड़े को छूने की कीमत उस अबोध बालक को अपनी जान देकर गंवानी पड़ी क्योंकि उसके अध्यापक ने घड़े छूने के अपराध के रूप मे उस निरपराधी बालक को  बुरी तरह पीट पीट कर अधमरा कर दिया था,  जिसके कारण कान के अंदर गहरा अंदुरुनी घाव हो जाने के कारण 20 दिन जीवन-मृत्यु के बीच संघर्ष के चलते इलाज के दौरान उस बेगुनाह की अहमदाबाद मे असमय मृत्यु हो गयी। जिस निष्कपट बालक ने अपने सुनहरे  भविष्य के सपने हांसिल करने के लिये जीवन की राह  पर  पहला कदम ही बढ़ाया था कि समाज द्रोहियों की उस  कलुषित अमानवीय सोच ने उस बहादुर बच्चे की राह मे रोड़ा डाल,  रोक सकने के  नाकामयाब प्रयास पर  उन दुष्टों  ने उसके  जीवन को ही समाप्त कर उसके सपनों की   यात्रा को अंतिम यात्रा मे परिवर्तित कर समाज और देश के साथ बहुत बड़ा घृणित पाप और गुनाह किया है।  

इस निंदनीय और हृदयविदारक घटना को गाँव के ही एक 40 वर्षीय अध्यापक, छैल सिंह जैसे  दुष्ट अध्यापक  ने अंजाम दिया, जिससे अपेक्षा थी कि वह शिक्षा और विद्या के माध्यम से देश के नौनिहालों को ऐसी शिक्षा और संस्कार देता  जो समाज के इस उंच-नीच और छुआ छूत के भेद को समाप्त कर उन्नति और विकास के शिखर पर ले जाने वाली राह दिखाता? इस शिक्षाक ने अध्यापक के नाम को कलंकित किया!!  पर हा!! शोक और  दुर्भाग्य कि देश की आज़ादी के 75वें अमृतमहोत्सव के बावजूद भी हम देश से छुआ-छूत और उंच-नीच के भेद को नहीं मिटा सके?? जो हम सब के लिये शर्म और लज्जा की बात है!! इस घटना को समाज के अति सम्मानीय शिक्षा क्षेत्र से जुड़े ऐसे अध्यापक ने अंजाम दिया  जिसे हमारे देश की सांस्कृति और सभ्यता  मे "गुरु गोविंद दोऊ खड़े.......के, से भाव से "देवतुल्य" स्थान दिया गया है, पर बड़े रोष और क्रोध का विषय है कि इस अध्यापक रूपी नर पिशाच ने अपने ही पुत्रवत शिष्य की पानी के घड़े से पानी लेने के दौरान घड़े  को छूने के कारण निर्ममता पूर्वक पीट-पीट कर हत्या कर दी।

ये अपराध किसी अनपढ़-गँवार व्यक्ति द्वारा भी किया जाता तो भी छुआ-छूत के अपराध मे उसे सजा मिलती लेकिन जब ये अपराध एक ऐसे व्यक्ति द्वारा किया गया जिसके ऊपर दायित्व था कि वह अपने अध्यवसाय से बच्चों को शिक्षित कर जातिभेद, रंगभेद, छुआ-झूत जैसी सामाजिक बुराइयों से परे रख उन्नति के पथ को प्रशस्त करता? लेकिन दुर्भाग्य!! इस अध्यापक ने एक ऐसे बालक को इतनी तरह पीटा जिसकी परिणति उसकी मृत्यु के रूप मे हुई। तब ऐसे क्रूर और निर्दयी अध्यापक को कठोरतम सजा मिलनी ही चाहिये ताकि भविष्य मे ऐसी सामाजिक भेद पैदा करने वाले अपराध करने के पूर्व लोग सौ बार सोंचे?       

सरकार और प्रशासन के उच्च पदस्थ अधिकारी दुर्बल वर्ग के विरुद्ध होने वाले अपराध रोकने मे कितने गंभीर है इस बात का अंदाज़ा इस घटना को देख बड़ी सहजता से लगाया जा सकता है कि इस मासूम छात्र इंदर मेघबाल के विरुद्ध हिंसात्मक अपराध की पुलिस प्राथमिकी घटना के 20 दिन बाद तब दर्ज़ की गयी जब उस मासूम की मृत्यु हो गयी। इस घटना मे शामिल अध्यापक रूपी अपराधी ने पहले कुछ धन देकर परिवार पर समझौते का दबाव भी बनाया लेकिन दुर्भाग्य से छात्र की मृत्यु के कारण उस दुष्ट अध्यापक की काली करतूतों का खुलासा हो गया। 

नौ वर्षीय इस अभागे बालक ने अभी ज़िंदगी की दहलीज़ पर पहला ही कदम बढ़ाया था कि शिक्षित हो वह अपने माँ-बाप की लाठी बन सहारा बनेगा पर छुआ-झूत की इस सामाजिक बुराई ने उसे असमय काल का ग्रास बना लिया। उस माँ के बारे मे सोच कर दिल दहल जाता है जो अपने दिल के टुकड़े की स्कूल से आने की बाँट जोह रही होगी और उसके दिल को कितना बड़ा धक्का लगा होगा जब उसको मालूम चला होगा कि जिस अध्यापक के पास अपने बच्चे के उज्ज्वल भविष्य निर्माण के लिये बच्चे को ज्ञान और शिक्षा प्राप्त हेतु भेजा था उस क्रूर आततायी ने तो उसके लाल की जान लेकर उस माँ के  भविष्य पर ही  कुठराघात कर उसके जीवन को अंधकार से भर दिया। अब उस अभागी माँ के भविष्य को सौ सूर्यों का प्रकाश भी उजाला नहीं ला सकता।   

इस कुत्सित कृत्य की जितनी भी निंदा की जाये कम है। यध्यपि उस अध्यापक को पुलिस द्वारा  इस अमानवीय कुकृत्य पर गिरफ्तार कर लिया गया है लेकिन जब तक उस अधम अध्यापक को उस अबोध बालक की हत्या के जुर्म मे सख्त से सख्त सजा नहीं मिल जाती तब तक शासन और सरकार के साथ क्या हम सभी को, समाज के हर वर्ग को शांति पूर्वक  बैठना चाहिये? हम सभी का आज ये नैतिक और सामाजिक दायित्व होना चाहिये कि उंच-नीच और छुआ-छूत जैसे   किसी भी दोष, बुराई के समूल उन्मूलन तक चैन से न बैठने का संकल्प ले।     

विजय सहगल

शुक्रवार, 19 अगस्त 2022

"शिमला -2"


"शिमला -2"











इस चौराहे पर एक ओर जहां, एलआईसी, एसबीआई, आईसीआईसीआई और एचडीएफ़सी बैंक की इमरते है पर भारतीय डाक घर की लकड़ी से बनी सफ़ेद रंग की पृष्ठभूमि और लाल रंग के बार्डर  से बनी तीन मंज़िला इमारत अपने पुराने वैभव और शानदार वास्तु की कहानी कह रही थी जो भारतीय कारीगरों के खूबसूरत वास्तु का शानदार नमूना पेश कर रही थी।  इस क्षेत्र को स्कंडेल पॉइंट कहा जाता है ऐसा बताते है कि इस स्थान से  हिमाचल के  किसी एक राजा के साथ अंग्रेज़ वाइसराय की बेटी को यहाँ से भगा ले जाने का स्कंडेल हुआ था। स्थान और उसका नाम रोमांचक था!! खाने पीने के लिये अनेकों रेस्टुरेंट और कॉफी हाउस के साथ स्थानीय और ब्रांडेड कंपनी के सभी शो रूम यहाँ उपलब्ध है जहाँ से खरीददारी की जा सकती है। सड़क किनारे लगी सुंदर बेंच पर बैठ कर आप मॉल रोड के नज़ारे बड़े इतमीनान और चैन से बैठ कर  देख सकते है। जहाँ एक ओर आप मैदान के किनारे  बड़े राष्ट्रीय ध्वज को दूर से देख सकते है जो ऊंचे आसमान मे लहराते हुए देश के जन-गण-मन उद्वेलित कर रहा था वही घने पेड़ों के बीच जाखू पहाड़ पर स्थित 108 फुट ऊंची हनुमान जी की अति विशाल प्रतिमा के दर्शन  भी आपको  यहाँ  से हो जाएंगे। टाउन हाल, बाचनालय (लाइब्रेरी), पर्यटक स्वल्पाहार केंद्र की सुंदर इमारतों के साथ ही  रिज मैदान मे स्थित पूर्व प्रधानमंत्रियों  स्व॰ श्री अटल बिहारी बाजपेयी एवं स्व॰ श्रीमती इंद्रा गांधी की सुंदर सजीव प्रतिमाओं को  अपने बड़े राजनैतिक अंतर्विरोधों के बावजूद पास-पास देखना एक सुखद आश्चर्य था।  यहाँ पर पड़ी बेंच पर बैठ कर शिमला के शानदार नज़ारे दूर दूर तक देखे जा सकते है।

झाँसी का निवासी होने के नाते रानी झाँसी पार्क मे स्थित रानी लक्ष्मी बाई की प्रतिमा को देख कर रोमांचित होना स्वाभाविक था। प्रातः स्मरणीय वीरांगना रानी झाँसी की घोड़े पर सवार प्रतिमा को स्मरण कर नमन करना मेरे लिये सौभाग्य की बात थी। पार्क रोड के अंतिम छोर पर शिमला के प्रतीक पीले गिरजाघर को देखना भी उत्साह जनक था। शिमला के प्रतीक जिस पीले गिरजा घर को प्रायः टीवी और समाचार पत्रों मे देखता था उसको सजीव रु-ब-रु देखना  उत्साह और उमंग से उत्तेजित कर देने वाला था। कहना अनुचित न होगा कि शिमला मे अनेक एतिहासिक इमारतों के बीच ये पीला चर्च शिमला की  पहचान बनाने मे कामयाब रहा।     

इस स्थान से शिमला के 360 डिग्री का विहंगम दृश्य देखने को मिलता है, शिमला के चारों ओर हरे भरे देवदार के ऊंचे ऊंचे वृक्षों के बीच सड़कों, भवनों और घाटियों के सुरम्य दर्शन होते है।  शिमला का ये स्थान शिमला का हृदय स्थल है इस रिज मैदान को यदि शिमला का स्वर्ग कहें तो कोई अतिशयोक्ति न होगी। मुझे कहते हुए कोई झिझक नहीं कि वाहनों और उसके प्रदूषण से मुक्त  इस स्थान के रहवासियों को इस जीवन मे ही स्वर्गिक आनंद का लाभ मिल रहा है जो उनके सौभाग्य का प्रतीक है। पास ही पर्यटन विभाग की शानदार इमारत को देख मैंने हिमाचल प्रदेश के पर्यटक नक्शा लेने की कोशिश की पर जीर्ण शीर्ण हालत का एक नक्शा मिला जिसकी कोई अन्य नयी  प्रति न थी मजबूरन उसी पुरानी प्रति को 30/- रुपए भुगतान कर प्राप्त किया। इस पुराने पर्यटक नक्शे ने यात्रा का मार्ग तय करने मे बड़ी मदद की। उम्मीद है पर्यटन विभाग ने अब तक पर्यटन नक्शे की नयी प्रतियाँ छपवा ली होंगी।

मॉल रोड से एक तल नीचे यूं तो रिज रोड पर स्थित बाज़ार काफी भीड़ भाड़ वाला है पर इस रोड के एक सिरे पर अँग्रेजी औपनिवेशिक राज का पुलिस स्टेशन देखते ही बनता है। 1887 मे निर्मित इस बिल्डिंग को पुराने रूप रंग मे सहेज कर इस का पुनरुद्घाटन हिमाचल के मुख्यमंत्री श्री जयराम ठाकुर द्वारा 5 सितम्बर 2021 को किया गया। इतनी सुंदर वास्तु से निर्मित इस भवन मे एक पुलिस सहायता कक्ष भी स्थापित किया गया है। शायद ही कोई पर्यटक उस कक्ष की ओर जाता दिखाई दिया क्योंकि आखिर है तो पुलिस स्टेशन!!

पुलिस बूथ से लगी सीढ़ियों से होकर आप अप्पर मॉल रोड पर पहुँच सकते है। सीढ़ियों से लगा हुआ ही टाउन हाल है जिसमे शिमला नगर निगम का कार्यालय स्थित है। मुख्य गोलाकार दरबाजे के प्रवेश द्वार के दोनों ओर एकसमान आकार के कार्यालय और उनमे लगी गोल्डन रंग से रंगी दरबाजों की सुंदर चौखटे इस दोमंजिला भवन की सुंदरता मे चार चाँद लगा रही थी। शाम के सुनहरे रंग की विद्धुत रोशनी मे इमारत परियों के देश के राजमहल का सा आभास करा रही थी। मुझे विभिन्न प्रदेशों के अनेकों नगर निगमों के कार्यालय मे जाने का मौका मिला शायद ही कोई भवन इतना सुंदर और साफ दिखाई दिया अन्यथा राज्य सरकारों के कार्यालयों मे बैठे बाबुओं के भद्दे चेहरे और मुंह मे रक्तरंजित पान-तंबाकू की हिलोरें लेते समुद्र की लहरों से गंदी होती ऑफिस  की दीवारों पर पान और पान मसाले की पीक और थूंक से रंगी दीवारें के  कुरूप और मलिन दर्शन ही होते है।

इसके ठीक बगल मे ही कला वीथिका के शानदार भवन को देखा जा सकता है, जिसमे होने वाली कलाओं की प्रदर्शनी को देखना सोने पर सुहागा की कहावत को चरितार्थ करता प्रतीत होता है। सफ़ेद रंग की चौखटों से बने खिड़की दरबाजों से बनी पाश्चात्य वास्तु पर बनी ये इमारत वास्तव मे निहायत ही खूबसूरत प्रतीत हो रही थी। अंदर जाने के सौभाग्य से वंचित होने का दुःख तो था पर समय की कमी के चलते ऐसा होना स्वाभाविक था।   किसी भी तरह के वाहन से पूरी तरह मुक्त  मॉल रोड और रिज़ रोड पर बिंदास  होकर टहलना एक सुंदर और सुखद  अनुभव था जिसको हमने नैनीताल और मसूरी के मॉल रोड पर नहीं महसूस किया। 

अब बापसी मे पोस्ट ऑफिस के स्कंडेल पॉइंट से होते हुए अपर मॉल रोड की ओर हम बड़े ही थे कि सामने एक निर्माणाधीन सुंदर लाल रंग की पृष्ठभूमि की इमारत को देख कर इमारत मे प्रवेश करने के उद्देश्य से आगे बढ़े। यध्यपि निर्माण के चलते प्रवेश बंद था फिर भी भवन की सुंदरता से आकर्षित हो चौकीदार से भवन देखने की अनुमति प्राप्त कर कुछ तस्बीरे लेने का आग्रह किया जिसे उसने सहर्ष स्वीकार कर बताया कि यहाँ शिमला का संग्रहालय का निर्माण प्रस्तावित है। आने वाले समय मे  शिमला शहर की इस शानदार इमारत मे एक शानदार संग्रहलाय पर्यटकों को देखने को मिलेगा इस बात की पूरी पूरी संभावना है।     

कालीबाड़ी के विशाल गेस्ट हाउस से आगे बढ़ने पर काली मंदिर के दर्शन हुए। मंदिर मे प्रवेश करते ही मंदिर प्रांगण से फूलों और धूप बत्तियों की भीनि-भीनि खुशबू ने मनमोह लिया। एकदम साफ सुथरे मंदिर ने बंगाल के देवालयों की सी सुंदर वास्तु से निर्मित मंदिर की सुंदरता और आध्यात्मिक वातावरण मे पवित्र मंदिर की  धार्मिक भावनाओं से ओतप्रोत हो खुशियों से मन को भर दिया। माँ काली  के चरणों मे शाष्टांग नमन कर मंदिर प्रांगण मे ही स्थित सफ़ेद रंग के उपग्रह लॉंच  करने जैसी सुंदर  रॉकेट की सी आकृति मे  जल रही पवित्र अग्नि की भस्म को मस्तक पर धारण कर मंदिर की परिक्रमा की। मंदिर की ऊंचाई से शिमला घाटी का विहंगम दृश्य बहुत ही खूबसूरत नज़र आ रहा था। मंदिर से मिले पवित्र चरणामृत और प्रसाद को ग्रहण कर अपने गंतव्य की ओर प्रस्थान किया।

जैसे ही मॉल रोड से नीचे विक्टरी टनल की ओर बड़े फिर वही कारों की रेलम पेल, यातायात की अव्यवस्था और ट्रेफ़्फ़िक जाम की स्थिति से सामना हुआ और ऐसे लगा मानों मॉल रोड के स्वपन महल से निकल कर एक बार फिर से कारों और कंक्रीट के जंगल मे बापस आ गायें हों।

विजय सहगल 

सोमवार, 15 अगस्त 2022

कट्टर ईमानदार

 

"कट्टर ईमानदार"





पिछले दिनों  दिल्ली के मुख्यमंत्री और आप पार्टी के प्रमुख श्री अरविंद केजरीवाल ने एक नया शब्द गढ़ा "कट्टर ईमानदार"। ये शब्द उन्होने हाल ही मे 19 मार्च 2022 को बनी पंजाब सरकार के  अपने ही स्वास्थ मंत्री रहे श्री विजय सिंगला के 24 मई 2022 को रिश्वत के आरोप मे बर्खास्तगी और गिरफ्तारी की प्रितिक्रिया के फलस्वरूप प्रकट की। "कट्टर ईमानदार" शब्द सुनकर मै विस्मय और आश्चर्य से हैरान था क्योंकि मैंने  इस तरह के पद-विन्यास को कभी देखा या सुना न था इसलिये गूगल की सहायता लेने का निश्चय किया।  

गूगल पर मुझे  कट्टर शब्द के अर्थ और पर्यायवाची शब्दों को खोजने के प्रयास मे जानकारी मिली कि कट्टर शब्द का अँग्रेजी अर्थ "hardcore" अर्थात कठोर  शब्द के रूप मे हुई। हिन्दी मे इस के समानार्थी शब्दों मे रूढ़िवादी, तीक्ष्ण, कर्कश, अभावुक, समझौता विरोधी, धर्मांध, उन्मत्त, पक्का, भ्रांत बुद्धिवाला, झक्की, मतान्ध जैसे शब्द गूगल मे सर्च करने पर प्राप्त हुए। उक्त सारे शब्द नकारात्मक भाव लिये थे। इसके विपरीत ईमानदार के पर्यायवाची शब्दों  के रूप मे सच्चा, नेकनीयत, चोखा, सत्यवादी, निष्कपट, उदार, शुद्ध, न्याय संगत, जैसे शब्द प्राप्त हुए जो सारे सकारात्मक भाव लिये थे।         

इस "कट्टर ईमानदार" शब्द के बारे मे और अधिक जानकारी लेने हेतु मैंने 85 वर्षीय  प्रोफेसर श्री जी॰ बी॰ सिंह से मुलाक़ात की जो संस्कृत महाविध्यालय, ग्वालियर  से प्रधानाचार्य के पद से सेवनिवृत्त हो हमारे पड़ौस मे  निवासरत है। श्री  सिंह साहब ने बड़ी ही दिलचस्प और रोचक जानकारी दी। उन्होने बताया कट्टर शब्द से आशय "काटना" अर्थात कुत्ते या अन्य पशुओं द्वारा काटने के संदर्भ मे किया जाता है। उन्होने भी कट्टर शब्द के उपर्युक्त पर्यावाची शब्दों का अनुमोदन कर अपनी सहमति बताई, साथ ही दोनों शब्दों के विपरीत भाव होने के कारण इनके एक साथ उपयोग को व्याकरण और व्यावहारिक दृष्टि से गलत बताया। "कट्टर" जैसे नकारात्मक भाव के शब्द का उपयोग "ईमानदार" जैसे सकारात्मक भाव के शब्द के साथ करना उसी तरह अनुपयुक्त और अनुचित है जैसे श्री रहीम दास जी ने अपने एक दोहे मे लिखा है:-

कहु रहीम कैसे निभे, बेर केर को संग।

वे डोलत रस आपने, उनके फाटत अंग॥

अर्थात  जैसे विपरीत स्वभाव के बेर और केले के पेड़ साथ साथ नहीं रह सकते उसी प्रकार सज्जन और दुर्जन व्यक्ति  भी साथ साथ नहीं रह सकते, क्योंकि  जैसे दानव, असुर स्वभाव वाले  काँटों से युक्त बेर का पेड़ हवा के झोंकों से केले के पत्तों को अपने काँटों से छिन्न-भिन्न कर काट देता है बैसे ही शैतान स्वभाव का व्यक्ति अपने आचरण और व्यवहार से भद्र और श्रीमान पुरुषों को नुकसान पहुँचाते है।

 

ठीक इसी प्रकार कट्टर शब्द के साथ ईमानदार शब्द का उपयोग नहीं किया जा सकता। क्योंकि जो व्यक्ति "कट्टर" है वह कदापि ईमानदार/उदार  नहीं हो सकता और जो व्यक्ति  ईमानदार/सच्चा  है वह कदापि  कट्टर/उन्मत्त  नहीं हो सकता। इसलिए श्रीमान अरविंद केजरीवाल के ये कहना कि स्वतन्त्रता के बाद आम आदमी पार्टी मात्र एक ऐसी पार्टी है जो "कट्टर ईमानदार है" उनको और उनके दल को शक, शंका और संदेह के घेरे मे खड़ा करता है??

यूं भी सत्य संकल्पों, ईमानदारी के व्रत और सिंद्धांतों के पथ पर चलने वाले माननीय अन्ना हज़ारे जी के आंदोलन से उपजे श्री अरविंद केजरीवाल ऐसे "संकर" भ्रूण है जिनकी राजनैतिक महत्वाकांक्षा के महल की  बुनियाद ही  झूठ, फरेब  और बेईमानी के धरातल पर हुई!! विदित हो अन्ना हज़ारे के स्पष्ट निर्देश कि हमारे आंदोलन मे शामिल लोग राजनीति और राजनैतिक दलों से पूर्णतः दूर रह कर आंदोलन करेंगे!! उस संकल्प पर माननीय श्री केजरीवाल जी कुछ हफ्तों तक भी कायम न रह सके। उनके बड़े सरकारी बंगला और बड़ी कार न लेने का संकलप भी सभी को याद होगा!! उनके जैसा मिथ्याचारी और अहंकारी नेता जब अपनी आत्मप्रवंचना मे पंजाब के स्वास्थ मंत्री विजय सिंगला को रिश्वत खोरी और भ्रष्टाचार मे लिप्त होने पर बर्खास्त कर अपनी पार्टी को "कट्टर ईमानदार" घोषित करता है तो हंसी आती है। "शून्य सहिष्णु" लक्ष्य को प्राप्त करने, 2 अक्टूबर 2012 मे आप पार्टी के गठन से लेकर आज तक के  उनके कार्यकाल पर जब दृष्टिपात  करते है, तो इनके मंत्रियों और पदाधिकारियों के जाली डिग्री, दंगों मे संलिप्तता, पत्नी से घरेलू हिंसा, दिल्ली सरकार के मुख्य सचिव के विरुद्ध हिंसात्मक अपराध, आदि के मामलों  को नज़रअंदाज़  भी कर दें तो भी  वर्ष 2016 मे  उनके एक मंत्री आशिफ अहमद खान को छह लाख के रिश्वत लेने के औडियो वाइरल होने के कारण हटाना पड़ा, मंत्री संदीप कुमार को एक महिला से दुर्व्यवहार और रेप के कारण बर्खास्त करना पड़ा।

 

लेकिन तथाकथित "कट्टर-ईमानदार" पार्टी के श्री अरविंद केजरीवाल के निकतम सहयोगी और सरकार के कैबिनेट मंत्री को जब 30 मई 2022 को प्रवर्तन निदेशालय ने 16.39 करोड़ के मनी लौंड्रिंग केस मे गिरफ्तार कर जब पूंछ-तांछ की गयी तो उनकी कोरोना के कारण यदादाश्त चले जाने का बहाना बना बचने की नाकाम कोशिश की और अब तक आर्थिक अपराध के जुर्म मे  कारावास की सजा भोग रहे है!! 19 मार्च 2022 को पंजाब सरकार के गठन के बामुश्किल एक माह ही  गुजरा था कि उनके स्वास्थ मंत्री विजय सिंगला 22 मई 2022 को मंत्रालय के सभी ठेकों पर 1% कमीशन लेने के आरोप मे गिरफ्तार किया गया। अपनी ही  पार्टी के मंत्री की गिरफ्तारी को "कट्टर ईमानदार" कह ऐसे प्रदर्शित किया गया मानो ये मंत्री महोदय किसी अन्य पार्टी या ग्रह के वासी हों?

 

अभी हाल हि मे दिल्ली मे शराब की नीति मे परिवर्तन कर निजी हाथों के सुपुर्द करने के विरुद्ध दिल्ली के उपराज्यपाल द्वारा सीबीआई जांच के आदेश देने के कारण श्री अरविंद केजरीवाल के चेहरे से "कट्टर ईमानदार" होने  का छद्म नकाब का पर्दाफाश कर दिया। दिल्ली सरकार  की आबकारी नीति मे परिवर्तन की कुचेष्टा ने अरविंद केजरीवाल को एक बहुत बड़ा भ्रष्टाचरण कांड करने  से बचा लिया?? लेकिन शायद, सीबीआई द्वारा आबकारी नीति मे भ्रष्टाचार की जांच की आंच उन्हे आने वाले समय मे चैन से बैठने न देगी??

 

विजय सहगल    

गुरुवार, 11 अगस्त 2022

"विनाश काले विपरीत बुद्धि"

 

"विनाश काले विपरीत बुद्धि"







पिछले दिनों नोएडा के एक अहंकारी, अर्धसाक्षर, मूढ़ बुद्धि युवक कान्त त्यागी के कुत्सित और अधम आचरण का वीडियो देखा। विडियो देख कर कान्त त्यागी का एक महिला के साथ अमर्यादित आचरण और व्यवहार पूर्णतः निंदनीय, आपत्तीजनक और भर्त्स्ना योग्य है। उक्त विडियो देख कर सभ्य समाज के किसी भी  शांत और संयमित व्यक्ति को क्रोध आना स्वाभाविक था। एक महिला के साथ कान्त त्यागी द्वारा किये अक्षम्य अपराध की जितनी भी निंदा और भर्त्स्ना की जाये कम है।

उक्त विडियो का सोश्ल मीडिया पर प्रचारित और प्रसारित होने पर समाज के सभी वर्ग मे कड़ी प्रितिक्रिया होना लाज़मी थी। चारों ओर से शासन और सरकार की तीव्र निंदा और आलोचना  ने नोएडा पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों को सक्ते मे ला दिया और तुरत फुरत ही  पुलिस विभाग को सक्रिय कार्यवाही करने लिये वाध्य होना पड़ा। नोएडा भारत मे ही नहीं विश्व मे तेजी से विकसित हो रहे शहरों मे एक अलग स्थान रखता है।  जहां अनेक देशी और विदेशी कंपनियों  कार्यालय और सूचना प्रौधौगिकी सहित अनेकों फ़ैक्ट्रीयां स्थित हों वहाँ की एक सभ्य, प्रतिष्ठित  रहवासी सोसाइटी मे पूर्वजों द्वारा अर्जित कृषि योग्य भूमि/संपत्ति से प्राप्त धन के मद मे अंधे हुए कान्त जैसे स्वच्छंद,  निरंकुश युवक का उच्छ्रंखल व्यवहार ने सारे देश को झकझोर दिया। इस  घटना ने  योगी आदित्य नाथ सरकार  के सामने कुछ ऐसी ही चुनौती प्रस्तुत की जिसमे  2 जुलाई 2020 को कानपुर के बिकरू गाँव कांड मे विकास दुबे ने गाँव मे दबिश डालने गयी पुलिस की टीम के 8 जवानों की बर्बरता पूर्वक हत्या कर दी गयी थी। अपने एक मूर्खतापूर्ण कदम के कारण न केवल कान्त त्यागी जैसे लोगो ने स्वयं अपनी थुक्का फजीती एवं जग हँसाई कराई अपितु अपनी पत्नी, रिश्तेदार के सम्मान को पुलिसिया कार्यवाही मे अपमानित कराने का पाप भी किया फिर किराये के गुंडों का गिरफ्तार होना तो लाज़मी था। 

बगैर किसी राजनैतिक पूर्वाग्रह के कहना अतिशयोक्ति न होगी कि 2 जुलाई 2020 को उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा तत्कालीन बिकरू गाँव की घटना मे "विकास दुबे" की मुठभेड़ और हाल ही मे नोएडा के "कान्त त्यागी" के विरुद्ध गेंगस्टर एक्ट जैसी   सख्त और कड़ी कार्यवाही से  लोगो का भरोसा योगी सरकार पर बढ़ा है। नोएडा मे  भी सरकारी बुलडोजर ने बगैर किसी भाषा, जाति-धर्म आदि मे भेदभाव के कान्त त्यागी के अवैध निर्माण को ज़मींदोज़ कर दिया जिसकी प्रशंसा की ही जानी ही चाहिये।

इस अर्धशिक्षित असंस्कारित  युवक ने विना किसी श्रम और कठिन मेहनत के पूर्वजों द्वारा अर्जित कृषि योग्य भूमि/संपत्ति की तिजारत के बल बूते झूठी शान और छद्म राजनैतिक वर्चस्व की  आभासी दुनियाँ मे  अति महत्वाकांक्षा को यदि अच्छे संस्कार और शिक्षा से नियंत्रित किया  होता तो कदाचित ही ऐसे अपमान, तिरस्कार और कलंकित दंड और सजा से न गुजरना पड़ता।

ऐसा नहीं कि कान्त त्यागी का ये उन्मत्त, उपद्रवी व्यवहार एक दिन मे विकसित हुआ होगा?  मित्रों की संगत, सौवत और नजदीकी परिजनों और स्वजनों ने इसके बुरे और अनियंत्रित व्यवहार के लिये यदि बचपन मे रोका और टोका होता तो आज शायद अपने, अपने परिवार और रिश्तेदारों और भाड़े की टट्टुओं के साथ इतनी अपमानजनक स्थिति से न गुजरना पड़ता।

लेकिन इस घटना और इस पर की गयी कार्यवाही ने समाज और देश को बहुआयामी संदेश दिये है जिन पर आज हर वुद्धिजीवि  को गंभीरता पूर्वक मंथन करने की आवश्यकता है।

·        सर्वप्रथम तो उस बहादुर महिला को शत शत नमन है जिसने कान्त त्यागी जैसे बदमाश के घर के अवैध निर्माण का चुनौतीपूर्ण विरोध किया जबकि 6-8 कथित बॉडी गार्ड अर्थात भाड़े के गुंडे उसके विरोध मे खड़े थे। इन असामाजिक तत्वों के सामने खड़े होकर उनका विरोध करना एक बहुत ही हिम्मत, साहस  और दिलेरी का काम था, जिसे उस संभ्रांत सोसाइटी के मर्द भी न कर सके। इस हेतु वो महिला  बधाई और सम्मान की पात्र है।   

·        सूचना क्रांति और सोश्ल मीडिया की सकारात्मक ताकत का लोहा एक बार पुनः सिद्ध हो गया कि इस सूचना क्रांति के मध्यम से किसी भी तानाशाह और बहुवली का विरोध परिमाण की दृष्टि से  भारी से भारी तोप और बंदूकों पर भारी पड़ सकता है जैसे के आज कल दिग्भ्रमित आमिर खान द्वारा फिल्म लाल सिंह चड्ढा के मामले मे देखने को मिल रहा है।

·        घटना के बाद सोसाइटी के रहवासियों ने जिस एकता और संघठनात्मक शक्ति का प्रदर्शन किया जो "काबले तारीफ" है। संदेश स्पष्ट है कि एकजुट होकर हम किसी भी अतिवादी, गुंडे या असामाजिक तत्व का विरोध करें तो परिणाम निश्चित तौर पर आपके पक्ष मे होंगे।

·        सोसाइटी के अलावा आज आवश्यकता है गली मुहल्ले के 8-10 घर आपस मे संधि करें कि संकट के समय हम एकत्रित होकर किसी भी आपराधिक या असामाजिक तत्वों के विरुद्ध संघठित होकर और कानून का सहारा लेकर होकर लड़ेंगे। इसके लिये किसी बहुत बड़े भागीरथी प्रयास की जरूरत नहीं है! आपके घर के 2-4 घर बाएँ, 2-4 दायें और कुछ घर आपके सामने और पीछे होंगे उन के साथ मिल बैठ कर ऐसे संघठन तैयार करने की आवश्यकता है बस अपने "अहम" को एक तरफ रखने की जरूरत है?

·        उस सोसाइटी के रहवासी समिति के सदस्यों को भी आत्मचिंतन और आत्मावलोकन करने की महती आवश्यकता है जो सोसाइटी के हर कार्यक्रमों मे अपनी फोटो निकलवाने और मैगजीन मे छपवाने को आतुर रहते है, पर सोसाइटी के ऐसे विकृत मानसिकता के रहवासी के विरुद्ध समय रहते यदि वे कानूनी रूप से उसके अवैध निर्माण करने के विरुद्ध संयुक्त कार्यवाही करते तो ऐसे हालत ही निर्मित न होते। 

एक अन्य विडियो मे एक रहवासी महिला ने एक सोसाइटी के रहवासियों की सुरक्षा का भी एक ज्वलंत प्रश्न भी उठाया जो समयोचित है। उसने सोसाइटी मे स्थायी रूप से पुलिस फोर्स की तैनाती की मांग की जो उचित है। यध्यपि कान्त त्यागी जैसे हठी को नोएडा पुलिस ने उसके समुचित स्थान जेल मे भेज दिया है लेकिन अपने आदतन अपराधी स्वभाव के चलते भविष्य मे ऐसे तत्वों से सावधान रहने की अति आवश्यकता है।

आप शायद हैरान होंगे कि मैंने अपने ब्लॉग मे श्री कान्त त्यागी को हर जगह "कान्त त्यागी" कह क्यों संबोधित किया? मेरा मानना है कि भारतीय सांस्कृति और परंपरा मे मे "श्री" शब्द का उपयोग "श्रेष्ठ" और मर्यादित आचरण करने वाले श्रीमान पुरुषों के नाम के पूर्व ही लगाये जाने की परंपरा है जो मुझे  इस विकृत मानसिकता के व्यक्ति मे नज़र नहीं आयी।

विजय सहगल

शुक्रवार, 5 अगस्त 2022

संजय उवाच

 

"संजय उवाच"





पिछले कुछ सालों से देश के विभिन्न हिस्सों से सत्ताधारी सरकारों के बड़े-बड़े बल, वैभवशाली नेताओं को भ्रष्टाचार के आरोपों मे गिरफ्तार कर जेलों मे डाला गया है। इन महामहिम!! मंत्रियों ने अपने राजनैतिक रसूख और मंत्री पद से मिली सत्ता की शक्ति का घोर दुर्पयोग कर काली कमाई की, लेकिन जब कानून ने अपना काम कर इन्हे सलाखों के पीछे जेल भेजा तो जैसा कि उम्मीद थी तुरंत संवैधानिक संस्थाओं पर आरोप लगाने मे एक मिनिट की देरी नहीं की गयी कि "राजनैतिक दुर्भावनाओं", "प्रतिशोध की राजनीति", "बदले की भावना"  के कारण प्रवर्तन निदेशालय ने कार्यवाही की है।

महाराष्ट्र सरकार के मंत्री रहे अनिल देशमुख और नाबाव मालिक दिल्ली सरकार के "कट्टर ईमानदार" मंत्री सतेन्द्र  जैन पंजाब के स्वास्थ मंत्री विजय सिंगला, पश्चिमी बंगाल के शिक्षा मंत्री पार्थ चटर्जी इनमे से कुछ प्रमुख "ईमानदार राजनेता" है जिनके विरुद्ध प्रवर्तन निदेशालय ने प्रतिशोध और बदले की भावना से कार्यवाही की है??  

28 नवम्बर 2020 को मैंने अपने ब्लॉग मे संजय राऊत के  अहंकार और सत्ता के मद मे चूर होकर एक महिला अभिनेत्री कंगना रनौत के मुंबई स्थित घर की ईंट गारे की चंद दीवारों को ढहाकर अपने स्वामित्व के समाचार पत्र "सामना"  मे बड़े बड़े अक्षरों के मुख्य शीर्षक "उखाड़ दिया" प्रकाशित कर एक औरत के सामने अपने पुरुषत्व का भौड़ा प्रदर्शन कर अपनी शेख़ी बघारने के बारे मे लिखा था। (https://sahgalvk.blogspot.com/2020/11/blog-post_28.html) और आज  जब 1 अगस्त 2022 को प्रवर्तन निदेशालय के अधिकारियों ने 1048 करोड़ के "पात्रा चॉल" घुटाले मे उन्हे उनके घर से गिरफ्तार किया तो परिवार के लोगो से अपना तिलक और आरती उतरवाने का जो स्वांग उन्होने किया मानों धर्म की संस्थापना, दुर्बल और निरीह लोगो के अधिकारों के रक्षार्थ युद्ध करने के लिए प्रस्थान कर रहे हों!!

विदित हो कि सन 2007 मे जिस  47 एकड़ मे वसी मुंबई स्थित "पात्रा चॉल" जिसमे 647 निर्धन और मध्यम वर्गीय  परिवार रहा करते थे और जिसको महाराष्ट्र आवास विकास अभिकरण (म्हाडा), बड़े बड़े बिल्डर और राजनैतिक गँठजोड़ के अनैतिक गिरोहों ने सपनों के घर का झांसा देकर जगह खाली करा ली थी, उस "पात्रा चॉल" के  647 परिवार अपने घर के छद्म स्वप्न की आशा  मे  पिछले पंद्रह साल से दर दर की ठोकरे खाते हुए यहाँ-वहाँ भटक रहे है। कुछ जो सौभाग्यशाली थे वे अपने घर की लालसा छोड़ अपने-अपने गाँव की यात्रा पर  प्रस्थान कर गये, उनमे से "पात्रा चॉल" कुछ अभागे जो उतने सौभाग्यशाली नहीं थे अपने घर की अभिलाषा और इच्छा  मन मे लिये ही मजबूरी मे अपनी अंतिम यात्रा पर परलोक गमन करने को मजबूर हो गये!!

इन्ही निर्धन, दरिद्र और कृश काया के लोगो की आहों को संत कबीर दास जी ने अपने एक दोहे मे शब्द दे कर कहा था-:

दुर्बल को न सताइए, जाकि मोटी हाय।
बिना जीव की हाय सों, लोह भस्म हो जाए॥

जिन छद्म और मिथ्या आश्वासनों के बल पर "पात्रा चॉल" के 647 दरिद्र नारायणो के सिर से छत्त छीन कर जिन अपराधियों ने उनको आश्रय से वंचित किया था शायद आज उन्ही निराश्रित परिवारों के श्राप, अभिशाप और बददुआओं का ही परिणाम है कि पंद्रह वर्ष पश्चात संजय राऊत जैसे अहंकारी राजनेता को जेल की सलाखों के पीछे जाने को मजबूर होना पड़ा। 

जो संजय राऊत अभी पिछले दिनों शिवसेना पार्टी मे हुई मत भिन्नता के चलते अपने ही बागी विधायक साथियों पर हमला करते हुए मुंबई आने पर जान से मारने तक की धौंस  देते थे, विधायकों के शव मुंबई आने और उन्हे सीधे पोस्टमार्टम के लिये मुर्दाघर भेजने की धमकी देते थे, मानों वे किसी रियासत के राजा हों, वहीं दूसरी ओर भ्रष्टाचार मे संलिप्त होने पर जब प्रवर्तन निदेशालय  द्वारा उन्हे  गिरफ्तार किया गया तब विभाग और व्यवस्था को दोष दे कर सरकार पर  "तानाशाह" होने का आरोप लगा रहे है !!

वो तो भला हो आधुनिक सूचना प्रौद्योगिकी और "सोश्ल मीडिया" का जिसने आज ऐसे खलनायकों की ऐसी दोहरे चरित्र की राजनीति को बेनकाब कर दिया है। अब आम जनता  ऐसे राजनैतिज्ञों के असली चेहरे को पहचान चुकी है।  तभी तो सत्ता मे रहते हुए जो संजय राऊत अपने बड़बोले पन की शेख़ी बघार कर अपने कार्यकर्ताओं को हिंसा के लिये भड़काने, जमीन आसमान एक कर गीदड़ भभकी देते थे, सत्ता परिवर्तन के बाद उनकी बातों और धमकियों का कहीं कोई असर दूर दूर  तक नहीं हुआ और कहीं से कोई एक भी  "चूँ-चपड़ की आवाज भी सुनाई नहीं दी!!

ये संजय राऊत ही थे जिन्होने महाराष्ट्र की जनता द्वारा बीजेपी और शिवसेना के चुनावी पूर्व गठबंधन को दिये गये जनादेश की अवाज्ञा कर श्री उद्धव ठाकरे को मुख्यमंत्री पद की लालच और लालसा जगा काँग्रेस, राष्ट्रवादी कॉंग्रेस पार्टी जैसी विपरीत विचारधारा के दलों से गठबंधन कर शिव सेना को सरकार के मुखिया बनाने का अपवित्र गठबंधन किया!! ऐसी भ्रष्ट और मौका परस्त युति का जीता जागता परिणाम सबके सामने है कि इस अनैतिक गठजोड़ के दो बड़े मंत्री  अनिल देशमुख, नाबाव मालिक और सत्तारूढ़ दल के बड़े नेता स्वयं संजय राऊत भ्रष्टाचार के आरोप मे जेल की सलाखों के पीछे है।

अब तनिक विपक्ष के उन शूरवीर युद्धाभिलाषी योद्धाओं पर गौर करें जो ईडी द्वारा गिरफ्तारी के विरुद्ध संजय राऊत के पक्ष मे खड़े है। अपनी धुर विरोधी स्वभावगत  नीतियों के कारण विपरीत ध्रुवों पर खड़ी काँग्रेस ने संजय राऊत की गिरफ्तारी का विरोध किया है। भ्रष्टाचार के अकंठ दल-दल मे फंसी काँग्रेस का विरोध तो लाज़मी है। नेशनल हेरल्ड कांड मे जूझ रहे इस दल  ने स्वतन्त्रता के इतिहास मे इस अखबार की दुहाई और योगदान को बारंबार स्मरण करा कर सत्ता धारी दल को पानी पी पी कर कोसा। यहाँ यह स्मरण रखना आवश्यक है कि देश की स्वतन्त्रता के संघर्ष मे मात्र कॉंग्रेस का ही योगदान कहना नेताजी सुभाष चन्द्र बोस, चन्द्रशेखर आज़ाद, भगत सिंह, अश्फ़ाक उल्लाह खान, राम प्रसाद विस्मिल, उद्धम सिंह, हेमू कलानी   जैसे हज़ारों हज़ार नौजवानों का अपमान है जिन्होने अंग्रेज़ो से लड़ते हुए अपने प्राणों की आहुति दी थी। दूसरी, स्वतन्त्रता के बाद से ब्लॉक काँग्रेस कमेटी से लेकर राष्ट्रीय काँग्रेस कमेटी के अधिकतर पदाधिकारियों, राज्यों  और केंद्र के तमाम मंत्रियों  ने देश को स्वतंत्र कराने हेतु जो श्रम, त्याग और बलिदान किया था उसकी पूरी-पूरी  कीमत  आज़ादी के पश्चात, भ्रष्टाचार, बेईमानि भाई भतीजा बाद, लाइसेन्स, कोटा, परमिट के रूप मे बसूल की।

जहां तक जया भादुड़ी जी का संजय राऊत की गिरफ्तारी पर विरोध करने का सवाल है, समाजवादी पार्टी की दया और कृपा से राज्य सभा मे राजनीति करने वाली महोदया का राजनैतिक जीवन कोई बहुत बड़ी उपलब्धियाँ भरा नहीं रहा और न ही कोई ऐसी उपलब्धि  हांसिल की जिसके कारण देश, और समाज मे क्रांतकारी परिवर्तन आया हो? या जिसका उल्लेख किया जा सके? जिस दल को पश्चिमी बंगाल मे मेडम भादुरी ने अपनी पूरी क्षमता के साथ अपने मन, वाणी और कर्म से समर्थन किया था उसके पार्थ चट्टर्जी जैसे मंत्रियों, कट मनी, टोलाबाजी बसूलने वाले कार्यकर्ताओं की करतूतों को कौन नहीं जनता? इस अनैतिक कमाई  को कौन सा  रंग दिया जाय, शायद वह बेहतर जानती और समझती होंगी? ये उस कथित महान नायक परिवार से आती है जिन्होने  कोरोना काल मे ज़िंदगी और मौत से जूझ रही देश की जनता को संकट के समय  सोश्ल मीडिया पर एक करोड़ की कार को क्रय करने के जश्न का भौड़ा और घिनौना  प्रदर्शन कर पीढ़ित और दुखी जनता का मखौल उड़ाया था!! इनकी निर्धन और दुर्बल लोगो के प्रति सोच का अंदाज़ आप इसी से लगा सकते है।

टीएमसी, एनसीपी के विरोध को तो सिर्फ एक कहावत के माध्यम से समझा जा सकता है कि, सूप तो सूप छलनी जिसमे छत्तीस छेद है वह कहती है सुई तेरे पेट मे छेद है!! इन दलों के महान योद्धा!! अनिल देशमुख, नाबाव मालिक, पार्थो चटर्जी प्रकृति और ईश्वर द्वारा निर्मित शास्वत, अनादि, अनंत सत्य को भी चुनौती देते नज़र आते है मानों अवैध, अधम और अनीति पूर्वक कमाये काले धन को का उपभोग ईहलोक के बाद परलोक मे भी ले जाने मे सक्षम है! मुझे एक सुभाषित सूक्ति याद आ रही है जिसे मैंने मध्य प्रदेश के डबरा मे, एक माननीय न्यायाधीश की कोर्ट मे पढ़ा था:-       


"बीती हुई इस घड़ी को कौन लौटा पाएगा।"
"इस धरा पर, इस धरा का सब धरा रह जायेगा।"

यहाँ एक बात सभी दलों और नेताओं के वक्तव्यों मे समान थी कि भ्रष्टाचार के आरोप मे गिरफ्तार  संजय राऊत के प्रति संवेदना, सहानुभूति, हमदर्दी और दया रखने वाले थे। इनमे से एक भी दल और नेता को "पात्रा चॉल" के  उन 647  दुर्बल, निर्धन, गरीब  परिवारों के प्रति कोई दया भाव नहीं था जिनकी झोपड़ियों को 2007 मे झूठ और फरेब के चलते संजय राऊत और उनके काकस गिरोह ने पिछले पंद्रह वर्षों से दर-दर भटकने के लिए छोड़ दिया था।  काश इन विरोधी दलों के शूरवीरों को "पात्रा चॉल" के उन 647 अकिंचन, दरिद्र नारायणों, निर्धन नागरिकों  के प्रति भी अपने कर्तव्यों और दायित्वों के बारे मे विचार किया होता??

विजय सहगल