"एस॰पी॰ आई॰
इंटर कॉलेज-झाँसी"
21
जून यूं तो तमाम बजहों से एक अत्यंत महत्वपूर्ण दिन होता है, जिसमे साल
का सबसे बड़ा दिन और अभी हाल ही के कुछ वर्षों मे ये दिन देश सहित दुनियाँ मे योग
दिवस के लिए भी जाना जाता है। लेकिन इन सब के साथ 21 जून 2022 का दिन एक विशेष कारण से भी मेरे लिए महत्वपूर्ण
था। प्रातः लगभग 6.30 बजे जब लक्ष्मी बाई एवं मैथली शरण गुप्त पार्क मे लोगो को योग दिवस और प्रातः घुम्मकड़ी
के साथ जब मैंने सफाई कर्मी मुकेश को अपनी ड्यूटि पर सफाई करते देखा तो उसकी प्रशंसा मे उसकी पीठ थपथपाएं बिना न रह सका। जिस तनमयता
और तल्लीनता से वह अपने कार्य मे मगन था वह उसके कर्तव्य पारायण योग पुरुष होने का
श्रेष्ठ उदाहरण था। हम पढे-लिखे श्रेष्ठी
वर्ग द्वारा फैलाएँ कचरे को जब एक कमजोर
वर्ग का अशिक्षित व्यक्ति, साफ करें तो क्या हमारी शिक्षा और
संस्कार पर सवाल नहीं उठने चाहिये?
मुकेश
से मिलने के बाद जैसे ही हम चंद कदम आगे बढ़े ही थे कि एस॰पी॰आई॰ कॉलेज (सरस्वती
पाठशाला इंडस्ट्रियल इंटर कॉलेज, झाँसी) के शताब्दी द्वार को सामने देख मेरे कदम
सहसा ही ठिठक गये और मै अपने आपको कॉलेज प्रांगण मे प्रवेश करने से न रोक सका। मुझे
आज भी जिज्ञासा है कि "सरस्वती पाठ शाला" मे "इंडस्ट्रियल"
शब्द जोड़ने का क्या प्रयोजन रहा होगा। अन्य
कोई दिन होता तो शायद कॉलेज के दरवाजे ग्रीष्म अवकाश के चलते खुले न होते पर चूंकि
आज योग दिवस था, तो कॉलेज के शिक्षक गण एवं अन्य स्टाफ कॉलेज
मे उपस्थित थे। मै एक अजनबी व्यक्ति की
तरह कॉलेज के प्रांगण मे स्थित हर स्थान को बड़े कौतूहल और उत्सुकता पूर्वक देख रहा
था! मोबाइल पर कुछ फोटो और तसवीर भी ले रहा था। अचानक एक अपरिचित और अनजान व्यक्ति
को इस तरह कॉलेज मे देख संदेह की दृष्टि से घूर रहे एक सज्जन जो शायद कॉलेज के शिक्षक थे, ने मेरा परिचय जानना चाहा जो स्वाभाविक था। मैंने उनको नम्रता पूर्वक
बताया कि 1973 मे मै भी इस शिक्षण संस्थान का छात्र था और अपने पुराने विस्मृत दिनों
की यादों को पुनः स्मरण कर उत्साह और उमंग से लबरेज़ हूँ। कॉलेज को देख पुराने दिनों, मित्रों और
शिक्षकों और उन से जुड़ी घटनाओं को स्मरण कर उत्साहित हूँ!! इतना सुन वे सज्जन भी
सहज हो हमसे पुराने दिनों की चर्चा करने लगे।
ध्वज
स्थल से खड़े हो सामने के खुले मैदान पर
प्रार्थना के लिए एकत्रित छात्र समूहों, जिनमे मै भी एक सहभागी छात्र के
रूप मे लाइन मे खड़े हों कर कॉलेज की प्रार्थना मे शामिल होता था। उन दिनों होने
वाली प्रार्थना-:
वह शक्ति हमे दो दया निधे, कर्तव्य मार्ग पर डट जाबे। पर सेवा पर उपकार मे हम, जीवन सफल बना जाबे........
आज भी मुझे कंठस्थ है। ध्वज स्थल पर अन्य शिक्षकों और अध्यापक गणों के साथ कॉलेज के दबंग प्रधानाचार्य श्री आर॰के॰ अग्रवाल भी मंचासीन रहते थे। जिनके हाथ मे एक बेंत होता था जिसके भय के आगे कॉलेज के बड़े से बड़े तीसमार खाँ, रंगबाज़ स्टूडेंट भी भय खाते थे। जिसका सबसे बड़ा कारण जो छात्रों के बीच सर्वविदित था कि, "प्राचार्य जी एक अच्छे क्रिकेट खिलाड़ी भी है! उनके हाथ मे चाहे क्रिकेट बाल हो या डंडा उनका निशाना लच्छ पर अचूक होता था"।
झाँसी के एक छोटे विध्यालय, "राजकीय आदर्श विध्यालय" मे लगातार आठ वर्ष कक्षा 1 से 8 तक टाट पट्टी पर बैठने के बाद कॉलेज मे कुर्सी मेज पर बैठने के रोमांच ने ही बालक से किशोर होने के बदलाव का अहसास मुझे करा दिया था। ये अन्य बदलावों के साथ एक मुख्य बदलाव था। उन दिनों पानी की बोतल ले जाने का रिवाज़ नहीं था, विध्यालय के स्कूल बैग मे रखी पुस्तकों के बीच मोरपंख और विध्या की पत्तियाँ हर विध्यार्थी का आवश्यक अंग थी और लंच बॉक्स भी बैग मे आवश्यक रूप से सँजो कर रक्खा जाता। डिब्बों मे रक्खे परांठा और अचार की खुशबू सहपाठियों के साथ कौओं और चील को भी प्रिय लगती थी। भोजन का कुछ हिस्सा चीलों के लिए आरक्षित था, जिसे हवा मे उछाल कर फेंकते और चील छपट्टा मार कर उसे हवा मे ही दबोच लेती। पर ये सब कॉलेज मे तिरोहित हो चुका था। हाथ मे कुछ कॉपी-किताब आ गयी थी। जिस विध्यालय मे पूरे आठ साल विध्यालय प्रांगण से बाहर जाने की सोच भी नहीं सकते थे, कॉलेज मे आते ही कॉलेज के बाहर जाने की हवा लग चुकी थी। लक्ष्मी पार्क, इलाइट सिनेमा तक घूमना साधारण बात हो चुकी थी।
आज कॉलेज मे नव निर्माण का काफी बदलाव मैंने उस दिन नोट किया। प्रार्थना स्थल के चारों ओर नये-नये क्लास रूम बन गये थे पर बयोलॉजी, भौतिक विज्ञान एवं रसायनिक विज्ञान की प्रयोग शालाएँ एवं उससे लगी पीने के पानी की टंकी अपने यथा स्थान पर ही थी। पुस्तकालय का हाल बैसा ही दिखा पर ये आज भी चालू था कि नहीं कह नहीं सकता। स्कूल के ऊपरी हिस्से मे भी खपरैल के क्लास रूम को पक्के सीमेंटेड कमरों मे परिवर्तित कर दिया गया था। जिस खेल कक्ष से हम लोग हॉकियां या क्रिकेट के सामान ले कर कॉलेज के पीछे के मैदान मे खेलते थे वह कार्यालय के बगल मे आ चुका था। उन दिनों के खेल अध्यापक श्री शिकोरिया जी की याद आना स्वाभाविक थी जिनकी सीटी, डर और भय से अच्छे भले चलते छात्र के पग को डगमगा देती थी। प्राचार्य अग्रवाल साहब के बाद जिस अध्यापक से छात्र डरते थे उनमे शिकोरिया साहब एक थे।
अलग अलग विषयों के यूं तो
अलग अलग अध्यापक थे पर विज्ञान विषय का छात्र होने के नाते विज्ञान के अध्यापक
अजीत टंडन, जीव विज्ञान के श्री एस॰एस॰ आब्दि, श्री यूएस
गुप्ता, श्री राजपूत, भौतिक विज्ञान मे
श्री भागवत और श्री राम सहगल तथा रसायन विज्ञान के श्री बी॰ आर॰ गुप्ता के चेहरे
याद आना स्वाभाविक था। इन शिक्षक गणों का पढ़ाए जाने का ढंग और स्टाइल भी अलग अलग
था। आब्दि साहब अपने बोलने और पहनावे के विशेष लहजे के लिए प्रसिद्ध थे। टंडन साहब
अपने छात्रों से दोस्तना व्यवहार के लिए जाने जाते थे वही श्री राम शरण सहगल शांत
और सौम्य व्यवहार के लिये प्रसिद्ध थे। श्री बी॰आर॰ गुप्ता जी के रसायन विज्ञान के नोट्स हू-ब-हू
वही थे जो उन्होने चार वर्ष पूर्व हमारे बड़े भाई शरद सहगल को लिखाये थे। अतः मैंने
भाई साहब की पुरानी कॉपी को ही अपनी नोट्स बुक की तरह ही इस्तेमाल कर लिया था।
कॉलेज मे गणित के अध्यापक श्री संतोष शिवानी और अजीत टंडन की दोस्ती सुविख्यात थी।
श्री त्रिभुवन नाथ त्रिवेदी, बाला प्रसाद चतुर्वेदी, हरगोविंद कंचन यद्यपि हमे पढ़ाते नहीं थे पर छात्रों के बीच प्रसिद्ध थे। शालीन
और सौम्य स्वभाव के अँग्रेजी अध्यापक श्री जगत दुबे एक प्रभावशाली व्यक्तित्व के
धनी थे। उन दिनों प्राचार्य श्री आरके अग्रवाल के कक्ष मे निरुद्देश्य किसी भी
छात्र की हिम्मत नहीं होती थी वही श्री राम रतन कंचन वरिष्ठतम अध्यापक का सभी
छात्र और अध्यापक आदर सम्मान करते थे। अधीनस्थ स्टाफ मे श्री भुजबल और भोला सभी
छात्र और अध्यापकों के बीच लोकप्रिय थे। कार्यालय
के बगल मे ही उन दिनों लाई चने रूपी पौष्टिक आहार की बाल्टी का वितरण कक्षा बार
होता था। जिस पर कभी क्लास के छात्रों को
कम-ज्यादा बटवारे के कारण छीना झपट्टी और हल्की फुल्की झूमा झटकी भी हो जाती
थी।
जहां एक ओर क्लास रूम्स मे बदलाव स्पष्ट दिखाई देता था किन्तु कार्यालय भवन, प्राचार्य कक्ष आज भी जस के तस था। जहां पर वर्तमान प्राचार्य श्री डा॰ मनोज मिश्रा जी से उस दिन मुलाक़ात और बात चीत हुई। मेरा परिचय जान, बीते हुए दिनों की चर्चा को सांझा कर हम दोनों की ही राय उत्साह और प्रसन्नता देने वाली थी। योग दिवस पर वितरित हुए फल का वितरण मुझे भी किया गया।
भौतिक और जीव विज्ञान प्रयोग शाला के बीच स्थित लेक्चर थिएटर को देख उन दिनों विज्ञान परिषद के गठन हेतु छात्र सभा को संबोधित करने के क्षण आज पुनः याद हो आए। उन दिनों मै ग्यहरवी का छात्र था। जीवन मे पहली बार लगभग सौ सवासौ छात्रों के सम्बोधन के समय लड़खड़ाते पैरों को किसी तरह नियंत्रित कर हिम्मत और आत्मविश्वास तथा डॉ हरगोविंद खुराना के उदाहरण के चलते सम्बोधन ठीक ठाक रहा था और विज्ञान परिषद के उप सचिव पद पर निर्विरोध निर्वाचित हुआ था। उन दिनों की झूठी, खोखली, दिशा हीन और छद्म छात्र राजनीति का "राग दरबारी" आगे स्नातक कॉलेज तक प्रत्येक वर्ष यूं ही देखता और भोगता रहा जो कहीं भी आज की राजनीति से अलग न थी।
बैसे तो इंटर का पाठ्यक्रम दो वर्ष मे पूर्ण हो जाना चाहिये था पर दुर्भाग्य से भौतिक विज्ञान के विषय के पाठ्यक्रम मे उस साल आमूल चूल परिवर्तन के कारण इंटर मे एक साल असफलता का मुंह देखना पड़ा। मुझे अच्छी तरह याद है उस साल मात्र दो छात्र मधु सूदन सूद और वैदेही शरण सरावगी विज्ञान विषय मे ही सफल हुए थे। उस असफलता के सबक ने मुझे "सफलता के प्रयास पूरे मन से न करने" का संदेश ता उम्र देते रहे।
इन कुछ खट्टे मीठे अनुभवों का संदेश मन मे लिए, एस॰पी॰आई॰ इंटर कॉलेज मे विताए अपने पुराने विस्मृत दिनों को एक बार पुनः स्मरण करते हुए मैंने वर्तमान प्राचार्य श्री मनोज मिश्रा, विनोद चतुर्वेदी और उनके अन्य सहयोगियों का अभिवादन करते हुए अपने गंतव्य की ओर प्रस्थान किया।
विजय सहगल





1 टिप्पणी:
अत्यन्त सुन्दर लेखन
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