"चैल (चायल), हिमाचल प्रदेश"-2
एक
जून 2022 को शाम के लगभग चार बजे हम अपने होटल ओक वूड मे पहुंचे। बैसे तो पूरा चैल
गाँव ही निस्तब्ध शांति मे सराबोर हो सुख और चैन का अनुभव करा रहा था। होटल के सामने
भी घने वृक्षों के बीच पशु पक्षियों की आवाज वातावरण की नीरवता को कभी कभी भंग
करती नज़र आ रही थी, शांति और शून्यता इतनी
थी कि होटल के रूम से 50-60 फुट नीचे सड़क पर बात कर रहे लोगो की आवाज स्पष्टता के
साथ सुनी जा सकती थी। कुछ देर विश्राम के बाद हमने होटल से लगभग 2 किमी॰ दूर स्थित
चैल पैलेस घूमने का कार्यक्रम बनाया। मैदानी क्षेत्रों के पूर्व राजे-महाराजों के
विपरीत पहाड़ों के राजाओं की रियायसते,
पैलेस और महल छोटे पर भव्य और शांत वातावरण मे सुकून और शांति का अनुभव प्रदान
करते प्रतीत होते है। चैल पैलेस को भी यहाँ के राजा भूपेन्दर सिंह द्वारा 1893 मे
बनवाया गया था जो पटियाला घराने से संबन्धित थे। यहाँ के रियासतों,
महलों के हालात का अंदाज़ा इसी बात से
लगाया जा सकता है कि इन महलों के एक हिस्से मे अधिकतर को हैरिटेज़ होटल मे
परिवर्तित किया जा चुका है, इसके बावजूद रखरखाव के लिये पर्यटकों से चैल
पैलेस के अवलोकन हेतु 100 रुपए प्रवेश शुल्क बसूल किया जा रहा था।
दो
मंज़िला चैल पैलेस या विरासती होटल मे
10-12 विलासिता पूर्ण कमरों के अलावा सभी खुले गलियारे और बरामदे को आम पर्यटकों
के लिये खोला गया है। पूर्व महाराजाओं के कुछ विदेशी उपहारों,
पेंटिंग्स, धातु की प्रतिमाओं,
पियानो, झूमरों,
पुराने फ़र्निचर शोकेश आदि को सँजो कर रक्खा गया था। गलियारों मे बिछे कालीन और
पुराने आईने पैलेस की सुंदरता मे इजाफ़ा कर रहे थे। होटल की ऊपरी मंजिल पर सराहन
स्थित देवी के मंदिर का मॉडल भव्य और आकर्षक था। कुछ बेशकीमती पेंटिंग्स के सामने
बैठ अपनी फोटो खिंचवाने का लोभ संभरण मै न कर सका। महल मे ही स्थित रेस्टुरेंट मे भी राजाओं की
भव्यता और विलसता के दर्शन हो रहे थे। अर्थव्यवस्था को प्रोत्साहन और बढ़ावा देने और विरासत कालीन होटल
के सुचारु संचालन के लिये हम सभी ने अपनी
सहभागिता सुनिश्चित करने हेतु हिमाचल पर्यटन
विकास निगम द्वारा संचालित उक्त जलपान गृह के व्यंजनों का रसास्वादन भी
हमने परिवार सहित लिया। अल्पाहार स्वादिष्ट और प्रिय था। जलपान मे प्रयुक्त कटलरी
और अन्य उपयुक्त पात्र भी सुंदर और आकर्षक थे जिनमे जलपान करना एक अलग ही आनंद
देने वाला अनुभव था। हाँ बार (मदिरालय) के
बारे मे ज्यादा वर्णन उचित प्रतीत नहीं होता अतः सिर्फ फोटो देख कर ही काम चलाएं।
बापसी
मे बमुश्किल 30-40 दुकानों का छोटा सा बाज़ार देखा जिसमे अधिकतर खाने,
नाश्ते से संबन्धित दुकाने थी। अधिकतर दुकानों मे आवश्यकता की हर चीज एक ही दुकान
पर बेचने का रिबाज़ है। सब्जी, भाजी,
किराना, वर्तन,
कपड़े आपको एक ही जगह उपलब्ध हो जाएंगे। बाजार मे घूमना भी अलग रोमांचकारी अनुभव
था।
दिन
भर दौड़ धूप, ड्राइविंग की थकावट के
बाद गहरी नींद मे रात मे अच्छी नींद का आनंद
लिया। अच्छी ख़ासी सर्दी के कारण रज़ाई,
कंबल पहली बार इस्तेमाल किये। चैल के बगैर पंखे और एसी के मौसम ने तबीयत खुश कर
दी। दूसरे दिन माँ काली का प्राचीन मंदिर जो क्षेत्र के निवासियों मे बड़ा महत्व और
मान्यता रखता है। चैल से लगभग 4-5 किमी॰ दूर ऊंची पहाड़ी पर स्थित सफ़ेद रंग का किले
नुमा भव्य मंदिर, जहां से पूरे चैल और
दूर दराज़ के क्षेत्रों का से 360 डिग्री
का शानदार नज़ारा दिखाई देता है। हाँ जमीनी स्तर पर बने सफ़ेद किले नुमा ऊंचे कंगूरों
के कारण दर्शनार्थी पहाड़ी के चारों ओर बने प्रकृतिक दृश्यों के दर्शन से पूर्णत: वंचित
रह जाता है!! शायद, इस वास्तु दोष को मंदिर
प्रबंधन ने निर्माण के समय महसूस नहीं किया।
लेकिन मंदिर के मुख्य प्रांगण रूपी छत्त पर सीढ़ियों से चढ़ कर पहाड़ी के चारों ओर दूर
दूर तक हरे वृक्षों से आच्छादित पहाड़ियों के
सुंदर ईश्वरीय परिदृश्य को देख कर मन को सुकून देने वाले दृश्य को देखा जा सकता है।
दूर दूर तक हरे भरे वृक्ष आँखों को सकून
और सुख देने वाले प्रतीत होते है। मंदिर मे माँ काली के अतरिक्त हनुमान जी,
एवं भगवान शिव का भी मंदिर है। प्रातः इन
सभी देवी देवताओं के दर्शन से दिन की शुरुआत हमारी अगली मंजिल कुफ़्री भ्रमण
के लिये ऊर्जा का संचार करने वाली थी।
विजय
सहगल





1 टिप्पणी:
सहगल जी आपने बहुत सुंदरता से चैयल और मां काली टिब्बा मंदिर का वर्णन किया। मुझे भी इस वर्ष देवभूमि के इस हिस्से पर रहने का अवसर मिला। मैं भी अपने परिवार के साथ लाल किला रिजॉर्ट मे रुका था। सच में यहां की शान्ति और सुंदरता मनमोहक है।
शिव शर्मा
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