शुक्रवार, 20 मई 2022

एक शहँशाह ने बनवा के हंसी ताज महल.......

 

"एक शहँशाह ने बनवा के हंसी ताज महल......."






सन 1630 मे निर्माण कार्य शुरू होने के बाद आगरा स्थित ताज महल,  भारतीय कारीगरों और वास्तुकारों के 23 वर्ष के अनथक प्रयास के पश्चात, वास्तु और  स्थापत्य का श्रेष्ठ नायाब निर्माण का नमूना ताज महल, सन 1653 मे बन कर तैयार आठ आश्चर्यों मे से एक इस ताज महल को विश्व धरोहर की बहुत ही खूबसूरत इमारतों मे एक गिना जाता है।  इस खूबसूरत इमारत को प्रेम और मोहब्बत के प्रतीक के रूप मे भी याद किया जाता है!! तमाम शायरों और कवियों ने भी खुर्रम उर्फ शाहजहाँ द्वारा निर्मित कराये ताज महल को अपनी पत्नी मुमताज़ के प्रेम और प्यार से जोड़ कर कवितायें किस्से भी लिखे है। देश के मशहूर शायर श्री शकील बदायूंनी ने तो एक कदम आगे बढ़ एक नज़्म लिखी :-

एक शहँशाह ने बनवा के हंसी ताज महल,

सारी दुनियाँ को मोहब्बत की निशानी दी है। (शकील बदायूंनी) 

इस एक नज़्म ने मुझे शाहजहाँ और मुमताज़ की मोहब्बत और प्रेम के प्रतीक इस मकबरे के बारे मे परिणामिक  शोध करने पर मजबूर कर दिया। गूगल मे तमाम  खोजबीन के बाद मै इस निष्कर्ष पर पहुंचा हूँ कि शाहजहाँ ने इस स्मारक को बनवाने मे वो सब कुछ किया जो इसे एक खूबसूरत और सुंदर इमारत बनाता है सिवाय  "प्रेम और मोहब्बत" के? "प्रेम और मोहब्बत" का ताज महल के निर्माण की कहानी मे कहीं दूर-दूर का रिश्ता  नज़र नहीं आता!! हाँ!, निम्न लिखित तथ्यों के आधार पर शाहजहाँ का मुमताज़ महल के प्रति एक तरफा प्यार और मुहब्बत हर कदम पर अवश्य दिखाई देता है!! क्या ताजमहल के निर्माण के पूर्व प्यार और मोहब्बत नहीं था? या इसके निर्माण के पश्चात भी ऐसी अनुराग, प्रीति या प्रेम नहीं होगा?  तभी तो मेरे इस निष्कर्ष के पक्ष को मजबूत करती देश के एक  विख्यात और नामी शायर श्री  साहिर लुधयानवी की ताज महल के उपर लिखी  निम्न पंक्तियां साधारण  आदमी के जीवन मे मोहब्बत के जज़्बात को  यथार्थ के धरातल पर दर्शाती नज़र आती है कि:- 


एक शहँशाह ने दौलत का सहारा लेकर
हम गरीबों की मोहब्बत का उड़ाया है मज़ाक। (साहिर लुधियानवी)

 

·         1627 मे जहाँगीर की मृत्यु के बाद शाहजहाँ ने छल-प्रपंच से सत्ता हथियाने के बाद अपने ससुर को  निर्देश दिया कि शाही परिवार के उन सभी सदस्यों को समाप्त कर दे जो सत्ता के दावेदार थे। 16 जनवरी 1628 को महलों मे षड्यंत्रों से उपजे कत्लेआम से सत्ता हथियाने वाले शाहजहाँ के आचरण मे क्या कोई पारवारिक भाई-चारा या  प्रेम-मोहब्बत कहीं आसपास दिखाई देती  है?

·       कुछ इतिहासकारों ने लिखा है कि मुमताज़ महल की पहली शादी मुगल सेना के एक सिपाही के साथ हुई थी। शाहजहाँ द्वारा जिसकी हत्या करवाने के बाद ही उसने मुमताज़ से निकाह किया। क्या किसी स्त्री के पति की सरे आम हत्या के बाद उससे प्यार, मोहब्बत और समर्पण की उम्मीद की जा सकती है? यह  एक बड़ा मनोवैज्ञानिक प्रश्न है? शायद इतिहास कार मानवीय स्वभाव के इस पहलू को भूल कर चाटुकारों की तरह शाहजहाँ की ठकुर सुहाती कर मुमताज़ से उसके प्यार और मोहब्बत की छद्म स्तुति-गान करके, सत्ता सुख भोगते रहे!!    

 

·         5 जनवरी 1592 मे लाहौर मे जन्मे शाहजहाँ की सगाई सन 1607 मे  15 साल की उम्र मे मुमताज़ उर्फ आर्जूमंद बानो बेगम के साथ हुई थी। शादी, सगाई के पाँच वर्ष बाद 10 मई 1612 मे हुई। सगाई और शादी के बीच इन पाँच वर्षों के दौरान  शाहजहाँ की दो शादिया हो चुकी थी!! आश्चर्य!!, यदि शाहजहाँ को मुमताज़ महल से इतनी ही मोहब्बत होती तो सन 1609 मे फारस की शहजादी क्वानदरी बेगम से पहली शादी और दूसरी शादी अकबरी बेगम से क्यों करता? आश्चर्य देखिये कि मुमताज़ महल से शादी मे पाँच साल तक इंतज़ार!! वो भी तत्कालीन मुगल सल्तनत के राजकुमार शाहजहाँ द्वारा? बात कुछ हजम नहीं होती?

 

·         ऐसा नहीं था कि मुमताज़ महल के शादी के बाद और 14वे बच्चे की प्रसव पीढ़ा के दौरान मुमताज़ महल के देहावसान के पश्चात शाहजहाँ उसके विछोह मे विरक्ति धारण कर ली हो? या मुमताज़ महल के न रहते उसके स्वच्छन्द यौन आचरण कोई कमी आयी हो!! इसलिये ये कहना कि वह अपनी बेगम मुमताज़ महल से वेइंताह प्यार था "अतिशयोक्ति" और "अतिरंजना" से ज्यादा कुछ नहीं था।    

 

·         मुमताज़ की याद मे बनवाए गए ताज महल के निर्माता शाहजहाँ को इतिहास कारों ने प्रेम, मोहब्बत, प्यार, प्रीति  और न जाने ऐसे ही अन्य अनेक विशेषणों से अलंकृत किया है। ताज महल के निर्माण कार्य के पश्चात इसके निर्माण मे लगे लगभग 22 हजार कारीगरों, मजदूरों और कामगारों के दोनों हाथ काटने की घटना इतिहास मे सर्वविदित है। क्या मोहब्बत और प्रेम मे सरावोर कोई आशिक शहँशाह  इतना क्रूर और निर्दयी भी हो सकता है? ताजमहल के निर्माण मे लगे इन निर्धन और मेहनतकश मजदूरों के अंग-भंग कराने वाले शाहजहाँ को इतिहासकारों द्वारा  प्रेम-मोहब्बत का प्रतीक निरूपित करने मे बहुत बड़ा संदेह और शंका खड़ा करता है? दुनियाँ की सबसे सुंदर इमारत बनाने वाले कारीगरों के हस्त-विच्छेदन करने वाला निर्दयी, क्रूर और कठोर शासक को कैसे प्रेम-मोहब्बत का प्रतीक कहा जा सकता है?   यह एक विचारणीय प्रश्न है जो उसके प्रेम और मोहब्बत पर बहुत बड़ा सवालिया निशान खड़ा करता है।

 

·         जिस शाहजहाँ ने वैवाहिक जीवन के 19 वर्षों मे अपनी प्रिय बेगम मुमताज़ महल को  14 बार संतान सुख की खातिर लगातार  प्रसव पीढ़ा दे प्रसूता  बना कर रक्खा हो, वो इस बात को दर्शाता है कि शाहजहाँ ने अपनी यौन क्षुधा  पूर्ति की तुष्टि ही की, कदाचित ही  उसने एक पल भी अपनी बेगम के ख्यालातों, जज़्बातों और अरमानों की कद्र की होगी? मुमताज़ महल उर्फ मेहरुन्निसा ने शाहजहाँ की इन उच्छृंखल आचरण  के चलते ही अपनी 14वी संतान को जन्म देने के दौरान दम तोड़ दिया। मनोवैज्ञानिक तौर पर देखे तो मेहरुन्निसा का जीवन सोने के पिंजड़े मे कैद एक परिंदे की तरह था जिसे सभी सुख सुविधायेँ तो थी सिवाय आज़ादी के? क्या इन हालातों और परिस्थितियों मे कोई दंपति आपस मे प्यार और मुहब्बत की कल्पना कर सकते है?

 

·         इतिहासकार लिखते है कि जहां कहीं भी शाहजहाँ जाते थे मुमताज़ भी उनके साथ यात्राओं और युद्धों मे जाती थी (या बलात ले जायी जाती थी?) क्या कोई स्त्री जिसका लगभग पूरा वैवाहिक जीवन बच्चों को जनने मे ही बीता हो, युद्ध और यात्राओं की आपा धापी मे जाना पसंद करती होगी? लेकिन शाहजहाँ ने जिस तरह सत्ता और शासन हथियाया था शायद  उसकी पृष्ठभूमि मे छुपे अदृश्य अविश्वास और  भय के कारण ही उसे अपने परिवारियों, दरबारियों और कर्मचारियों पर सहज और सरल विश्वास न होने के कारण ही वह हर यात्रा और युद्ध मे उसे अपने साथ रखता हो? इसके चलते ही बुरहानपुर मे उसकी 17 जून सन 1631 मे मृत्यु हो गयी।

           

·         मुमताज़ महल का निधन बुरहानपुर मे सन 1631 मे प्रसव पीढ़ा के दौरान 37 वर्ष की उम्र  हो गया था। इतिहास मे इस बात का उल्लेख है कि मुमताज़ महल के पार्थिव शरीर को छह माह बाद आगरा ले जया गया। ताज महल के निर्माण पूर्ण होने के पश्चात मुमताज़ महल को 22  वर्ष बाद  ताज महल मे दफन किया गया। मुमताज़ महल का शव 22 वर्षों तक कहाँ, किस हाल मे रहा कोई नहीं जानता? इस तरह 22-23 साल तक शव की छीछा लेदर करना, बार-बार कफन-दफन बदलना प्यार और मुहब्बत को कम मानसिक आरोग्य को अधिक प्रदर्शित करता है?  

 

उपर्युक्त सारे निष्कर्षों से समझ पाना कठिन नहीं है कि शाहजहाँ और मुमताज़ महल के मोहब्बत के प्रतीक ताज महल मे प्रेम-मुहब्बत  जैसी कोई चीज नज़र आती हो? मुमताज़ से शाहजहाँ का प्रेम, एक तरफा प्रेम ही प्रतीत होता है, कदाचित ही उसने मुमताज़ महल के प्रेम, भावनाओं और इच्छाओं और समर्पण का कभी कोई सम्मान किया होगा?

 

जिस झूठ और फरेब के आधार पर अपने सहोदर भाइयों और सगे संबंधियों का कत्ल कर शाहजहाँ ने सत्ता हथियाई उसके पुत्र औरंगजेब ने भी अपने पिता के पथानुगामी  बन उसे उम्र के आखिरी पढ़ाव के आठ वर्ष कैद कर, एक-एक बूंद पानी के लिये तड़पा तड़पा कर जीते जी नरकीय जीवन जीने को मजबूर किया।  तत्पश्चात 22 जनवरी 1666 को 74 वर्ष की आयु मे शाहजहाँ को औरंगजेब के दोज़ख से छुटकारा मिला और वे जन्नत को प्यारे हो गये?

 

गोस्वामी तुलसी दास जी ने श्री रामचरित मानस मे सही ही लिखा है कि :-

करम प्रधान विश्व रचि राखा।

जो जस करई सो तस फल चाखा॥

 

अर्थात जैसी करनी, बैसी भरनी को चरितार्थ करती कहावत "बोया पेड़ बबूल का आम कहाँ से होय?"  शाहजहाँ के जीवन चरित्र पर सही साबित होती है!!

विजय सहगल  

 

   

3 टिप्‍पणियां:

बेनामी ने कहा…

बहुत सुंदर और सटीक विवेचन किया है आपने कि मुमताज़ की मोहब्बत में शाहजहाँ ने ताजमहल बनाया था । कम्युनिस्ट इतिहासकारों ने मुग़लों के रक्तरंजित इतिहास को ग़लत ढंग से पेश कर पीढ़ियों के साथ अन्याय किया तथा कांग्रेस ने इसमें भरपूर सहयोग किया । इतिहास को सही ढंग से लिखने की आवश्यकता है ।

विजय सहगल ने कहा…

धन्यवाद बंधु। आप जैसे सुधि पाठक का नाम न लिखा होने के कारण आपको व्यक्तिगत आभार जताने मे असमर्थ हूँ। हार्दिक आभार।

बेनामी ने कहा…

पहली टिप्पणी के बाद कुछ कहने को बचा नहीं है। एक बात यह है कि हिंदुस्तान आज़ादी के बाद से ही सत्ता धारकों को शांति दूतों के इलावा ऐसे कोई बुद्धिमान हिन्दू व्यक्ति नही मिला जिसे शिक्षा मंत्री के पद से नवाजा जा सके। जब शांति दूत शिक्षा मंत्री बन जाय तो वह अपनी खून को नजर अंदाज कैसे कर सकता है और उनकी प्यार पर कैसे आंच आने देते।