"कश्मीर फ़ाइल्स" (समापन अंश-2)
इस
फिल्म के प्रदर्शन पर पक्ष और विपक्ष की प्रतिक्रिया स्वाभाविक थी। जहां
वामपंथियों और कॉंग्रेस के अधिसंख्य नेताओं, पीडीपी नेता महमूदा मुफ़्ती एवं नेशनल
कॉन्फ्रेंस के नेता एवं पूर्व मुख्य मंत्री
फारुख अब्दुल्ला, उमर अब्दुल्ला और अन्य अनेक नेता तो
सीधे ही फिल्म की कथावस्तु को झूठा
सिद्ध करने में लगे हुए थे। बहस और विवाद इस बात पर भी था कि उस वक्त केंद्र मे किस की सरकार थी और
राज्यपाल कौन था। लेकिन एक बात निर्विवाद रूप से सच थी कि 19 जनवरी के सत्य को विवादित बनाने का कुत्सित
प्रयास किया जा रहा था। फारुख अब्दुल्ला जिन्होने 19 जनवरी 1990 के नरसंहार के
एक दिन पहले अर्थात 18 जनवरी 1990 को
जम्मू कश्मीर राज्य के मुख्य मंत्री पद से इस्तीफा देने के करण इस नरसंहार से
निर्लज्जता, धृष्टता और धूर्तता पूर्वक अपनी ज़िम्मेदारी से पल्ला छाड़ लिया। फारुख
अब्दुल्ला जैसा परिपक्व कोई राजनेता कैसे समय की लकीरों को साक्षी मान अपने राज्य
की जनता के दुःख-दर्द और कष्टों से किनारा सिर्फ इसलिये कर सकता है कि एक दिन पहले
उसने राज्य के मुख्य मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया था? आतंकी
और आतंकी संगठन कोई एक दिन मे नहीं खड़े होते? ऐसी आतंकी घटना कोई एक दिन मे अचानक नहीं घट जाती? महीनों, सालों पहले से ये आतंकी चरमपंथी समाज मे
अशांति और उपद्रव का माहौल बना रहे थे। इन आतंकियों को जहां एक ओर पाकिस्तान की
सरकारे पोषित कर रही थी वही दूसरी ओर जम्मू कश्मीर मे राजनीति के सरपरस्त कुछ
राजनैतिक परिवार भी अपने हाथ बांध तमाशबीनों की तरह खड़े थे। जब 19 जनवरी 1990 को कश्मीर मे हिन्दू पंडितों का जन
संहार हो रहा था तो फारुख अब्दुल्ला लंदन मे गोल्फ खेल का आनंद ले रहे थे। इन काल
और परिस्थितियों को देख तो ऐसा ही लगता है कि जन संहार के एक दिन पहले मुख्यमंत्री
पद से इस्तीफा देना फारुख अब्दुल्ला की
सोची समझी चाल थी? उनके इस गैरजिम्मेदारन व्यान के आधार पर
हमे क्यों नहीं शंका करना चाहिये कि आतंकी संगठनों के इस नर संहार की उन्हे पूर्व
सूचना थी? इस संदेश और शक के पर्याप्त आधार हैं कि फारुख
अब्दुल्ला त्याग पत्र दे अपनी कानूनी
ज़िम्मेदारियों से तो बच गये पर
क्या वे एक जन प्रीतिनिधि और राज नेता के नाते अपने नैतिक कर्तव्यों से कभी बच
सकेंगे? उनका ये
कहना कि 19 जनवरी 1990 को कश्मीरी पंडितों की समूहिक हत्या के समय मै मुख्य मंत्री
पद से इस्तीफा दे चुका था? उनकी धृष्टता, अशिष्टता और बेहयाई की चरम सीमा है!!
कश्मीरी
पंडितों के पलायन और नर संहार के लिये जहां एक ओर
फारुख अब्दुल्ला सरकार जिम्मेदार थी ही वहीं दूसरी ओर केंद्र मे स्थित काँग्रेस शासित इन्दिरा
सरकार के निष्क्रिय रवैये ने भी कश्मीरी पंडितों के जन संहार और पलायन ने आग मे घी का काम किया। हमे अच्छी तरह याद है इस दौरान कश्मीर मे घटने
वाली हर आतंकी हत्या, लूट
बलात्कार या जन संहार की घटनाओं की
प्रतिक्रिया स्वरूप सरकार समाचार पत्रों मे सिर्फ "रेड अलर्ट घोषित कर दिया है"!!
या "सुरक्षा और कड़ी कर दी गयी है"!! के
संदेश देने की औपचारिकता मात्र निभायी जाती
थी, और आतंकी संगठन
दिन व दिन नयी नयी हिंसक घटनाओं को अंजाम
देते रहते थे। आज की तरह सेना और सुरक्षा बालों को कभी भी आतंकी संगठनों के
विरुद्ध कार्यवाही करने की खुली छूट नहीं दी गयी थी? सेना के
अनेकों उच्च पदस्थ अधिकारियों ने भी उन दिनों की काँग्रेस सरकार की कश्मीरी अलगाव
वादी और आतंकवादियों के विरुद्ध राजनैतिक ईक्षा शक्ति मे कमी का खुले आम और स्पष्ट तौर पर उल्लेख किया था। यदि आज की तरह ही
दृढ़ ईक्षा शक्ति वाली सरकार उन दिनों होती और इन अतिवादियों,
पत्थरबाजी करने वालों और अशांति फैलाने वालों के विरुद्ध सख्त कदम उठाए गए होते तो
कश्मीर मे आतंकवाद का ये नासूर इतना न बढ़ता।
फिल्म
मे एक जगह उल्लेख किया गया कि जम्मू कश्मीर मे 19 जनवरी 1990 मे नर संहार और
औपचारिक रूप से पंडितों का पलायन की शुरूआत हुई लेकिन मेरा मानना है कि हिंदुस्तान
मे पहला नर संहार और पलायन 1947 मे देश
विभाजन के संदेश के साथ ही शुरू हो चुका
था। चूंकि उक्त पलायन देश के पश्चिम मे एक
सीमित क्षेत्र पंजाब और सिंध प्रांत तथा
पूर्व मे बंगाल तक ही सीमित था। पंजाबियों, सिंधियों और बंगालियों का कत्लेआम और पलायन का दुःख शेष भारत मे 15 अगस्त
1947 मे स्वतन्त्रता के उल्लास और उमंग के शोर के बीच दब गया? ऐसा मानना है कि 1947 के इस पलायन मे उक्त लोगो को न केवल अपनी जमीन, जायदाद, धन संपत्ति, अपहरण, हत्या, हिंसा एवं बलात्कार झेलना पड़ा अपितु लगभग 10 लाख से भी
अधिक व्यक्तियों को अपनी जान से भी हाथ धोना पड़ा था।
नेशनल
कॉन्फ्रेंस, पीडीपी, वामपंथी, काँग्रेस और
ऐसी ही विचारधारा वाले राजनैतिक दलों, रवीश कुमार, एनडीटीवी जैसे
दोहरी मानसिकता की सोच वाले टीवी चैनल ने कश्मीर फाइल फिल्म के जनसंहार को राजनीति से प्रेरित दिखाने का प्रयास किया।
हिन्दू अखबार ने तो इसे अर्ध सत्य और तोड़ मरोड़ कर उकसाने एवं भड़काने के इरादे से
लिखी पटकथा बताया। यही नहीं इन अभिव्यक्ति के छद्म पैरोकारों ने फिल्म के निर्देशक
पर पैसा कमाने का आरोप भी लगाया। इस फिल्म
के प्रदर्शन को गड़े मुर्दे उखाड़ना, सांप्रदायिक वैमनस्य
फैलाने वाली एवं आपसी भाई चारा बिगड़ने एवं अशांति फैलाने की अशंका वाली फिल्म बताया। मै ऐसी सोच और विचार धारा के लोगो से पूंछना
चाहता हूँ कि चाहे अत्याचार और अनाचार के प्रतीक यहूदी राजा पिलातुस द्वारा प्रभु ईसा मसीह को शूली पर
चढ़ाने की घटना हो या करबला के युद्ध मे याजीद द्वारा इमाम हुसैन के निर्दयी कत्ल
हो या दुनियाँ के एक मात्र ईकलौते दृष्टांत के तहत श्री गुरु तेग बहादुर जी द्वारा 11 नवम्बर 1675 मे हिन्दू धर्म के
रक्षार्थ क्रूर आततायी औरंगजेब जैसे विधर्मी
की अवज्ञा कर अपना आत्मोत्सर्ग कर सर्वोच्च बलिदान इस बात के उदाहरण है कि हर देश
और काल मे ऐसे महा पुरुषों ने क्रूरता, अनाचार और अत्याचार के विरुद्ध अपना बलिदान दे मानवता की रक्षा की है। हर
वर्ष इन श्रेष्ठ पुरुषों के बलिदान दिवस पर इनके पराक्रम,
शूर-वीरता फिर चाहे ईसा मसीह का गुड फ्राइडे पर स्मरण,
इमाम हुसैन के बलिदान का मुहर्रम पर
यशोगान या श्री गुरु तेग बहादुर जी का शहीदी पर्व को याद करने की परंपरा आज तक चली
आ रही है। इन श्रेष्ठ पुरुषों के शौर्य, साहस और वीरता को याद करने से विद्वेष, घृणा, तिरस्कार या नफ़रत कैसे फैल सकती है? अपितु उन क्रूर
शासकों, दुष्टों आततायी, हैवान समूहों
और पशुवत व्यक्तियों के स्याह चेहरे, जुल्म, ज्यादती, अत्याचार और उत्पीढन को बारम्बार स्मरण उस विचारधारा और घृणित मानसिकता को
धिक्कारना से होता है। कश्मीर फ़ाइल मे भी 1990 के दशक मे कश्मीरी
पंडितों पर अत्याचार, हिंसा और अनाचार की घटनाओं के दस्तावेज़ फिल्म के रूप मे तैयार कर दिये गये है, अब उनकी ये नैतिक ज़िम्मेदारी है कि इन विलेखों को अपनी आने वाली पीढ़ियों
को इस निर्देश के साथ सुपुर्द करें कि हर वर्ष इस अन्याय और अत्याचार की इन घटनाओं पर चर्चायेँ-परिचर्चायेँ, गोष्ठियाँ और सभाओं के माध्यम से अपने देश और समाज के लोगो को जाग्रत कर इन
घटनाओं की यादे सांझा करें।
फिल्म
मे निश्चित ही कुछ घटनाओं का ही फिल्मांकन किया गया जो कश्मीरी पंडितों के नरसंहार
और पलायन से संबन्धित थी। अन्य अनेकों
घिनौनी और विभत्स घटनों का छायांकन दिखाया जा सकता था। लेकिन शायद इतिहास मे
कश्मीरी पंडितों के सबसे बड़े पलायन को केंद्रीय विषय बनाने के कारण अन्य
विषयों को इस फिल्म के साथ नहीं उठाया गया ताकि पलायन और नरसंहार के विषय पर ही
ध्यान केन्द्रित किया जा सके, जो विषय की गंभीरता गहराई और महत्व को बनाए
रखने हेतु आवश्यक एवं समयोचित था। 20 मार्च सन 2000 को अनंतनाग जिले के छत्तीपोरा
मे इन्ही आतंकवादि राक्षसों ने 35 सिक्खों के सामूहिक जन-संहार की घटना भी इनमे से
एक है, जब इसी तरह लाइन मे खड़ा करके इन कश्मीरी उग्र एवं
अलगाव वादियों ने मानवता को गोलियों से भून दिया था। तमाम प्रगतशील मुस्लिम आदर्श
वादियों ने भी कश्मीर मे इन अलगाव वादियों से संघर्ष कर अपना बलिदान किया है। इन
घटनाओं पर भी अलग अलग फिल्मांकन की महती आवश्यकता है। लेकिन इन अतिवादी घटनाओं मे
प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से लिप्त व्यक्ति एवं राजनैतिक संगठन, झूठा स्यापा कर कश्मीर मे आतंकियों के हमले मे असमय मारे गये राष्ट्र भक्त
मुस्लिमों और समाज के अन्य लोगो के बलिदान को, पंडितों के पलायन और नर संहार के साथ घाल मेल
कर विषय को हल्का बनाने का निष्ठुर प्रयास कर रहे थे पर भारतीय जनमानस द्वारा फिल्म की अपार ने उनके इस नृशंस प्रयास को असफल कर दिया।
एक
अंतिम बात और, हमे ये स्मरण रखना होगा हर देश, काल मे गुरु तेग बहादुर जैसे आत्मबलिदानी महा पुरुष पैदा नहीं होंगे। हमे खुद उनकी शिक्षाओं से उन जैसा न सही पर उनके
जैसा बनने का प्रयास करने होंगे।
विजय
सहगल


1 टिप्पणी:
आपने कश्मीर की इस समस्या पर वास्तव में काफी चिंतन-मनन किया है ।
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