"आर॰टी॰जी॰एस॰"
सार्वजनिक सेवा के किसी भी संस्थान की सफलता उसके कर्मचारियो के टीम आधारित प्रयास पर निर्भर करती है। टीम के
किसी भी सदस्य की कोताही पर सफलता मे अवरोध और परिणाम के रूप मे विरोध उत्पन्न होता है। ऐसा ही कुछ मैंने अपनी
बैंक सेवा के डबरा पदस्थपना मे महसूस
किया। धन प्रेषण का इलेक्ट्रॉनिक्स "आरटीजीएस" माध्यम नया-नया ही शुरू
हुआ था। इसके अंतर्गत एक बैंक का ग्राहक
अपने बैंक के माध्यम से पैसे को भारत मे किसी
दूसरे बैंक की किसी भी शाखा मे सीधे ही धन
का प्रेषण कर सकता था।
शायद सन् 2007 की बात थी। हमारी शाखा के एक महत्वपूर्ण ग्राहक श्री संतोष
जी मोर ने पाँच लाख रुपए की धनराशि का प्रेषण एसबीआई की इटावा शाखा के अपने
व्यवसायिक हित रखने वाले व्यापारी को आरटीजीएस के माध्यम से प्रेषित करने का आवेदन
किया। वे डबरा के एक बड़े व्यापारी है। समान्यतः इस प्रेषण को उसी दिन चार घंटे के
भीतर प्रेषित हो जाना चाहिए था लेकिन पता नहीं किस तकनीकी खामी के चलते उक्त
धनराशि इटावा स्थित उनके व्यापारी के खाते मे नहीं पहुंची। व्यापारी से फोन पर
चर्चा से ज्ञात हुआ कि उक्त धनराशि उन्हे उस दिन देर रात तक भी नहीं मिली! संतोष
जी की धन प्रेषण पर व्यापारिक विश्वसनीयता और प्रतिष्ठाता पर चिंता स्वाभाविक थी
पर उनसे ज्यादा चिंता मुझे इसलिये हो रही थी कि पाँच लाख जैसी बड़ी धनराशि के
प्रेषण मे कहीं कोई चूक बैंक स्तर पर हमारे स्टाफ से तो नहीं हो गयी? बैंक खाता नंबर या बैंक के कोड लिखने मे कोई
त्रुटि से धन प्रेषण कहीं किसी गलत व्यक्ति के खाते मे तो नहीं हो गया?
मुझे चिंता यूं हो रही थी कि शाखा से पहले "आरटीजीएस" धन प्रेषण से कहीं
ऐसा न हो कि "होम करते हाथ जल जायें"?
सावधानी वश, शाम को बैंक बंद करने
के पूर्व मैंने उक्त समस्या के बारे मे अपने उच्च अधिकारियों को फोन और ई-मेल के
माध्यम से अवगत करा दिया था।
अगले दिन सुबह बैंक मे आते ही मैंने
आरटीजीएस सेल दिल्ली और मुंबई फोन किया और विस्तृत विवरण दे कर जानकारी चाही पर
बहुत सकारात्मक उत्तर दोनों जगह से प्राप्त नहीं हुआ। मुझे याद है दिल्ली मे कोई
उमा मेडम इस संबंध मे अपने स्तर पर प्रयास रत तो थी पर उनके प्रयास भी निश्चयात्मक
परिणाम देने वाले न थे। उस दिन पूरे समय मै दिल्ली और मुंबई फोन करता रहा। दिल्ली
फोन करो, तो वे लोग मुंबई संपर्क
करने का निर्देश देते और मुंबई कार्यालय
वाले दिल्ली संपर्क करने की हिदायत दे रहे थे। मुझे अच्छी तरह याद है उस पूरे दिन
फोन पर हमारे दिल्ली और मुंबई कार्यालय ने
मुझे फुटबाल की तरह इस्तेमाल कर दिल्ली और मुंबई के पाले मे लतिया-लतिया कर
मेरी हालत खराब कर दी थी!! इसके बावजूद मैने मुंबई और दिल्ली स्थित दोनों ही कार्यालयों के अधिकारियों से धैर्य
पूर्वक यही निवेदन किया कि नियमानुसार यदि
चार घंटे मे प्रेषण नहीं हुआ तो पैसा व्यापारी के खाते मे बापस तो आना चाहिए?
परंतु अफसोस कोई संतोषजनक उत्तर नहीं प्राप्त हुआ। वही दूसरी ओर हमारे खाता धारी
श्री संतोष जी मोर भी व्यापारी के पास पैसा न पहुँचने के कारण परेशान थे। उनकी
व्यावसायिक साख भी दाँव पर लगी थी। एक बात अच्छी थी चूंकि पाँच लाख रुपए जैसी बड़ी
धन राशि का मामला था तो मैने भी पूरे घटना क्रम को ई-मेल कर अपनी डायरी मे नोट कर लिया था।
आप जानकार हैरान होंगे कि हमारे लगातार
फोन/मेल आदि के प्रयास के बावजूद हमारी
शाखा की उस गंभीर समस्या का समाधान अगले दो दिन तक भी नहीं हुआ!! इस घटनाक्रम के
पांचवे दिन भी शिकायत का निराकरण न होने से चिंतित मैंने एक गंभीर आत्मघाती कदम
उठा कर अपने खाताधारक श्री संतोष मोर को बैंक के सीएमडी महोदय का नंबर दे उनसे
मेरी शाखा और मेरी शिकायत करने का सुझाव दिया। पहले तो उन्होने मेरी शिकायत सीएमडी
से करने मे संकोच और हिचकिचाहट
दिखाई। पर जब मैंने उनसे संशय और दुविधा
छोड़ सीएमडी के स्तर पर शिकायत के शीघ्र सुनवाई और समाधान के बारे मे बताया तो वो मेरी
शाखा और शाखा प्रबन्धक अर्थात मेरी शिकायत
के लिये राजी हो गये। मैंने उन्हे आगाह भी किया कि आप सिर्फ शाखा और शाखा प्रबन्धक
की समस्या पर कार्यवाही न करने की शिकायत
पर ही केन्द्रित रहना, आप दिल्ली या
मुंबई कार्यालय से मेरे प्रयास का कोई जिक्र न करना। ये तरक़ीब काम कर गयी!! जैसे ही उन्होने
दिल्ली/गुड़ गाँव स्थित कार्यालय मे सीएमडी महोदय को फोन किया। सीएमडी साहब की सचिव
महोदया ने शिकायत का विवरण की जानकारी ली। दो मिनिट के अंदर ही मुझे सीएमडी
सचिवालय से फोन पर संतोष मोर जी की शिकायत पर की गयी कार्यवाही के वारे मे पूंछा?
मैंने मेडम को शिकायत के समाधान के लिये मेरे द्वारा किये गये प्रयासों की विस्तृत जानकारी,
ई-मेल और दिल्ली-मुंबई स्थित कार्यालयों से संपर्क किये गये अधिकारियों के नाम बता
कर समाधान का निवेदन किया। मैंने उन्हे इस
बात से भी अवगत कराया कि पीढ़ित पार्टी ने खाता बंद करने एवं रिजर्व बैंक मे शिकायत
की भी धमकी दी है।
सीएमडी को किये गये शिकायती फोन के कारण अब
तक तो शिकायत, जो कल तक रेंग-रेंग कर
चल रही थी मानो शिकायत को पंख लग गये!! एक के बाद एक अनेकों फोन बैंक के दिल्ली और
मुंबई कार्यालय से शिकायत की पूंछ-तांछ के संबंध मे आने लगे!! आई-टी सेल के सहायक
महा प्रबन्धक सहित न जाने किस किस के फोन आये और दस-पंद्रह मिनिट मे आरटीजीएस की
धनराशि श्री संतोष जी के इटावा स्थित व्यापारी के खाते मे जमा हो गयी। हर अधिकारी
अपनी सफाई मे एक दूसरे को दोषी ठहरा कर कभी एसबीआई बैंक को तो कोई तकनीकी खामी को
उत्तरदायी बता रहा था।
मैंने कभी सोचा भी नहीं था कि ग्राहक की
"उत्तम एवं त्वरित सेवा" की नीति के तहत खुद मुझे अपनी ही शिकायत बैंक
के उच्चतम पदाशीन अधिकारी, श्रीमान
"अध्यक्ष एवं प्रबंध निदेशक" महोदय से करवानी पड़ेगी। लेकिन अंततः अपनी
शाखा और अपनी ही शिकायत कराये जाने से उपजे समाधान पर जो सुख और संतोष मिला वह अवर्णीय था।
विजय सहगल
6 टिप्पणियां:
वीर सर्वदा विजई
आप फुटबॉल अवश्य बने लेकिन समस्या के समाधान का उचित रास्ता (शिकायत) बता कर आपने समस्या का समाधान कर ही दिया
सत्य ही ईश्वर है !
वीर और सत्य पर अडिग व्यक्ति सदा विजई हो ना हो इस से कोई फर्क नहीं पढ़ता पर वह अपने सत्य और वीरता के साथ सदा यशस्वी होता ही हे , आपका यश उस ग्राहक के मन में सदा ही विद्यमान रहेगा , जो जानता हे की आप अपने संस्थान के प्रति और अपने कर्तव्य के लिए निष्ठावान रहे । आप अपने संस्थान के लिए अपनी निष्ठा के लिए सब की बधाई के पात्र है, और हम सब बड़े भाग्यशाली हे कि हम आपके मार्गदर्शन में हे ।
-एसआईएनजीएच ON व्हाट्सप्प
वीर और सत्य पर अडिग व्यक्ति सदा विजई हो ना हो इस से कोई फर्क नहीं पढ़ता पर वह अपने सत्य और वीरता के साथ सदा यशस्वी होता ही हे , आपका यश उस ग्राहक के मन में सदा ही विद्यमान रहेगा , जो जानता हे की आप अपने संस्थान के प्रति और अपने कर्तव्य के लिए निष्ठावान रहे । आप अपने संस्थान के लिए अपनी निष्ठा के लिए सब की बधाई के पात्र है, और हम सब बड़े भाग्यशाली हे कि हम आपके मार्गदर्शन में हे ।
- singh ON व्हाट्सप्प
बहुत खूब श्रीमान..
एक टिप्पणी भेजें