सोमवार, 7 मार्च 2022

मातृ शक्ति नमन्-दिवस

 

मातृ शक्ति नमन्









आदरणीय अम्माँ जी, 08 मार्च 2022

चरण वंदन,

 

आज आठ मार्च को यूं तो "महिला दिवस",  मातृ शक्ति को नमन कर उनको याद करने का, उनके प्रति सम्मान प्रकट करने का दिन है लेकिन मेरा मानना है कि साल का हर दिन मेरे लिये तुम्हें स्मरण करना, तुम्हें याद करना मेरे लिये दैनिक अनुष्ठान के अंग की तरह है। माँ, तुम  परिवार  की आदर्श "हीरो" की तरह हो जिसने हम सबको  संकट और दुःख की घड़ी मे धैर्यपूर्वक, मजबूती के साथ खड़े हो विपत्तियों से सामना करना सिखाया। उपलब्ध संसाधनों मे संतुष्ट, शांति और सुखी  रहने के तुम्हारे गुरुमंत्र से हम सभी आज भी  प्रेरणा लेते है।  आपने पापा के वेतन आमदनी की  सीमित आय मे भी हम छह भाई बहिनों के पालन पोषण, पढ़ाई-लिखाई मे अपने जीवन की कोई कोर कसर बाकी नहीं छोड़ी। 

अम्माँ, यूं तो मध्यम वर्गीय परिवारों हर मौसम मे अपनी कठिनाइयाँ और अनुकूलतायेँ होती है लेकिन मुझे याद है बरसात के मौसम मे सुबह के समय जब हम भाई बहिन स्कूल जाने की तैयारी करते, तो तुम  रसोई के चूल्हे पर सबके लिए सब्जी रोटी बना खाने के टिफिन का इंतजाम करती थी। आधे आँगन मे टीन के छप्पर के नीचे जहां अन्य मौसम मे रसोई खुली एवं बड़ी दिखाई देती थी, पर बरसात मे पानी की फुहारों के बीच रसोई का  आकार सीमित हो कर एक तिहाई हो जाता। नालीदार टीन की शेड मे जितनी नाली होती उतनी धाराएँ आँगन मे गिरने के कारण, उछलते पानी के छीटें "आटे" की परात और चूल्हे मे जल रही लकड़ियों को भी गीला कर देते थे। पानी के छीटों और परात के बीच मूंझ वाली चारपाई से भी जब बचाव न होता तो चारपाई पर कोई चादर डाल दी जाती ताकि चादर पानी के छीटों को सोख टपकती बूंदों की धाराओं मे बदल कर आँगन मे बहा सके। मिट्टी से बने मुख्य चूल्हे के पीछे भी एक गोल उप चूल्हा भी बना रहता जिससे  निकलने वाली आंच के ऊपर तुम  बटलोई या बटरी मे दाल या कढ़ाई मे सब्जी पकाने के लिए चढ़ा देती थी। माँ, तुम्हारा जब एक रोटी को अंगारों  के ऊपर रख फूलने के लिए सेंकना, दूसरी रोटी को तवे पर सेंकने के लिए डालना और तीसरी आटे की लोई को चकले, बेलन की सहायता से बेलने के इस निरंतर  क्रम को आटा समाप्त होने तक विना किसी क्षणिक व्यवधान के मशीन की तरह रोटी बनना, सेंकते देखना अद्भुद और आश्चर्य चकित कर देता था।  रोटी बनाने, सेंकने  के साथ, बीच बीच मे उप चूल्हे पर सब्जी मे छौंका लगा सब्जी बनाने का संतुलन देखते ही बनता था जो मुझे आज भी याद है। गीली लकड़ी से जब धुआँ निकलने लगता तो इस संतुलन के क्रम मे कुछ बिघ्न पड़ता, आंखो मे धुआँ और जलन से आँसू निकलते पर तुम, कभी फुँकनी से कभी विजना (खजूर का पंखा), या कॉपी या रजिस्टर के  गत्ते से हवा कर चूल्हे की आंच को बापस प्रज्वलित कर लिया करती थी। तमाम बाधाओ के बीच, हर क्षण संतुलन बनाये रखने का अनूठा उदाहरण देखते ही बनता था। नहाने के बाद, मै भी ठंड से बचने के लिये, चूल्हे के सामने कुछ मिनिट खड़े होने के मोह को नहीं रोक पाता, साथ ही आपके खाना बनाने के क्रम को  बड़े कौतूहल से देखा करता था।

माँ,  परिवार मे सबसे पहले जाग कर, देर रात सबसे बाद मे सोने के तुम्हारे क्रम को  मैंने सालों साल ऐसे ही देखा! जब तुम  सुबह से देर रात तक बिना एक पल विश्राम किये, हम भाई बहिनों के लिये खटती रहती थी। दमयंती और नीलम (दोनों बहिने) भी जब स्कूल स्तर पर पढ़ने जाने लगी थी तो वे भी अपनी पढ़ाई-लिखाई  और घर के कार्यों के बीच संतुलन बना तुम्हारा  हाथ बंटाने लगी थी।

मई-जून के ग्रीष्म अवकाश के समय जब हम बच्चों की छुट्टियाँ हो जाती तो ऐसा नहीं था कि घरेलू काम से तुम्हें कुछ आराम या छुटकारा मिल जाता हो? तब तुम उन दिनों आवश्यक वस्तुओं का  पूरे साल का भंडारण करने के जतन मे व्यस्त रहती थी।  "चैत" माह जब  गेहूं की नयी फसल के बाजार मे आगमन का समय होता, पापा पूरे साल के लिये मंडी से चार-पाँच बोरे गेहूं  क्रय  कर लाते थे। तुम, गेहूं को पानी से धोना, सुखाना, छजने या छलनी  से छानने, फटकारने और बीनने के कार्य को करती थी, यह  क्रम हफ्ते दस दिन चलता था। हम भाई, गेहूँ को उठाने-धरने छत्त पर गेहूँ को फैला सुखाने के क्रम मे थोड़ी सहायता जरूर कर देते पर गेहूँ बुहारने का कार्य कठिन और दुष्कर था। गेहूँ के भंडारण हेतु लोहे की एक टंकी घर मे थी पर बाकी बचे गेहूँ को मिट्टी से बनी ढिंकौली, हौद और पीतल के बड़े-बड़े हंडे मे रखने का जतन तुम ही करती थी। इन पात्रों को बजनी होने के कारण सुव्यस्थित रखबाने, खिसकाने की जिम्मादारी हम भाई जरूर कर लेते थे।  

वस्तुओं के साल भर के  भंडारण मे आटे की सिमइयाँ भी होती थी। सिमइयाँ एक मशीन  की सहायता से बनाई जाती थी। आज की युवा पीढ़ी शायद इस मशीन से परिचित न हो पर अस्सी-नब्बे के दशक तक सिमइयाँ बनाने की मशीन से हर परिवार परिचित था। हर दिन 5-10 किलो गूँथे हुए आटे को इस मशीन मे लोई बना बना के डाल, हैंडिल की सहायता से घुमा कर लंबी-लंबी पतले तार की तरह इन सिमइयाँ को निकाल सुखाया जाता था। चारपाई की पाटी पर कस इस मशीन को चलाना एक श्रमसाध्य काम था जिसे माँ, सभी भाई-बहिनों के बीच समय अंतराल को बाँट करा लेती,   तींन चार दिन चलने वाले इस क्रम मे पूरे साल का स्टॉक एकत्रित कर लिया जाता था।  सिमइयाँ मशीन के साथ आज तो चारपाई भी लुप्तप्राय हो गयी। उन दिनों बाज़ार मे पिसा हुआ नमक उपलब्ध नहीं होता था डेला नमक ही उपलब्ध था जिसके छोटे-छोटे  डेलों का  उपयोग तो  सब्जी, दाल आदि मे हो जाता था पर आटे, पापड़, पकवान आदि मे नमक को घर मे चक्की से पीस कर रक्खा जाता था। माँ, आप ने एक मिट्टी के घड़े मे इसकों भी पीस कर साल का स्टॉक रखा हुआ था।    

प्रायः हर भारतीय घरों मे ग्रीष्म अवकाश के दौरान आम, हरी और लाल  मिर्च, नीबू, टेंटी, कटहल, लवेरे  आदि के अचार भी बड़ी मात्र मे बनाये जाते जिनको पूरे साल उपयोग के लिये बनाया जाता। अरहर की दाल और आलू के पापड़ का पूरे साल का स्टॉक को तैयार करना भी परिवारों के लिये बड़ी चुनौती होती थी। हाँ आलू मसाले के पापड़ को वेलने के बाद मै सुखाने के लिए पापड़ को धूप मे डालने का कार्य बड़े दिल से करता था क्योंकि मसाले के आलू को चोरी से खाने का स्वार्थ जो छुपा था। दाल बड़ी, आलू चिप्स के अलावा धनियाँ, मिर्च, अमचुर  हल्दी आदि मसलों का भी पूरे साल का स्टॉक इन्ही दिनों मे एकत्रित कर लिया जाता था। माँ, तुम बड़ी धैर्य पूर्वक इन सभी वस्तुओं को अपनी पूरी क्षमता और समर्पण के साथ क्रमबद्ध तरीके से तैयार कर इनका  भंडारण कर लेती जो पूरे साल परिवार के लोग इस्तेमाल करते थे।   

मेरा मानना है कि  उत्तर भारत के प्रायः हर परिवार मे महिलाएं अपने दैनंदिनि कार्यो के अलावा इन मौसमी कार्यों का सम्पादन बड़े सुचारु और प्रबंधकीय कौशल से करती थीं। पर  माँ तुमने  इन सभी कार्यों मे महारथ हांसिल कर ली थी। माँ तुम,  गृह संचालन के हर स्तर पर प्रबंधकीय कौशल, आर्थिक स्तर, तीज त्योहारों, परिवार के सभी सदस्यों के कपड़ो-लत्तों का प्रबंधन,  स्कूल की फीस एवं सामाजिक कार्यों के अंतर्गत नेग, सगुन आदि के  लेनदेन  सफलता पूर्वक  संपादित कर तुम ताउम्र एक सफल गृहणी का अनुपम उदाहरण प्रस्तुत करती रही। आज पिच्यासि वर्ष की उम्र मे भी जब तुम आधुनिक इलेक्ट्रोनिक यंत्रों पर  यूट्यूब को देखने एवं सक्रियता पूर्वक, उनकी  सहायता से नए नए व्यंजनों को बनाने एवं देखने के आपके शौक के  हम सभी बड़े कायल है। आधुनिक तकनीकी के "माऊस" के उपयोग से टीवी को संचालन करना मुझे आश्चर्य चकित कर देता है। आज भी जब घरों पर महिलाएं भले ही सास-बहू के सीरियल को देख आनंदित होती हों पर आप देश दुनियाँ के समाचार देखे और पढे बगैर एक दिन भी न रहती। अँग्रेजी की समुचित शिक्षा के अभाव के बावजूद आप शब्दों को जोड़  अँग्रेजी के अक्षरों को सुगमता से पढ़ लेती हो तो मुझे आश्चर्य होता है। माँ तुम आज भी परिवार की एक  आदर्श अगुआ हो, हम परिवार के सभी सदस्य आज भी आप से ऊर्जा और  प्रेरणा ग्रहण करते है। माँ, आप शतायु हों, स्वस्थ रहे! हम सब ये ही कामना करते है।  

आज महिला दिवस पर आप को स्मरण करते हुए, हम अपने परिवार, समाज, स्नेहिजनों, मित्रों, शुभचिंतक सभी महिला शक्ति रूपा  माँ, बहिन, बेटियों को इस अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर  अपना अभिवादन, स्नेह और सम्मान प्रेषित कर अभिनंदन करते है। आप सहित सभी महिला शक्ति को  हार्दिक बधाई, शुभकामनायें, चरण वंदन!

विजय सहगल               

3 टिप्‍पणियां:

P.c.saxena ने कहा…

आपने अपने घर परिवार और खास तौर पर अंबाजी को केंद्रित कर सजीव चित्रण किया है पूरा लेख पढ़कर ऐसा लग रहा है कि जैसे आप हमारे घर की बात कर रहे है प्राय सभी घरों में पहले ऐसी परिस्थितियों मैं मिलजुल कर घर के कामों में हाथ बटाया करते थे अब वह बातें कहां समय के साथ सभी कुछ बदल चुका है पूरा लेख पढ़कर आंखों में पानी आ जाता है 🙏🙏

Unknown ने कहा…

Ye tho meri kahani jasi hai

Ganguli ने कहा…

अति सुंदर