शनिवार, 5 फ़रवरी 2022

कोंछा भावर

 

"कोंछा भावर"







मै अपने गृह क्षेत्र झाँसी मे मटकों और घड़ों अर्थात कुम्भ निर्माण के लिये प्रसिद्ध गाँव कोंछा भावर  का स्मरण करता हूँ तो मुझे संत कबीर का निम्न दोहा और यदि इस दोहे को याद करूँ तो गाँव "कोंछा भावर" स्वतः ही याद हो आता है। "कोंछा भावर" गाँव और "संत कबीर" का ये दोहा मेरे मन मस्तिष्क मे ऐसे रच वस गये है कि एक के स्मरण मात्र से दूसरा स्वतः ही याद हो आता है :-

गुरु कुम्हार शिष कुम्भ है, गढ़ि गढ़ि काढै खोट।

अंदर हाथ सहार दै, बाहर बाहै चोट॥

बुंदेलखंड मण्डल मे स्थित कुम्भ (घड़ा) या मटकों के निर्माण के लिये प्रसिद्ध कोंछा भावर जिला झाँसी का एक ऐसा गाँव है जिसके वारे मे बुंदेलखंड क्षेत्र का  शायद ही कोई वृद्ध, नौजवान या बच्चा इस नाम से परिचित न हो? झाँसी शहर से लगभग आठ किमी दूर इस गाँव की विशेषता है कि यहाँ के बने हुए घड़े, मटके एवं मिट्टी के अन्य पात्र का निर्माण यहाँ सदियों से होता आ रहा है। इन मिट्टी के मटकों की एक विशेषता ये है कि पूरी ग्रीष्म ऋतु के दौरान एवं मई-जून मे  गर्मी की  पराकाष्ठा  के दौरान भी मटकों मे भरा शीतल और ठंडा जल, पीने से आत्मा तृप्त और संतुष्ट  हो जाती है जो कदाचित ही फ्रिज के ठंडे पानी से प्राप्त होती हो? आज दिनांक 03 फरवरी 2022 को अपने गृह नगर झाँसी प्रवास के दौरान मेरी यात्रा विशेष रूप से इस कोंछा भावर के मटका निर्माण की जानकारी देखने, समझने, जानने और इस मटका निर्माण से जुड़े उन परिवारों से मिलने की थी, जिसका निश्चय मैंने काफी दिनों से अपने मन मे वसा रक्खा था।

ग्वालियर और कानपुर के राष्ट्रीय राजमार्ग को जोड़ने वाले इस संधि मार्ग पर स्थित ग्राम कोंछा भावर मे प्रवेश करते ही सामान्य गाँव का सा आभास ही होता है। जब एक राहगीर से मटका निर्माण क्षेत्र से जुड़े परिवारों के बारे मे पूंछ तांछ की तो उसने एक पतली सी गली की ओर इशारा करते हुए जगदीश मास्टर से संपर्क करने को कहा। गली मात्र इतनी ही चौड़ी थी कि मेरा स्कूटर ही आसानी से प्रवेश हो सकता था जो सीधे जगदीश मास्टर के दरबाजे पर ही समाप्त होती थी। जगदीश मास्टर तो नहीं मिले पर राजकुमार जी से भेंट जरूर हो गयी जो मटका निर्माण मे रत थे, पर दुर्भाग्य से बोल नहीं सकते थे क्योंकि वे मूक और बधिर थे। कुछ इशारों से और कुछ पड़ौस मे बैठी महिलाओं ने मटका निर्माण के संदर्भ मे कुछ प्रारम्भिक  जानकारी दी। कुछ अधूरी काली मिट्टी की आकृतियाँ अधबनी सी दिखाई दे रही थी मूक श्री राजकुमार जी ने इशारों से समझाया कि आगे इन्हे गोल मटकों के रूप मे ढाला जाएगा।  कुछ और आगे बढ्ने पर मेरी मुलाक़ात एक पढे लिखे नौजवान श्री हरिकिशन प्रजापति उर्फ कल्ली जी से भी  हुई।  जिन्होने  मुझे इस मिट्टी के घड़े और मटकों के निर्माण की विस्तृत जानकारी दी। उन्होने बताया इस "पुरे" या "टोले" मे प्रजापति समाज के ही लोग रहते है वे स्वयं भी इसी समाज से आते है। पूरे मुहल्ले मे मटका, घड़े, गमले का निर्माण हर घर मे किया जाता है। परिवार की महिलाएं समान रूप से इस कार्य मे न केवल दक्ष है अपितु समान रूप से इस मिट्टी के पात्रों के निर्माण मे सहभागी है। अभी पिछले दिनों वर्षात होने के कारण निर्माण का कार्य कुछ धीमा था। हर घर के सामने इन मिट्टी के वर्तनों के निर्माण मे उपयोग होने वाली मिट्टी के ढेर पड़े हुए थे जिनको तैयार कर आगे मटकों के निर्माण मे  उपयोग मे किया जाएगा।  एक सुंदर नवजात खुली हवा मे लेटा था जिसके नजदीक ही एक लंबी मिट्टी के आकार की आकृति अर्धनिर्मित अवस्था मे पड़ी थी जिसे बताया गया कि यह  तंदूरी रोटी बनाने का तंदूर है। हरिकिशन उर्फ कल्ली जी ने कुम्भ निर्माण के उपयोग मे आने वाले मुख्य दो औजारों के भी दर्शन कराये एवं साक्षात जीवंत प्रदर्शन भी कराया। लकड़ी के एक औज़ार जिसे "थप्पी" कहा जाता है लकड़ी के छोटे, गोल हत्थे पर गोलाकार कटोरी नुमा आकृति पर अर्धचंद्राकार रूप मे धँसी आकृति बनी थी और दूसरी पत्थर की चपटी गोलाकार आकृति थी जिसे "पीढ़ी" कहा जाता है। कल्ली ने बताया कि पीढ़ी को घड़े के अंदर से सहारा दे थप्पी से घड़े के बाहर  चोट कर घड़े को गोलाकृति दी जाती है ठीक बैसे ही जैसे संत कबीर दास जी के उक्त दोहे के अनुरूप  "अंदर  हाथ सहार       दै, बाहर बाहै चोट" को चरितार्थ करती पंक्तियाँ लिखी थी। 

मुझे याद है बचपन मे हमारे मुहल्ले के कुछ सेवभावी व्यक्ति और बुजुर्ग गर्मी के मौसम मे कोंछा भावर मे निर्मित आठ-दस बड़े मटके  जिनकी क्षमता लगभग 200-250 लीटर की रही होती मेरे घर के बाहर चबूतरे पर रखवा दिये जाते थे। शाम और रात को उन घड़ों मे हम पड़ौस के सभी बच्चे जितना पानी नलों से आता उसके अतरिक्त कुएं से भी पानी ला कर सभी घड़ों मे पूरी तरह से भरकर रख देते थे। गर्मी की लपट के थपेड़ो से मटकों का पानी एक दम शीतल और ठंडा हो जाता था। बच्चे दिन भर सड़क से आने-जाने वाले राहगीरों को शीतल जल पिला कर सेवा करते। उन दिनों बर्फ एक विलासिता की वस्तु हुआ करती थी लेकिन कोंछा भावर के मटकों से मिलने वाला शीतल जल वर्फ सी ठंडक को भी  मात करता था। जल पीने वालों की संख्या का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता था कि शाम से पहले ही घड़ों का पानी समाप्त हो जाता था। पशु-पक्षियों एवं गाय को भी जल पिलाने के लिये अलग पात्र का भी प्रावधान किया जाता था, इस हेतु पक्षियों के लिये "सकोरे" एवं पशुओं के लिये "ढिकोली" या "नाद" का निर्माण भी कोंछा भावर मे किया जाता था। दही जमाने के लिए मिट्टी की कुढ़ी का इस्तेमाल सारे हलवाई एवं दूध डेयरी वाले आज भी करते है। शीतल जल पिलाने को एक पुण्य धार्मिक कार्य मानने के  संस्कार हम बच्चों को बचपन से ही परंपरागत रूप से मिले जिनका महत्व आज भी कम नहीं हुआ है।

हमे याद है शहर मे मटकों का व्यापार करने वाले व्यापारी कोंछा भावर के कुम्हार परिवारों द्वारा साइकल से लाये मटकों को क्रय करते थे पर जब मांग बढ़ती तो शहर के व्यापारी साइकल एवं हाथ ठेलों से मटकों को गाँव से ही क्रय कर शहर ले आते। "नूरा" नाम का एक व्यापारी तो अपने हाथ ठेले पर 4x6 की एक लाइन बना कर एक के उपर एक 7-8 लाइन लगा कर एक बार मे लगभग 150-160 मटकों को  लेकर शहर आता था। उसके  घड़ों से भरे ठेले पर एक बार मे लगभग डेढ़ सौ मटकों को इस तरह लाना अपने आप मे सर्कस के  अजूबे से कम नहीं होता था, जिसे रास्ते मे सभी लोग आश्चर्य और कौतूहल से देखते थे।

मै समझता था सदियों से इतने प्राचीन मिट्टी के पात्र बनाने वाले ये प्रजापति परिवार समृद्धि की मिसाल होंगे लेकिन मेरा सोचना सर्वथा त्रुटिपूर्ण और मिथ्या था। 45-47 डिग्री के ज्वलंत तापमान पर क्षेत्र के अमीर-गरीब जैसे हर वर्ग के लोगो को पीढ़ी दर पीढ़ी शीतल जल पिलाने वाले, मटकों के इन निर्माताओं का दर्द जब हरिकिशन उर्फ  कल्ली जी से जाना तो मन उनके समुदाय के प्रति करुणा और व्यथा से द्रवित हो गया। उन्होने बताया कि पिछले दिनों मिट्टी के खनन हेतु सरकार ने जो भूमि उनके समुदाय को आवंटित की पर जिसके  चारों ओर  सम्पन्न और बलशाली लोगो की निजि जमीन से घिरा  होने के कारण वहाँ तक जाने का कोई मार्ग नहीं है।  अतः  पहुँच मार्ग के अभाव मे उक्त भूमि से खनन न हो पाने के कारण  अनुपयोगी पड़ी है। अतः  घड़ों, मटकों के निर्माण मे आने वाली मिट्टी मिलने मे अत्यंत ही कठिनाई होती है। चोरी छिपे एक-एक दो-दो बोरी मिट्टी को रात के अंधेरे मे लाना पड़ता है।  निरंतर शासन के लोगो की चिरौरी करनी पड़ती है। भूमिहारों  से प्रायः धौंस-धपट के कारण परंपरागत मटका निर्माण मे अत्यंत कठिनाई आ रही है। किसी तरह जीवन यापन हो रहा है। अधिकतर महिलाएं एवं बच्चे अभाव की ज़िंदगी जी रहे है।  टोले के कच्चे अध बने मकान और रस्तों को देख ये अनुमान लगाना कठिन न था कि यहाँ का रहन सहन अत्यंत दीन और पिछड़ा हीं था। अत्यंत  पतली एवं संकरी गलियों के इस टोले मे एक भी घर ऐसा नहीं दिखा जिसे संपन्नता की श्रेणी मे रक्खा जा सके।

आज के इस भौतिकता और तकनीकि के दौर मे इन  मिट्टी के जल पत्रों की प्रांसांगिगता कम अवश्य हो गयी है पर समाप्त कदापि नहीं लेकिन यदि सरकार और शासन ने कोंछा भावर के मटके और घड़ों के निर्माताओं को तकनीकी एवं आर्थिक आश्रय नहीं दिया तो आने वाले समय मे शायद कोंछा भावर मे परंपरागत रूप से मिट्टी के मटकों और घड़ों के उध्योग विलुप्त होने के कगार पर पहुँच जाएगा एवं कोंछा  भावर के ठंडे पानी के मटके का निर्माण एक कहानी मात्र बनके न रह जाये।

विजय सहगल

 

2 टिप्‍पणियां:

दयाराम वर्मा ने कहा…

ज्ञानवर्धक जानकारी, संवेदनशील और सुंदर ब्लाग

N K Dhawan ने कहा…

बहुत सुंदर शब्दावली के साथ आपने कोछा भँवर ग्राम की घड़ा व मिट्टी के बर्तन निर्माण की कला के बारे में विस्तृत जानकारी दी । साथ ही वहाँ के प्रजापति समाज की समस्याओं पर भी प्रकाश डाला ।