रविवार, 9 जनवरी 2022

अंकित "ए स्ट्रीट बॉय"

"अंकित"










भोपाल पदस्थापना के दौरान शाहपुरा लेक और उसके आस पास के सड़कों पर भ्रमण करना, कार चलाना मेरा प्रिय शगल रहा है। मुझे याद है जब मै कोलार स्थित अपने आवास से प्रेस कॉम्प्लेक्स स्थित कार्यालय के लिये जल्दी निकलता तो पाँच दस मिनिट अपने वाहन को रोक शाहपुरा झील के किनारे खड़े होकर लेक को निहारा करता था। देशी विदेशी पक्षियों का कलरव मुझे आकर्षित करता था। मई-जून की झुलसा देने वाली गर्मी मे भी झील के किनारे खड़े होने पर झील से आने वाले ठंडी हवा के झोंके दिल को जो सकून देते है उसको शब्दों मे व्याँ करना कठिन है।   

14 दिसम्बर मेरे लिये कई मामलों मे एक विशेष महत्वपूर्ण दिन था। इस वर्ष 2021 को भी मै अपनी कार से  भोपाल प्रवास पर था और जब अपने  वाहन के साथ हों तो शाहपुरा जाने मे चूक कैसे हो सकती थी। शाम के समय शाहपुरा लेक का चक्कर लगाने के बाद जब मै घर जाने के लिये कैंपियन स्कूल जाने वाली मेरी पसंदीदा बड़ी, चौड़ी, शांत, सुरम्य सड़क की ओर बढ़ा ही था कि लेक के दूसरी ओर नगर निगम द्वारा बनाए गए पूजन सामग्री विसर्जन के लिये बनाये गए विशेष  स्थल पर कुछ मिनिट के लिये रुका। जब तक श्रीमती जी हवन/पूजन सामाग्री की विभूति को विसर्जन कर बापस आती, मैंने देखा सड़क के पार फुटपाथ पर  एक 3-4 साल का नन्हा बच्चा एक "पिल्ले" के साथ बड़े तन्मय होकर खेल रहा है। मै अपने आपको उस नन्हें बालक द्वारा उस "पिल्ले" से  निश्छल प्रेम और स्नेह के साथ खेलते, फोटो लेने के मोह से नहीं रोक सका। प्रथमदृष्टा: फुटपाथ पर रह रहे उस बालक को देखकर  अनुमान लगाना कठिन न था कि वह नितांत ही गरीब और अभावग्रस्त परिवार का बालक है। पीछे परिवार के सदस्यों के साथ एक महिला जो उस बच्चे की माँ थी,  प्लास्टिक की थैली पर आटे को गूँथ रही थी। वह पत्थर, ईटों से बने चूल्हे पर खाना बनाने की तैयारी मे जुटी थी। चकला-वेलन फुटपाथ  पर ही कहीं पड़ा था। फुटपाथ पर चारों ओर गंदगी और धूल पड़ी थी। लहसुन व्याज को वही फुटपाथ के पत्थर पर पीस का सब्जी का मसाला बनाया गया था, जिसकी खुशबू फुटपाथ पर तो आ ही रही थी, शायद सड़क के पार भी उसकी सुगंध आ रही होगी। बच्चा इस सबसे बेखबर उस "पप्पि"  के साथ खेल रहा था।

जब मैंने उस बच्चे की फोटो ली तो बाल सुलभ लालसा रखते हुए उसने निसंकोच अपनी फोटो दिखाने की तमन्ना प्रकट कर दी। उस मासूम ने पूंछने पर अपना नाम अंकित बताया।  मोबाइल मे अपनी फोटो देख कर बच्चा बहुत खुश था। फोटो देखने के बाद उसने बाल हट करते हुए एक और फरमाइश कर दी कि, "अंकल मुझे, छोटू कार का विडियो दिखाओ न? मै उसकी तोतली और अस्पष्ट भाषा न समझ सका। उसने एक दो बार मुझे समझाने की कोशिश की पर कोई नतीजा न निकला। दरअसल मै  बच्चो या अन्य विडियो मे ज्यादा जानकारी  न रखने के कारण उस बच्चे की बात को न  समझ सका। तब उसने मुझे मोबाइल मे बोल कर  वीडियो सर्च करने की सलाह दी। मै आश्चर्य चकित था कि अभावों मे सड़क पर रहने वाला नन्हा बालक भी आधुनिक तकनीकी के संचार माध्यमों के यंत्रों पर अपनी पकड़ रखता है!!

तब आखिर मे मैंने मोबाइल को वॉइस सर्च पर डाल अंकित को ही बोल कर सर्च करने को कहा। मै आश्चर्य चकित था कि छोटू की कार का लिंक यू ट्यूब पर जैसे ही खुला वह खुश हो कर  वीडियो देखने मे तल्लीन हो गया। मैंने कहा भी कि बेटे मुझे घर जाना है? लेकिन मेरी बात को अनसुना कर मोबाइल पर वीडियो देखने मे मगन रहा। इसी बीच उसके परिवार के एक अन्य वृद्ध व्यक्ति ने मोबाइल बापस देने का आग्रह किया तो उसने बड़ी मासूमियत से आग्रह कर साधिकार मेरा हाथ पकड़ अपने पास बैठा लिया। उसने जिस अधिकारपूर्ण लहजे से मुझे बैठाया उसे मै इंकार न कर सका और चुपचाप उसके पास ही उस गंदे धूलभरे फुटपाथ पर बैठ गया। मैंने जब उससे कहा यदि मुझे घर जाने मे देर हुई तो तुम्हें मुझे खाना खिलाना पढ़ेगा? उसे सारी शर्ते मंजूर थी और वह एक टक वीडियो को देखता रहा। उन वृद्ध और फटेहाल सज्जन ने बताया कि वह अंकित का नाना है और उसका पिता हम दोनों के ही पीछे कंबल ओढ़ सो रहा था। शायद रात की ठिठुरन वाली  सर्दी मे गर्म कपड़ों के आभाव मे नींद पूरी न हुई हो? उसके नाना ने बताया कि बच्चे का पिता  अपंग और विकलांग है हम लोग दिन भर भीख मांगकर जैसे तैसे अपना जीवन यापन करते है। मुझे शंका तो थी पर सच सुनकर मेरा मन दुःख, क्लेश और संताप से भर गया।

अब तक लगभग बीस मिनिट हो चुके थे। छोटू की कार के साथ छोटा भीम का विडियो भी अंकित द्वारा देखा जा चुका था। आए दिन घरों मे बच्चो की मोबाइल और टीवी पर कार्टून देखने की लालसा से अतृप्त बच्चो को देखता रहता हूँ तो इस नादान मासूम की वीडियो के प्रति इच्छा और आकांक्षा को भली प्रकार समझा जा सकता है। नाना के आग्रह पूर्वक मोबाइल बापस करने को अंकित इंकार न कर सका और अनिकच्छा पूर्वक उसने मेरा मोबाइल बापस कर दिया। मै अंकित के  मन मे चल रहे अंतर्द्वंद और विक्षोभ का मौन  उसके चेहरे पर स्पष्ट देख रहा था। बच्चे को दिलाशा देते हुए जब मैंने  उसको चॉकलेट खाने का प्रस्ताव दिया तो उसके चेहरे पर खुशी के लक्षण दिखाई दे रहे थे। मैंने उसे कुछ पैसे देकर पूंछा कितनी चॉकलेट लाओगे? तो उसने कहा एक, तब मैंने कुछ और पैसे देते हुए कहा कि वह एक नहीं दो चॉकलेट लाये। एक चॉकलेट वह और दूसरी मै मिल कर खाएँगे। मैंने उससे झूठा वादा किया कि मै कल फिर आऊँगा क्योंकि मै उसके चेहरे पर उदासी के लक्षण देख कर उसे विदा करना नहीं चाहता था।            

मुझे लगा कि अंकित धनाभाव के कारण गरीब जरूर है लेकिन उसका नौसर्गिक ज्ञान, कौशल और बुद्धि ने उसे बुद्धिमत्ता की कसौटी पर  निर्धनता से परे रक्ख दिया, उसका बुद्धिलब्धि पैमाना (आईक्यू) किसी अन्य उच्च वर्गीय बच्चे से कम नहीं था। अगर इस बच्चे को भी समान अवसर और अनुकूल परिस्थितियाँ उपलब्ध हों तो यह बच्चा भी होनहार बन समाज और देश के लिये एक बहुत बड़ी आस्तियाँ बन सकता है, बस आवश्यकता है इस अभाव ग्रस्त बच्चे को अवसर देने की।

इस पूरे वाक्ये के दौरान मै ये सोच कर उस बच्चे के पास आया था कि इस मासूम की फोटो लेकर  कुछ खुशियाँ दे सकूँ पर मुझे कहते हुए कोई संकोच नहीं मेरी सोच के उलट उस बच्चे ने इस पूरे घटनाक्रम से जो खुशियाँ मुझे दी वो मेरे लिए अनमोल थी।

मुझे 19 नवम्बर 1863 को अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति स्व॰ अब्राहिम लिंकन का वो कथन याद आ रहा था जिसमे उन्होने लोकतांत्रिक गणराज्य को उद्धर्त करते हुए कहा था कि "प्रजातन्त्र जनता का जनता के लिए जनता द्वारा संचालित शासन है"। जो भारतीय लोकतन्त्र पर सटीक लागू होता है एवं जो भारतीय संविधान की मूल प्रस्तावना को संबोधित करते हुए प्रारम्भ होता  है:-  "हम भारत के लोग............"                    

प्रिय बच्चे अंकित बेशक मैंने दुबारा मिलने की झूठी दिलाशा दे तुम्हसे बिदा ली थी पर मै सच्चे दिल से ईश्वर से आज प्रार्थना करता हूँ कि तुम्हारे जीवन की हर वो  इकच्छा और आकांक्षा पूरी हो जिसकी कामना तुमने की है।

विजय सहगल    

2 टिप्‍पणियां:

हमारी खुशी ने कहा…

अत्यंत सराहनीय सुन्दर भावाभिव्यक्ति। यह सच है कि बच्चे की खुशी चाहे वह अपना हो या पराया और स्वयं अपनी खुशी पाने के लिए खुद बच्चा बनना पड़ता है। बड़े बनकर हम वो आनन्द नहीं प्राप्त कर पाते हैं। इसलिए हर दिल फिर से बच्चा बनना चाहता है।

Unknown ने कहा…

वास्तविक सुख के पलों को कथात्मक रूप देकर पाठकों को भावनात्मक स्तर पर जागृत करने का साधुवाद। हमें गर्व है कि हमारा संविधान अंकित को भी समान अधिकार की सुरक्षा प्रदान करता है ।