रविवार, 16 जनवरी 2022

सुरक्षा मे चूक

 

"सुरक्षा मे चूक "



प्रधान मंत्री की सुरक्षा मे सेंध का मामला इस समय सारे देश मे सुर्खियों मे छाया हुआ है। पिछले दिनों 5 जनवरी 2022 को पंजाब के भटिंडा से  फिरोजपुर जाने के रास्ते मे तथाकथित किसान प्रदर्शनकारियों ने  हुसैनीवाला से चंद किमी पहले एक फ़्लाइ ओवर पर रास्ता रोक पीएम की सुरक्षा को तोड़ने का प्रयास कर एक गंभीर चुनौती पेश की। पीएम के काफिले को रास्ते मे एक मिनिट के भी लिये रोका जाना उनकी सुरक्षा के संबंध  मे एक गंभीर मामला है और जो देश की सुरक्षा को चुनौती देने के ही समकक्ष ही है। बेहतर होता  इस मुद्दे पर राजनैतिक दलों को एक मत होकर गंभीरता पूर्वक विचार विमर्श करना चाहिए था, क्योंकि देश पहले ही द्रोहीयों और अतिवादियों  द्वारा भारत के दो पदाशीन प्रधानमंत्रियों की देश के अंदर ही नृशंस हत्या का दंश झेल चुका है जिसने  देश के सुरक्षा तंत्र को  एक बहुत बड़ी चुनौती दी थी।

यध्यपि यूपीए अध्यक्ष श्रीमती सोनिया गांधी ने इस मामले मे अपनी चिंता जाहिर की पर ये सुन कर बड़ा दुःख और अफसोस होता है जब पंजाब एवं छत्तीसगढ़ के मुख्य मंत्रियों का   पीएम की सुरक्षा के संबंध मे ये संदेश देते है कि पंजाब मे प्रधानमंत्री का रास्ता ही तो रोका था! कहीं गोली तो नहीं चली? पत्थर तो नहीं मारा गया? काले झंडे तो नहीं दिखाये गए? तो सुरक्षा मे कहाँ चूक हुई? ऐसा प्रतीत होता है कि इन महानुभावों के अनुसार प्रधानमंत्री की  सुरक्षा मे चूक तभी मानी जाएगी  जब गोली चलेगी, पत्थर फेंके जाएँ या  काले झंडे दिखाये जाए? जैसा कि देश के पूर्व प्रधानमंत्रियों स्व॰ श्रीमती गांधी एवं स्व॰ श्री राजीव गांधी के मामले मे हुआ!!  क्या ये जरूरी नहीं था कि  ऐसी गंभीर और चुनौती पूर्ण परिस्थितियों को उत्पन्न ही न होने दिया जाता  जो पीएम की सुरक्षा मे सेंध का कारण हों? क्या पीएम के लिये ऐसी आदर्श सुरक्षा नीति के हालात उत्पन्न नहीं किये  जाने  चाहिए थे  ताकि पीएम के उपर या  आस पास भी किसी हमले की आशंका को निर्मूल सिद्ध किया जा सकता हो? यदि पूर्व प्रधानमंत्री द्व्य स्व॰श्रीमती  इंद्रा गांधी और स्व॰ श्री  राजीव गांधी के सुरक्षा कवच इतना सख्त और मजबूत बनाया गया होता जो अभेद्य होता और जिससे इन दोनों प्रधानमंत्रियों को असमय अकाल मृत्यु के दंश से बचाया जा सकता था।  

छत्तीसगढ़ और पंजाब के मुख्य मंत्रियों द्वारा फिरोजपुर मे प्रधानमंत्री की सुरक्षा मे चूक पर प्रतिक्रिया देते वक्त ये दुहाई देना कि हमने पहले ही "अपने" दो प्रधान मंत्रियों को खोया है मानो श्रीमती गांधी और श्री राजीव गांधी मात्र कॉंग्रेस के प्रधानमंत्री थे, ये मुखिया द्व्यय शायद भूल गए कि ये दोनों देश के करोड़ो लोगो के सहित  दुनियाँ के सबसे बड़े लोकतान्त्रिक देश भारत के प्रधानमंत्री थे। यदि उस समय प्रधान मंत्री की सुरक्षा की चूक को  हमने चुस्त दुरुस्त रक्खा होता तो देश को उन दोनों  प्रधानमंत्रियों की  नीतियों, कार्यक्रमों और विचारों से असमय वंचित न होना पड़ता और देश कदाचित विकास की नयी मंजिलें हांसिल कर चुका होता। इन दोनों मुख्यमंत्रियों की बातों से ऐसा प्रतीत होता है कि "प्रधानमंत्री पर हमला" और "प्रधानमंत्री की सुरक्षा मे चूक के विषय मे भेद नहीं कर सके"? हमे याद रखना चाहिये कि फिरोजपुर जैसे मामले मे प्रधानमंत्री की सुरक्षा मे चूक ही प्रधानमंत्री के उपर हमले का कारण बन सकती थी।   खेद और अफसोस ये है कि ये  माननीय इस बात से अनिभिज्ञ रहे की यदि प्रधानमंत्री की सुरक्षा मे चूक के अंदेशे को ही समाप्त कर दिया गया होता तो आतंकवादियों और देश द्रोहियों के  हिंसात्मक हमले की नौबत न आती और न ही देश को अपने दो गौरवशाली प्रधानमंत्रियों को असमय, अकाल ही "कालकवलित" होना पड़ता!!

काश जैसे पंजाब मे  सुरक्षा की गंभीर सुरक्षा मे सेंध के पूर्व ही पीएम के आगे के समस्त कार्यक्रम निरस्त कर फ़्लाइ ओवर से बापसी का निर्णय लिया गया और इस तरह एक और अनहोनी को होने से  बचा लिया गया।  उनके सुरक्षा तंत्र मे लगे सुरक्षा अधिकारियों  मे जिस तरह के आकस्मिक निर्णय से देश के प्रधान मंत्री की जीवन रक्षा की गयी अगर ऐसे ही परिस्थितियों मे रक्षात्मक  कदम श्रीमती गांधी और श्री राजीव गांधी के समय उठाए जाते तो वे भी आज हम लोगो के बीच जीवित होते।

ये एक कड़वा सच है कि जो वृक्ष मीठे फल देते है उन्ही पर गली-मुहल्ले के असभ्य, अशिष्ट आवारा किस्म के बच्चे पत्थर फेंकते है। कुछ ऐसा ही आचरण पंजाब काँग्रेस के अध्यक्ष श्री नव जोत सिंह सिद्धू ने प्रधानमंत्री के लिये शर्मनाक, असभ्य और अशिष्ट भाषा का इस्तेमाल कर एक  वीडियो मे गली गलौज की भाषा मे अपशब्द कहे!! (लिंक संलग्न)।   माननीय प्रधानमंत्री की सुरक्षा मे हुई चूक पर तंज़ कसते हुए इसे ड्रामा करार दिया और कहा कि,  "जब पाँच सौ आदमी पीएम की सभा मे आए तो किसी तरह इज्जत बचानी थी" इसलिये पीएम ने ये ड्रामा किया!! आगे कहा "बताओ जब पंद्रह महीने से किसान दिल्ली के बार्डर पर बैठे थे तो कोई पूंछने नहीं आया और जब प्रधानमंत्री का रास्ता पंद्रह मिनिट के लिये रोका गया तो "अऊँ-अऊँ हो गयी", "अऊँ-अऊँ हो गयी", "अऊँ-अऊँ हो गयी" "ठोको ताली"। ऐसी ही अशिष्ट भाषा मे आगे प्रधानमंत्री द्वारा किसानों के तीन कृषि कानून बापसी पर अपनी प्रतिक्रीया देते हुए पंजाबी मे जिन घिनौने शब्दों का इस्तेमाल किया उसकी अपेक्षा देश के सबसे पुराने राजनैतिक दल काँग्रेस  के प्रदेश अध्यक्ष से कदापि नहीं की जा सकती थी। इस वीडियो मे (3 मिनिट 8-9सेकोण्ड्स पर) गली छाप अनपढ़ व्यक्ति से भी गिरी भाषा मे सिद्धू ने जो बोला:- असि काले कानून बापस लै लए, "बताऊँ बापस लै लए, थोडे "$....%¥" (अशिष्ट अपशब्द) के विच डूंठा देके बाप्स लिवाये"!!  पंजाब की कोंग्रेसियत भले ऐसी रही हो पर पंजाब की पंजाबियत तो ऐसी कभी नहीं रही। जब पंजाब प्रदेश कॉंग्रेस के अध्यक्ष महोदय की ऐसी भाषा, सांस्कृति और संस्कार है तो कॉंग्रेस का तो भगवान ही मालिक है। सिद्धू की अध्यक्षता मे कॉंग्रेस किस तरह का शासन देगी इसका अनुमान सहज ही लगाया जा सकता है।

जब देश मे किसानों सहित  सभी राजनैतिक दलों, संस्थाओं व्यक्तियों  को अभिव्यक्ति की आजादी है तब एक पीएम के नाते न सही देश के एक साधारण नागरिक होने के नाते  क्या उन्हे अपने विचारों को अभिव्यक्त करने की आज़ादी नहीं मिलनी चाहिये? तब क्यों उन तथाकथित किसानों ने उनका मार्ग अवरुद्ध कर उन्हे बल पूर्वक रोका? क्यों पंजाब पुलिस ने पीएम के मार्ग को अवरोध मुक्त नहीं बनाया ताकि वे भी अपने विचारों को श्रोताओं के समक्ष रक्ख सकते? क्या  अभिव्यक्ति की आज़ादी सिर्फ किसानों को ही मिली है? देश का पीएम को क्या अपनी अभिव्यक्ति की आज़ादी नहीं मिलनी चाहिए?

जैसा कि पंजाब के मुख्य मंत्री चरण जीत सिंह चन्नी और प्रदेश अध्यक्ष श्री नवजोत सिंह सिद्धू का मानना था कि साठ-सत्तर हजार  की क्षमता वाले मैदान मे मात्र पाँच सौ श्रोता ही प्रधानमंत्री की सभा मे आये थे इसलिये प्रधानमंत्री ने अपनी इज्जत बचाने के लिए भटिंडा से फिरोजपुर हैलिकोप्टर से न जाकर सड़क रास्ते से जाने का ड्रामा किया और सुरक्षा मे चूक का ठीकरा  हम (पंजाब सरकार) पर फोड़ दिया!!  अगर ये ही सच था तो  मेरा तो मानना है, तब तो पंजाब सरकार को किसी भी कीमत पर रास्ते की सारी रुकावटें दूर कर प्रधानमंत्री के सभा तक के  मार्ग को  प्रशस्त कराया जाना चाहिए था,  ताकि प्रधानमंत्री द्वारा पाँच सौ लोगो की संख्या को सम्बोधित  करने की फजीती एवं जगहँसाई, काँग्रेस पूरे देश और दुनियाँ को दिखा सकती थी। बगैर कुछ किए ही पंजाब की काँग्रेस को  प्रधानमंत्री जी की सभा मे खाली कुर्सियों को संबोधित करने की तस्वीरे प्रचार प्रसार और सोश्ल माध्यमों मे वाइरल करने का सुनहरा मौका मिल जाता। ढ़ोल बजा-बजा कर कॉंग्रेस को पैसठ हजार खाली कुर्सियों मे पाँच सौ श्रोताओं को प्रधानमंत्री का  संम्बोधन का वीडियो/फोटो, इश्तेहार, विज्ञापन समाचार पत्रों और टीवी मे  ही दिखाते रहते तो किसी और चुनाव प्रचार की जरूरत ही न रहती? प्रधानमंत्री के लिये श्रोता विहीन सभा से ज्यादा  अपकीर्ति और अप्रिसिद्धी और क्या हो सकती थी। प्रधानमंत्री और बीजेपी पंजाब सहित सारे देश मे  उपहास का पात्र बनते।  पंजाब सरकार को ऐसा  स्वर्णिम अवसर कदाचित ही मिलता और एक अति मूल्यवान  मुद्दा बिना किसी प्रयास के मिल जाता। सुरक्षित रास्ता प्रदान करने पर उनके "एक पंथ दो काज हो" जाते तथा ये कहावत भी चरितार्थ हो जाती कि  "साँप भी मर जाये और लाठी भी न टूटे"।

सोने पे सुहागा ये होता  कि  पंजाब सरकार के उपर प्रधान मंत्री की सुरक्षा मे चूक का "जान लेवा" आरोप भी नहीं लगता। प्रधान मंत्री जैसे अति सम्मानित व्यक्ति की सभा मे  मात्र पाँच सौ लोगो के सम्बोधन से उपजे अपयश और अपकीर्ति के इस वक्तव्य कि "अपने सीएम को थैंक्स कहना कि मैं एयरपोर्ट जिंदा लौट पाया" जैसे वक्तव्य की नौबत ही नहीं आती और वे स्वयं ही कम श्रोताओं के कारण "इज्जत बचाने के जाल" मे फंस जाते?

दुर्भाग्य से पंजाब के मुख्य मंत्री और पंजाब प्रदेश अध्यक्ष द्वारा  प्रधान मंत्री को सुरक्षित सड़क मार्ग प्रदान कर जो प्रसिद्धि और शोहरत मिलती, उस मौके की राजनीति करने का ये सुनहरा मौका वो चूक गए।

विजय सहगल

1 टिप्पणी:

N K Dhawan ने कहा…

सहगल साहब तुसी कमाल हो। आपने प्रधानमंत्री की सुरक्षा व्यवस्था लेख में चूक के साथ कमीने सिद्धू को नंगा कर दिया।यह वही कमीना व्यक्ति है जो एक समय सोनिया जी को मुन्नी बाई के नाम से संबोधित करता है और दूसरी तरफ़ उनकी चरण वंदना करता है । आप नोट कर लो यदि खुदानखास्ता पंजाब में कांग्रेस की सरकार बनती है और यह मुख्यमंत्री नहीं बनाया जाता तो यह राहुल को भी ठोकने से नहीं हिचकेगा ।राहुल का उपनाम पप्पू भी इसी कमीने की देन है ।