सोमवार, 27 सितंबर 2021

पांचो बुआ

 

"पांचो बुआ"


पांचो बुआ छुन्ना के  घर के पास ही  स्थित बाड़े  मे रहा करती थी। एक साधारण सी स्थूलकाया  प्रौढ़ महिला थी, पांचों बुआ। यूं तो हाते के सभी आस-पड़ौस के घरों से उनका मेल जोल और उठना बैठना था। लेकिन जब हाते के सभी महिलाएं अपने अपने घरों के कार्यों मे व्यस्त होते तो कुछ शैतान बच्चे उन्हे बुआ राम राम कह कर चिढ़ाते थे। "बुआ राम-राम" कहते ही पांचों बुआ उन बच्चों और उनके माँ-बाप को कोसती थी। आठ साल का छुन्ना भी जो उसी बाड़े मे अपने माँ बाप के साथ रहता था मौका देख बच्चों की मंडली मे शामिल होकर उनके घर के सामने खड़े होकर "बुआ, राम-राम कह कर खिजाता था। बुआ जो हर समय एक छोटा पतला लगोदा (छड़ी) रखती और बच्चों को छड़ी का भय दिखाती जिससे डर कर बच्चे अपने अपने घरों मे दुबक कर भाग जाते। पांचों बुआ बच्चों के "राम-राम" कहने से क्रोधित हो फटकारती पर डांटने का अंदाज क्रोधाभाव से परे होता था। कोसते समय भी उपहास और अपमान जनक भाषा ईतर उलाहना प्रेम भरा होता था। बुआ द्वारा बच्चों को  पांचों पहर, "राम-राम" कहने पर कोसने के कारण लोग उन्हे बुआ से "पांचो बुआ" बुलाने लगे थे।  

छुन्ना भी बच्चों की शरारतों मे शामिल रहते हुए पांचों बुआ को राम-राम कह कर चिढ़ाता था। छुन्ना  एक बार अपनी मित्र मंडली के साथ मेला देखने जाने वाला था। इस हेतु वह माँ से कुछ पैसे मांगने हेतु बाहर आया, किन्तु माँ तो महिला मंडली मे बैठी थी जिसमे पांचों बुआ भी शामिल थी। अब तो छुन्ना की हिम्मत ही न हुई कि वह मंडली मे बैठी माँ से पैसा मांग सके। उसको डर था कि माँ के पास ही बैठी पांचो बुआ उसकी ढिठाई की शिकायत उसकी माँ से कर देगी! लेकिन दबाब था कि यदि छुन्ना नहीं आता तो बाल मंडली उसके बिना मेला देखने निकल जायेगी। इसी कारण हिम्मत करके उसने महिलाओं के बीच मे अपनी माँ को पुकारा। माँ ने भी बेटे को देख उसके पास आकार पूंछा क्या बात है? छुन्ना की माँ के चेहरे पर कुछ चिंता भरे भाव को देख पांचो बुआ ने आवाज लगाई। श्यामा!! अब तो छुन्ना की हालत खराब थी कि पांचो बुआ ने उसकी शिकायत करने के लिए ही  माँ को आवाज दी है! उसका डर और घबड़ाहट के मारे बुरा हाल था। पर आशा के विपरीत बड़े प्यार और वात्सल्य से छुन्ना की माँ से  पूंछा, क्या बात है? सब ठीक तो है? इतनी परेशान क्यों हो? माँ ने कहा कुछ नहीं बुआ, छुन्ना बच्चों के साथ मेला देखने जाना चाहता है! कुछ पैसे मांग रहा है। मै घर से पैसे लाकर अभी आती हूँ! पांचों बुआ ने तुरंत अपनी साड़ी के पल्लू से दो रूपये का नोट निकाल कर छुन्ना को देते हुए कहा, "ले रख दोस्तों के साथ मेले मे  कुछ खा पी लेना!! माँ ने कहा, बुआ ये तो बहुत ज्यादा है? बुआ ने बड़े प्रेम भरी झिड़की देते हुए कहा, "कुछ ज्यादा नहीं है मेरे छुन्ना के लिये"। श्यामा ने कहा, "बुआ, मै आपको घर से पैसे ला अभी देती हूँ।  बुआ ने साधिकार उलाहना देते हुए कहा, "कोई जरूरत नहीं पैसे लौटाने की"! क्या छुन्ना के उपर मेरा कोई हक नहीं? छुन्ना मेरा भी तो बेटा है!

छुन्ना ये सब देखकर  और सुनकर आश्चर्य चकित था कि जिस "पांचो बुआ" को वह दिनभर "बुआ, राम-राम" कह कर चिढ़ाता था, दूसरे बच्चों के साथ परेशान करता था उसके दिल मे उसके लिये इतना प्यार और हमदर्दी है।  बुआ के इस ममता मयी माँ के रूप को देख उसकी आँखों मे आत्मग्लानि और अपराध बोध का भाव जाग्रत हो उठा! आँखों के कोने मे आँसू उभरने ही वाले थे कि उसने बुआ का आभार जताते इंतजार कर रही बाल मंडली की ओर दौड़ लगा दी और बच्चों के साथ मेला देखने रवाना हो गया। उस रात उसके दिल  मे पांचों बुआ के प्रति सम्मान और आदर के भाव उमड़ पड़े और भविष्य मे दुबारा ऐसी ढिठाई न करने की सौगंध खाई।      

समय बीतता गया और छुन्ना उर्फ क्षेत्र पाल सिंह  ने स्नातक की परीक्षा पास कर जो रेलवे  की नौकरी हेतु फॉर्म भरा था उस नौकरी का आज बुलावा, पत्र के माध्यम से आ गाय था। कल उसे नौकरी जॉइन करने हेतु लखनऊ जाना था। सारी तैयारी हो चुकी थी। तैयारी पूरी हो चुकी थी, कपड़े और आवश्यक सामान, प्रमाण पत्रों, कागजों के साथ एक सन्दूक मे जमा लिये थे। बाड़े के गेट पर तांगा आ चुका था। छुन्ना ने अपने माता-पिता के पैर छू आशीर्वाद ले तांगे की ओर बढा ही था कि अचानक पीछे से आवाज आयी, बेटा, छुन्ना!! बुआ को "राम-राम" नहीं करोगे? उसने पीछे मुड़ कर देखा! पांचो बुआ अपने घर के दरबाजे के पास खड़े हो उसको निहार रही थी। छुन्ना तेजी से पीछे मुड़ा और बुआ के पैरों की तरफ झुका ही था कि पांचों बुआ ने छुन्ना को गले से लगा लिया!! पांचो बुआ ने प्यार और वात्सल्य से सिर पर ममतामयी चपत लगते हुए कहा अब मुझे, बुआ राम-राम कौन कहेगा? सुनते ही छुन्ना की आँखों मे पश्चाताप के आँसू आ गये! छुन्ना बोला बुआ अनजाने मे बचपन मे बार-बार "राम-राम" कह कर चिढ़ाने की मेरी शैतानियों को माफ करना, बुआ!

बुआ ने प्यार भरी झिड़की देते हुए कहा, हट पगले!! बो तो मै यूं ही तुम बच्चों को कोसती फटकरती रहती थी ताकि तुम बच्चे भगवान "राम" के नाम  का सुमरिन करो और तुम बच्चों को जबाब देने के लिये मै भी भगवान श्री राम के  नाम का स्मरण बारबार करती रहूँ!! मै तुम बच्चों को देख मन ही मन बड़ी खुशी और आनंद का अनुभव करती हूँ!! तुम बाल गोपालों के कारण ही मै भगवान राम का सुमरिन करती रहती हूँ ताकि इह लोक से परलोक के लिए मुझ  जैसी अभागिन को मुक्ति मिल सके? मै सुन कर हतप्रभ था!! ये सुन मै एक बार फिर बुआ के पैरों को नमन करने से न रोक सका!! कैसे एक साधारण सी दिखने वाली बुआ की आध्यात्मिक विद्ध्या  का स्तर हमारी अकादमिक  शिक्षा से कितना श्रेष्ठ था!! जिसमे सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय का वास्तविक संदेश छिपा था!!           

इतना सुन  जैसे ही मै स्टेशन की  ओर जाने के लिये तांगे की ओर बढ़ा, बुआ ने हाथ पकड़ अपनी साड़ी के पल्लू से दो रूपये देते हुए कहा, "तूँ कितना भी बड़ा अफसर बन जाये पर मेरे लिये तो तूँ नन्हा से छुन्ना ही रहेगा"!! "ये रूपये रख ले अपने लिये कुछ खाने की चीज ले लेना"। छुन्ना आँखों मे आँसू लिये दो रूपय का नोट अपनी मुट्ठी मे रख, तांगे की ओर बढ़ चला!!  

विजय सहगल


शुक्रवार, 17 सितंबर 2021

यादगार हवाई यात्रा

 

"यादगार हवाई यात्रा"




यध्यपि इससे पहले मै दो बार हवाई यात्रा कर चुका था पर दोनों यात्राएं यादगार तो थी लेकिन आनंद, प्रसन्नता के विपरीत अप्रसन्नता दायि एवं विरक्ति से परिपूर्ण थी, जिसका उल्लेख मैंने अपने ब्लॉग https://sahgalvk.blogspot.com/2021/07/blog-post_17.html मे किया था।  अब तक तीसरी यात्रा के समय हम भी हवाई यात्रा की बारीकियाँ और चालाकियाँ सीख चुके थे या यूं कह ले कि हम भी हवाई यात्रा मे अनुभवी और परिपक्व हो चुके थे। अब तक   हमे ये भी ज्ञान हो चुका था कि खिड़की की सीट कैसे लेनी है और किन-किन लाइन को छोड़ कर टिकिट बुक करानी है ताकि वायुयान के पंख (डेने) खिड़की के सामने न पड़े । भौगोलिक विज्ञान का अब हमे पूरा ज्ञान था अर्थात किस दिशा मे और किस समय के हिसाब से बाएँ या दायें वाली सीटे चुननी है। ऐसा इसलिये कि अल सुबह यात्रा के समय  पूर्व दिशा से निकलने वाले सूर्य देवता की तेज चकाचौंध वाली किरणे यदि हवाई जहाज की खिड़की से पर पड़ेंगी तो चकाचौंध के कारण  हवाई जहाज की यात्रा का मजा खिड़की होने के बावजूद किरकिरा हो जायेगा।

यात्रा के समय "दिशा" के महत्व का एक किस्सा आपके साथ सांझा करूंगा। उन दिनों  ग्वालियर डबरा  के बीच दैनिक यात्रा के समय हम बस से यात्रा करते थे। ग्वालियर से डबरा  के लिये लगभग डेढ़ घंटे की यात्रा थी जो दक्षिण  दिशा की ओर थी। भरी गर्मियों का समय था। बस ग्वालियर बस स्टैंड से प्रातः सात बजे रवाना होती थी। स्टैंड पर बसें  बेतरतीब सी खड़ी रहती थी। मै अपने एक दो साथी के साथ बस मे चढ़ा और उस खिड़की की ओर अपना बैग रखा जहां पर अभी तेज धूप आ रही थी और बाहर खड़े हो बस चलने का इंतज़ार करने लगा।  एक सौम्य-सुशील पर अङ्ग्रेज़ी परस्त महिला  भी उसी समय बस मे चढ़ी और भूगोल  ज्ञान के अभाव मे छाया दार सीट पर बैठ गई। छाया दार वाली सारी सीटे लगभग भर चुकी थी। एक-दो सीट खाली पड़ी थी उस सौम्य महिला ने कुछ उपहास भरी दृष्टि से अपने ज्ञान और विवेक पर इतराते हुए हम लोगो को भी छाया दार खिड़की की तरफ बैठने की नसीहत दी। बस चली और 10-15 मिनिट बाद चौराहों, रस्तों पर दायें-बाएँ मुड़ के शहर को पीछे छोड़  मुख्य डबरा/झाँसी  रोड की ओर बढ़ी ही थी, अब तक बस की बाएँ तरफ की खिड्कियों मे सूर्य की तेज किरने पड़ने लगी थी। हम लोग जो दायीं ओर बैठे थे मजे मे झपकी आने का इंतजार कर रहे थे, तभी अर्ध इंग्लिश महिला फुसफुसा कर बोली आप लोग "सही जगह" पर बैठे है, "जेण्टलमेन"!! मैंने भी धीरे से चुटकी लेते हुए कहा  "मेडम बचपन मे भूगोल पढ़ी होती तो आज आप भी "सही जगह" बैठी होती"!!

इन सारी चतुराईयों, चालाकियों एवं दिशा ज्ञान के भूगोल का इस्तेमाल मैंने तिरुपति से चेन्नई जाने वाली हवाई यात्रा मे भी किया था। यात्रा 40-50 मिनिट की ही छोटी सी थी पर जिसको इस बार हम यादगार बनाना चाहते थे। 31 दिसम्बर 1988 को तिरुपति बालाजी के दर्शन करने के बाद हम परिवार सहित तिरुपति शहर स्थित हवाई अड्डे पर प्रातः छह बजे पहुँच गए। छोटा सा हवाई अड्डा था। पत्नी और चार साल के बेटे के साथ मैंने वायुदूत कंपनी के काउंटर पर तीनों का टिकिट प्रस्तुत किया। भीड़ न के बराबर थी। मुझे लगा, बाकी यात्री पहले ही प्रवेश कर चुके है। मुझे फिर लगा आज भी कही खिड़की की सीट छोड़ बीच की सीटों पर फिर न बैठना पड़े। फिर पिछली दो यात्राओं के दौरान का खराब अनुभव पुनः घटित न हो जाये। मन ही मन मे कुछ बेचैनी हो रही थी। टिकिट की जांच के बाद स्टाफ ने सामान आदि का बजन कर जांच आदि पूरी की। हाथ के सामान मे टैग लगाया। अब तक बेचैनी चरम पर थी मैंने अपने आपको सयंत कर काउंटर स्टाफ को कहा।" कि मुझे दो सीट खिड़की की तरफ दे तो उत्तम रहेगा", "अन्यथा कम से कम एक सीट तो खिड़की की अवश्य ही मिलनी चाहिये"। काउंटर पर बैठे कर्मचारी ने कुछ रहस्यमय हंसी के साथ सहमति मे सर हिलाया पर बोला कुछ नहीं। चुप-चाप बोर्डिंग पास मेरे आगे बढ़ा दिया। उसने अब मेरी बेचैनी को और बड़ा दिया। सामान आदि की औपचारिकता के साथ सुरक्षा जांच मे स्टाफ ने बड़ी तेजी दिखाई और हम तीनों हवाई पट्टी से हो सीधे हवाई जहाज की ओर बढे। मुझे ऐसा लगा कि शायद स्टाफ हमारा ही इंतज़ार कर रहा था? यध्यपि मै हवाई यात्रा के नियत समय से काफी पहले आ चुका था।

मै जिस हवाई जहाज की कल्पना कर खिड़की, सीट, दिशा आदि की योजना बना रहा था पर सामने जिस  हवाई जहाज को देखा तो कुछ चौका!! ये बोइंग विमान न था अपितु 19 सीटों  वाला वायुदूत कंपनी का एक छोटा विमान था। कौतूहल और जिज्ञासा अब भी मन मे रह-रह कर उठ रही थी कि पता नहीं कितने यात्री पहले से बैठे होंगे। खिड़की की सीट मिलेगी भी या नहीं? इसी उहाँ-पोह की स्थिति मे हम परिवार सहित विमान मे सवार हुए।  वायु यान मे प्रवेश करते ही मै हतप्रभ था! मैने  चारों ओर निगाह दौड़ाई! हवाई जहाज के अंदर का नज़ारा देख मै हैरान था!! एक बार फिर से हमारी चालाकियाँ, होशियारी और भौगोलिक शिक्षा, ज्ञान  तिरोहित हो चुका थी। मुझे अपने ज्ञान, कौशल और हवाई यात्रा के अनुभव पर हंसी आ रही थी। हमारी  खुशी की सीमा तब न रही जब मैंने हवाई जहाज को पूरा खाली देखा!! खिड़की की सीट, दिशा आदि की कोई भी समस्या नहीं थी क्योंकि हवाई जहाज मे हमारे परिवार के अलावा कोई अन्य सहयात्री था ही नहीं!! मेरा खुशी के मारे बुरा हाल था कि कहाँ एक अदद खिड़की चाहता था, पूरा विमान ही मेरा था!! प्रायः वायु यान पूरे यात्रियों को किराये पर ले जाते है और यहाँ, मै था जो आज पूरे वायु यान को  ही किराये पर ले जा रहा था। बिल गेट्स, वॉरेन बफेट, अंबानीयों और टाटाओं के अपने निजी विमान से परिवार सहित यात्रा करने के किस्से सुने और पढे थे, आज कुछ बैसी ही फीलिंग इस विमान मे बैठ हो रही थी। धनी-मनी, दौलतमंद सा अहसास!! एक व्यक्तिगत निजी वायुयान अर्थात "मेरा चार्टर्ड "एरोप्लेन"।

2X2 सीट की पाँच छह लाइन मे सारी खिड़कियाँ हमारा इंतजार कर रही थी। कुछ ही देर मे हवाई जहाज आसमान मे था। दो चालक दल के सदस्यों एवं एक सेवादार के अलावा वायु यान मे अन्य कोई यात्री न होने की शानदार, सुखद एवं यादगार  यात्रा के दौरान विमान "परिचारक" ने जब गरमा गर्म कॉफी वितरित की तो यात्रा की प्रसन्नता दुगनी हो गई। खिड़की से शहरों की सड़के ऐसे दिखाई दे रही थी जैसे कोई इठलाती, बलखती नदी निडर निर्भय हो बह रही हो। कार, बस, ट्रक छोटे-छोटे चलते फिरते खिलौने लग रहे थे। घरों की छत्त पर टहलते लोग, सड़क पर चलते-फिरते इंसान छोटे से पुतलों की तरह लग रहे थे। छोटे छोटे घर, पुल, सैकड़ों पेड़, वृक्ष, फूल पौधे  कुछ कुछ सपनों  मे पारियों के देश सा अहसास करा रहे थे। उड़ते बादलों के बीच हवाई जहाज ऐसे लगता मानों आसमान मे स्थित हम अपने छोटे से घर मे बैठ वहाँ से निकल रहे बादलों से बात कर रहे हों। मै मन ही मन सोच रहा था कि कहाँ आज एक अदद खिड़की वाली सीट की ईक्षा की थी और कहाँ ईश्वर ने पूरा वायुयान ही हमारे हवाले कर दिया था। किसी ने सच ही कहा है-: 

"बिन मांगे मोती मिले, मांगे मिले न भीख।                

इस तरह मेरे जीवन की तीसरी "हवाई यात्रा" एक स्वर्णिम सुखद, आनंद दायक यात्रा बन गयी जिसे मै "पहली" रमणीय, मनोहारी और सुहावनी  "हवाई यात्रा" के रूप मे याद रखना पसंद करता हूँ।

विजय सहगल

मंगलवार, 14 सितंबर 2021

बंटवारा-? क्यों स्वीकारा-?

 

"बंटवारा-? क्यों स्वीकारा-?"





मेरे पास हमारे पुरखों की मुझ  से उपर लगभग दस पीढ़ियों की वंशावली है। हम लोगो का कुटुंब बहुत बड़ा है जिनके ज्ञात पूर्वज श्री चन्द्र सेन खत्री है। उनके पूर्व के पूर्वजों  का विवरण उपलब्ध नहीं। लगभग दो सौ  वर्ष पूर्व शायद हमारे पूर्वज झाँसी आये होंगे ऐसा हमारा अनुमान है। क्योंकि जहां हम लोगो के घर है उसके आमने-सामने एवं अगल-बगल चार-पाँच घर हमारे कुटुंबी जनों के ही परिवार है और घरों की बनावट सौ-सवा सौ वर्ष पूर्व की अवश्य ही रही होगी। एक विशेषता हमारे घरों की और थी कि वे सभी अंदर से एक दूसरे से जुड़े थे।  लेकिन यहाँ मै एक विशेष प्रयोजन के लिये अपने परदादा का उल्लेख करूंगा। मेरे परदादा स्व॰ श्री हरचरण लाल थे जिनके तीन पुत्र स्व॰ श्री कालू राम जी, स्व॰ श्री चतुर्भुज एवं स्व॰ श्री सरमन लाल थे। स्व॰ श्री चतुर्भुज के सिर्फ आठ पुत्रियाँ ही थी कोई पुत्र नहीं था, कालू राम जी के दो बेटे थे एक बेटी एवं स्व॰ श्री सरमन लाल जी (मेरे दादा) के एक पुत्र (मेरे पिता स्व॰ श्री विष्णु नारायण) एवं दो पुत्रियाँ (मेरी बुआएँ थी) मेरा यहाँ अपने कुटुंब का  परिचय देने का कोई ऐसा प्रोयजन नहीं था कि वे कोई बहुत बड़े व्यवसायी या उद्योग के स्वामी  या नगर के प्रसिद्ध व्यक्ति थे। निश्चित ही हमारे पूर्वज महारानी लक्ष्मी बाई के काल खंड मे भी रहे होंगे पर राजा गंगाधर राव राज परिवार से निकटता का कोई प्रमाण नहीं अतः मेरा ये मानना है कि हमारे परदादा भी हम जैसे एक  साधारण मध्यम वर्गीय परिवारों के एक सुसंस्कृत व्यक्ति रहे होंगे। लेकिन जो सबसे बड़ी विशेषता या खूबी उनमे थी कि कैसे परिवार मे आपसी एकता, मेलमिलाप एवं समाज मे स्थापित मूल्यों को कैसे परिवार के बीच कायम रक्खा जाये। इसी बात का उदाहरण परदादा जी के आचार-विचार, व्यवहार  और जीवन के आचरण मे लाये गुणों से परिलक्षित होता है। परिवार के सदस्यों की आवश्यकता के अनुरूप घर के उपयोग के लिए जगह प्रदान कर दी गयी। मेरे दादा के एक भाई जिनके कोई पुत्र न होने के कारण आज भी उनके हिस्से मे  उनकी पौत्रियों के परिवार  वैधानिक भागीदार तो है ही। किसी के हिस्से उपर की संपत्ति है तो नीचे परिवार के अन्य सदस्य की जायदाद इसके ठीक उलट किसी का हिस्सा नीचे है तो अन्य सदस्य की परिसंपति  उपर। कहने का तात्पर्य है कि तत्कालीन परिस्थिथितियों मे आपसी प्रेम और भाई चारे के संस्कार के फलीभूत, आवश्यकताओं के अनुरूप स्थान का उपयोग होता रहा पर कोई लिखित विभाजन आज भी नहीं है। आपको आश्चर्य होगा कि परंपरा से प्राप्त उक्त संपत्ति के आज की तारीख मे डेढ़ सौ-दो सौ  से ज्यादा वैधानिक वारिस होंगे। यदि  एकाध सदस्य की महत्वाकांक्षा के कारण   कुछ आपसी मन-मुटाव और भेद भाव को नज़रअंदाज़ कर दे तो कुल मिला कर स्थिति आज  तक भी सौहद्र्पूर्ण है। यहाँ उक्त आख्यान लिखने का मुख्य प्रयोजन ये बताना है कि परिवार की आवश्यकताओं का सम्मान एक दूसरे की भावनाओं के सम्मान से होता है न कि बंटवारे के कारण।

अब मूल विषय पर आते है। स्वतन्त्रता वाले दिन 15 अगस्त 1947 मे जब देश के बहुतायत नागरिक अपने घरों मे चैन की नींद सो रहे थे तब पूर्वी बंगाल, पश्चिमी क्षेत्र मे  पंजाब, गुजरात, कश्मीर राजस्थान के लोग विभाजन से उपजी विपदा और विभीषका से दो-चार हो रहे थे। करोड़ो लोग इस विभाजन रूपी दंश से सताये अपना घर परिवार छोड़कर एक अनिश्चित भविष्य की यात्रा करने को मजबूर किए गए। गांधी जी के उस कथन को कि "देश का बंटवारा मेरी लाश पर होगा", दरकिनार कर अंग्रेजों और भारतीय राजनैतिज्ञों विशेषकर काँग्रेस  द्वारा देश के बँटवारा स्वीकारने  के क्रूर निर्णय के कारण कुछ ही दिनों  दोनों ओर से शरणार्थियों का पलायन हुआ।  लगभग एक करोड़ सिक्ख, पंजाबी और सिंधियों जिसमे अधिकतर हिन्दू थे को हँसती खेलती ज़िंदगी को शरणार्थी के रूप मे  सड़क के दो राहे पर ला खड़ा किया। लाखों  लोग दंगे मे अकारण काल कवलित हो गये। बँटवारे के एक ऐसे राजनैतिक निर्णय ने इन बेघर हुए लोगो को दाने-दाने के लिये मुंहताज कर दिया जो अब तक सुख और वैभव का जीवन व्यतीत कर रहे थे।  इन अभागे लोगो को दो वक्त के खाने के भी लाले पड़ गये!! संकट के इन दुर्दिनों की वेदना को पंजाब, सिंध, गुजरात और बंगाल के कुछ हिस्सों को  छोड़ कर कदाचित ही किसी अन्य क्षेत्र या प्रांत ने या कोई अन्य देशवासी ने इस विभीषिका को महसूस किया हो? ऐसे महा विपदा को सिर्फ और सिर्फ  बँटवारे की मनोव्यथा से पीढ़ित भुक्त-भोगी शरणार्थी ही समझ सकते है। किशोर अवस्था मे मेरे बचपन के सहपाठी देवेंद्र दुआ के पिता श्री एवं माता जी  से इस संबंध मे कई बार बात करने का सौभाग्य मिला था। कैसी वेदना और लाचारी के भाव थे उनके चेहरे पर!! माताजी तो बात करते करते अपने घर की यादों कहीं खो गयी थी। उनके मुँह  से निकले शब्दों से कहीं ज्यादा दर्द उनके चेहरे से झलक रहा था।  बाबूजी और माताजी के  चेहरे पर उपजे उस दर्द और पीढ़ा को मै आज भी नहीं भुला पाया। क्या गुनाह था उनका जो उन्हे उनकी जड़ों से विलग कर जन्मभूमि/मातृभूमि से वंचित हो पलायन के लिए मजबूर किया गया था। रातों रात अपनी धन संपत्ति, व्यापार-वैभव जस का तास छोड़ सुरक्षित जीवन की तलाश मे अपनी जड़ो से जुदा  होना पड़ा।

देश की स्वाधीनता संग्राम मे हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन के भगत सिंह, चंद्रशेखर आज़ाद, बिस्मिल, अशफाकुल्लाह जैसे क्रांतकारी सदस्यों के बलिदान और योगदान को   कभी भुलाया नहीं जा सकता। अन्य दलों के साथ काँग्रेस से संबद्ध महात्मा गांधी सहित नेहरू, सरदार पटेल एवं अन्य अनेक सेनानियों के स्वतन्त्रता मे योगदान की हम सभी भूरि-भूरि प्रशंसा  करते है।  पर जहां एक ओर हम काँग्रेस के स्वतन्त्रता मे किये योगदान के लिये अच्छे निर्णय की   आदर और स्तुति  करें तो क्या काँग्रेस पार्टी द्वारा अंग्रेजों के देश के बँटवारे के निर्णय को स्वीकारने पर आलोचनात्मक टिप्पड़ी और चर्चा नहीं की जानी चाहिये? 

क्यों हम सभी के जेहन मे कभी ये सवाल नहीं आया कि 15 अगस्त 1947 मे जब देश का  बँटवारा हुआ तो तत्कालीन राजनैतिक पार्टी कॉंग्रेस सहित अन्य राजनैतिज्ञों ने क्यों नहीं इस बँटवारे का विरोध  किया? जब महात्मा गांधी ने देश के अवाम को ये भरोसा दिया था कि हिंदुस्तान का बंटवारा उनकी "लाश" पर होगा, तो अग्रेजों की इस बांटो और राज करो नीति का विरोध करने के लिये देश की सबसे बड़ी और सक्रिय राजनीतिक पार्टी काँग्रेस आगे क्यों नहीं आयी?  उन्होने विभाजन को क्यों स्वीकार किया? क्या उन्हे विभाजन की विभीषिका का अहसास नहीं था? या फिर विभाजन का समर्थन करने वाले लोगो को सिर्फ अपनी गद्दीनाशीन होने की तीव्र ललक, लालसा और अति महात्वाकांक्षा ने बँटवारे की इस मानव निर्मित आपदा को नजजरंदाज कर दिया? ये चिंतन-मनन का विषय  है।

यदि तकालीन नेताओं ने समावेशी रवैया अपनाया होता और जिन्ना की तदर्थ प्रधानमंत्री बनने की  महत्वाकांक्षा   को संतुष्ट कर दिया होता तो शायद बंटवारा न होता। लेकिन यदि पंडित नेहरू सभी लोगो को साथ लेकर स्वयं की अभिलाषा और आकांक्षा को दरकिनार कर दूसरों की भावनाओं और सम्मान का समावेश कर महत्व देते एवं महात्मा गांधी ने विभाजन के विरुद्ध अपने वचन और कथन पर दृढ़ और कठोर रवैया अपनाया होता तो देश को विभाजन की विभीषका से बचाया जा सकता था।  क्योंकि कालांतर मे लोकतान्त्रिक प्रणाली के तहत चुनी गयी सरकार सत्ता और शासन मे अपनी भागेदारी सुनिश्चित करती। हर मत और  संप्रदाय के लोगो की सत्ता मे भागेदारी से आपसी मतभेदों के बावजूद लोग साथ रहने को मजबूर होते। तब शायद कल का अखंड भारत एवं  आज का  पाकिस्तान आतंकवादियों  का अड्डा न बनता। पाकिस्तान मे अल्पसंख्यक हिंदुओं, सिक्खों  के पूजा स्थलों को आए दिन धर्मभीरु लोगो द्वारा नहीं तोड़ा जाता और  कश्मीर की समस्या तो उत्पन्न ही न होती। क्या मजाल थी कि पिछले दिनों सिरफिरे लोगो द्वारा लाहौर मे महाराजा रणजीत सिंह की प्रतिमा को क्षति पहुँच पाती? भारत का विशाल भूखंड अखंड भारत का रूप ले देश की जनता के विकास और उन्नति के पैमाने पर दुनियाँ मे एक अलग स्थान रखता। देश की भूगर्भीया सम्पदा, पर्यटन और प्रकृतिक सम्पदा से देश मे चहुं ओर खुशाली होती पर दुर्भाग्य से राजनैतिक नेताओं के अंतर्द्वंद और अति महावकांक्षा ने ऐसा होने नहीं दिया जिसके फलस्वरूप बँटवारे की इस विभिषका मे लगभग 10 लाख लोगो को अपनी जान न गंवानी पड़ती। लोगो को अपनी जड़ों से विलग होने के दंश से न गुजरना पड़ता। अपने ही देश मे शरणार्थियों की तरह रहने के लिये बाध्य न होना पड़ता। एक कहावत है "देर आयद, दुरुस्त आयद"। देर से ही सही 1947 के विस्थापितों द्वारा झेले गये दुःख और संताप को महसूस करने और उस वेदना मे देश के सभी नागरिकों को सहभागी हो  एकाकार होने मे इस वर्ष सरकार ने "14 अगस्त 2021 को विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस" के रूप मे मनाने का कदम सराहनीय है। काश महात्मा गांधी के कहे अनुसार देश का "बंटवारा न स्वीकारा"  होता तो आज देश का समृद्धशाली, वैभव शाली और गौरव शाली इतिहास होता।    

विजय सहगल     

 

  

शनिवार, 11 सितंबर 2021

संस्कृत संभाषण-कक्षा

 

"संस्कृत संभाषण-कक्षा"






17 अगस्त 2021 को अपने नित्य प्रातः भ्रमण उपरांत जब मै सुबह समाचार पत्र का अवलोकन करा रहा था तो हमारी निगाह अचानक एक समाचार  पर स्थिर हो गयी। "मिस्ड कॉल दें और केवल 20 दिनों मे सीखें ऑन लाइन "संस्कृत" बोलना और पढ़ना"। प्रस्ताव अच्छा था, बचपन मे कक्षा छठी से हाई स्कूल तक संस्कृत का अध्यन तो किया था पर मूल उद्देश्य था की परीक्षा मे जैसे भी हो पास होने लायक अंक आ जाये। हमारी वर्तमान शिक्षा प्रणाली का दुर्भाग्य रहा है कि अग्रेजों द्वारा नियुक्त अंग्रेज़ नौकर शाह लॉर्ड मैकाले ने आज से 186  वर्ष पूर्व सन 1835 मे जिस शिक्षा प्रणाली को देश पर थोपा था वो सिर्फ विश्वविध्यालयों मे  स्नातकों/परास्नातकों का उत्पादन करने वाले कारखानों के रूप मे उभरी। इन फ़ैक्टरियों मे अंग्रेजों कों उनकी शासन और सत्ता के रूप मे सहायक, नौकर शाहों का उत्पादन लगातार होता रहा जो थोड़े बहुत बदलाव के साथ आज तक निरंतर जारी है।  इस प्रणाली मे भारत देश की प्राचीन ऋषि-मुनियों और गुरुजनों द्वारा हजारों वर्षों पूर्व संस्कृत के  वेद, उपवेद, उपनिषद, सहिंताओं, श्रीमद्भग्वत गीता आदि पवित्र ग्रन्थों   मे उल्लेखित अध्यात्म विध्या कों कोई स्थान नहीं दिया गया। इस प्रणाली मे नैतिक शिक्षा और चरित्र निर्माण का पूर्णतः आभाव रहा जिसके कुप्रभाव वर्तमान मे आम जनों की सेवा मे रत मैकाले की शिक्षा प्रणाली से निकले  अधिकारियों और नौकरशाहों के चाल,  चरित्र और चेहरे  मे आज भी  स्पष्ट देखा जा सकती है।      

जब उत्तर प्रदेश संस्कृत संस्थान द्वारा संस्कृत के प्रचार प्रसार के अभियान के बारे मे समाचार पत्र मे  पढ़ा तो सुखद आश्चर्य होना स्वाभाविक था। मै माफी सहित लिखना चाहता हूँ कि प्रायः इस तरह के संस्थान सफ़ेद हाथी की माफिक रहे है जिनका सरोकार कदाचित ही संस्कृत भाषा के प्रचार-प्रसार  को सामान्य जनों तक  जोड़ने के प्रयास करते हों। मैंने पहली बार इस अभियान के माध्यम से आम जनों कों संस्कृत शिक्षा से जोड़ने के प्रयास कों देखा अतः मै श्री वाचस्पति मिश्रा सहित उत्तर प्रदेश संस्कृत संस्थान के श्री नागेश दुबे जी सहित अन्य आचार्यों की इस प्रयास मे सहभागी होने पर उनकी सराहना और प्रशंसा करता हूँ।

मुझे यह लिखते बेहद खुशी है कि आज मेरी कक्षा का दसवां दिवस है। आचार्या श्री नागेश जी के अध्यापन मे संचालित इस ऑन लाइन कक्षा का मेरा अब तक का अनुभव भी सुखद एवं यादगार रहा। एक ओर जहां  जितनी तन्मयता, समर्पण और निष्ठा के साथ आचार्या जी कक्षा मे हमारी भूली बिसरी यादों कों व्याकरण और प्राथमिक शब्दों के माध्यम से पुनः जीवंत और जागरण कर रहे थे वही दूसरी ओर आभासी विध्यार्थियों कों संस्कृत सीखने की ललक और लालसा भी हमारे इस विचार कों दृढ़ कर रही थी कि देश के आम जनों के संस्कृत सीखने की उत्कंठा कितनी प्रबल है! हर उम्र और वर्ग के आभासी शिक्षार्थियों का ऑन लाइन शिक्षा ग्रहण करने की अभिलाषा कों देख लगता है कि यदि शासन और सरकार ईमानदारी और  सकारात्मक भाव से प्रयास करते रहें  तो लोग संस्कृत सीखने के अभियान मे निश्चित ही बढ़ चढ़ कर शामिल होंगे। जहां मेरे सहित श्री लक्ष्मीकान्त त्रिपाठी, ललिता तिवारी, डॉ जागृति देसाई जैसे वरिष्ठ भवान् और भवत्या विध्यार्थी के रूप मे सहभागी है वही विनय, विकास, सुप्रिया, वैष्णवी जैसे युवा और किशोर विध्यार्थी भी जिनकी अच्छी ख़ासी संख्या इस संस्कृत सीखने के अभियान मे शामिल है उपस्थित है।    

ऑनलाइन संस्कृत शिक्षा अभियान मे जहां एक ओर आचार्य श्री नागेश जी का संस्कृत भाषा मे प्रभावपूर्ण प्रवीढ्ता परिलक्षित हो रही थे वही स्लाइडस  एवं पावर प्रेजेंटेशन के माध्यम से हर रोज भरपूर पठनीय सामाग्री सॉफ्ट कॉपी के रूप मे उपलब्ध कराई गयी वही दूसरी ओर सारे प्रतिभागियों को भौतिक रूप से अभ्यास  मे शामिल कराने के कारण विषय मे रोचकता और निरंतरता बनी रही। हर रोज क्लास के प्रारम्भ मे भिन्न भिन्न विध्यार्थियों से गणेश वंदना एवं संस्कृत ध्येय मंत्र का पाठन कराने से उनमे संस्कृत वाचन के प्रति आत्मविश्वास का संचार हुआ। आज मै इसी आत्मविश्वास और साहस के साथ कह सकता हूँ कि बेशक मुझे संस्कृत लेखन एवं व्याकरण मे उतनी प्रवीढ्ता न प्राप्त हुई हो पर मै संस्कृत लिखित संभाषण मे तो सिद्धहस्त हो गया हूँ।    

डॉ वाचस्पति मिश्रा और नागेश जी जैसे आचार्यों और उनकी टीम के इस संस्कृत महाभियान कों देख कर और देश के हर प्रांत, भाषा, उम्र, वर्ग, और लिंग भेद के परे संस्कृत सीखने के अभियान मे शामिल इन विध्यार्थियों कों देख लगता है कि संस्कृत भाषा का भविष्य आज की नौजवान पीढ़ी के हाथ मे ज्यादा सुरक्षित और उज्ज्वल है। उत्तर प्रदेश संस्कृत संस्थान के ऐसे सद्प्रयस संस्थान की सार्थकता कों सिद्ध करेंगे। संस्थान सफलता के नये आयाम प्राप्त करे इन्ही  शुभकनाओं के साथ।       

विजय सहगल

मंगलवार, 7 सितंबर 2021

विक्टोरिया टर्मिनस-(बॉम्बे-वीटी)

 

"विक्टोरिया टर्मिनस-बॉम्बे"


मुंबई  सपनों का शहर, चका चौंध से भरी फिल्मी सितारों की नगरी। 60-70 के दशक का समय बॉलीवुड पर एक से एक धांसु फिल्मे बनती और सारे देश मे जिनकी चर्चा घर घर मे होती। संयुक्त परिवारों पर बनी कहानियों पर भी फिल्मे खूब बनी, कमोवेश कहानी सबकी एक ही होती। कहीं जमींदार परिवार का लड़का अभिनेत्री से प्रेम के चक्कर मे घर से निष्काषित कर दिया जाता। ठेला, रिक्शा चलाना, मजदूरी करना, प्रायः भूंखे सोना उसके जीवन का हिस्सा होता। पतिव्रता पत्नी ऐसी फिल्मों मे साहूकार के यहाँ  मंगल सूत्र जरूर गिरवी रखती थी। ये फिल्म का आवश्यक हिस्सा होता था। बाद मे झक मारकर हीरो  का बाप साहूकार को रुपए देकर "मंगल सूत्र" छुड़ाता है। दया, करुणा और दर्द से भरी मर्मस्पर्शी कहानी मे अभिनेत्री की गलती न होने के बावजूद वो यहाँ अपने पति के साथ पिता के पैर छूये, जैसे ही उसने यहाँ डायलोग बोला,  "बाबूजी मुझे माफ कर दो", मुझसे भूल हो गयी तैसे ही वहाँ हाल मे दर्शकों की तालियों की गड़गड़ाहट और महिला दर्शकों के नेत्रों से अश्रुओं की  धारा बहने लगती तभी पर्दे पर "द एंड" का शीर्षक उभर आता है। थिएटर मे महिलाएं की रुलाई छूटना फिल्म की सफलता का पैमाना होता था। ऐसे ही तमाम किस्सों पर ढेरों चलचित्र बनाये जाते थे, इस फिल्मी शहर बॉम्बे मे।  

उन दिनों मे मुंबई शिवाजी टर्मिनस को  बॉम्बे वीटी (विक्टोरिया टर्मिनस) बोला जाता था। मै छटी कक्षा मे रहा हूंगा लगभग 12 साल उम्र होगी। जब स्कूल की गर्मियों की छुट्टी मे आपको यदि बॉम्बे घूमने जाने का ऑफर मिले तो क्या कहना!! ऐसा ही कुछ हुआ था उन दिनों मेरे साथ। खुशी का ठिकाना न रहा। दरअसल मेरे पापा उन दिनों झाँसी रेल्वे स्टेशन पर बुकिंग ऑफिस मे थे। गर्मियों मे बॉम्बे जैसे महानगरों मे रेल्वे पर कार्य का अतरिक्त  बोझ बढ्ने के कारण अन्य छोटे स्टेशन से स्टाफ को बुलाया जाता था। उन दिनों बॉम्बे सेंट्रल रेल्वे का मुख्यालय हुआ करता था। इसी क्रम मे मेरे पापा की ड्यूटि भी बॉम्बे मे वीटी (विक्टोरिया टर्मिनस) स्टेशन पर लगी थी। बॉम्बे मे रहना एक सबसे बड़ी चुनौती थी। इस हेतु रेल्वे बाहर से आये कर्मचारियों के रहने की व्यवस्था उन दिनों प्रचलित प्रथम श्रेणी के डिब्बों मे करता था। जिसके कुछ रैक वीटी स्टेशन के आखिरी प्लेटफॉर्म पर खड़े किये गये थे। क्योंकि बॉम्बे वीटी या आसपास आवास की उपलब्धता न के बराबर थी। उक्त प्रथम श्रेणी डिब्बे जो सीधे ही प्लेटफॉर्म पर खुलते थे। आश्यक सेवाये  जैसे पंखे, लाइट, टॉइलेट, बर्थ और दो या चार बड़ी खिड़कियाँ रोशनी और हवा उपलब्ध कराने मे सहायक होती। सबसे बड़ी बात एक दरबाजे  को अंदर से बंद कर यदि दूसरे दरबाजे पर आप बाहर ताला डाल दे, तो एक वन रूम सेट की तरह इस डिब्बे को बखूबी इस्तेमाल किया जा  सकता था। रेल विभाग दो बर्थ के डिब्बे मे एक स्टाफ को और चार बर्थ के डिब्बे मे दो स्टाफ को ठहराता था। पापा को भी दो बर्थ वाला प्रथम श्रेणी कंपार्ट्मेंट रहने के लिए मिला हुआ था। डिब्बों मे पर्याप्त मात्र मे पानी और लाइट की व्यवस्था विभाग द्वारा उपलब्ध हो जाती थी। जब बॉम्बे के हृदय स्थल वीटी स्टेशन पर ठहरने/रहने की व्यवस्था हो जाए तो क्या कहना। बड़े से बड़े करोड़ पति अभिनेता या व्यवसायी के भाग्य मे भी वीटी जैसे क्षेत्र मे रहना  एक दिवा स्वपन जैसा था तब अपने जैसे लोगो को फ़र्स्ट क्लास डिब्बे मे रुकने की सुन, मन प्रसन्नता और खुशी के भाव से आनंदित हो उठा। चूंकि ऐसी जगह परिवार सहित रुकना समुचित न था तो पापा ने मुझे और मेरे बड़े भाई प्रदीप को बॉम्बे बुलाने की खबर भेजी।

उन दिनों 24 घंटे की रेल यात्रा पर दोनों बच्चों को अकेला भेजने मे माँ ने तो इंकार कार दिया पर अपन तो भाई के साथ जाने तैयार थे। पर उन्ही दिनों हमारे पड़ौस के श्री सूरज चाचा जो ठाणे मे आरपीएफ़ मे कार्यरत थे झाँसी स्थित अपने घर आये हुए थे। फिर क्या था इस अकेले जाने की समस्या से भी छुटकारा मिल गया और हम दोनों भाई उनके साथ ठाणे तक पहुँच गए। उनके घर पर फ्रेश, स्नान-ध्यान और भोजन कर हम अपने गंतव्य बॉम्बे वीटी पहुँच गए। अब तक रेल की पटरियों को एक दिशा से दूसरी दिशा तक मीलों दूर जाते देखा था पर वीटी स्टेशन पर पटरियों की समाप्ती देख आश्चर्य हुआ और तभी ही "टर्मिनस" शब्द के  अर्थ से रु-ब-रु भी हुआ था। तदुपरान्त पापा के साथ अपने सपनों के महल मे बोरी विस्तरा जमाया जो आगे 15-20 दिन के लिये हमारे रहने का ठिकाना होने जा रहा था। एक छोटे कस्बे से निकल बॉम्बे महानगर अबूझा और अलग सा था। पहला दिन तो अपने डिब्बे की खिड़की से बैठ  वीटी जैसे बड़े स्टेशन पर गाड़ियों का आना जाना देखते रहे।  बैसे भी बचपन मे उन दिनों हर बच्चे को आसमान मे  उड़ते हवाई जहाज और जमीन पर दौड़ती  रेल गाड़ियों का आते-जाते  देखना सबसे प्रिय शगल होता था। एक-दो दिन तो पापा रात मे हम दोनों भाइयों के साथ रुके पर शिफ्ट की ड्यूटि के कारण उन्हे भी रात की ड्यूटि करनी पड़ी। रात मे आवश्यक निर्देश ये था कि लक्ष्मण रेखा की तरह  किसी भी सूरत मे कंपार्ट्मेंट की कुंडी नहीं खोलना, चाहे कुछ भी हो जाये। पहली रात हम दोनों भाइयों ने यूं ही कुछ जागते सोते काटी और हर समय अंदर से बंद की जाने वाली कुंडी पर निगहे टिकाई रक्खी कि कहीं कुंडी स्वतः ही अपने आप न खुल जाये? साथ मे सब्जी छीलने और काटने वाले चाकू भी सिरहाने रख लिये कि किसी मुसीबत मे मुक़ाबला किया जा सके ठीक उस गीत की तर्ज़ पर "छोटा बच्चा जानके मुझसे मत टकराना रे ...... "। देर रात तक इसी उधेड़-बुन मे जागने के कारण सुबह कब नींद लग गई पता ही न चला।

पापा के साथ एक-दो दिन पूर्व वीटी स्टेशन के बाहर  कुछ आवश्यक वस्तुओं जैसे दूध, ब्रेड, मिट्टी का तेल और राशन की दुकानों को हम देख आये थे। अकेले रहने के अगले दिन हम दोनों भाई सबसे पहले दूध लेने अकेले बाहर निकले। बड़े सहमते अजनबियों की तरह हम दोनों ने वीटी स्टेशन के बाहर दूध की दुकान से दूध लिया और वही से ब्रेड लेकर बापस अपने ठिकाने पर पहुंचे। रात के मौसम भी कुछ गरम था नींद भी ठीक से पूरी नहीं हुई थी। डिब्बे मे एक कोने मे स्टोव जला चाय बनाई और डिब्बे के बाहर खुले प्लेटफॉर्म पर चाय की चुस्कीयों का आनंद लिया। लगभग दो घंटे बाद नाश्ता तो क्या बनता क्योंकि कुछ बनाना आता नहीं था पर पराँठे और सब्जी बनाने मे माहिर थे। पराँठे मे नमक मिर्च और जीरा डाल कर पराँठे बनाए। पराँठे के आकार प्रकार को छोड़ दे तो स्वाद मे पराँठे ठीक थे। घर से लाये अचार के साथ अपने हाथ के बनाए पराँठों का स्वाद पहली बार लिया। अब तक रेल का डिब्बा हम लोगो के लिये घर का सा हो गया था। ठंडे पानी के लिये प्लेटफॉर्म के उपर एक कार्यालय मे लगी मशीन (वॉटर कूलर) से ले आते थे। वही पहली वार हम लोगो ने लिफ्ट को बड़े आश्चर्य और कौतूहल से देख सवारी की। वीटी लोकल और अन्य  यात्री ट्रेन के  स्टेशन अलग अलग थे। एक दिन टहलते हुए लोकल के प्लेटफॉर्म पर भी जा पहुंचे। बापसी मे एक टीसी ने हम लोगो को आराम से टहलते हुए देख टिकिट मांग लिया। इस आफत के बारे मे तो सोचा ही नहीं था। जब उन्हे पूरी कहानी बताई और बॉम्बे वीटी पर अपना घर दिखाया तो उन्हे विश्वास हुआ। तब तो रेल का डिब्बा हमारा घर और वीटी स्टेशन हमारे घर के आँगन सा हो गया था जहां हम स्व्छंद पूर्वक घूमते और आते जाते रहते।

अब तक जैसे नवांकुर पंछियों के "पर" आसमान मे स्व्छंद उड़ने के लिये तैयार होते हम लोग भी सुबह दूध लेने के पूर्व जहाँगीर आर्ट गैलरी तक पैदल चले जाते लेकिन गेटवे ऑफ  इंडिया उम्र के लिहाज से कुछ ज्यादा दूर पड़ता अतः वह हमारी पहुँच के बाहर ही रहा। साप्ताहिक अवकाश पर  जब पापा के साथ पहली बार ताज होटल,  गेटवे ऑफ  इंडिया देखा तो आश्चर्य और अचरज से उसे देखता  ही रहा। पहली बार बहु मंजिली  ऊंची ऊंची इमरते देख विस्मित हो एकटक निहारता ही रहा। इन बहुमंज़िली इमारतों की गिनती उपर से नीचे कुछ इस तरह करता रहा जैसे बचपन मे स्टेशन से गुजरती मालगाड़ी के डिब्बे गिनने की कोशिश करता था।  नरीमन पॉइंट, मेरीन ड्राइव, हंगिंग गार्डन मुंबा देवी मंदिर, मछ्ली घर, देखने के बाद चौपाटी पर समुद्र किनारे टहलना हम दोनों भाइयों के लिये अजूबा था। हम पहली बार इतनी विशाल जलराशी को  समुद्र मे  देख रहे थे। वीटी स्टेशन के बाहर से शुरू होने वाले फुटपाथ बाजार के बारे मे सुन रक्खा था। यहाँ के जेब कतरों के किस्से कहानी बाल मंडली मे चटखारे लेकर सुन चुका था पर ऐसा कुछ न देखा न अनुभव किया इसका एक मुख्य कारण शायद हम जैसे फक्कड़ बच्चों का जेब कतरों की सूची से बाहर रखना रहा होगा। एक अन्य छुट्टी मे हम कुछ परिचित लोगो के घर भी मिलने गये जिन्हे मेरे पापा जानते थे। इनमे हमारे कुटुंब के एक बाबा स्व॰ श्री छोटे लाल भी थे। जिन्हे हमने पहली बार देखा था। सुना था वे अपने जवानी के दिनों मे मावा  के व्यवसाय के सिलसिले मे मुंबई आ गये थे। हम बच्चे उन्हे बंबई वाले बब्बा कहते थे। उनकी खोली मे जब पहुंचे तो उन्होने दिल खोलकर हम दोनों भाइयों का स्वागत किया। हमने पहली बार अरबी के पत्तों की रोल कर बनाई भाजी खाई, जो बड़ी ही स्वादिष्ट थी और हमारे लिये एक नयी डिश थी। पापा ने बताया कि उन दिनों मुहल्ले के उनकी उम्र के लड़के बंबई भाग कर घूमने के लिये प्रायः उनकी ही खोली मे ठहरते थे।

मुंबई प्रवास धीरे धीरे समाप्ती की ओर था। अब तक हम प्रथम श्रेणी डिब्बे मे रहने के आदि हो चुके थे पर एक रात जब  हम डिब्बे मे सोये हुए थे कि अचानक हमारे डिब्बों की ट्रेन  वीटी स्टेशन से चलने लगी। अब तक तो हमारे रहते ट्रेन स्थाई तौर पर प्लेटफॉर्म पर खड़ी रहती थी पर अचानक आज चलने से हम दोनों घबड़ा कर जाग गये। पापा को कहीं कोई खबर देने के साधन भी नहीं था। हम दोनों भाई डरे सहमे अंदर बैठे रहे। गनीमत रही कि कुछ दूरी तक जाने के बाद ट्रेन रुकी और फिर बापस दूसरे  प्लेटफॉर्म पर आ गयी।  हम दोनों भाइयों  की जान मे जान आयी। बाद मे ज्ञात हुआ कि रहने वाले स्टाफ के डिब्बे के नीचे पड़े  मल-मूत्र की सफाई के लिये ट्रेन को हटाया गया था।

अब तक बॉम्बे की यात्रा और वीटी स्टेशन पर रेल कंपार्ट्मेंट मे रहने  की सुनहरी यादों  के बीच हमारी बॉम्बे की यात्रा एक यादगार यात्रा बन चुकी थी जिसकी मधुर स्मृति मेरे ज़िहन मे आज भी ताजा है।   

 

विजय सहगल

 

शनिवार, 4 सितंबर 2021

अफगानी तालेबान को मान्यता

 

"अफगानी तालेबान को मान्यता?






2 सितंबर 2021 को श्री भरत कर्नाड का नव भरत  टाइम्स दिल्ली मे अफगानिस्तान मे तालिबानों को मान्यता देने पर एक लेख "तालिबान से बात करने मे हर्ज ही क्या है" छापा था। इस पर मैंने अपनी प्रतिक्रिया रीडर्स मेल मे प्रकाशनार्थ प्रेषित की थी। चूंकि समाचार पत्र मे स्थानाभाव के कारण संपादक की अपनी सीमाएं होती है अतः भाव और भावना को स्थान देने के बाद हमारे पत्र का प्रकाशन तो हुआ लेकिन सामाग्री संक्षित करने के बाद। मैने अपने सुधि पाठकों को पत्र का सम्पूर्ण विवरण आपके लिए प्रस्तुत किया है। बैसे मैने 28 अगस्त 2021 को भी अफगानिस्तान के तालिबानियों पर अपना ब्लॉग लिखा था जिसका लिंक इस प्रकार है ( https://sahgalvk.blogspot.com/2021/08/blog-post_28.html ) कृपया पर भी गौर फरमाये:-  

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रीडर्स मेल मे प्रकाशनार्थ पाठक के विचार    

श्रीमान संपादक,                            02.09.2021          

नवभारत टाइम्स                         

नई दिल्ली

महोदय,

आपके समाचार पत्र दिनांक 02.09.2021 मे श्री भरत कर्नाड द्वारा लिखित "तालिबान से बात करने मे हर्ज ही क्या है" पढ़ा। उक्त विषय मे लेखक का अंतर्द्वंद स्पष्ट उजागर होता है। वे एक ओर तो भारत सहित अन्य देशों के इस डर का उल्लेख करते है कि  "तालिबान चाहे जो वादे कर रहा हो वह  अपने वादे के बावजूद अलकायदा, इस्लामिक स्टेट, लश्करे ए तैयबा और जैश जैसे आतंकी गुटो से हाथ मिला सकता है"। "वे कश्मीर मे दिक्कत बढ़ा सकते है" और "पाकिस्तान मे तहरीक ए तालिबान के जरिए चरम पंथ को हवा दे सकते है"।  वहीं आगे वह "भारत को तुरंत अफगान अमीरात को मान्यता देने" की उताबली दिखाते है। वे अफगानिस्तान को मान्यता देने को इस तरह बेताब नजर आते है मानों तालिबान कोई आधुनिक, प्रगतिशील और आध्यात्मिक सोच का अजूबा संगठन हो! लेखक इसी लेख मे जब लिखता है कि "मान्यता देने पर तालिबान भारत का अहसान मानेगा" और भारत के हितों का ध्यान रखेगा!! तब लेखक महोदय की भारत देश की  सेना और सुरक्षा बलों की "शक्ति" और "नीति" के बारे मे सोच पर दया, करुणा और सहानुभूति होती है। एक लुटेरे और क्रूर आतंकी संगठन तालिबान  को मान्यता देकर उसके साथ खड़े होने पर भारत देश के कौन से हितों का तालिबान ध्यान रक्खेगा? पूर्णतः अविश्वसनीय इस संगठन के लोग  12 साल से उपर की लड़कियों को बलपूर्वक अपने लड़ाकों से शादी कराने, बलात्कार लूट और हत्या जैसे क्रूर कृत मे शामिल इस अतिवादी संगठन को मान्यता के अहसान से नबाजने पर क्या भारत की जग हँसाई नहीं होगी? यत्र नार्यस्तु पूज़्येंन्ते.... जैसे नीति वाक्यों की विरासत वाले भारत देश की छवि को महिलाओं पर कोड़े वरसना, महिलाओं को पत्थरों से मार कर हत्या जैसे पाशविक कृत्यों करने वाले तालेबानियों के साथ खड़े होने से देश और दुनियाँ मे क्या संदेश जाएगा? पाशविक जंगली कानून के विधान को लागू करने वाले तालेबानियों के साथ खड़े होने मे भारत देश को कोई यश, मान या प्रतिष्ठा प्राप्त होने से रही!! अपितु इसके विपरीत इनके साथ खड़े होने पर भारत देश को समस्त संसार के समक्ष अपकीर्ति का सामना करना पड़ेगा और जैसा की श्रीमद्भगवद गीता मे भगवान श्री कृष्ण, अर्जुन से कहते है कि :-

अकीर्तिं चापि भूतानि कथयिष्यन्ति तेऽव्ययाम्।

संभावितस्य चाकीर्तिर्मरणादतिरिच्यते। (अध्याय 2 श्लोक 34) अर्थात

(सब प्राणी भी तेरी सदा रहनेवाली अपकीर्ति का कथन अर्थात निंदा करेंगे। वह अपकीर्ति सम्मानित मनुष्यके लिये मृत्युसे भी बढ़कर दुःखदायी होती है।)    

हमे अपनी सेना और सुरक्षा बालों पर दृढ़ विश्वास है कि दुश्मनों की टेढ़ी निगाह को भी बलपूर्वक कुचल  देने का दम-खम रखते है, फिर चाहे वो तालेबान हो या पाकिस्तान। अतः इस विषय मे भारत को अपनी निश्चयात्मक निर्णय से तालेबानियों को अवगत करा अर्जुन की तरह सारे संशयों को समाप्त कर युद्ध के लिये खड़े होने के संकल्प जता देना चाहिये: -

तस्मादज्ञानसंभूतं हृत्स्थं ज्ञानासिनाऽऽत्मनः।

छित्त्वैनं संशयं योगमातिष्ठोत्तिष्ठ भारत।। (अध्याय 4 श्लोक 42) अर्थात

इसलिए हे भरतवंशी अर्जुन ! हृदय में स्थित इस अज्ञान से उत्पन्न अपने संशय का ज्ञानरूप तलवार से छेदन करके योग मे स्थित हो जा, और युद्ध के लिये खड़ा हो जा।)

हमे ये याद रखना होगा कि ये वही संगठन है जो महिला अधिकारों के हनन के लिये कुख्यात रहा है। निरीह महिलाओं और पुरुषों को  सरे आम फांसी, कोड़े और पत्थर मारने जैसे पाशविक विधान को मानने वाला है। अभी हाल ही मे हुए आत्मघाती  बम्ब धमाकों मे 13 अमेरीकन सैनिकों और  सैकड़ों निरीह अफगानी नागरिकों का हताहत होने की घटना दुनियाँ भूली नहीं है। आश्चर्य और अचंभित करने वाली इस घटना मे तालेबानी संगठन के एक भी सदस्य  को खरोंच भी नहीं आयी?  फिर कैसे इस संगठन पर विश्वास किया जा सकता है।  भारत को तालिबान के  अतीत और वर्तमान  पर भलीभाँत विचार मंथन के बाद ही "मान्यता जैसे" भविष्य का निर्धारण करना चाहिये।

विजय सहगल