शनिवार, 29 मई 2021

सकरन

"सकरन"






मै नहीं जनता की आप "सकरन" शब्द से परिचित है या नहीं पर  ये  हो सकता है कि  इस सकरन शब्द को आप किसी और रूप  से संबोधित करते हो। घर मे निकलने वाले कचरे को हमे दो भागो मे विभक्त करने की शिक्षा और संस्कार बचपन से ही मिले। सब्जी भाजी के छिलके, बीज या अन्य अनुपयोगी भाग, खाने मे बचे रोटी, दाल चावल को एकत्रित कर एक वर्तन मे एकत्रित कर लिया जाता था। इस सब्जी, भाजी के अनुपयोगी पदार्थ और खाने मे बची रोटी, दाल, चावल को हमारे बुंदेलखंड क्षेत्र मे "सकरन" कह संबोधित करते है। इस सकरन को प्रायः गाय को खिलाने मे उपयोग हम बचपन से ही करते आये थे। घर के अन्य कचरे को जिसमे धूल, कागज, काँच या अन्य अखाध्य पदार्थ को अलग एकत्रित कर सड़क पर डालते थे जिसे बाद मे नगर निगम के सफाई कर्मी झाड़ू लगा एकत्रित कर कचरा निस्तारण हेतु बड़े ट्रक मे डाल कर ले जाते थे। ये हर घर मे नित्य का कार्य था। एक छोटी बाल्टी मे सकरन को एकत्रित कर गाय को खिलाना मुझे हमेशा प्रिय लगता रहा, अतः इस काम को करने मे मुझे एक अलग ही आनंद और संतुष्टि की प्राप्ति होती थी। इस सद्कार्य को समाज मे एक पवित्र, पावन और पुण्य कार्य के फलस्वरूप धार्मिक कार्य की भी की मान्यता मिली थी। गाय को सकरन खिलाना प्रकृति और मानव के पारस्परिक लाभ का एक शानदार उदाहरण है। मानव उत्सर्जित खाध्यान कचरे के निस्तारण मे होने वाली ऊर्जा और समय का अपव्यय को इसे गाय को खिलाकर रोका जा सकता है। गाय की सेवा के रूप मे प्राप्त होने वाली "संतुष्टि" और परोपकार का अनमोल लाभ एक अतरिक्त प्रतिफल के रूप मे भी प्राप्त होता है।    

महानगरों के विकास और जीवन शैली और प्लास्टिक के प्रादुर्भाव ने सकरन के अस्तित्व पर ही प्रश्न चिन्ह लगा दिया।  जिसके फलस्वरूप "सकरन" के साथ अन्य अनुपयोगी कचरे को अपनी सुविधा और सहूलियत के अनुरूप प्लास्टिक की थैली मे मिश्रित कर लोगों ने सड़कों पर फेंकना शुरू कर दिया। इस तरह जो सकरन गाय को पहले सहज और सरल तरीके से उपलब्ध हो खाने मे मिल जाती थी अब उसको पाने और खाने के लिये गाय सहित अन्य जानवरों को बड़ी मेहनत-मशक्कत शुरू करनी पड़ गयी। लोग इतने निष्ठुर और अदयालु हो गये कि न केवल  प्लास्टिक की थैली मे एक साथ खाद्य और अखाद्य वस्तुओं को मिश्रित कर फेंकते अपितु थैली मे इतनी पक्की गांठ भी लगा देते जिसे खोलने के जतन मे गायों को तो क्या आदमी को भी भारी मशक्कत करनी पड़े।  

प्लास्टिक की थैली मे बंद खाद्य पदार्थो के खाने की लालच मे इन बेजुबान जानवरों को  अनेकों बार खादध्य वस्तुओं के साथ साथ अखादध्य वस्तुओं एवं प्लास्टिक का भी सेवन करना  उनकी मजबूरी बन गयी। जिसके फलस्वरूप भोजन के साथ, लोहे की कीलें, काँच, नाखून, बालों के गुच्छे आदि के साथ प्लास्टिक रूपी कचरा भी गायों के पेट मे जाने लगा। इन अखाद्य और जहरीले पदार्थों के पेट मे पहुँचने के कारण गायें बीमार होने लगी और अनेकों बार मौत के मुँह मे जा, अकाल मृत्यु को प्राप्त होने लगी। दुर्भाग्य से सकरन शब्द के साथ सकरन की सांस्कृति को भी उस समुदाय, समाज और संप्रदाय  ने तिलांजलि दे दी  जो गाय को पवित्र और पूज्यनीय मान घर मे पहली रोटी गाय के लिये निकालता था।

महानगरों मे तो गाय की और भी दुर्दशा होने लगी। बहुमंजिला इमारतों मे "सकरन" शब्द और सांस्कृति से पूर्णतः अनिभिज्ञ इस  पीढ़ी ने तो लोहा, काँच, पेपर, कपड़े के साथ फल सब्जी से उपजी सकरन को भी कचरे का रूप दे दिया। घर के दरबाजे से कूड़ा-करकट एकत्रित करने की सांस्कृति ने अखादध्य पदार्थों के साथ गाय के सकरन रूपी खादध्य पदार्थों को भी "कचरा घर" मे जाने को मजबूर कर दिया, जिसके  कारण महानगरों मे गाय के दर्शन ही दुर्लभ होने लगे। महानगरों मे गाय जैसे पवित्र पालतू पशु का स्थान बड़ी तेजी से कुक्कुर अर्थात कुत्ते ने ले ली।   मुझे अच्छी तरह याद है दिल्ली और नोएडा मे अपने प्रवास के सालों मे प्रति वर्ष पितृ पक्ष के दौरान गायों की खोज मे स्कूटर से कई-कई किलोमीटर तक जाना पड़ा, तब कहीं गाय के निमित्त निकले पहले भोजन-प्रसाद को गाय को अर्पित कर सका।  

इस कोरोना काल ने मुझे अपने गृह नगर आने पर विस्मृत "सकरन" का पुनःस्मरण अपने पड़ौसी परिवार ने कराया। मैंने महसूस किया कि पिछले दिनों नगर निगम की कचरा एकत्रित करने वाली गाड़ी हड़ताल के कारण 8-10 दिन नहीं आयी फिर भी उस परिवार सहित हमे भी कोई परेशानी नहीं हुई। क्योंकि घर मे झाड़ू-बुहारने से निकला  सूखा कचरा, धूल-धक्कड़, पेपर, प्लास्टिक बैग आदि का कचरा एक थैली मे एकत्रित होता रहा और सब्जी-भाजी, फल-तरकारी एवं नित्य के खाने से बचे भोजन अर्थात सकरन को रोज एकत्रित कर घर के बाहर एक निश्चित स्थान पर डाल दिया करते थे। इस गीले खाध्य कचरे रूपी सकरन को रोज 2-3 गाय बेनागा आ कर पूरी तरह चट कर जाती थी। मजाल! है एक छिलका भी उस स्थान पर आपको पड़ा मिले। बचपन मे गाय को सकरन खिलाने से मिली सुख की अनुभूति एक बार पुनः प्राप्त होने लगी। नित्य ही सकरन को दिन मे दो-तीन बार इक्कठा कर निश्चित स्थान पर गाय के लिये डालने से मिले सुखद अहसास को मै शब्दों मे ब्याँ नहीं कर सकता। बैसे ग्रामीण और छोटे कस्बों के लोग की दिनचर्या मे गायों के लिए सकरन एकत्रित कर गायों को अर्पित करना उनकी सांस्कृति और  संस्कारों का एक अभिन्न हिस्सा है, पर महा नगरो की बहुमंजिला इमारत के रहवासियों से ऐसी अपेक्षा करना असंभव है। मध्यम और छोटे शहरों, कस्बों एवं ग्रामीण जनों से तो ये अपेक्षा की ही जा सकती है कि "सकरन" की सांस्कृति को पुनः जीवित कर अपने समुदाय, समाज, संप्रदाय की गौरवशाली और बैभवशाली  परंपरा को पुनः जीवित कर गाय की सेवा कर अपने ईहलोक और परलोक को सार्थक बनाये।

विजय सहगल

                         


मंगलवार, 25 मई 2021

झाँसी मेल

 

"झाँसी मेल"




मै उन दिनों डबरा मे पदस्थपना के चलते ग्वालियर से दैनिक आवागमन करता था। अलग अलग समय हमारे मित्र अश्वनी मिश्रा जी एवं रामजी लाल मीना भी साथ थे। ग्वालियर से डबरा की दूरी 45 किमी॰ थी, ये दूरी हम लोग अन्य बैंक और सरकारी विभाग मे कार्यरत कर्मचारियों के साथ तय कर नित्य अपनी नौकरी पर जाते। बस ग्वालियर से डबरा होके आगे दतिया तक जाती थी जहां से झाँसी (उत्तर प्रदेश) महज 25 किमी॰ दूर रह जाता। बस का परमिट दतिया तक ही था अतः बस झाँसी तक न जाती थी। इसके बावजूद बस पर "झाँसी मेल" के बोर्ड ने हमे शुरू-शुरू मे  दुविधा और आश्चर्य मे डाला था पर बाद मे इस संबंध मे समुचित स्पष्टीकरण ने इस संबंध मे सारे सवालों पर निरुत्तर कर दिया।  यात्रा सुख और सुखद रूप से जारी रहती थी। आठ बजे प्रातः एक विशेष बस मे प्रायः सभी साथी एक साथ होते। पहले आने वाला दैनिक यात्री अन्य साथियों की सुविधा हेतु अपना बैग, पेपर, रुमाल आदि  रख  सीटों को आरक्षित कर लेते। 5-10 मिनटों मे अन्य सभी साथियों के आ जाने पर एक पारवारिक यात्रा नित्य का क्रम था। बस का स्टाफ भी दैनिक यात्रियों के प्रति काफी दयालु और मददगार था। बस मे बैठते ही सभी दैनिक यात्री आपस मे किराया एकत्रित कर दैनिक यात्रियों की संख्या के अनुसार कंडक्टर को एकमुश्त दे देते  ताकि एक-एक दैनिक यात्री से किराया बसूलने मे  समय और श्रम  व्यर्थ न जाये और दूसरी जो विशेष महत्वपूर्ण बात थी कि  मीठी नींद की झपकी मे कण्डक्टर महोदय टिकिट मांग कर व्यवधान न डाले।

मौसम के अनुसार सीटों का आधिपत्य दैनिक यात्री अपनी सुविधा अनुसार करते थे अर्थात गर्मियों मे सूर्य की दिशा के विपरीत ड्राईवर के पीछे वाली लाइन मे और सर्दियों मे बस की बाएँ लाइन मे हम दैनिक यात्रियों का कब्जा हो जाता। मौसम कैसा भी हो पर बस अड्डे से बस के रवाना होते ही सभी दैनिक यात्री ऐसी मीठी झपकी लेते कि आँख सीधी डबरा बस स्टैंड पर ही खुलती। बापसी मे भी यही नित्य का  क्रम था।  हाँ बापसी मे शाम होने के कारण बस की दिशा को भूल किसी मौसम मे किसी भी लाइन मे हम लोग बैठ जाते। यात्रा के दौरान उस शानदार मीठी झपकी को हम आज भी नहीं भूले।

बस का ड्राईवर सरमन एवं कण्डक्टर जो जगत "मामा" होने के कारण हम सब भी मामा कहते थे। बहुत ही हंसमुख और सरल स्वभाव। सामान्य यात्रियों से बातचीत मे मामा की हाजिर जबाबी और वाक-पटुता के हम सभी कायल थे। दरअसल बस का परमिट ग्वालियर से दतिया का होता था पर बस के आगे "झाँसी मेल" का बोर्ड लगा रहता था जिससे झाँसी जाने वाले सामान्य नागरिक बस का गंतव्य झाँसी मान कर प्रायः बस मे बैठ जाते। ग्वालियर शहर की अंतिम सीमा तक तो सवारियों को लेने और बैठाने मे ड्राईवर और कण्डक्टर व्यस्त रहते। विक्की फ़ैक्टरि/सिथोली से मामा यात्रियों के टिकिट बनाना शुरू करते। बस के पीछे से एक एक यात्री से उसके गंतव्य पूंछ टिकिट काटना एक बड़ा दुष्कृत कार्य रहता पर मामा बड़े धैर्य और मुस्कराहट से इसे संपादित करते।

बस मे "झाँसी मेल" के बोर्ड के कारण प्रायः हर रोज यात्रियों से नौक-झोंक होती। जो यात्री झाँसी जाने हेतु बस पर सवार होते पर टिकट काटने पर पता चलता कि बस तो दतिया तक ही जायेगी, वहाँ से बस बदल कर दूसरी बस से झाँसी जाना पड़ता तो यात्री का नाराज होना स्वाभाविक होता। पर मामा अपनी हाजिर जबाबी और मुस्कराहट से इस कहासुनी को रोज समाधान कर यात्री को निरुत्तर कर मुस्कराने के लिये बाध्य कर देते और अपने झाँसी मेल के बोर्ड को न्यायोचित ठहरा देते।

एक दिन जब मामा ने झाँसी जाने वाले एक यात्री का टिकिट जब  दतिया तक ही दिया तो वह नाराज हो गया कि आपने पहले क्यों नहीं बताया कि बस दतिया तक ही जायेगी? मामा ने बड़े ही धैर्य और सरलता से उस यात्री को कहा आपने तो मुझ से पूंछा ही नहीं कि बस झाँसी की जगह दतिया तक ही जायेगी। आप पूंछते तो हम बता देते कि बस दतिया तक ही जायेगी।  यात्री को ऐसे उत्तर की अपेक्षा न थी,  वह और भी क्रोधित हो के बोला, मुझे फिर से दतिया मे बस बदलनी पड़ेगी! सामान और बच्चों के साथ  बस बदलने मे फिर दिक्कत होगी। सीधी झाँसी की बस मे बैठता तो ये झंझट तो नहीं झेलना पड़ता और फिर "पूंछने की क्या जरूरत थी जब आपने बस के आगे "झाँसी मेल" का बोर्ड जो लगा रखा है।

मामा ने पुनः शांत और विनम्रता और चेहरे पर मासूमियत का  भाव लिये यात्री से कहा बस मे "झाँसी मेल" का बोर्ड सही लगा है। हम दतिया मे झाँसी की बस का मेल (मिलाप) कराते है ताकि झाँसी वाले यात्री उस मे बैठ सके। इसलिये ही बस मे "झाँसी मेल" का बोर्ड लगा है। ये हमारी ज़िम्मेदारी और जबाबदारी है कि आपको झाँसी के लिये बस का मेल-मिलाप  करा आपको सुविधाजनक तरीके से झाँसी की बस मे बैठाये। "मेल" शब्द की नई परिभाष और उत्तर सुन कर यात्री सहित हम सभी सहयात्री भी हँसे बिना न रह सके और मामा की बाकपटुता और चतुराई की दाद दिये बिना न रह सके।

विजय सहगल           

            

शुक्रवार, 21 मई 2021

विनाशाय च दुष्कृताम्

 

"विनाशाय च दुष्कृताम्"







श्रीमद्भगवत गीता मे भगवान श्री कृष्ण एक श्लोक मे कहते है कि :-

परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्।
धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे।।   (अध्याय 4 श्लोक 8)  

अर्थात साधुरूपी, सदाचारी  पुरुषो की रक्षा के लिये एवं पापकर्म करने वाले दुष्ट  मनुष्यों का विनाश करने के लिये और धर्म की भलीभाँति स्थापना के लिये मै समय समय पर अवतार लेता हूँ।

वर्तमान लोकतान्त्रिक परिद्र्श्य मे "पंच परमेश्वर" रूपी सरकार ही ईश्वर का रूप होती है अतः एक जन कल्याण राज्य से ये अपेक्षा होती है कि सर्वसाधारण की रक्षा और सुख, शांति एवं सुविधाओं  के लिये एवं अपराधी, डॉन, माफिया के सर्वनाश के लिये, राज्य मे कानून की अच्छी तरह संस्थापन हेतु कार्य करने की नैतिक और वैधानिक ज़िम्मेदारी सरकारों की होनी चाहिये। कदाचित इसी उद्देश्य की प्राप्ति हेतु  ही गीता का उक्त श्लोक समसामयिक है।

पूर्वी उत्तर प्रदेश के डॉन माफिया और दुर्दांत अपराधी एवं अपराधी से बाहुवली राजनैतिज्ञ   मुख्तार अंसारी से कौन परिचित नहीं है। ये डॉन माफिया अपराधी राजनीति मे विधायक तक की पदवी यूं ही हांसिल नहीं कर सके जब तक कि राजनैतिक दलों ने अपने स्वार्थ सिद्धि और निजी लाभ के लिये इन्हे पराश्रय नहीं दिया होता। लेकिन समय के फेर ने ऐसे डॉन को कानून का इस कदर खौफ पैदा कर दिया कि अपने काले साम्राज्य के प्रभाव से अपने अर्दली सेवादारों की मदद से  मूल प्रदेश उत्तर प्रदेश से कानूनी दाँव पेंच की बारीकियों का फायदा उठा नजदीक के प्रदेश पंजाब की रोपड़ जेल मे  भागने को मजबूर कर दिया। अपने इस फरेब से लगभग जनवरी 2019 से अप्रैल 2021 तक लगभग दो साल तक कड़े नियम कायदे के अनुरूप साधारण कैदी के रूप मे अपने गृह प्रदेश मे जेल मे मिलने वाली कठिनाइयों, मुसीबतों और संकटों  से बचा रहा एवं इस काल को अपनी सुख सुवधाओं और ऐशों-आराम मे तब्दील करा पाने मे सफल  रहा।    

गुंडे माफिया या बदमाशों का तो समझ आता है वे अपनी काली करतूतों से कमाई काली दौलत के बल पर दुनियाँ की हर वस्तु और सुख-सुविधा  को खरीदने की कोशिश कर सकते है (सिवाय संतोष के) पर एक जन कल्याण कारी सरकार से तो ऐसी अपेक्षा नहीं कर सकते कि ऐसे माफिया के झांसे मे आ उसको अवैधानिक सुख सुविधायें उपलब्ध करा अपने कर्तव्यों की खुले आम अवेहलना कर कुत्सित और अधम  उदाहरण प्रस्तुत करे??  एक षड्यंत्र के तहत  पिछले दिनों इन्ही मुख्तार अंसारी के विरुद्ध कोई झूठा और मनगढ़ंत  केस  लगवा पर पंजाब मे पेशी के लिये जनवरी 2019 मे हाजिर करवाया गया था। एक घोर अनैतिक, अशुभ आश्चर्य के अंतर्गत पेशी के बाद छद्म बीमारी और सेहत के आधार पर वहाँ की  पुलिस ने इस डॉन माफिया को कानूनी दाँव-पेच का इस्तेमाल कर बापिस उत्तर प्रदेश भेजने  से इंकार कर दिया। कैसा घोर आश्चर्य एक सूबे की पुलिस कानून का घोर दुर्पयोग एक दुर्दांत अपराधी को बचाने के लिये कर रही थी जिस अपराधी ने ज़िंदगी मे कभी कानून की परवाह नहीं की। क्या अन्य किसी निरीह, गरीब और आसक्त  कैदी के लिये भी पंजाब पुलिस, ऐसी तत्परता और त्वरित कार्यवाही कर किसी बीमार, रुग्ण और अस्वस्थ कैदी के अभियान को मूर्त रूप देगी??  दुनियाँ की शायद ही कोई ऐसी पुलिस होगी जो एक अपराधी को उसके मूल आपराधिक स्थान  पर जाने से रोकने के लिये माफिया के पक्ष मे खड़ी नज़र आये और  न केवल खड़ी नज़र आये कानूनी की पेचीदगियों का दुर्पयोग एक अपराधी के पक्ष मे करती नज़र आये। ऐसा पतित और अनैतिक कृत पंजाब पुलिस अपने स्तर पर कदापि नहीं कर सकती, अपितु इस सब मे राजनैतिक दबाब स्पष्ट नज़र आता है।  इस पूरे अपवित्र प्रकरण के सम्पादन मे राजनैतिक दलों और उनके क्षत्रपों का कुत्सित और घिनौना चेहरा एक बार पुनः समाज के सामने उजागर कर दिया!!  ये एक निर्लज्ज, शर्मसार करने वाला कटु सत्य था। इस प्रकरण मे पंजाब सरकार बेशक  अपने आपको या शासन प्रशासन को बुद्धिमान मान कर एक अपराधी को बचाने हेतु मानवता की दुहाई दे अपनी पीठ ठोक रही हो रही हो लेकिन देश और दुनियाँ की पूरी जनता, प्रशासन की इस बुद्धि, ज्ञान और कौशल पर तरस खा रही है!!

मेरे सहित जनसमान्य की समझ से परे मुख्तार अंसारी को रोपड़ जेल मे बनाये रखने और सुख सुविधायें प्रदान करा कर पंजाब सरकार ने ऐसा कौन से आदर्श  प्रस्तुत किया जो एक जन कल्याण कारी सरकार से अपेक्षा की जाती है? क्या जनकल्याणकारी राज्य ने  आम जनों की सुख सुविधायें प्रदाय के परे  डॉन, माफिया और अपराधियों को जेल मे सुविधायें उपलब्ध करा एक अनैतिक, अन्यायी और सिद्धान्तहीन काला दृष्टांत प्रस्तुत कर अपनी निर्लज्जता और वेशर्मी जग जाहिर  नहीं  की?? शायद पंजाब प्रशासन को  अपने दंभ, अभिमान और घमंड मे इस अनैतिक आचरण मे कुछ भी गलत न दिखाई दे लेकिन उन्हे ये बात हमेशा याद रखना चाहिये कि आम जन सरकार के हर कृत को अपनी सही-गलत की कसौटी पर कस कर देखती है और समय आने पर सटीक जबाब देती है जिसकी गहनता, तीव्रता का अहसास सरकारों को अभी नहीं होगा। ऐसी सरकारों के पैतृक राजनैतिक दलों के मुखिया या जिम्मेदार नेतृत्व को भी इस कृत मे कुछ भी अनैतिक नहीं दिखाई दिया? अगर ऐसा है तो भगवान भी ऐसे व्यक्तियों और दलों को देश दुनियाँ से विलुप्त होने से नहीं रोक सकता!!    

इस माफिया के परिवार के लोग और उनकी पत्नी  ने सुप्रीम कोर्ट और राष्ट्रपति से मुख्तार अंसारी की रक्षा की गुहार की है। उन्हे अंदेशा था कि इस डॉन की गाड़ी भी कहीं विकास दुबे (वही "मै विकास दुबे बोल रहा हूँ, कानपुर वाला") की तरह दुर्घटनाग्रस्त हो कर पलट न जाये। देख और सुन कर बड़ा आश्चर्य होता है कि जो डॉन और माफिया या उनके गुर्गे बगैर कानून और न्यायालय की परवाह किये दूसरों  की जानमाल को नुकसान पहुँचाने एवं  जान लेने मे एक पल भी नहीं सोचते, कैसे उसी न्यायालय के समक्ष से अपनी जान की भीख के लिये गिड़गिड़ा रहे है।

उत्तर प्रदेश शासन की अपराधियों और डॉन माफियाओं के विरुद्ध शक्ति और कड़ी कार्यवाही के कारण इन अपराधियों की हालत अब खस्ता होने लगी है। अपनी काली कमाई के दम पर हर सुख सुविधाओं को खरीदने के लिये अब उनकी दाल नहीं गलने  के कारण मुख्तार जैसे माफियाओ ने उत्तर प्रदेश के बाहर ही अपनी सजा काटने मे ही भलाई समझने की नीति के कारण ही पंजाब की रोपड़ जेल मे रहने के लिये ही अपने राजनैतिक रसूख का इस्तेमाल किया।  जिसमे वो सफल भी रहा और कानून की कमियों, बारीकियों और कानून मे मिले अधिकारों के बल पर न्यायिक तंत्र का दुर्पयोग कर स्थानीय न्यायालय से अप्पर न्यायालय, जिला न्यायालय, हाई कोर्ट होकर सुप्रीम कोर्ट मे प्रकरण को दो साल से ज्यादा तक उलझाये रख रोपड़ मे ऐशों आराम, सुख सुविधाओं का सजायाफ्ता जीवन व्यतीत किया। लेकिन कहावत है कि "झूठ कितना भी बलवान हो", "सच परेशान हो सकता है, परास्त नहीं"। अंततः इस तरह 2 साल से चूहे बिल्ली के खेल पर विराम लगा  सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश के माध्यम से 6 अप्रैल 2021 मे अपराधी डॉन को अपने मूल गंतव्य बांदा की जेल मे रवाना कर दिया।

कानून की ताकत का अहसास देश, काल और पात्र के अनुसार  कुछ ही घंटे मे देखने को मिला, जब रोपड़ जेल की काल कोठरी से डॉन माफिया को स्थांतरण हेतु निकाला गया तो पुलिस के छः जवान डॉन माफिया को व्हील चेयर पर बैठा कर सेवा और सहायता करते नज़र आये। वही माफिया जब लगभग 900 किमी की 14  घंटे की यात्रा के बाद अपने गंतव्य पर पहुँचने पर  जेल की काल कोठरी तक खुद पैदल चलते हुए नज़र आया। ये होती है समय की बलिहारी, जैसा कि कहावत है कि "अब आया ऊंट पहाड़ की नीचे" और  तभी तो कहा जाता है "समय बड़ा बलवान"!!

विजय सहगल     

मंगलवार, 18 मई 2021

संकट मे खोता सदाचार

 

"संकट मे खोता सदाचार"






सामान्य स्थितियों मे हम भारतवासी समाजिकता, धार्मिकता मानवता और देश प्रेम का  ऐसा प्रदर्शन करेंगे कि शायद ही किसी देश और दुनियाँ मे देखने को मिले। तीज़-त्योहार, राष्ट्रीय पर्व, राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर के खेलों मे किसी भारतीय का  प्रदर्शन, विशेषकर क्रिकेट मे भारतीय टीम के प्रदर्शन मे आम भारतियों को  राष्ट्रीय भावना से ओत-प्रोत देखा जा सकता है, पर न जाने क्यों देश का बड़ा दुर्भाग्य है कि संकट के समय आपदा  से जुड़े विषय, व्यापार और  सेवाओं मे लगे लोग मानवता से परे अपने व्यक्तिगत स्वार्थ और लाभ के लिये नैतिक रूप से इतने गिर जाते है कि उन पर घिन आती है। आज कोरोना महामारी से देश बुरी तरह पीढ़ित है। पर चिकित्सा व्यवसाय, दवाई और अन्य सेवाओं मे जुड़े कुछ लोगो मानवता को शर्मसार कर रहे है। ओक्सीमीटर को  काला बाजारी मे 6-7 सौ की जगह 2-3 हज़ार मे बेचा जा रहा है।  इस बीमारी मे लगने वाले इंजेकशन रेमडिसिवीर की काला बाजारी ने सारी हदे पार कर दी। सेवा और मानवता को दरकिनार कर 3-4 हज़ार के इंजेकशन को 20-25 हज़ार मे बेचा गया। काला बाजारी को दरकिनार भी कर दे, पर इंसानियत के दुश्मन नकली इंजेकशन मे पानी भर कर मानव हत्या करने मे भी गुरेज नहीं कर रहे। इन नराधमों और  नरपिशाचों की निंदा, तिरिस्कार और लानत-मलामत  के लिये शब्द भी नहीं है। हदें तो तब पार हो गयी जब प्राइवेट और सरकारी अस्पतालों मे भर्ती मरीजों के मोबाइल, और पहने हुए गहने भी चोरी किये जाने की घटनायें सामने आई। कुछ सेवभावी चिकित्सकों को यदि छोड़ दे तो अधिकतर प्राइवेट हॉस्पिटल मरीजों से अनाप सनाप बिल बसूल कर करोना रूपी महामारी से उनकी मजबूरी का फायदा उठा रहे है और सरकारी अस्पतालों मे सेवा का अभाव और अमानवीय व्यवहार से लोग हताश और निराश है।  ये  अधम कीट-पतंगों रूपी नरभक्षी येन केन प्रकारेण पैसे कमाने मे अपनी हद से इतने नीचे गिर जायेंगे सहज विश्वास नहीं होता। एक दिन मे मालामाल होने की हवश मे इन्हे  निरीह दुःखी, पीढ़ित रोगियों की हत्या करने मे संकोच नहीं। क्या ये ही संस्कार, शिक्षा और चरित्र हमारी संस्कृति और सभ्यता ने हमे शिखाए?? दुःख और अफसोस इस बात का है इस मानवता को कलंकित करने वाले कृत मे नैतिकता के परे  सारे धर्म-संप्रदाय, प्रांत और भाषा के सभी व्यक्ति समान रूप से भागीदार है।   

अस्पतालों मे इस्तेमाल होने वाले हैंड ग्लब्स (दस्तानों) की रिपोर्ट आप सभी ने कुछ दिन पूर्व टीवी पर जरूर देखी होगी। कैसे समाज और देश के दुश्मनों ने हॉस्पिटल मे उपयोग मे आ चुके  हैंड ग्लब्स को कबाड़ मे से उठा कर धो और पोंछ  कर पुनः पैक कर बापस बाज़ारों मे सस्ते दाम पर बेचा जा रहा है।  ऐसे दस्ताने जिनमे कोरोना सहित अन्य बीमारी का संक्रामण हो, सिर्फ पैसे की लालच मे मरीजों की जान से खिलवाड़ कर पुनः बाज़ार मे बेचा जा रहा है। कहाँ मर गई इनकी मानवता और नैतिकता? एक पल के लिए भी इन्हे शर्म नहीं आई कि उपयोग मे आ चुके हैंड ग्लब्स से  संक्रामण फैल लोगो की जान भी जा सकती है पर दुर्भाग्य से, लक्ष्य यहाँ भी त्वरित पैसा कमा, कम समय मे करोड़पति बनने की चाह समाहित है।

ऑक्सीज़न सिलेंडर की कालाबाजारी, धोखा धड़ी किसी से छिपी नहीं है। मरीजों के परिजन दिन-दिन भर यहाँ वहाँ भटकने, लाइन मे खड़े होने के बावजूद एक अदद ऑक्सीजन सिलिंडर को तरस रहे ताकि अपने परिजनों की जान ऑक्सीजन रूपी प्राणवायु के अभाव मे न चली जाये। रक्त, रक्त-प्लासमा का लेन देन बगैर काली कमाई के संभव नहीं। कालाबाजारी मे सिलेंडर के दाम मे अनाप सनाप पैसों की बसूली गरीब, लाचार मरीजों के परिजनों से लूट खसूट और हराम की कमायी से कमाये गये पैसों से  घर मे मे  शरीफज़ादों की उपस्थिती शायद ही हो,   हाँ हरामज़ादों  की उत्पत्ति से कतई इंकार नहीं किया जा सकता।

संकट के समय हम नैतिकता, ईमानदारी और समर्पण से सेवा और व्यापार करने के विपरीत हमारे आचरण मे  कितनी  गिरावट आ गई की हम निर्लज्जता और वेशर्मी की सभी हदे पार कर गये। पिछले दिनों कोविड महामारी के आपातकाल स्थितियों मे मृतकों के सम्मान की लोकलाज, सामाजिक और धार्मिक परंपरा के निर्वहन मे शव को अर्पित किये जाने वाले शाल और साड़ी रूपी कफन को भी शमशान घाट से उठा कर धो और पोंछ कर, प्रेस आदि कर पुनः आकर्षक पैकिंग और ब्रांडेड कंपनी के लेबेल लगा कर बाज़ार मे बेचने से भी गुरेज नहीं करते। घोर अमानवीय और अनैतिकता के इस व्यापार  मे समाज के श्रेष्ठी वर्ग शामिल हो औने-पौने दामों मे बेच कर धनोपार्जन कर रहे है। कुछ टीवी चैनलों पर कफन के इस काला बाज़ार को दर्शाया गया। येन केन प्रकारेण धन अर्जन की इस कुत्सित करतूत के बाद अब समय आ गया है ऐसी प्रथा, रीतिरिवाज और परंपरा मे बदलाव पर  क्यों न गहन विचार करें??

क्या संकट, कष्ट और दुःख की इस घड़ी मे हम अपनी कुत्सित, अशुद्ध और अपवित्र ईक्षाओं को नियंत्रित नहीं कर सकते? क्या सेवा संस्कार और नैतिक संस्कारों को अपनी विचार, बुद्धि और मानसिक सोच मे प्रभावशील स्थान दे सेवाभाव से वाणिज्य और  व्यापार नहीं कर सकते? अवश्य हो सकता है, पर इसकी शुरुआत हमे खुद से ही करनी होगी। ऐसे समय मुझे गायत्री परिवार के परमपूज्य आचार्या श्री राम शर्मा की शिक्षा और सुंक्तियाँ याद आ रही है जिसके मूल मे दिये संदेश को देखे:-

·         "अपना अपना करो सुधार, तभी मिटेगा भ्रष्टाचार॥"

·         "हम सुधरेंगे, युग सुधरेगा।  हम बदलेंगे, युग बदलेगा॥"

·         "अपना सुधार संसार की सबसे बड़ी सेवा है।"

·         "दूसरों के साथ वह व्यवहार न करे जो हमे अपने लिये पसंद न हो॥"

·         "उन्हे मत सराहों जिनने अनीति पूर्वक सफलता पाई और संपत्ति कमाई॥"

·         "विपरीत परिस्थितियों मे भी जो ईमान, साहस और धैर्य को कायम रख सके वस्तुतः वही सच्चा शूरवीर है॥"

·         "जो बच्चो को सीखते है, उनपर बड़े खुद अमल करें, तो ये संसार स्वर्ग बन जाये॥"

समस्या गंभीर है, संकट गहन है, आपदा विकट  है आइये कठिनाई, विपत्ति और जोखिम की इस कठिन घड़ी मे संगठित हो कर चिंतन मनन करते हुए कोरोना रूपी इस महामारी से  मुक़ाबला करे।

विजय सहगल                     

शनिवार, 15 मई 2021

श्री सांवलियाँ सेठ मंदिर, चित्तौड़ गढ़ (राजस्थान)

 

"श्री सांवलियाँ सेठ मंदिर, चित्तौड़ गढ़"












दिनांक 5 मार्च 2021 को अंबाजी से आबू रोड होकर वाया उदयपुर हो दोपहर करीब 2 बजे चित्तौड़ गढ़ पहुँच कर कुछ समय आराम के पश्चात शाम चार बजे होटल से निकले ही थे कि सामने सड़क पर आते ऑटो को श्रीमती जी ने रोक लिया। उसने ऑटो वाले से साँवलिया सेठ मंदिर जाने आने की बात शुरू कर दी। मेरा इरादा बस से  साँवलिया सेठ मंदिर  जाने का था क्योंकि मैंने अपने एक दो घुम्मकड़ी मित्रो से जो चित्तौड़ गढ़ से तालुकात रखते थे से पता किया था। उन घुम्मकड़ी मित्रो की राय के अनुसार साँवलिया सेठ मंदिर, चित्तौड़ गढ़ से लगभग 45 किमी दूर ग्राम भदसोड़ा मे मुख्य हाईवे पर स्थित है। उदयपुर की सारी बसे साँवलिया सेठ मंदिर होकर ही जाती है। लेकिन कई बार स्थानीय लोगो विशेषकर परिवहन चालकों की राय घुम्मकड़ी साथियों से जुदा हो अच्छी हो जाती है। क्योंकि वहाँ एक नहीं दो नयनभिराम सुंदर साक्षात देवस्थान साँवलिया सेठ मंदिर है। राष्ट्रीय राजमार्ग के अलावा यहाँ 7-8 किमी॰ दूर मंडफिया ग्राम मे भी मुख्य विशाल साँवलिया सेठ मंदिर है।

ऑटो चालक कुछ अलग ही मिज़ाज और स्वभाव का था साँवलिया सेठ मंदिर जाने आने की बात हो ही रही थी बोला ये ऑटो कुछ दिन पहले ही नया लिया है, साँवलिया सेठ की ही गाड़ी है। वे ही मालिक है हम तो सेवक है। भाड़ा जो आपको देना हो दे देना। मैंने मंदिर के बारे मे जानकारी मांगी तो उसने कहा वहाँ दो साँवलिया सेठ मंदिर है। छोटा मंदिर मुख्य हाइवे 76  पर गाँव बागुंड-भदसोड़ा पर है और मुख्य मंदिर वहाँ से 7-8 किमी॰ अंदर ग्राम मण्ड्फ़िया मे है। तब हमे अपने मित्र की सलाह अनुसार बस से जाने आने के निर्णय न लेने और ऑटो द्वारा दोनों भगवान श्री कृष्ण स्वरूप साँवलिया मंदिर पर प्रसन्नता थी। क्योंकि सामान्य यात्री बस जाने मे पैसा तो बचता पर समय और शायद दूसरे  साँवलिया सेठ मंदिर मंडफिया  जाने से हम वंचित रह जाते। ऑटो चालक का नाम रवि तिवारी था बहुत ही व्यवहारकुशल और नम्र। दर्शनार्थियों और पर्यटकों से मित्रवत व्यवहार के कारण उस  कुशल नौजवान ने ज्यादा मोलभाव के विना साँवलिया सेठ मंदिर चलने पर तुरंत राजी हो गया। उसके इसी सद्व्यवहार के कारण दूसरे दिन हमने चित्तौड़ गढ़ भ्रमण हेतु उसके ऑटो से ही जाने का निश्चय कर लिया। आगे जाने वाले घुम्मकड़ी मित्रों की सुविधा हेतु रवि का मोबाइल आपके साथ सांझा कर रहा हूँ (मोबाइल नंबर 9166865014)  

उदयपुर राष्ट्रीय राज मार्ग छह लेन का बना हुआ था फिर भी  ऑटो चालक रवि  अपनी मध्यम गति से ऑटो को चलाते हुए चित्तौड़ गढ़ एवं साँवलिया सेठ मंदिर की जानकारी के साथ स्थानीय जानकारी भी दे रहा था। सड़क के दोनों ओर कुछ खेतो मे हाई मास्क रोशनी हो रही थी उसने बताया कि ये खेत अफीम की खेती की फसल उगा रहे है इसीलिए फसल की सुरक्षा व्यवस्था के विशेष इंतजाम है। लगभग एक घंटे मे राज मार्ग से लगे साँवलिया सेठ मंदिर, भदसोड़ा पहुंचे। विशाल आयताकार मंदिर अपने आधार से 12  फुट ऊंचे चबूतरे पर बनाया नवीन वास्तु निर्माण प्रतीत हो रहा था। मुख्य मंदिर मंडप के चारों ओर 15-17 फुट चौड़ा गलियारा बनाया गया था जिस पर राजस्थानी  संगमरमर के पत्थर लगाये गए थे। चारों गलियारे की छत्त के धरातल पर बहुत ही शानदार पेंटिंग की गई थी। पेंटिंग मे भगवान कृष्ण से संबन्धित लीलाओं का चित्रण किया गया था जिनको  शानदार रंग-बिरंगी  बेल-बूटों से बार्डर मे रेखांकित किया गया था।

भदसोड़ा साँवलिया मंदिर के मुख्य मंडप मे चारों ओर रंगीन काँच की शानदार नक्काशी की गई थी। विशाल आयताकार मंडप मे सैकड़ो  दर्शनार्थी एक बार मे बैठ मंदिर मे होने वाले तीज त्योहारों के साक्षी होते। मंदिर के मुख्य आकर्षक भगवान श्री कृष्ण के बाल रूप की मूर्ति लड्डू गोपाल की नयनभिराम, आकर्षक रूप मे विराजमान थे। सुंदर सिंहासन पर ग्वाल बाल और गायों के झुंड के साथ मोरपंखों मे शोभायमन लड्डू गोपाल के दर्शन अत्यंत मनमोहक थे। ऐसी किवदंती है कि इसी मंदिर प्रांगढ़ मे स्थित कुएं से 125 वर्ष पूर्व भगवान कृष्ण की तीन मूर्ति से निकली थी। इनमे से एक बाल रूप भगवान की मूर्ति इसी जगह (भादसोड़ा) दूसरी प्रतिमा की स्थापना  यहाँ से 7-8 किमी॰ दूर मंडफिया गाँव मे हुई है।

अब हमारा अगला पढ़ाव राष्ट्रीय राजमार्ग से परे 7-8 किमी॰ दूर  मंडफिया स्थित साँवलिया सेठ का मुख्य मंदिर के दर्शनार्थ जाना था। पक्की सड़क से होते हुए हम ऑटो मे सवार जिसके सारथी श्री रवि कुमार थे और जो लगातार भगवान साँवलिया सेठ के इस क्षेत्र की महिमा और यशोगान से अवगत करा रहे थे। रास्ते मे अनेक खेत और संस्थान जो साँवलिया सेठ के नाम से थे लोगो के दान पुण्य की महिमा का वखान कर रहे थे।

450 वर्ष पूर्व निर्मित साँवलिया सेठ मंदिर कल्पना के परे इतना विशाल मंदिर प्रांगढ़ होगा मुझे सहज विश्वास न हुआ। इतनी विशाल अधोसंरचना इस बात का साफ संकेत थी की मुख्य पर्व और त्योहार पर कितना वृहद जनसमुदाय यहाँ भगवान साँवलिया सेठ के  दर्शनार्थ पहुंचता होगा। ऐसी  किवदंती है कि ये वही गिरधर गोपाल की प्रतिमा है जिसको मेवाड़ राजघराने का परित्याग करने वाली कृष्ण की भक्ति मे लीन रहने वाली मीरा बाई पूजा करती थी। 

विशाल कलात्मक वास्तु और मेहरवों से सुसज्जित दरवाजो की संरचना मे सीढ़ियों चढ़ मंदिर की दहलीज़ को लांघ पवित्र और आराध्य मंदिर मे प्रवेश किया। विशाल प्रवेश मंडप के खुले प्रांगण के दूसरे सिरे पर वृहद मंदिर शिखर पर  सोने के पत्रों से जड़ित स्वर्ण कलश ढलते सूर्य की रोशनी मे दूर से चमक रहा था। राजस्थानी वास्तु से निर्मित दो मंजली   इमारत आकर्षण का केंद्र थी। दर्शनार्थियों खुले प्रांगढ़ से प्रवेश वर्जित होने के कारण दोनों ओर बने बरामदों मे  से बाएँ गलियारे से होकर मुख्य मंदिर मे दर्शनार्थ प्रवेश की व्यवस्था थी।

लंबे चौड़े गलियारे से होकर मंदिर के विशाल मंडप मे प्रवेश कर भगवान साँवलिया के बालरूप के दर्शन किये। सिर पर मोरमुकुट एवं स्वर्णभूषणों एवं मोतियों की माला से सुसज्जित सिंहासन पर विराजमान भगवान कृष्ण की साँवलिया स्वरूप के एकटक  दर्शन लाभ  कर अपने को कृतिकृत, धन्यभागी होने का गौरव प्राप्त किया। मुख्य मंडप के नवद्वारों को स्वर्ण रंग से सुंदर ढंग से पेंट कर  सजाया गया था। संगमरमर के कलात्मक मेहराबों ने मंडप की सुंदरता मे चार चाँद लगा दिये थे। चरणामृत एवं प्रसाद ग्रहण कर दायें तरफ के गलियारे से हमारे सहित सारे दर्शनार्थी बापस हुए। बापसी मे दायें गलियारे मे चाँदी से जड़ित रथ के दर्शन किये जिसका उपयोग भगवान   रथयात्रा के समय किया जाता है।                             

चित्तौड़ गढ़ और आसपास के क्षेत्रों मे ऐसी मान्यता है कि कि भगवान साँवलिया को अपने खेती, उद्धयोग, व्यवसाय मे सांझीदार बना, भक्तगण साल दर साल  व्यवसायिक लाभ का एक हिस्सा मंदिर को समर्पित करते है।  इसलिये भगवान साँवलिया, सेठ कहे जाते है। हों भी क्यों न जब लाखों करोड़ो व्यवसाय मे सांझीदार को सेठ नहीं कहेंगे तो क्या कहा जाये!! हर माह 8-9 लाख भक्त साँवलिया सेठ मंदिर के दर्शनार्थ पहुँचते है। पूरे चित्तौड़ गढ़ सहित मेवाड़ क्षेत्र मे हर बड़े कॉलेज, हॉस्पिटल, संस्थान का नाम भगवान श्री साँवलिया के नाम पर ही है। भगवान कृष्ण के दोनों  साँवलिया स्वरूप बालरूप के दर्शन और दर्शनार्थियों की साँवलिया सेठ के प्रति श्रद्धा एवं समर्पण साँवलिया सेठ की महिमा अपरमपार जो बनाती है।  

श्री कृष्ण भगवान के साँवलिया स्वरूप की जय!!

विजय सहगल

मंगलवार, 11 मई 2021

बैंक कर्मियों का वेतन समझौता या धोखा??

"बैंक कर्मियों का वेतन समझौता या धोखा??" 


मेरे ब्लॉगर साथियों आज मै अपने हजारों बैंक कर्मी साथियों का दर्द आपके साथ सांझा करना चाहता हूँ जो वेतन समझौते के लंबे संघर्ष के बाद उम्मीद लगाये बैठे थे कि उनकी पेंशन मे भारी नहीं तो हल्की ही  सही, कुछ वृद्धि तो होगी। पर हा!! दुःख और संताप यूनियन के नेतागणों ने इतनी सफाई और चालाकी से भारतीय बैंक संघ से समझौता किया कि वर्तमान पदस्थ बैंक स्टाफ की तो वेतन मे वृद्धि हो गई पर सेवा निवृत्त बैंक अधिकारियों और कर्मचारियों की तुरंत प्रभाव से पेंशन मे पदानुसार चार हजार से 6 हजार तक कमी हो गई।  ब्लॉग के साथ मैंने अपनी बैंक पेंशन खाते की माह मार्च एवं अप्रैल 2021 की पेंशन प्रविष्टि  त्वरित संदर्भ हेतु संलग्न कर रहा हूँ।      

दुनियाँ का शायद ये पहला अजूबा होगा जब वेतन नवीनीकरण और वेतन वृद्धि मे लोग एक दूसरे को बधाई दे रहे थे, मिठाई बाँट रहे थे उल्लास और प्रसन्नता से खुश थे कि बैंक अधिकारियों और कर्मचारियों की वेतन मे बड़े संघर्ष और हड़तालों के बाद वेतन मे वृद्धि हुई है। हम जैसे हजारों अधिकारी और कर्मचारियों  ने इस संघर्ष मे बराबरी से वेतन वृद्धि के संघर्ष मे धरना-प्रदर्शनों मे भाग लिया और हा!! दुःख, संताप और वेदना कि इस वेतन समझौते से हमारी पेंशन मे माह अप्रैल 2021 से लगभग चार हज़ार रुपए की कमी हो गई। न केवल कमी हुई बल्कि सेवानिवृत्ति के अगले माह मई  2018  से प्रति माह वेतन समझौते के पालन मे 3500 से 4000 रुपए प्रति माह बैंक को बापस भी करने पड़े। दुनियाँ के इतिहास मे शायद ये इकलौता सम्झौता होगा जब समझौते के अंतर्गत लगभग विभिन्न पदानुसार 4000 से 6000 या इससे अधिक   रुपए प्रति माह का नुकसान अधिकारियों और कर्मचारियों उठाना पड़ रहा है। वैसे भी व्याज दरों मे कमी के चलते व्याज से होने वाली आय मे कमी झेल रहे बैंक कर्मी पेंशन की इस कमी से अधमरे हो जायेंगे।   भला ऐसा भी कभी कोई वेतन समझौता देश सहित दुनियाँ मे सुना या देखा गया  जब वेतन मे बढ़ौती के बजाय कमी हुई हो??  

इस वेतन समझौते के लिये हम जैसे हजारों बैंक अधिकारी और कर्मचारी साथियों ने कंधे से कंधे मिला कर लड़ाई लड़ी थी। इन आंदोलनों के धरना प्रदर्शन एवं  हड़ताल मे भी  शामिल हो अपना वेतन भी कटाया था फिर भी इस लड़ाई का ये सिला मिला की सेवानिवृत्ति के पश्चात पेंशन मे कटौती झेलनी पड़ी!! जिन यूनियन लीडर को अपना भाग्य विधाता मान अपने भाग्य के निर्णय का भार इन नेताओं को  सौंपा था कि वे हमारे भाग्य का निर्णय हमारे पक्ष मे करेंगे। पक्ष तो दूर ऐसा कुठाराघात, धोखा, छल, कपट ये तथाकथित नेता रूपी  भाग्य विधाता करेंगे कि वेतन/पेंशन मे बढ़ौती की जगह कटौती होगी? इन नेताओं के चरित्र का दर्द निम्न पंक्तियों मे व्याँ करूंगा:- 

"जिन्हे हम हार समझे थे, गला अपना सजाने को।"
"वही अब नाग बन बैठे, गले मे काट खाने को॥"

भला श्रमिकों के साथ ऐसा भी अन्याय दुनियाँ मे कभी हुआ है  या देखा गया कि वेतन समझौते मे मिलने वाली धनराशि मे कटौती होगी? पहले लोग यूनियन लीडर के बारे मे कहा करते थे कि ये नेतागण अपने निजी आर्थिक लाभ के लिये बैंक कर्मियों के हितों से समझौता कर लेते है पर कभी विश्वास नहीं हुआ लेकिन आज कहते हुए दुःख और संताप के साथ कोई संकोंच नहीं कि ऐसी कौन सी मजबूरीयां थी कि "विशेष वेतन"  नाम के भत्ते को समझौते मे शामिल किया गया जो पेंशन के आंकलन मे इस भत्ते को शामिल नहीं किया? जिसके कारण पेंशन धरियों की पेंशन चार हज़ार से अधिक लगभग कम हो गई। समझौते मे शामिल भारतीय बैंक के छल-प्रपंच तो समझ आता है क्योंकि वे प्रबंधन के अंग थे पर नौ कर्मचारी अधिकारियों की ऐसी क्या मजबूरी थी कि वे इस चालबाज़ी और पाखंड मे शामिल हो गये? ये नेतागण  तो बैंक कर्मियों/अधिकारियों के हितैषी थे?? इन संगठनों के नेताओं के कर्मचारी और अधिकारियों के हितों को नज़रअंदाज़ करने के इस धोखेबाज़ी पूर्ण  चाल चरित्र और फरेब पर अब क्यों न शक किया जाये? हम ये क्यों न मान कर चले कि बैंक के पेंशन धारी अधिकारियों/कर्मचारियों के विरुद्ध इस षड्यंत्र मे इन यूनियन लीडर की भागीदारी है? जिस बाढ़ को ज़िम्मेदारी दी गई थी कि वो खेतों की रक्षा करेगी और वही बाढ़ खेत को खा गई इस से बड़ा कुठराघात और धोखेबाज़ी हो नहीं सकती। हम बैंक कर्मियों के साथ कुछ वैसा ही धोखा हुआ है जैसे कोई एक मासूम, भोला बच्चा जो एक दुकान से हर रोज चॉकलेट लेता था अचानक एक दिन चॉकलेट खरीदने पर दुकानदार ने पैसे अपने पास रख कर यह कहते हुए चॉकलेट देने से माना कर दिया कि पिछले दिनों तुमने चॉकलेट की कीमत कम दी थी? ये पैसे उसी कीमत मे समायोजित कर दिये है!!  कुछ ऐसा ही कपट, प्रवंचना एवं धूर्त चालबाजी हम सेवा निवृत्त बैंक स्टाफ के साथ की गई।    

क्या कोई मानवाधिकार संगठन, दृश्य एवं प्रिंट मीडिया, श्रमिक कल्याण संगठन, स्वयंसेवी संस्थायें  बैंक कर्मियों के विरुद्ध इस ज्यादती और अन्याय के संघर्ष हेतु आगे आएंगे? क्या देश की अदालते इस छद्म वेतन समझौते जिसमे पेंशन बढ्ने के विपरीत कम हो रही  हो स्वतः संज्ञान (suo moto) ले सरकार/भारतीय बैंक संघ एवं अधिकारी कर्मचारी संगठनों से इस वेतन समझौते मे सफाई मांगेंगी?

अगर ऐसा नहीं होता है तो ये ऐसा दुनियाँ का पहला काला  "वेतन समझौता" होगा जो समझौते के नाम पर कलंक होगा जिसमे बैंक कर्मियों की पेंशन कम हो रही होगी। कभी कोई संगठन खराब और श्रम विरोधी नहीं होते, पर  धिक्कार है उन सांगठानिक नेताओं पर जिन्होने न केवल श्रमिकों के साथ धोखा किया अपितु संगठन की रीतियों, नीतियों के विरुद्ध भी  कपट, धूर्तता और पाखंड का छल-प्रपंच किया।

किसी शायर ने ठीक ही  कहा है :-

"मुझे अपनों ने मारा, गैरों मे कहाँ दम था।"
"मेरी कश्ती वहाँ डूबी जहां पानी बहुत कम था!!!"

आइये सभी सेवानिवृत्त बैंक अधिकारी/कर्मचारी इस अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाएँ एवं दोषी संगठन के नेताओं की निंदा और भर्त्स्ना कर अपनी आवाज बुलंद करें!!

विजय सहगल