गुरुवार, 31 दिसंबर 2020

रानीमहल, झाँसी

 

"रानीमहल, झाँसी'











प्रातः स्मरणीय देश की गौरव झाँसी की महारानी लक्ष्मी बाई के रानी महल पर वर्ष 2021 के नवागमन पर हमारी ये पोस्ट सुधि पाठकों को समर्पित करते हुए हर्ष है। सभी स्नेहिजनों, परिजनों, स्वजनों को नव वर्ष की मंगल कामनाओं के साथ। 

कभी कभी छोटी सी यात्रा को पूरा करने मे इतना लंबा वक्त लग जाता है जिसकी कल्पना मुश्किल है। लेकिन प्रायः ऐसा ही होता है, जब आगरा के लोग ताजमहल न गए हों या पुरी के लोग जगन्नाथ मंदिर न गये हों। अब मुझे ही देंखे मै भी झाँसी मे पला बढ़ा हूँ, पूरा बचपन इसी शहर मे बीता, शिक्षा-दीक्षा भी इसी शहर मे हुई। हजारों बार इस जगह से निकला हूंगा पर झाँसी की रानी लक्ष्मी बाई के महल मे आज  29 दिसम्बर 2020 मे 62 साल के उम्र के बाद जा सका। प्राइमरी स्कूल से स्नातक की शिक्षा के दौरान हर दिन ही लगभग यहाँ से निकालना होता था। दरअसल एक बार नॉर्मल स्कूल के समय बचपन मे स्कूल से आते समय महल मे जाने का प्रयास किया था तो दरबान ने यूं ही हम बच्चों को डांट-डपट  कर भगा दिया था। तब से यूं ही समय बीतता रहा और मैं रानी महल के अंदर न जा सका। शायद आज भी दर्शन लाभ से मै  वंचित रह जाता यदि मै टिकिट वितरण बाबू श्री पांडे जी का इंतज़ार 25-30 मिनिट न करता क्योंकि वे खाना खा रहे थे।  पूंछ-तांछ पर मालूम हुआ मुश्किल से 2-3 तीन पर्यटक ही महल को देखने आते होंगे। मैंने गार्ड को कहा भी कि भाई टिकिट की राशि 25/- मै आपको दे देता हूँ और बाबू के आने तक मै कुछ दीर्घाएँ घूम लेता हूँ!! पर पर्यटक को छोड़ सभी अपने अपने कानूनी दायित्व को पूरी मुस्तैदी से सर्दी की धूप मे सेंक कर पालन कर रहे थे। ऐसी कर्तव्य परायण सेवा भावी  कर्मचारियों  को हमारा हार्दिक नमन।

पीले रंग से पुती दो मंज़िला रानी महल का निर्माण 1769-1796 के दरमियान श्री रघुनाथ राव द्वारा कराया गया था जो झाँसी के अंतिम शासक राजा गंगाधर राव के पूर्वज थे। कालांतर मे इस महल को झाँसी की रानी लक्ष्मी बाई के आवास हेतु उपयोग किया जाने लगा और तब से इसे रानी महल के नाम से जाना जाता है। मैंने अपने ब्लॉग मुरली मनोहर मंदिर (https://sahgalvk.blogspot.com/2020/11/blog-post.html) मे झाँसी की रानी लक्ष्मी बाई का नित्य मुरली मनोहर मंदिर मे भगवान श्रीकृष्ण के दर्शन का उल्लेख किया था जो इस महल से बमुश्किल एक किमी से भी कम दूरी पर है। विशाल आयताकार महल के मध्य स्थित प्रवेश द्वार इसके आकर्षण को भव्यता प्रदान करता है। प्रवेश द्वार के बाए दोनों ही मंजिलों पर आदमक़द  दस दरवाजे, मुख्य प्रवेश द्वार के उपर तीन एवं दाहिनी ओर छह दरवाजे इस बात को इंगित करते है कि तत्कालीन शासकों का धूप हवा, पानी रूपी प्रकृति से जितना प्रेम था उतना ही आदर सम्मान वे अपनी प्रजा के प्रति भी रखते थे अन्यथा राजे राजमहल प्रायः बड़ी बड़ी चारदीवारों के अंदर छुपा कर निर्मित किये जाते देखे गये है।

प्रायः हर खिड़की दरवाजे के उपर सफ़ेद धरातल पर गेरुआ रंग के अधर्वृत्ता आकृति मे मोर, मोरपंख, बतख, पुष्पों एवं गुलदश्तों की सुंदर आकृति आपको सारे महल मे देखने को मिलेंगी। महल के मुख्य दरवाजे से प्रवेश करते ही एक बहुत बड़ा आँगन दिखाई देता है शायद उन दिनों भी पेड़, पौधों एवं पुष्प लताएँ उन दिनों भी दिखाई देती होंगी। आँगन के चारों ओर गलियारा/वरांडा एवं गलियारे के बाद अग्र भाग मे दोनों ही मंजिलों पर बड़े हाल है  एवं अन्य भाग मे छोटे बड़े कमरे दर कमरे है जिनका  आसार एक मीटर  से अधिक मोटी दीवारों से निर्मित है। महल के भू तल के हर कमरे और हाल मे पूर्व शासकों के काल मे जहां दरबारियों के विचार विमर्श के स्थान रहे होंगे वहाँ पर आज उन कक्षों मे झाँसी, ललितपुर, बरुआ सागर जिले मे उत्खनन से प्राप्त हुई प्राचीन मूर्तियों को सँजोया गया है।

जहां खुले आँगन के मध्य मे एक कुआँ महल की पानी की आवश्यकताओं की पूर्ति करता था वही आँगन मे दो भव्य लगभग चार फुट ऊंचे फब्बारे विध्यमान है जो दो-ढाई फुट ऊंचे जल आयताकार सरोवर के मध्य स्थित है। निश्चित ही फब्बारे जो आज मौन है पर अपने वैभव काल मे महल की भव्यता मे चार चाँद लगाते होंगे। पूरे आँगन के किनारे पर  आयताकार पथ जो महल के किसी भी भाग मे पहुँचने को आकर्षक एवं सुगम बनाता है वही आयताकार पथ को चार भागों मे विभाजित करने वाला मध्य  पथ भी आँगन को और आकर्षण प्रदान करता है।

महल का मुख्य आकर्षण प्रथम तल पर स्थिति मुख्य दरबार हाल एवं महारानी लक्ष्मी बाई का अन्तः कक्ष है जो विभिन रंगों से सजाई गई आकर्षक तत्कालीन पेंटिंग का जीता जाता उदाहरण है। अन्तः कक्ष के बाहर तीन मेहराब वाला वरांडा जिनको  सुंदर आकर्षक ज्योमिति लिए पत्थरों की नक्काशी किये  पाँच स्थम्भों पर आधारित है। इस हाल, वरांडा एवं अन्तः कक्ष की चारों दीवारों और छत्त पर सुंदर रंग विरंगी नक्काशी, लाल, हरी भित्ति चित्र महल को  आकर्षक  भव्य रूप प्रदान करते है। लकड़ी के सहतीरों पर  टिकी  छत पर भी आकर्षक पेंटिंग की गई है।   कक्ष के दोनों ओर रोमन अंकों की पेंडुलम वाली घड़ी की पेंटिंग उस समय के राजा महाराजाओं को  घड़ी के प्रति आकर्षण को दर्शाती है, साथ ही घड़ी की पेटिंग के उपर दोनों ओर वीर हनुमान राक्षसों के बध को दर्शाती आकर्षक पेंटिंग तत्कालीन कला और वास्तुकला के दर्शाती है।  एक ओर महल के स्थिति, बनावट, आदि से ये अंदाज लगाना सुगम है कि राजा गंगाधर राव और महारानी लक्ष्मी बाई  का राज्य अन्य राजाओं और रियासतों के मुक़ाबले  आर्थिक रूप से धनाढ्यता, वैभवता संपन्नता के उच्च  मानदंडों भले ही न लिये हो पर अपने राष्ट्र प्रेम, अंग्रेजी शासन के  विरुद्ध, विद्रोह रूपी विचारों मे एवं स्वाधीनता के संग्राम मे अपना सर्वस्व आहूत करने के संदेश मे देश के राजे रजबाडों मे सर्वोच शिखर पर था। वीरांगना महारानी लक्ष्मी बाई की कर्म स्थली मे हर जगह एवं  रानीमहल के कण कण मे महारानी के त्याग, बलिदान, 1857 मे देश मे स्वनधीनता की अलख जगाने मे अपने जीवन का  बलिदान आज भी इतिहास मे स्वर्णिम अक्षरों से उल्लेखित है। इस इतिहासिक महल मेरे लिये किसी मंदिर से कम न था। महल  की पवित्र रज का तिलक धारण करना मेरे लिये सौभाग्य प्रदान करने वाला था। मै महारानी झाँसी लक्ष्मी बाई को नमन करता हूँ, शत शत नमन करता हूँ। 

विजय सहगल, झाँसी            


मंगलवार, 29 दिसंबर 2020

चाटुकारिता

 "चाटुकारिता"






देश के हर क्षेत्र और हर विभाग मे एक प्रजाति आपको समान रूप से व्याप्त दिखेगी जिसे चापलूस कहते है। चाटुकारिता मे पारंगत ये प्रजाति अपने गुणों और व्यवहार के अनुरूप अपने बॉस या यूं कहे आकाओं से अनेक लाभ पाकर गौरान्वित महसूस करती है जबकि इस "चापलूसी" कला से वंचित लोग प्रायः अपने बॉस की छोटी छोटी बातों मे भी कोप का भाजन बनते है।
उक्त प्रजाति की एक विशेषता ये रहती कि वे प्रायः विभाग प्रमुख अर्थात बॉस के निकटष्थ और मुंह लगे रहते। ऐसी बात नहीं कि ये प्रजाति बैंक मे ही रही हो हर देश काल मे इनका वर्चस्व रहा है। इनकी एक विशेषता ये रहती है कि ये एक दूसरे की पीठ खुजाते हुए एक दूसरे की प्रशंसा करने मे कभी कंजूसी नहीं वर्तते। मुक्त कंठ से झूठी प्रशंसा इनके सद्गुणों मे एक मात्र विशेषता होती है। बचपन मे एक बुंदेलखंडी कहावत सुनी थी कि :-
"जी के राज मे रईये, ऊकी ऊसे कहिये"।
"ऊंट बिल्लाईया ले गई, सो हाँजू-हाँजू कईये"!!
अर्थात जिस बॉस के राज मे रह रहे है उसकी हाँ हाँ मे मिलाईये, यदि बॉस कहता है कि ऊंट को बिल्ली उठा के ले गई तो उसकी हाँ मे हाँ मिलाओ अर्थात एक चापलूस की ये मात्र एक श्रेष्ठ आहर्ता/योग्यता है, ठीक उसी तर्ज़ पर जैसे एक फिल्मी गाना आप सभी ने भी सुना होगा जिसे मैंने बॉस के संदर्भ मे लिया है -:
जो तुमको हो पसंद वही बात कहेंगे।
तुम दिन को अगर रात कहो, रात कहेंगे॥ जो तुमको हो..........................
दरअसल मेरी उन दिनों पदस्थपना सहायक महा प्रबन्धक के अधीन नियंत्रण एवं निरीक्षण कार्यालय मे थी। हमारे कार्यालय से लगा हुआ ही प्रादेशिक प्रबन्धक का कार्यालय भी एक ही छत्त के नीचे था,यहाँ तक कि बाहर जाने का रास्ता भी प्रादेशिक कार्यालय से होकर जाता था। शुरुआत मे आपस मे दोनों कार्यालयों का अच्छा ताल-मेल,मेल जोल था। बैंक के कुछ स्वतंत्र आवास भी एक अच्छी कॉलोनी मे थे जहां दोनों ही कार्यालयों के अधिकारी आस-पास ही निवासरत थे। एक बार निरक्षालय प्रमुख के आवास पर कुछ काम को प्रादेशिक प्रमुख द्वारा नियम विरुद्ध होने से स्वीकृति न मिलने के कारण निरीक्षालय प्रमुख कुछ नाराज रहने लगे,जिसके कारण निरीक्षालय प्रमुख मौका-बेमौका अपने कार्यालय की श्रेष्ठता एवं प्रादेशिक कार्यालय को दीन हीन जताने मे कहीं कोई कसर नहीं छोड़ते। हद तो तब हो गई जब उनके आवास पर अतिरिक्त पानी की टंकी/टैंक न रखवाने के कारण निरीक्षालय प्रमुख के इशारे पर छोटी छोटी बातों मे शाखा के निरीक्षण के दौरान स्पेशल रिपोर्ट (जिसका संज्ञान सीधा प्रधान कार्यालय लेता है) बनाई जाने लगी। जो कि कतई उचित नहीं था। निरीक्षणालय के कुछ चापलूस प्रकृति के स्टाफ अपने स्वभाववश अपने बॉस की हाँ मे हाँ मिला आग मे घी डालने से भी नहीं चूके। चूंकि मेरा काफी समय प्रादेशिक कार्यालय एवं उसके अधीन शाखा कार्यालयों मे बीता एवं संगठन से जुड़ा रहने के कारण भी निरीक्षणालय प्रमुख मुझ से कुछ पूर्वाग्रह रखते थे लेकिन खुल कर कहने हमेशा बचते रहे,जिसकी मैंने कभी परवाह नहीं की। क्योंकि वे अच्छी तरह जानते थे कि मै उनके इशारों पर चलने वाला व्यक्ति नहीं हूँ। मै बगैर किसी के प्रति आग्रह,पूर्वाग्रह या दुराग्रह का भाव लिये अनासक्त भाव से अपना कार्य संपादित करता था। खेद का विषय है उक्त निरीक्षालय प्रमुख के रहते प्रादेशिक कार्यालय एवं निरीक्षालय स्टाफ के बीच उन दिनों आपसी सबंध नैतिक गरिमा के निम्नतम स्तर पर थे। निरीक्षणालय एवं प्रादेशिक कार्यालय मे व्यवहार दो दुश्मन देशों के बीच "शीत युद्ध" की स्थिति जैसा था। आपसी अविश्वास और मन भेद की पराकाष्ठा तब हो गई जब बैंक अधिकारियों के लिये निर्मित मकानों के परिसर मे एक अति वरिष्ठ स्टाफ की धर्मपत्नी के आकस्मिक निधन पर भी कुछ लोग अन्त्येष्टि/परवारिक दुःख मे शामिल न हुए?कदाचित ही ऐसी स्थिति मैंने ज़िंदगी मे कभी कहीं देखी हो!!
एक दिन मेरे निरीक्षणालय विभाग प्रमुख किसी विभागीय कार्य हेतु मुख्यालय से बाहर थे। हम, दो-तीन स्टाफ ही कार्यालय मे थे। चूंकि प्रादेशिक कार्यालय भी हमारे कार्यालय से लगा हुआ था। प्रादेशिक प्रबन्धक ने किसी कार्यक्रम के आयोजन मे शामिल होने के लिये हमारे कार्यालय के स्टाफ को भी आमंत्रित किया जैसा कि प्रायः होता रहता था। सौजन्यतावश मै अपने स्टाफ के साथ कार्यक्रम मे शामिल होने चला गया शायद किसी अधिकारी के जन्मदिन का कार्यक्रम था। बमुश्किल दस मिनिट का कार्यक्रम रहा होगा। जैसा कि प्रायः होता है लंच या ऐसे किसी कार्यक्रम मे जाने पर हम लोग कार्यालय मे सब स्टाफ को इस निर्देश के साथ अवशय छोड़ जाते है कि स्टाफ कि अनुपस्थिति मे कार्यालय मे आने वाले सभी फोन कॉल को सुने एवं फोन करने वाले का नाम,संदेश आदि भी नोट करले ताकि बाद मे संबन्धित स्टाफ को अवगत कराये ताकि प्रस्तुत विषय को हल किया जा सके। इसी दौरान हमारे निरीक्षालय प्रमुख का लेंड लाइन पर फोन कार्यालय मे आया जिसे वहाँ उपस्थित सब स्टाफ ने उठा स्टाफ के प्रादेशिक कार्यालय के कार्यक्रम मे शामिल होने की सूचना उनको दी एवं स्टाफ के आते ही बात कराने की सूचना से भी अवगत करा दिया।
सब स्टाफ की सूचना पर मैंने आते ही अपने निरीक्षालय प्रमुख से बात की। मेरे सहित किसी स्टाफ को कार्यालय मे न होने पर पर उन्होने अपनी नाराजी जाहिर की। मैंने जब प्रादेशिक प्रबन्धक के कार्यक्रम मे शामिल होने के संदेश को बताया पर वे अपनी यही बात कहते रहे कि आप किसी को कार्यालय मे रहना चाहिये था। जब मैंने उन्हे दूरभाष पर पूर्व मे भी उन सहित सारे स्टाफ को इस तरह के कार्यक्रम मे शामिल होते रहने के दृष्टांत दिये पर उनको मै संतुष्ट न कर सका। दूसरे दिन कार्यालय मे आते ही उन्होने सुबह सुबह पुनः मेरे सहित शेष स्टाफ को अपनी कैबिन मे बुला कार्यालय के शिष्टाचार,नियम, प्रधान कार्यालय के अधिकारी के फोन आदि के अनेक उदाहरण कह सुनाये। सब स्टाफ के द्वारा फोन पर उच्च अधिकारी से बात को अति गंभीर कृत करार दिया। लगभग एक-डेढ़ घंटे तक इस संबंध मे उपदेश आदि देते रहे। तब मेरे से न रहा गया। मैंने शालीनता पूर्वक लेकिन द्र्ढ़्ता से उनको कहा कि श्रीमान,एक उपमहाप्रबंधक के आग्रह पर हम लोग उनके कार्यक्रम मे गए थे। क्या उनके आदेश की अवाज्ञा करना शिष्टाचार और नैतिकता विरुद्ध न होता??मेरी तो छोड़िए क्या आप भी उनके आमंत्रण को इस तरह अशिष्टता पूर्वक मना कर सकते थे?आप का फोन आया भी था तो तुरंत ही विषय विशेष मे हमने आपको फोन कर सारी स्थिति से अवगत भी कराया था। एक डीजीएम के द्वारा आयोजित कार्यक्रम मे शामिल होने से ऐसा कौन सा अपराध हो गया या पहाड़ टूट गया?फिर भी यदि आप नहीं चाहते है तो भविष्य मे आपकी अनुमति के बिना अब प्रादेशिक कार्यालय के किसी कार्यक्रम मे शामिल नहीं होंगे। एक छोटी सी बात का इतना बढ़ाना,बतंगढ़ बनाना, शिष्टाचार के विरुद्ध बताना कदापि उचित नहीं है?मैंने बोलना जारी रख नम्रता पूर्वक एजीएम साहब से पूंछा, कार्यालय मे शराब पीकर आना किस शिष्टाचार के अंतर्गत आता है??मेरे प्रत्युत्तर पर वे चौंके!! उन्होने पूंछा कौन स्टाफ शराब पीकर कार्यालय मे आता है? जब मैंने उनके कृपा पात्र स्टाफ का नाम बताया जो पूर्व मे भी शराब पीकर ऑफिस के नियमों पर कुठराघात करता रहा था लेकिन बॉस के खास होने का फायदा उठा ऑफिस के कभी किसी अनुशासन एवं शिष्टाचार का पालन नहीं किया। एक अनुशासन हीन अधिकारी शिष्टाचार के विरुद्ध कार्यालय मे शराब पीकर आ सकता है, लेकिन एक डीजीएम के कार्यक्रम मे हम शिष्टाचार और सौजन्यतावश शामिल नहीं हो सकते?ये कहाँ का न्याय है? तब तो उनकी हालत देखने लायक थी। उक्त अधिकारी जो उनके बहुत मुंह लगा था उन्होने उस चापलूस स्टाफ को कैबिन मे बुला क्रोध से पूंछा?कि तुम कल कार्यालय मे शराब पी कर आए थे?उक्त स्टाफ क्षमाप्रार्थी की मुद्रा मे उनके सामने खड़ा था। मैंने पुनः कहा कल की बात छोड़िए इनसे अभी इसी वक्त पूंछिये कि वे अभी यहाँ शराब पिये खड़े है या नहीं?अब तो दोनों की स्थिति बड़ी असहज थी क्योंकि वो चापलूस सेवादार स्टाफ अभी भी शराब पीकर उनके सामने खड़ा था। सोर्री बोलते हुए उसने क्षमा मांगी। लेकिन ऐसे अनेकों चापलूस स्टाफ जो लोगो की जानकारी के बावजूद बेनकाब होने से रह जाते है। लेकिन वही ढांक के तीन पात, कहीं कुछ नहीं बदला और ढर्रा यूं ही चलता रहा। इस तरह इस चापलूस प्रजाति ने भी बैंक के अधोपतन मे नकाबले तारीफ भूमिका अदा की है।

विजय सहगल

गुरुवार, 24 दिसंबर 2020

उन्नाव बालाजी

"उन्नाव बालाजी"








27 ओक्टूबर 2020 को अपने गृह नगर झाँसी से यूं तो प्रायः करारी, दतिया वाया डबरा होकर ग्वालियर जाना होता पर इस बार सोचा क्यों न उन्नाव बालाजी मंदिर  मे सूर्य भगवान के दर्शन कर दतिया होकर शेष उसी मार्ग का अनुसरण कर ग्वालियर पहुंचू। कानपुर वायपास से ग्वालियर मार्ग के पूर्व मैने कार की दिशा उन्नाव बालाजी मार्ग पर मोड़ दी। लगभग एक दशक बाद आज पुनः इस मार्ग पर यात्रा कर रहा था। सुखद अनुभव हुआ। रोड अच्छी थी। जिस रास्ते पहले कभी निकलना टूटी फूटी सड़क से संघर्ष कर यात्रा करना था, आज पक्की सड़क के दोनों ओर ग्रामीण क्षेत्रों का विकास देख सुख की अनुभूति हो रही थी। बचपन मे प्रायः उन्नाव बालाजी शहर से  न जाकर मंदिर के नीचे बह रही पहूज नदी के दूसरी ओर रेत के मैदानों मे साइकल,  बैल गाड़ी और कभी कभी तांगा से जाना हुआ था। विशेष तौर पर संक्राति वाले दिन 14 जनवरी को। गज़ब की भीड़ होती थी। नदी के रेत के मैदान मे मीलों दूर तक बैल गाड़ियों बैलों  या तांगे से घोड़े को ढील दे आराम के लिए छोड़ दिया जाता। रेत के मैदानों मे घोड़ो को रेत मे लोट लगते देखना सुखद लगता था। ग्रामीण महिलाएं सिर पर टोकरी कर अमरूद बेचा करती थी। मंदिर मे सूर्य देव को अर्घ समर्पिण  के लिए लोटा भर जल एवं हरे पत्तों के बीच मे दो चार गेंदें के फूल गुत्थी  माला जगह जगह बेची जाती थे। किले नुमा गढ़ी मे नदी के पाट से मंदिर का दृश्य बहुत ही सुहावना नज़र आता। नदी से लोटे मे जल लेकर  मंदिर के मुख्य प्रवेश द्वार होकर ऊंची ऊंची सीढ़ियों से चढ़ कर जाना सुखद अनुभव देता। ऐसी मन्यता है कि त्वचा रोग से संबन्धित बीमारियों मे नदी के स्नान पश्चात मंदिर मे सूर्य देवता को जलार्पण से रोग ठीक होते है। एक और मन्यता के अंतर्गत बच्चों का मुंडन संस्कार भी मंदिर के प्रांगण  मे किया जाता। उक्त मान्यताओं मे निष्ठा और विश्वास आज भी मंदिर परिसर  मे देखा जा सकता है। मेरे परिवार मे भी छोटे बच्चों का मुंडन संस्कार उन्नाव बालाजी मंदिर मे ही होता है।

मंदिर का खुला एवं अत्यधिक बड़े प्रांगण मे दर्शनार्थियों का दर्शन के पूर्व एवं पश्चात किये जाने वाले धार्मिक रिवाजों को बड़े ही श्रद्धा एवं भक्ति भावना से लोग वहाँ के पुरोहितों के माध्यम से सम्पन्न कराये जा रहे थे। मेले के से दृश्य का अवलोकन बड़ा ही मनोहारी प्रतीत होता। आज भी मंदिर मे जल अर्पण करते समय  मंदिर के दर्शन लाभ लेते समय बचपन के दृश्य चल चित्र की तरह मन मस्तिष्क पर पुनः उभर आए। 

मेरे गृह नगर झाँसी से उत्तर दिशा मे 16-18 किमी पर ये उन्नाव बालाजी स्थित था जो मध्यप्रदेश मे स्थित है जबकि दक्षिण मे इतने ही किमी दूर ओरछा स्थित है। मध्यप्रदेश मे स्थित दोनों ही स्थल ओरछा भी उन्नाव बालाजी की तरह  बुंदेलखंड का एक प्रसिद्ध धार्मिक स्थल है पर कालांतर मे जो विकास ओरछा का हुआ वो उन्नाव बालाजी का न हो पाया जबकि उन्नाव बालाजी के जिला मुख्यालय दतिया से मध्य प्रदेश के वर्तमान गृहमंत्री दतिया का ही प्रतिनिधित्व करते है। नदी और मंदिर परिसर की सफाई व्यवस्था मे और सुधार से मंदिर के आकर्षण को और भी भव्य रूप दिया जा सकता है।  

इस यात्रा का एक थोड़ा दुःखद एवं अप्रिय पहलू मध्य प्रदेश पुलिस के व्यवहार से मिला जिसने इस धार्मिक यात्रा के पूर्व ही  व्यवधान तो डाला पर कभी कभी देश काल मे रहने की कीमत तो चुकनी ही पड़ती है।  मध्य प्रदेश की सीमा मे प्रवेश करते ही बैरियर पर पुलिस कर्मियों का कार को रोक भूंखे  भेड़ियों की तरह झपटना एवं सवालों के पहाड़ खड़ा करना असहज करने वाला था। मानों कोई कमर्शियल ट्रक या मेटाडोर कोई अवैध माल असवाव लेकर उनकी सीमा मे प्रवेश कर रहा हो?? कहाँ से आ रहे है, कहाँ जाना है, गाड़ी किनारे लगा दो, डिक्की चैक कराओ, सूटकेस खोलो सामान चैक करना है फिर इसके बाद गाड़ी के कागज और इन्स्योरेंस लाइसेंसे तो चैक करना लाजिमी है। मुझे याद नहीं 26 साल की कार ड्राइविंग के दौरान देश के दूर दराज की यात्रा के दौरान ऐसे अनुभव से गुजरा।  दुर्भाग्य ये इन मे से अधिकतर पुलिस कर्मी कोरोना महामारी के बीच  बगैर मास्क लगाये हुए थे और किसी  भी कर्मी ने वर्दी पर अपने नाम की प्लेट नहीं लगा रखी थी। दुख तब और हुआ कि दतिया के एसपी को मेल करने के बावजूद भी कोई कार्यवाही नहीं हुई। इस तरह की घटनाएँ न केवल धार्मिक पर्यटकों को कटु अनुभवों से गुजारकर यात्रा के लिए हतोत्साहित करती है बल्कि पुलिस महकमे की छवि भी खराब करती है। परिवार सहित वरिष्ठ नागरिक के रूप मे पुलिस का यह व्यवहार असहज करने वाला था।  क्या शासन/प्रशासन से कुछ  अपकेक्षा की जा सकती है??

 

विजय सहगल             


सोमवार, 21 दिसंबर 2020

दो मुंही बातें

 

"दो मुंही बातें"



दिनांक 17 दिसम्बर 2020 का श्रीमती प्रियंका गांधी का ट्वीट पढ़ा। जिसमे संसद के शीतकालीन सत्र 2020 को न बुलाने पर सरकार की आलोचना की गयी थी। पढ़ कर अच्छा लगा आलोचना होनी भी चाहिये। 135 वर्ष पुरानी, 1885 मे स्थापित जिस  भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस का देश के स्वतन्त्रता आंदोलन मे एक महत्वपूर्ण भूमिका रही हो उस दल की राष्ट्रीय  महासचिव का  ट्वीट देश के सर्वोच लोकतान्त्रिक मंदिर का सरकार द्वारा  शीतकालीन सत्र न बुलाये जाने  पर जनतंत्र मे उनके एवं भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस के लोकतान्त्रिक मूल्यों के प्रति निष्ठा एवं विश्वास को दर्शाता है।

श्रीमती प्रियंका गांधी, उनके परिवार एवं काँग्रेस  की कितनी निष्ठा, विश्वास और श्रद्धा लोकतन्त्र के प्रति रही है देश के आम लोगो से छुपी नहीं है। 135 वर्ष पुरानी कॉंग्रेस के महासचिव का देश की संसद का सरकार द्वारा  शीतकालीन  सत्र न बुलाये जाने पर   लोकतान्त्रिक मूल्यों के हनन पर चिंता करना स्वाभाविक है और होना भी चाहिये। काँग्रेस के  के इस युवा पदाधिकारी द्वारा लोकतान्त्रिक मूल्यों की रक्षा हेतु सोच और भावनाएं प्रशंसनीय है।

लेकिन 135 वर्ष पुरानी काँग्रेस पर आधे से भी ज्यादा समय तक एवं स्वतन्त्रता के बाद से लगभग आज तक,  जिस एक परिवार का वर्चस्व रहा हो उसके युवा महासचिव को काँग्रेस पार्टी के आंतरिक लोकतन्त्र पर भी  तनिक प्रकाश नहीं डालना चाहिये? देश की स्वतन्त्रता पश्चात अधिकतर समय नेहरू/गांधी परिवार से इतर काँग्रेस मे लोकतान्त्रिक मूल्यों की स्थापना मे  किसी अन्य व्यक्ति या परिवार के नेत्रत्व न मिलने के कारणों पर कोई विचार मंथन नहीं होना  चाहिये?? ऐसे कौन से कारण रहे जो भारत भूमि पर कुछ समय छोड़  एक परिवार से परे कोई दूसरा नेत्रत्वकारी व्यक्ति नहीं मिला? स्वतंत्र भारत के इतिहास के कुछ वर्षों को यदि विस्मृत कर दिया जाये तो भी  वर्ष 1947 से 1966 तक नेहरू युग, 1966 से 1984 तक इंद्रा युग, 1985 से 1998 तक राजीव गांधी युग और 1998 से आज 2020 तक श्रीमती सोनिया गांधी एवं राहुल गांधी युग!!! क्या पीढ़ी दर पीढ़ी देश की सबसे पुराने राजनैतिक दल पर वंश-परंपरा का नेत्रत्व हमे लोकतन्त्र के विपरीत  राजशाही या राजवंश की तरफ नहीं ले जा रहा है?? क्या काँग्रेस की युवा नेत्री को अपने "कुलश्रेष्ठ" की इस परंपरा को समय रहते, लोकतान्त्रिक मूल्यों के हनन पर गहन आत्ममंथन नहीं करना चाहिये? ये अपने आप मे एक ज्वलंत प्रश्न है??

उन्होने किसानों के बिलों पर चर्चा के लिये सरकार द्वारा  संसद सत्र न बुलाने पर सरकार की असंवेदन शीलता और अहंकार पर कटाक्ष कर ठीक ही टिप्पड़ी की है। देश के आप जैसे नेत्रत्वकारी  युवा को लोकतान्त्रिक मूल्यों के हनन पर चिंतातुर होना, उसके राजनैतिक परिपक्वता और जागरूकता का परिचायक है।

हमारे देश के आम जीवन मे कहावतों का एक महत्वपूर्ण स्थान है जो अपने संक्षिप्त शब्दों मे तीखे एवं गहरे संदेश लिये  होती है। ऐसे ही एक मुहावरा है "सूप तो सूप, छलनी जिसमे 36 छेद है, सुई से कहती है कि तेरे पेट मे छेद है"। काँग्रेस का दुर्भाग्य है कि लोकतान्त्रिक मूल्यों के हनन के उदाहरणों से इसका इतिहास भरा पड़ा है। फिर चाहे 1975 मे श्रीमती गांधी द्वारा घोषित आपात काल हो? या  तुष्टीकरण के वशीभूत राजीव सरकार का शहबानों प्रकरण!! या राहुल गांधी द्वारा सितम्बर 2013 मे श्री मनमोहन सिंह सरकार द्वारा दागी मंत्रियों के संबंध मे पारित अध्यादेश का सार्वजनिक रूप से फाड़ना हो या 2018 मे श्री राहुलगंधी द्वारा संसद मे "काँग्रेसी प्यार की झप्पी" जताते हुए पीएम को गले लगाने के बाद आँख मारना!! काँग्रेस के राष्ट्रीय नेताओं के उक्त संसदीय प्रेम के जीवंत द्रष्टांत से देश के लोग भली भाँति परिचित है। श्री  राहुल गांधी के संसद मे आँख मारने के दृश्य को देश के करोड़ो लोगो ने टीवी पर लाइव देखा!! क्या ये सारी घटनाएँ काँग्रेस के संसद एवं लोकतान्त्रिक संस्थाओं के प्रति सम्मान, अपनत्व, मर्यादा, निष्ठा और समर्पण को दिखलाते है??       

श्रीमती प्रियंका गांधी, संसद के शीतकालीन सत्र न बुलाये जाने पर, किसानों के बिलों पर चर्चा न कराये जाने  पर जनतंत्र की परंपराओं का हनन बताती है, जो इस बात का परिचायक है कि संसद मे चर्चा-परिचर्चा, चिंतन मनन  के पश्चात लिये गये निर्णयों पर उनकी एवं उनके दल भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस की  गहरी निष्ठा, आस्था एवं विश्वास है। राजनैतिक दलों का आपस मे नीतिगत मतभेद हो सकते है तब संसद द्वारा बहुमत से पारित उन तीन कृषि  बिलों का विरोध क्यों? आम जनता/किसानों  द्वारा किसी कानून या बिल पर असहमति या विरोध हो सकता है पर राजनैतिक दलों द्वारा संसद द्वारा पारित बिलों के विरुद्ध  लोगो को क्यों भड़काया जा रहा है?

आखिर संसद के शीतकालीन सत्र मे भी यदि चर्चा के दौरान जो निर्णय लिये जाएंगे तो क्या गारंटी कि काँग्रेस या अन्य राजनैतिक दलों द्वारा संसद के  उन निर्णयों पर अपनी सहमति के बावजूद देश के भोले भले लोगो को पुनः नहीं वरगलायेंगे  या  भृमित नहीं  करेंगे?? इन राजनैतिक दलों द्वारा अपनी इन दो मुंही,  "नकली चेहरा सामने आये असली सूरत छिपी रहे वाली" नीतियों को क्यों नहीं बदलना चाहिये?  इस पर गहन चिंतन मनन की आवश्यकता है।

विजय सहगल

शनिवार, 19 दिसंबर 2020

नगदी प्रेषण

 

"नगदी प्रेषण"




उन दिनों (सन् 1993) मेरी पोस्टिंग मध्य प्रदेश राज्य के पोरसा शाखा मे थी जो मुरैना   जिले की के तहसील थी। पोरसा एक नगदी फसल सरसों के उत्पादन का एक बड़ा केंद्र आज भी है। इसकी भौगोलिक स्थिति मध्यप्रदेश के दो सबसे ज्यादा  दस्यु  प्रभावित जिले भिंड और मुरैना  के बीच मे स्थित है। डाकू मान सिंह, पुतली बाई, मोहर सिंह, माधव सिंह, पान सिंह तोमर सभी दस्यु सम्राटों की यही कर्म स्थली रही थी और वे सभी इसी क्षेत्र के रहवासी थे। यध्यपि उन दिनों उतनी संगीन स्थिति डाकुओं की नहीं थी लेकिन  उन दिनों डाकू चैन सिंह का आतंक था जिसे चैना या चैना डाँकू भी कहते थे। उन दिनों पोरसा के नजदीक ही एक अन्य शाखा नगरा थी जो शायद पोरसा से 12-15 किमी दूर थी। हमारे एक मित्र श्री एम॰सी॰ जैन, श्री हरज्ञान सिंह सिशोधिया  नगरा के प्रबन्धक पद से कार्यमुक्त हो जा चुके थे और नवागांतुक श्री पी॰के जैन ने नया नया कार्य भर ग्रहण किया ही था। उन दिनों स्टाफ के बीच ये राय थी कि पोरसा, किरियांच एवं नगरा ब्रांच की पदस्थापना सजा पोस्टिंग है। एक रोज उन्हे डाकू चैना का एक फिरौती पत्र मिला। फिरौती की  धनराशि तो ठीक से  ध्यान नहीं शायद पाँच लाख की मांग की गई थी अन्यथा बैंक आते-जाते  अपहरण करने की धमकी दी गई थी। बेचारे प्रकरण को प्रादेशिक कार्यालय को सूचित कर एक महीने की छुट्टी पर चले गये थे पर दुर्भाग्य, किसी भी तरह का सहयोग उन्हे न मिला।  

कहने का तात्पर्य उन दिनों भी समान्य कानून व्यवस्था की स्थिति प्रशंसनीय नहीं कही जा सकती थी विशेषतः बैंकिंग व्यवसाय के संबंध मे जहां सिर्फ और सिर्फ  नगदी के लेन-देन का  कार्य था। पोरसा मे उन दिनों दो ही राष्ट्रीयकृत बैंक थे और पोरसा के  सरसों के व्यापारियों का अधिकतर व्यापार पश्चिमी बंगाल के व्यापारियों से था जो सरसों की पूर्ति का भुगतान ड्राफ्ट के माध्यम से मुरैना स्थित बैंकों पर देय ड्राफ्ट्स के माध्यम से करते थे। पोरसा मे एक तकनीकि समस्या उन दिनों और थी, आज की तरह आरटीजीएस या एनईएफ़टी की सुविधा न थी। यदि व्यापारी ड्राफ्ट हमारे पोरसा स्थित  बैंक मे भुगतान प्राप्ति हेतु जमा करते थे तो उन्हे दो तरह से नुकसान होता था। एक तो समाशोधन के माध्यम से भुगतान प्राप्ति मे दो तीन दिन लगते थे और दूसरा कमिशन की भरी भरकम राशि भी देनी पड़ती थी। हमारे बैंक द्वारा  कमीशन आधा किया जाना  भी व्यापारियों को आकर्षित न कर सका।  इसलिये अधिकतर व्यापारियों ने अपने खाते मुरैना की बैंकों मे भी खोल लिये थे। क्योंकि  व्यापारी बस से 40-45 किमी दूर दस रुपए मे मुरैना का टिकिट कटा सुबह सुबह ड्राफ्ट अपने मुरैना बैंक मे जमा कर देते थे, और दोपहर तक जिला मुख्यालय के  अपने और पड़ौसियों के काम निपटा बैंक से ड्राफ्ट का भुगतान जो औसतन रु 2-3 लाख का होता था प्राप्त कर झोले मे डाल मैली कुचैली कुर्ता धोती या शर्ट पहन शाम तक पोरसा बापस आ जाते थे। इस तरह कमीशन के रूप मे 4-5 सौ की बचत हो जाती थी। ये मैले कुचैले कपड़ों का पहनावा व्यापारी जानबूझ कर इस लिये पहनते थे ताकि उनपर बदमाश गुंडे या अन्य असामाजिक तत्व  ध्यान न दे। जब व्यापारी मात्र 20-30 रुपए खर्च कर उसी दिन अपने बैंक के ड्राफ्ट का भुगतान प्राप्त कर लेता है तब कौन सा व्यापारी  बैंक के कमीशन के चार-पाँच सौ कमीशन देने और चार दिन बाद बैंक से भुगतान प्राप्त करने की मूर्खता करेगा?

इस एक तरफा बैंक व्यापार के कारण हमारी शाखा मे नगदी एकत्रित होने की गंभीर समस्या उत्पन्न हो गई। दुर्भाग्य से करेंसी चेस्ट भी नजदीकी बड़े शहर ग्वालियर मे स्थापित नहीं हुआ था। इस तरह लगभग हर हफ्ते या कभी कभी फसल के समय हफ्ते मे दो-तीन  बार "नगदी" पोरसा से अपनी मुख्य शाखा मुरैना मे प्रेषण कराना पड़ता था, इसके उलट मुख्यालय मुरैना  मे स्थित बैंकों को नगदी की गंभीर कमी का सामना करना पड़ता था। फसल के समय स्टेट  बैंक इस आशय का पत्र बैंकों को जारी करता था कि नगदी की मांग न करें। नगदी प्रेषण के समय जिले मे कानून व्यवस्था की दयनीय  स्थिति हमेशा नगदी को मुरैना प्रेषण चिंता एवं भय की स्थिति निर्मित करती थी। प्रशासन मे लाल फीताशाही का ऐसा आलम था कि  बैंक के नाम से बंदूक का लाइसेन्स जिला कलेक्टर को लगभग 200 चिट्ठियाँ लिखने के बावजूद मेरे  साढ़े चार साल के प्रवास मे भी स्वीकृत न हो सका था। उन दिनों मोबाइल फोन जैसी सुविधायें भी नहीं थी। एसटीडी सेवा चालू तो हो गई थी पर बैंक की नीति नियमनुसार ये सुविधा शाखा मे उपलब्ध न थी। इसलिये नगदी का प्रेषण हमेशा एक चुनौती बना रहता। सुरक्षा अधिकारी के निर्देशानुसार हम नगदी का प्रेषण बगैर किसी पूर्व नियोजित सूचना या कार्यक्रम के मुरैना भेजते रहते ताकि सुरक्षा का मुद्दा न  आढ़े आये।

लेकिन जैसा कि अपने बैंक के कुछ उच्च अधिकारियों का कार्यव्यवहार और रवैया बैंक के सामान्य कामकाज मे भी ऐसा रहता है कि वे अपने अधीनस्थ अधिकारियों और  कर्मचारियों से सामान्य शिष्टाचार से अलग ये अपेक्षा रखते है जैसा पुराने राजाओं के दरबार मे होता था।  वे कुछ लोग, राज दरबारियों/राग दरबारियों की तरह ये भी अपेक्षा रखतेहै  कि उनके अधीनस्थ अधिकारी उनकी "जय जुहार" या "हुकुम सरकार" या ऐसे ही आचरण जैसे चापलूसी वाक्यों और व्यवहार से उनकी प्रशंसा करें, उनके यश गुणगान करें। एक दिन मुख्यालय स्थित शाखा के प्रबन्धक ने काफी बड़ी राशि के "कैश रैमिटेंस" को इस विना पर लेने से इंकार कर वापस कर दिया कि आपने पूर्व सूचना नहीं दी। मैंने उन्हे आग्रह भी किया कि शाखा मे एसटीडी सुविधा नहीं है ताकि आपको पूर्व सूचना दे सके और एसटीडी बूथ से फोन कर सूचना देना सुरक्षा से खिलवाड़ करना होता। पर उन्होने अनसुनी कर बड़ी मात्रा का नगदी प्रेषण वापस कर दिया। मैंने भी इसे अन्यथा नहीं लिया बस इस आशय का एक पत्र प्रादेशिक कार्यालय को लिख दिया।

कुछ दिन बाद प्रादेशिक प्रबन्धक महोदय का फोन आया, आवाज की मुद्रा कुछ क्रोधावेश की थी। उन्होने कहा "तुम बहुत कानून बाजी दिखाते हो", आपने "कैश रैमिटेंस" वापसी का पत्र यहाँ प्रादेशिक कार्यालय को  क्यों लिखा? मैंने बताया कि "श्रीमान, आपके कार्यालय को इस आशय की सूचना देना आवश्यक समझ ये पत्र सूचनार्थ प्रेषित किया था। उन्होने फिर पूंछा आपने नगदी प्रेषण की पूर्व सूचना जिला मुख्यालय की शाखा को क्यों नहीं दी? मैंने कहा "सर" शाखा मे एसटीडी न होने के कारण सुरक्षा की द्रष्टि से सूचना एसटीडी, पीसीओ के माध्यम से शाखा को देना मैंने उचित नहीं समझा क्योंकि सार्वजनिक स्थान पर इस तरह की बातचीत बैंक और स्टाफ के हित मे नहीं थी और बैसे भी इस शहर की सामान्य कानून व्यवस्था ठीक नहीं रहती है, अब तक बैंक को गन लाइसेन्स भी नहीं मिला जिसकी लगातार सूचना से आपके कार्यालय को भी अवगत कराया जाता रहा। तब उन्होने फिर कहा सप्ताह का कोई दिन निश्चित कर नगदी का प्रेषण किया जा सकता है। मैंने विनम्रता से इस पर भी असहमति जतलाते हुए पुनः एक निश्चित दिन प्राइवेट जीप/टैक्सी से "कैश रैमिटेंस" मे सुरक्षा का मुद्दा बतलाया कि सप्ताह के एक निश्चित दिन लगातार नगदी का भेजना सुरक्षा की दृष्टि से उचित न होगा? तब प्रादेशिक प्रबन्धक ने जो कहा, सुनकर मै आश्चर्य चकित था। उन्होने कहा कि "फिर आप उनसे अपने संबंध ऐसे बनाइये कि उन्हे "कैश रैमिटेंस" लेने मे समस्या या शिकायत न हो।

मै सुनकर हैरान था कि एक रीज़न का मुखिया समस्या का बिना कोई समाधान निकाले हिदायत दे रहा है कि संबंध बनाईये? जैसे बैंक नहीं गोया कोई प्राइवेट संस्थान हो?  सामान्य शिष्टाचार के बाद बैंक के कार्य हेतु उनकी चरण वंदना तो होने से रही? तब शाखा मे नगदी शेष हमारी अनुमत्य सीमा से 40-50 गुना एकत्रित हो गयी।  बैंक को भी इस बजह से काफी आर्थिक हानि होती रही पर कुछ समाधान न निकला। तब एक दिन  मुरैना शाखा के प्रबन्धक ने फोन कर कैश उनकी शाखा मे प्रेषित  कराने को कहा। इस तरह अनियमित अंतराल पर नगदी प्रेषण की सुरक्षा नीति का ही अनुपालन किया गया।

ईश्वर प्रदत्त अनुग्रह और आशीर्वाद से बैंक के उच्च पदों तक पहुँचने बाले लोग विरले ही होते है। वे और भी सौभाग्यशाली होते है जो उच्च से भी उच्चतम पदों तक पहुँचते है। पर इन पदों पर आसीन कुछ लोग ये भूल जाते है कि "दूसरों के साथ ऐसा व्यवहार न करे जो आपको अपने लिये पसंद न हो" या "दूसरों के साथ बैसी ही उदारता बरते जैसी ईश्वर ने तुम्हारे साथ बरती"।  

विजय सहगल

मंगलवार, 15 दिसंबर 2020

काम अभी ढेरों करना है

"काम अभी ढेरों करना है"





हम,हमारे मे युग बीता,
मनुजता का ऋण भरना है।
यम के दूत खड़े दरबाजे,
काम अभी ढेरों करना है॥

शैशव रैन चैन मे सोया।
किशोर,ज्ञान ध्यान मे खोया॥
युवा हो,इतिहास मे अटका।
अंकगणित के जाल मे भटका॥
विद्या अध्यन,जीवन वृत्ति।
गृहस्थ आश्रम,वानप्रस्थि॥
से आगे अब पग धरना है।
यम के दूत खड़े दरबाजे,
काम अभी ढेरों करना है॥

उऋण उस माँ का होना है,
जिसने "मल" सिर मेरा ढोया।
उऋण उस "तात" का होना,
जिसने द्वार नित पोंछा धोया॥
सारा जीवन स्वयं,स्वार्थ मे,
उस कृतघ्नता से डरना है।
यम के दूत खड़े दरबाजे,
काम अभी ढेरों करना है॥

देर रात सपनों मे आकर,
उन बच्चों ने फिर झकझोरा।
खुले गगन के नीचे रहते,
अक्षर ज्ञान का,कागज कोरा॥
उस कोरे कागज मे बच्चों के,
सतरंगी सपने भरना है।
यम के दूत खड़े दरबाजे,
काम अभी ढेरों करना है॥

शतकों से जो दबे,सताये,
उनका भी कुछ मुझ पे हक था।
जैसे पा पाये हम सब कुछ,
नींव मे ये थे,कोई न शक था॥
वक्त आज आहुति देने का,
हवन-मंत्र पूरे पढ़ना है।
मृत्यु बाट जोहे दरबाजे,
काम अभी ढेरों करना है॥

विजय सहगल

शुक्रवार, 11 दिसंबर 2020

#तख्त श्री हरिमन्दिर साहिब

#तख्त श्री हरिमन्दिर साहिब, पटना"







2 दिसम्बर 2020 को पटना प्रवास पर तख्त श्री हरिमन्दिर साहिब, पटना मे श्री गुरु गोविंद सिंह जी की जन्मभूमि के दर्शन का पुण्य लाभ प्राप्त कर अपने आप को बड़ा सौभाग्य शाली और गौरवान्वित महसूस किया। आज से 354 वर्ष पूर्व श्री गुरु गोविंद सिंह का जन्म 22 दिसम्बर 1666 मे इसी स्थान पर हुआ था। मेरे लिये  गालव ऋषि की पुण्य भूमि ग्वालियर मे निवासरत होने के कारण अतरिक्त गौरव की बात भी है क्योंकि श्री गुरुगोविंद सिंह जी का ऐतिहासिक जुड़ाव भी गुरुद्वारा दाताबंदी छोड़ के कारण ग्वालियर से रहा है। आज पटना मे तख्त श्री हरिमन्दिर साहिब मे बचपन मे देखी वो तस्वीर याद हो आई जो मैंने  गीता प्रेस गोरखपुर से प्रकाशित पत्रिका "कल्याण" मे देखी थी। ग्लाज़ेड पेपर पर छपी उस तस्वीर मे कैसे श्री गुरु गोविंद सिंह के दोनों साहिबजादों सात वर्षीय श्री जोरावर सिंह और 5 वर्षीय बालक श्री फतेह सिंह को आततायी वजीर खाँ द्वारा जिंदा दीवार मे चुनवा देने का चित्र  विवरण के साथ दिया था। मेरा अनेकों वार ग्वालियर के किले मे स्थित  गुरद्वारा दाताबंदी छोड़ जाना हुआ हर वार  कल्याण पत्रिका मे छपी वो काली-सफ़ेद फोटो मेरे ज़ेहन मे याद आती। कैसे श्री गुरु गोविंद सिंह जी के दोनों साहिबजादों  ने उस आततायी वज़ीर खाँ  के सामने झुकने से इंकार कर "बोले सो निहाल, सत श्री अकाल के जयकारों के साथ आत्मोत्सर्ग के लिये खड़े हो गये। दोनों साहिबजादों ने   अपने बाबा गुरु श्री तेगबहादुर के पद चिन्हों पर चल उनकी ही तरह आत्मबलिदान के मार्ग को चुन मानवता की खातिर अपनी आत्माहुति दे दी। विश्व इतिहास मे ऐसा कोई दूसरा उदाहरण देखने को नहीं मिलता जब श्री गुरुगोविंद सिंह जी जैसे महामनव ने अपने मन, वचन और कर्म मे अंश मात्र के भेद  विना  देश, धर्म और मानवता  की रक्षा हेतु अपना एवं अपने परिवार का  सर्वस्व न्योछावर कर दिया हो। श्री गुरु गोविंद सिंह ने अन्याय अनाचार के विरुद्ध निडर हो युद्ध करते हुए अपनी एवं अपने चारों पुत्रों की जीवनाहुति अर्पित कर "सर्ववंशदानी" होने का गौरव इतिहास मे किसी और को हांसिल नहीं हुआ। खालसा पंथ के संस्थापक ऐसे महान योद्धा, वीर पुरुष, सिखों के दसवे गुरु श्री गुरु गोविंद सिंह जी की जन्मभूमि की चरणरज़ अपने सिर माथे लगाना गौरवशाली एवं रोमांचकारी अनुभव था।

पटना सिटी की मुख्य और कोलाहल और भीड़-भाड़  से परिपूर्ण सड़क से सटे  गुरद्वारा तख्त श्री हरिमन्दिर साहिब मे प्रवेश करते ही गुरुद्वारे के विशाल प्रांगढ़ मे  एक अलग आध्यात्मिक शांति, दिव्य तेज की अनुभूति का अनुभव महसूस होता है। निहायत ही साफ सफाई से पूर्ण प्रवेश द्वार पर अपनी पादुकाओं को रख दुनियाँ की माया मोह रूपी चरण रज जल से भरे कुंड  से होकर निकलने मे स्वतः ही छूट जाती है। पानी के कुंड  से गुजर गुरुद्वारे की सीढ़ियाँ चढ़ना मुझे हमेशा ही भाया है। मै गुरद्वारों के प्रवेश द्वारों पर  जल से भरे कुंड  से निकलने की इस वैज्ञानिक सोच का हमेशा प्रशंसक रहा हूँ जो जगह जगह की धूल, वैक्टीरिया या अन्य विषाणुओं को पवित्र पावन भूमि मे प्रवेश से रोकती है। संगमरमर से बने सुंदर वलयाकार प्रवेश द्वार से होकर विशाल खुले प्रांगढ  के चारों ओर स्वेत रंग के वास्तु निर्माण मन को सुखद एवं शांति प्रदान करने वाला था। मुख्य हाल मे प्रवेश करते ही हाल के केंद्र मे विराजे श्री गुरुग्रंथ साहब के नयनभिराम दिव्य दर्शन मन को सुकून और शांति प्रदान करने वाले थे। श्री गुरु ग्रंथ के सामने नतमस्तक हो मत्था टेकना अपने आप को कृतार्थ करने वाले क्षण थे। परिक्रमा पथ मे आज से लगभग  355  वर्ष पूर्व  माता गूजरी द्वारा पानी हेतु प्रयुक्त कुआं के दर्शन एवं उसके अमृत तुल्य जल का आचमन हमे  तत्कालीन समय और परिस्थितियों से रूबरू कराता है । इस पथ मे आगे गुरु गोविंद सिंह जी द्वारा वचपन प्रयुक्त तलवार, गुलेल तीर आदि के साथ उनके द्वारा प्रयुक्त वस्त्र एवं अन्य वस्तुएँ के दर्शन सुखद अनूभूति देने वाले थे। कुछ समय हाल मे बैठ ग्रंथियों की सुमधुर आवाज मे शब्द कीर्तन:-   

"अमृत वाणी हरि हर तेरी, सुण सुण होवे परम गति मेरी। सुण सुण..........

जलन वुझी, शीतल होये मनवा, जलन वुझी.......  

सतगुरु का दर्शन पाये जियो, सतगुरु का दर्शन...................  

अमृत वाणी, हरि हर तेरी, सुण सुण  होवे परम गति मेरी। सुण सुण..........

शब्द कीर्तन मे हारमोनियम एवं तबले की संगत ने मन को भाव विभोर कर दिया। न जाने क्यों पंजाबी कम जानने के बावजूद श्री गुरु नानक से लेकर गुरु गोविंद सिंह तक सभी गुरुओं की शिक्षाएं, उनके शब्द मेरा स्वाभाविक पथ प्रदर्शक है। 1980 मे लखनऊ सेवा काल के दौरान प्रातः टेक्सला टीवी द्वारा आयोजित कार्यक्रम के शाबद कीर्तन की शीर्ष लाइन "कोई बोले राम राम, कोई खुदाय, कोई सेवे गुसैयाँ........." मेरा प्रिय कार्यक्रम था जिसमे हर रोज गृरुग्रंथ साहब की वाणी का पाठ होता था। पहले भी अमृतसर यात्रा के दौरान स्वर्ण मंदिर मे ऐसे ही सुखद पलों को मैंने घंटों बैठ कर महसूस किया था। कुछ ऐसी ही अनभूति मुझे आज  तख्त श्री हरिमन्दिर साहिब मे भी हुई।

पिन्नी प्रसाद अर्पित/प्राप्त  कर बापसी मे कड़ाह प्रसाद ग्रहण कर पुनः खुले प्रांगढ़ मे एक परिक्रमा कर बापसी की ओर बढ़ा। वही पास मे एक स्थान पर संवत 1722 (सन 1665) मे जिस द्वार से गुरु श्री तेग बहादुर जी ने अपने श्री चरण रख परिवार सहित प्रवेश किया था उन्ही पद चिन्हों पर चलना जीवन को कृत-कृत करने जैसा था।

बापसी मे गुरुद्वारा परिसर मे ही स्थित बिहार पर्यटक विभाग के कार्यालय मे श्री नागेंद्र शर्मा जी से बिहार एवं स्थानीय अन्य धार्मिक एवं पर्यटक स्थलों की जानकारी एवं सूचना पत्र एकत्र करना दिल को छूने वाला अनुभव था। प्रायः सरकारी विभागों मे ऐसे व्यवहार की उम्मीद कम ही होती है। उन्होने अन्य स्थलों के साथ, निकट ही गुरद्वारा बाल लीला एवं गुरु के बाग के बारे मे जानकारी दी। कैसे तत्कालीन जमींदार राजा दंपति श्री फतह चंद मैनी एवं विश्वंभरा  देवी ने श्री गोविंद राय जी के बाल्यकाल की  बाल सुलभ लीलाओं के चलते उन्हे पुत्रवत स्नेह के वशीभूत अपने महल/हवेली को गुरु जी के श्री चरणों मे समर्पित कर दी। गुरद्वारे के चारों ओर सघन आबादी वाले गली मुहल्लों के वर्तमान स्वरूप एवं रिहाइश से तत्कालीन समय के शहर के स्वरूप और रहन सहन की कल्पना सहज ही  की जा सकती है।

एक बार पुनः प्रवेश द्वार से ही गुरु स्थान एवं गुरु ग्रंथ साहब को प्रणाम कर इस चिर अभिलाषित तीर्थ यात्रा को सम्पन्न कर अपने गंतव्य की ओर प्रस्थान किया जो एक यादगार यात्रा बन गई।  

विजय सहगल