"रानीमहल, झाँसी'
प्रातः
स्मरणीय देश की गौरव झाँसी की महारानी लक्ष्मी बाई के रानी महल पर वर्ष 2021 के नवागमन
पर हमारी ये पोस्ट सुधि पाठकों को समर्पित करते हुए हर्ष है। सभी स्नेहिजनों, परिजनों, स्वजनों को नव वर्ष की मंगल कामनाओं के साथ।
कभी
कभी छोटी सी यात्रा को पूरा करने मे इतना लंबा वक्त लग जाता है जिसकी कल्पना
मुश्किल है। लेकिन प्रायः ऐसा ही होता है, जब आगरा के लोग ताजमहल न गए हों या
पुरी के लोग जगन्नाथ मंदिर न गये हों। अब मुझे ही देंखे मै भी झाँसी मे पला बढ़ा
हूँ, पूरा बचपन इसी शहर मे बीता, शिक्षा-दीक्षा
भी इसी शहर मे हुई। हजारों बार इस जगह से निकला हूंगा पर झाँसी की रानी लक्ष्मी
बाई के महल मे आज 29 दिसम्बर 2020 मे 62
साल के उम्र के बाद जा सका। प्राइमरी स्कूल से स्नातक की शिक्षा के दौरान हर दिन
ही लगभग यहाँ से निकालना होता था। दरअसल एक बार नॉर्मल स्कूल के समय बचपन मे स्कूल
से आते समय महल मे जाने का प्रयास किया था तो दरबान ने यूं ही हम बच्चों को डांट-डपट
कर भगा दिया था। तब से यूं ही समय बीतता
रहा और मैं रानी महल के अंदर न जा सका। शायद आज भी दर्शन लाभ से मै वंचित रह जाता यदि मै टिकिट वितरण बाबू श्री
पांडे जी का इंतज़ार 25-30 मिनिट न करता क्योंकि वे खाना खा रहे थे। पूंछ-तांछ पर मालूम हुआ मुश्किल से 2-3 तीन
पर्यटक ही महल को देखने आते होंगे। मैंने गार्ड को कहा भी कि भाई टिकिट की राशि
25/- मै आपको दे देता हूँ और बाबू के आने तक मै कुछ दीर्घाएँ घूम लेता हूँ!! पर
पर्यटक को छोड़ सभी अपने अपने कानूनी दायित्व को पूरी मुस्तैदी से सर्दी की धूप मे सेंक
कर पालन कर रहे थे। ऐसी कर्तव्य परायण सेवा भावी
कर्मचारियों को हमारा हार्दिक नमन।
पीले
रंग से पुती दो मंज़िला रानी महल का निर्माण 1769-1796 के दरमियान श्री रघुनाथ राव
द्वारा कराया गया था जो झाँसी के अंतिम शासक राजा गंगाधर राव के पूर्वज थे।
कालांतर मे इस महल को झाँसी की रानी लक्ष्मी बाई के आवास हेतु उपयोग किया जाने लगा
और तब से इसे रानी महल के नाम से जाना जाता है। मैंने अपने ब्लॉग मुरली मनोहर
मंदिर (https://sahgalvk.blogspot.com/2020/11/blog-post.html) मे झाँसी की रानी लक्ष्मी
बाई का नित्य मुरली मनोहर मंदिर मे भगवान श्रीकृष्ण के दर्शन का उल्लेख किया था जो
इस महल से बमुश्किल एक किमी से भी कम दूरी पर है। विशाल आयताकार महल के मध्य स्थित
प्रवेश द्वार इसके आकर्षण को भव्यता प्रदान करता है। प्रवेश द्वार के बाए दोनों ही
मंजिलों पर आदमक़द दस दरवाजे, मुख्य प्रवेश द्वार के उपर तीन एवं दाहिनी ओर छह दरवाजे इस बात को इंगित
करते है कि तत्कालीन शासकों का धूप हवा, पानी रूपी प्रकृति
से जितना प्रेम था उतना ही आदर सम्मान वे अपनी प्रजा के प्रति भी रखते थे अन्यथा
राजे राजमहल प्रायः बड़ी बड़ी चारदीवारों के अंदर छुपा कर निर्मित किये जाते देखे गये
है।
प्रायः
हर खिड़की दरवाजे के उपर सफ़ेद धरातल पर गेरुआ रंग के अधर्वृत्ता आकृति मे मोर, मोरपंख, बतख, पुष्पों एवं गुलदश्तों की सुंदर आकृति आपको
सारे महल मे देखने को मिलेंगी। महल के मुख्य दरवाजे से प्रवेश करते ही एक बहुत बड़ा
आँगन दिखाई देता है शायद उन दिनों भी पेड़, पौधों एवं पुष्प
लताएँ उन दिनों भी दिखाई देती होंगी। आँगन के चारों ओर गलियारा/वरांडा एवं गलियारे
के बाद अग्र भाग मे दोनों ही मंजिलों पर बड़े हाल है एवं अन्य भाग मे छोटे बड़े कमरे दर कमरे है
जिनका आसार एक मीटर से अधिक मोटी दीवारों से निर्मित है। महल के भू
तल के हर कमरे और हाल मे पूर्व शासकों के काल मे जहां दरबारियों के विचार विमर्श
के स्थान रहे होंगे वहाँ पर आज उन कक्षों मे झाँसी, ललितपुर, बरुआ सागर जिले मे उत्खनन से प्राप्त हुई प्राचीन मूर्तियों को सँजोया
गया है।
जहां
खुले आँगन के मध्य मे एक कुआँ महल की पानी की आवश्यकताओं की पूर्ति करता था वही
आँगन मे दो भव्य लगभग चार फुट ऊंचे फब्बारे विध्यमान है जो दो-ढाई फुट ऊंचे जल आयताकार
सरोवर के मध्य स्थित है। निश्चित ही फब्बारे जो आज मौन है पर अपने वैभव काल मे महल
की भव्यता मे चार चाँद लगाते होंगे। पूरे आँगन के किनारे पर आयताकार पथ जो महल के किसी भी भाग मे पहुँचने
को आकर्षक एवं सुगम बनाता है वही आयताकार पथ को चार भागों मे विभाजित करने वाला
मध्य पथ भी आँगन को और आकर्षण प्रदान करता
है।
महल
का मुख्य आकर्षण प्रथम तल पर स्थिति मुख्य दरबार हाल एवं महारानी लक्ष्मी बाई का
अन्तः कक्ष है जो विभिन रंगों से सजाई गई आकर्षक तत्कालीन पेंटिंग का जीता जाता
उदाहरण है। अन्तः कक्ष के बाहर तीन मेहराब वाला वरांडा जिनको सुंदर आकर्षक ज्योमिति लिए पत्थरों की नक्काशी किये
पाँच स्थम्भों पर आधारित है। इस हाल, वरांडा
एवं अन्तः कक्ष की चारों दीवारों और छत्त पर सुंदर रंग विरंगी नक्काशी, लाल, हरी भित्ति चित्र महल को आकर्षक भव्य रूप प्रदान करते है। लकड़ी के सहतीरों पर टिकी छत
पर भी आकर्षक पेंटिंग की गई है। कक्ष के दोनों ओर रोमन अंकों की पेंडुलम वाली
घड़ी की पेंटिंग उस समय के राजा महाराजाओं को
घड़ी के प्रति आकर्षण को दर्शाती है, साथ ही घड़ी की पेटिंग
के उपर दोनों ओर वीर हनुमान राक्षसों के बध को दर्शाती आकर्षक पेंटिंग तत्कालीन
कला और वास्तुकला के दर्शाती है। एक ओर महल
के स्थिति, बनावट, आदि से ये अंदाज
लगाना सुगम है कि राजा गंगाधर राव और महारानी लक्ष्मी बाई का राज्य अन्य राजाओं और रियासतों के मुक़ाबले आर्थिक रूप से धनाढ्यता, वैभवता
संपन्नता के उच्च मानदंडों भले ही न लिये
हो पर अपने राष्ट्र प्रेम, अंग्रेजी शासन के विरुद्ध, विद्रोह रूपी
विचारों मे एवं स्वाधीनता के संग्राम मे अपना सर्वस्व आहूत करने के संदेश मे देश
के राजे रजबाडों मे सर्वोच शिखर पर था। वीरांगना महारानी लक्ष्मी बाई की कर्म
स्थली मे हर जगह एवं रानीमहल के कण कण मे
महारानी के त्याग, बलिदान, 1857 मे देश
मे स्वनधीनता की अलख जगाने मे अपने जीवन का
बलिदान आज भी इतिहास मे स्वर्णिम अक्षरों से उल्लेखित है। इस इतिहासिक महल मेरे
लिये किसी मंदिर से कम न था। महल की पवित्र
रज का तिलक धारण करना मेरे लिये सौभाग्य प्रदान करने वाला था। मै महारानी झाँसी लक्ष्मी
बाई को नमन करता हूँ, शत शत नमन करता हूँ।
विजय सहगल, झाँसी





























