मंगलवार, 29 सितंबर 2020

बादल

"बादल"






काश यदि बादल बनकर मै,
आसमान मे उड़ पाता।
दूर गगन मे चंदा के संग,
उड़ता बन कर लघु भ्राता॥

तारे झिलमिल-झिलमिल करते,
"छेड़" उन्हे जताता मै।
अग्रज मेरा नभ का राजा,
प्रजा उन्हे बताता मै॥
मेघ खड़े सेवा मे रहते,
मेरी मर्जी जल बरसाते।
कभी उड़े शिखरों के उपर,
कभी दूर गगन खो जाते॥
रोक रास्ता धरती तक का,
सूर्य किरण से टकराता।
काश यदि बादल बनकर मै,
आसमान मे उड़ पाता॥

प्यासी धरती "कातर"मन से,
जब जब मुझे निहारा करती।
संगी साथी बादल मेरे,
नीर गिरा आंचल भर जाती॥
नदी सरोवर अठखेली कर,
लहर हिलोरें बनवाते।
कश्ती नीचे उपर नीचे,
नाविक का मन भरमाते॥
धमा चौकड़ी,मौज परस्ती
घनघोर घटा,घट मे घर लाता।
काश यदि बादल बनकर मै,
आसमान मे उड़ पाता।

उड़ा कभी मेघ ले जाते,
चुन्नु-मुन्नू के घर ऊपर।
और कभी "शाला" दिखलाते,
गाँव गली चौबारों पर॥
और कभी घने जंगलों,
मोर मनोहर नाच दिखाती।
मेढक टर्र-टर्र कर गाते,
कोयल मस्ती राग सुनाती॥
संगी साथी,पहन धवल वस्त्र,
रत्न सितारे जड़ लाता।
काश यदि बादल बनकर मै,
आसमान मे उड़ पाता॥

बीच गगन मे उड़े पतंग जो,
डोर तोड़ हवा हो जाती।
बच्चे भागे पतंग के पीछे,
पतंग घूम, गोते खाती॥
रंग विरंगे तारों जैसी,
उड़े पतंग आकशों मे।
हरी बैगनी लाल गुलाबी,
रंग वसे हर श्वासों में॥
पतंग दिखाती सपने ऊँचे,
बुलंद इरादे धरो मन मे।
धागा संदेश ये देता,
जुडों धरातल जीवन मे॥

विजय सहगल

शुक्रवार, 25 सितंबर 2020

अंडमान निकोबार

 

"अंडमान निकोबार"

 







अंडमान निकोबार की यात्रा मेरे लिये किसी तीर्थ यात्रा से कम न थी। बचपन मे स्वतन्त्रता के लिये संघर्ष मे सेनानियों को काला पानी की सजा के किस्से पड़े व सुने थे। बैसे बचपन मे समाज शास्त्र विषय के अंतर्गत स्कूल विध्यार्थियों के साथ जिला जेल झाँसी का भ्रमण पूर्व मे ही कर चुका था (https://sahgalvk.blogspot.com/2018/09/blog-post_26.html) पर  अंडमान देखने और विशेष तौर पर सेल्यूलर जेल देखने की इच्छा भी   थी।  बटुकेश्वर दत्त, विनायक सावरकर, भाई परमानंद जैसे कुछ नाम याद है जिनको काले पानी के सजा मिली थी। कभी कल्पना न की थी कि अंडमान निकोबार की यात्रा भी करेंगे।

आठ नवम्बर 2002 को मेरा परिवार सहित अंडमान जाना तय हुआ। जब मन की अभिलाषा पूरी हो तो मिलने बाली खुशी की कल्पना नहीं की जा सकती। कोलकता से पोर्टब्लेयर की सुबह छह बजे के फ्लाइट थी। तभी एक अपसगुन के बारे मे सूचना प्राप्त  हुई की वामपंथी पार्टियों ने बंगाल बंद का आवाहन प्रातः 6 बजे से 24 घंटे के लिये किया है। सारी सेवाएँ बंद रहेंगी जैसे, रेल, हवाई, सड़क, टेम्पो, ऑटो, टैक्सी। चिंता होना स्वाभाविक थी। जिस यात्रा की महीनों से तैयारी हो उसमे विघ्न पड़ता दिखाई देने लगा। बैसे होटल से प्रातः चार बजे निकलने का प्रोग्राम था। इसी चिंता मे रात भर नींद नहीं आई और हम लोग रात एक बजे ही टैक्सी से एयरपोर्ट के लिये निकाल लिये। लेकिन वामपंथियों को भी लगता था सारी रात नींद नहीं आई वे भी झुंड के झुंड प्रातः छह बजे के पूर्व ही रात एक बजे जगह जगह सड़क रोक कर बंद का आवाहन समय के पूर्व ही कर चुके थे। रात मे एक दो जगह रोका पर जैसे तैसे आगे बढ़ते रहे पर अंततः एयरपोर्ट से लगभग एक किमी॰ पूर्व उनके आंदोलन का शिकार हो ही गये। टैक्सी से सामान उतार एयरपोर्ट तक खींचते खींचते जैसे तैसे पहुंचे। तब कुछ चैन की सांस आयी। एयरपोर्ट पर पता चला कि पोर्टब्लेयर की फ्लाइट जाएगी, तो सारे कष्ट भूल यात्रा के समय का इंतज़ार करने लगे। लेकिन बिलकुल ऐन वक्त पर बताया कि देश के किसी भी हिस्से से न फ्लाइट आयेगी और न ही जायेगी। सभी के साथ समाजवादी समान व्यवहार। अंततः अंडमान की फ्लाइट भी निरस्त हो गई।   

अब तक सब कुछ अनिश्चित था। इस महा बंद मे कहाँ रुकेंगे खाने पीने की क्या व्यवस्था होगी और सबसे बड़ी बात क्या और कब पोर्ट ब्लेयर के लिए जाएंगे, जाएंगे भी या नहीं? इन्ही उहाँ पोह की स्थिति मे एयर पोर्ट पर हजारों यात्री धीरे धीरे एकत्रित हो गये। एयर पोर्ट की स्थिति रेल्वे प्लेट फोर्म की तरह हो चुकी थी। हर कोने जहां मे लोग चादर बिच्छा आराम की मुद्रा मे आ चुके थे। कहते है कि बंगाल मे बरसात और बंद का आवाहन कब हो जाये पता नहीं चलता। इससे पहले 21 मई 1991 मे जगन्नाथ पुरी की यात्रा के समय  खड़गपुर मे स्व॰ श्री राजीव गांधी की हत्या के अगले दिन सुबह से 24 घंटे के  बंद को झेल चुका था। चूंकि बंगाल मे थल (रेल यात्रा), नभ (हवाई) यात्रा  के पूर्व 24-24 घंटे के बंगाल बंद को झेल चुका था अतः मैंने अब निश्चय कर लिया कि भविष्य मे समुद्र यात्रा की शुरुआत कम से कम बंगाल से हरगिज न करूंगा कहीं ऐसा न हो कि तब भी मुझे फिर 24 घंटे के बंद का सामना करना पड़े।

लेकिन ईश्वर का कृपा रही की अगले दिन हमे पोर्ट ब्लेयर की फ्लाइट सही समय मिल गई और इस तरह हम नौ बजे के करीब अंडमान की पावन धरती पर कदम रखने मे कामयाब रहे। हवाई अड्डे पर उतरते ही एक उत्साह पूर्ण रोमांच का अनुभव था। हवाई अड्डे से बाहर निकल टैक्सी ली ताकि होटल की तलाश की जा सके। बहुत ही सुंदर, सुखद एकदम शांत साफ सुथरा शहर का आभास हुआ था। ऊंची नीची पहाड़ियों के बीच बसा सुंदर शहर, एक तरफ  छोटे एवं मध्यम ऊंचाई के पहाड़ और उसके चारों ओर समुद्र की अनंत मे व्याप्त जलराशि। एक दो जगह होटल  देखने के बाद सेल्यूलर जेल से 50 कदम दूरी पर आखिरकार ठ्हरने के व्यवस्था हो गई। छोटा लेकिन शांत शहर पोर्ट ब्लेयर, अंडमान की राजधानी। बैसे छह दिन का प्रवास था लेकिन वामपंथियों के बंद के निमित्त एक दिन यूं ही खर्च हो गया बगैर किसी व्यापार विनिमय के।

कुछ आराम आदि के बाद दिन के शेष समय गांधी पार्क, सामुद्रिका म्यूजियम, मछ्ली म्यूजियम तथा सेल्यूलर जेल के पास नीचे "सी बीच" मे व्यतीत किया। अंडमान के समुद्र तट निहायत ही साफ सुथरे और शांत है। भीड़ भाड़ आपको कहीं नहीं दिखेगी। शाम स्थानीय बाजार मे व्यतीत की। मिश्रित आबादी से परिपूर्ण अंडमान निकोबार मे देश की हर प्रांत और संस्कृति के लोग मिलेंगे। एक ओर जहाँ  दक्षिण भारतीय अपने बोलचाल एवं पहनावे मे नज़र आयेंगे वही सिक्ख एवं पंजाबियों के व्यापारिक प्रतिष्ठान भी आपको नज़र आयेंगे। बंगाल और बिहार के रहवासी भी आपको प्रतिष्ठानों मे कार्यरत मिलेंगे। इसकी मुख्य वजह भारत के प्रथम स्वतन्त्रता आंदोलन से आज़ादी मिलने तक अंग्रेजों से संघर्षरत योद्धाओं की ये संताने है जिन्हे  अग्रेजों से लड़ी लड़ाई मे अग्रेज़ शासकों ने अंडमान की जेलों मे सजा के तौर पर कैद कर रखा था और जो सजा के बाद अंडमान की ही धरती पर ही अपने सुनहरे भविष्य की चाह मे वही वस गये। पूरे अंडमान मे अधिकतर आबादी इन्ही देश के स्वतन्त्रता सेनानियों के वंशज है जिन पर  देश को नाज़ है।

अगले दिन सुबह 6 बजे  भ्रमण के दौरान ही सेल्यूलर जेल के दर्शन हुए और नीचे ही बने बीच पर नारियल पानी ग्रहण कर दिन की शुरुआत की। यदि अंडमान को एक दिव्य आलौकिक शांति द्वीप कहें तो अतिसयोंक्ति न होगी। वास्तव मे अंडमान द्वीप समूह भारत का स्वर्ग है। प्रदूषण से एकदम मुक्त एक स्वस्थ वातावरण से परिपूर्ण द्वीप समूह। जिसमे छोटे बड़े लगभग 300 द्वीप है और बमुश्किल 38-39  द्वीप मे ही आबादी है।

हर घटना मे देश काल और पात्र का एक अपना ही महत्व है। एक समय था जब देश को आज़ाद कराने बाले वीर योद्धा जब स्वतन्त्रता के युद्ध के लिये लड़ते थे तो सजा के बतौर  अंग्रेज़ शासक उन्हे कालापानी भेज दुर्दांत विद्रोही करार  कैदी के रूप मे सजा देते थे। समय चक्र परिवर्तित हुआ अंग्रेजों के सिरदर्द बने वे कुपात्र आज सुपात्र बन उसी कालापानी सहित पूरे देश मे स्वतंत्र वीर योद्धा के रूप मे बलिदानी और  स्वतन्त्रता सेनानी के रूप मे जाने जाते है। कभी अत्याचार, अनाचार, उत्पीढन, शोषण और निरंकुशता का प्रतीक रही अंडमान स्थित काला पानी के रूप मे कुख्यात सेल्यूलर जेल आज काल चक्र के परिवर्तन स्वरूप 130 करोड़ भारतीयों के लिये राष्ट्रीय धरोहर का प्रतीक आस्था और विश्वास के तीर्थ के रूप मे जाना और पूजा जाता है। कल्पना कीजिये 15X8 फुट की कोठरी मे किसी व्यक्ति को सालों और किन्ही किन्ही व्यक्तियों द्वारा दशकों तक अपना जीवन बिताया हों? सिर्फ 3x6 फुट का एक दरबाजे एवं कोठरी मे ऊंचे बने मात्र एक छोटे रोशन दान से उस दढ्वे नुमा कोठरी मे हवा और रोशनी के आने का इंतजाम हो, तत्कालीन वीर सेनानियों ने कैसे स्वतन्त्रता के संघर्ष के एवज़ मे मिली सजा को भोगा होगा? अंग्रेजों द्वारा बड़ी बर्बरता और क्रूरता से बंदियों पर अत्याचार किये जाते थे। तेल पिराई का काम कैदियों से लिया जाता था। जिसके अवशेष अवलोकनार्थ जेल मे आज भी मौजूद है।  केंद्रीय निरीक्षण टावर के चारो ओर सात लाइनों मे तिमंजिला भवन मे 694 काल कोठरियां बना बड़ी निरंकुशता से कैदियों को यहाँ रखा जाता था। आज केवल सात मे से तीन हिस्से ही है जीवंत देखे जा सकते है। वीर सावरकर को नासिक कलेक्टर की हत्या के जुर्म मे कालापानी के सजा हुई। अंग्रेज़ शासकों ने उन्हे दो बार आजन्म कैद की सजा दी। उनको सजा के तौर पर 50 वर्ष कालापानी मे वितना था। ऐसी सजायाफ्ता  वे एकलौते कैदी थे। जुलाई 1911 से मई 1921 तक वे सेल्यूलर जेल मे कैदी के रूप मे रहे। उनके बड़े भाई भी अंग्रेजों के विरुद्ध जुर्म मे कालापानी मे ही थे पर लगभग तीन साल तक दोनों को एक दूसरे के बारे मे जानकारी न थी। ऐसी थी अंग्रेजों के अत्याचार और अनाचार की कहानी। फांसी घर भी एक भयावह दृश्य उत्पन्न करता दिखता। पूरी सेल्यूलर जेल की बनावट कुछ  इस तरह से 1906 मे  की गई थी कि पूरे लगभग 687 कोठरियों को मात्र एक केंद्रीय टावर से नियंत्रित किया जा सके। एक विशेषता और थी सेल्यूलर जेल की, कि जेल के बाहर मैदान से कोई भी जेल कर्मी तीनों मंजिल के कैदियों को देख सकता था लेकिन कोई भी कैदी आपस मे एक दूसरे को नहीं देख सकता था। यहाँ तक कि बगल बाला कैदी भी अपने साथ बाले को नहीं देख सकता था ये बात और थी कि ऊंची आबाज मे शायद सुरक्षा कर्मियों से बच  बात कर सके।

रात मे प्रकाश एवं ध्वनि कार्यक्रम देखना रोमांच पैदा करने वाला था। ओम पुरी की आवाज मे जब सेल्यूलर जेल की कहानी सुनाई जाती है तो रोंगटे खड़े हो जाते है। बड़ा ही जीवंत प्रस्तुतीकरण दिखलाया गया। ऐसे लगता है सारे पात्र मौन होकर अपना चरित्र अभनीत कर रहे है और सूत्राधार हर पात्र की कहानी का चित्रण पूर्ण निस्तब्धता और सन्नाटे की बीच अपनी आवाज मे कर रहा हो।  

सेल्यूलर जेल का देशभक्ति की भावना से ओतप्रोत ये एक पहलू था। जेल की कालकोठरियों मे भारत के महान सपूतों ने देश की स्वतन्त्रता की खातिर जो कष्ट, वेदना और जुल्म सहे  उनके इस त्याग और बलिदान के कारण अंतर्मन से ही इस स्थान के प्रति श्रद्धा और सम्मान उमड़ता है। समय के चक्र ने इस स्थान को उन बलिदानियों के त्याग रूपी तप ने आज इतना सुंदर बना दिया कि जिसकी कल्पना नहीं की जा सकती। जेल के कण कण मे महान आत्माओं की दिव्यता का आभास होता है। लकड़ी से बने सेंट्रल टावर की सर्वोच्च भवन से चारों ओर का नज़ारा इतना सुंदर और जीवंत था कि कह नहीं सकते। हम उस छोटे से "काष्ठ भवन" मे  लगभग 2-3 घंटे बैठे रहे। एक ओर "रौस द्वीप" नज़र आ रहा था। दूसरी ओर गहरा  काला  रंग लिये समुद्र का पानी दूर दूर तक दिखाई देता। द्वीप पर हरे भरे सघन नारियल के पेड़ सहित अन्य लाखों पेड़ पौधे द्वीप की सुंदरता को और भी शोभयमान कर रहे थे। न चाहते हुए भी बेमन से वॉच टावर से उतरा और फिर सेलुलर जेल की काल कोठरियों की छत पर से नीचे बने निर्माण को निहार अपने आपको उन सेनानियों की मृत आत्माओं से साक्षात्कार करने की कोशिश कर उनको स्मरण करता  रहा। अप्रीतम द्रश्य था।       

पोर्ट ब्लेयर की मुख्य धरती से वोट की यात्रा से 5-6 किमी दूरी पर एक छोटा सा द्वीप रौस आईलैंड स्थित है जहां पर उस समय के अंग्रेज़ अफसर और उनके लोगो की रिहाइश थी। उस समय के विलसतापूर्ण जीवन की झांकी के भग्नावशेष के दर्शन इस द्वीप मे किये जा सकते थे।  जैसे द्वीप पर रोशनी आदि के लिये पावर हाउस, स्विमिंग पूल, क्लब, बेकरी, चर्च एवं पुराने अवसीय खंडहर जिनसे स्पष्ट अनुमान लगाया जा सकता था कि "खंडहर बता रहे है, इमारत बुलंद थी"। पूरे द्वीप का चक्कर डेढ़-दो घंटे मे लगाया जा सकता है। कुछ चाय आदि की भी सुविधा यहाँ उपलब्ध थी। काश देश के इस स्वर्ग अंडमान मे कुछ दिन, सप्ताह, महीने रहने की ख्वाइश पूरी हो तो आज भी मै वहाँ रहने के लोभ संभरण से न चूंकूँ?

केंद्र शासित प्रदेश होने के कारण सम्पूर्ण व्यवस्थाएं उत्तम कोटि की थी। मसलन उन दिनों भी पेट्रोल 5-6 रुपए से ज्यादा उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के मुक़ाबले सस्ता था। अंतर द्वीप यात्रा के लिये उपलब्ध फेरि सुविधाओं का किराया स्थानीय निवासियों को नाम मात्र के किराये पर उपलब्ध थी। साक्षारता का प्रतिशत भी देश के अन्य राज्यों की तुलना मे सर्वोपरि  था। बिजली की भरपूर उपलब्धता बहुत ही कम दामों पर थी। हर जगह सड़के शानदार बनी हुई थी। जब सड़क का जाल सम्पूर्ण  द्वीप पर बिखरा हो और प्रकृति भी जंगल और समुद्र के रूप मे मुक्त हस्त से स्नेह  वर्षा रही हो, प्रदूषण का नामोनिशान न हो, प्रशासन द्वारा साफ सफाई की चाक चौबन्द व्यवस्था हो, स्थानीय निवासियों का व्यवहार सहयोगात्मक हो, अपराध का प्रतिशत "जीरो" हो, जगह जगह प्रकृतिक सौन्दर्य के नज़ारे कदम कदम पर दृष्टिगोचर हों  तो दिल्ली एनसीआर तो एक जलती और धुआँ उगलती भट्टी के सदृश्य नज़र आयेगा ही!!

उन दिनों हमारे बैंक की अंडमान निकोबार द्वीप समूह पर कोई शाखा न थी। यहाँ के शांत एवं सुखद जीवन शैली से प्रभावित हो मैंने एक बार यूं ही अपने प्रबंधन और संगठन के नेतृत्व से आग्रह किया था कि यदि एक शाखा यहाँ अंडमान मे खुलती है तो मै यहाँ की प्रथम पदस्थपना के पाँच वर्ष के कार्यकाल व्यतीत करने को तैयार हूँ।

महा अंडमानी, जरबा, ओंग और सेंटीनली जनजाति यहाँ की संरक्षित जाति मे आती है जो एक-दो द्वीप समूह तक ही सीमित है और उनका मुख्य भूमि के लोगो से किसी भी तरह का संपर्क नहीं है। इन जतियों के संरक्षण हेतु  सरकार की अनेक कल्याण पूरक योजनाओं को सीमित स्टाफ के माध्यम से इन तक पहुंचाया जाता है जिनके लिये विशेष प्रशिक्षित स्टाफ ही उनके साथ जुड़ा है क्योंकि ये खूंखार स्वभाव के लोग है जो अपने वर्ग के बाहर के लोगो से एकदम दूर है। यदि कभी किसी बाहरी व्यक्ति ने इनके नजदीक आने की कोशिश भी की तो ये तीर कमानों और भालों आदि से जान लेने मे भी नहीं हिचकते। विशेष संरक्षण के कारण इनके विरुद्ध किसी भी तरह की कोई कार्यवाही वर्जित है। इनके रिहाइश के आस पास इस तरह के चेतावनी वाले बोर्ड सामान्य जनो के लिये लगाये गये है। हमे सौभाग्य मिला कि बाराटांग भ्रमण के दौरान जरबा जाति के इन नागरिकों को जो सड़क किनारे पुलिस के संरक्षण मे खड़े थे। बस ड्राईवर ने बिलकुल शांत रहने की चेतावनी पहले ही दे दी थी। पुलिस ने भी उनके खड़े स्थान के पूर्व ही गाड़ियों को न रोकने, हॉर्न और शोर ने मचाने की हिदायत पहले ही ड्राईवर को दे दी थी। इस द्वीप पर जाने के लिये वाहनों को झुंड मे पुलिस अभिरक्षा मे ही भेजा जाता है।                   

नॉर्थ वे द्वीप, हैवलॉक द्वीप,कार्बाइन कोव, जॉली बॉय,  चिड़िया टापू जैसे अन्य अनेक सी बीच है जिनपर जाकर नहाना यादगार क्षण होते है। बस अंतर इतना ही है कि यहाँ के बीच एकदम साफ सुथरे है।  गंदगी, प्लास्टिक आदि फैलाने के विरुद्ध नियम सख्त है।   मैनग्रूव खारे पानी के समुद्री दलदली  जंगल बाराटांग मे प्रकृतिक रूप से पानी के रिसाव से बनी चूने की गुफाएँ भी दर्शनीय थी। जमीन से कुछ मीटर नीचे 2-3 किमी लंबी स्याह अंधेरे मे चूने की गुफाओं को देखना अपने आप मे एक रोमांचक अनुभव था।  समुद्र की तलहटी मे मूँगे की चट्टानों की रंग बिरंगी दुनियाँ वोट की तली मे लगे काँच से देखी जा सकती थी। एक अलग ही सपनों के दुनियाँ जिनमे हर रंग की छोटी बड़ी मछ्लियाँ जीव जन्तु अपने मूँगे की चट्टानों के महलों मे विचरती नज़र आयेंगी। समुद्री किनारे अन्य समुद्रीय तट के शहरों की तरह ही होते है पर अंडमान के समुद्र तट पर्यावरण के प्रदूषण से मुक्त साफ सुथरे और मन भावन है। एक बार अंडमान जाने के बाबजूद आज भी पुनः एक बार फिर से वहाँ जाने की आकांक्षा और उत्कंठा लंबा  प्रवास व्यतीत करने  के लिये आज भी ज़ेहन मे जीवित है देखो ईश्वर कब पुनः इस अतृप्त  ईक्षा की पूर्ति करता है। हमे इंतज़ार है।

 

विजय सहगल

शुक्रवार, 18 सितंबर 2020

स्केल-फाइव एवं कुतुब मीनार" (व्यंग)

 

"स्केल-फाइव एवं कुतुब मीनार" (व्यंग)





यहाँ पर कुतुब मीनार के निर्माण, इतिहास, वास्तु या पुरातत्व की चर्चा करने का मेरा कोई इरादा नहीं है। न ही इसके इतिहास की, कि किसकी थी किसने बनाई इससे भी हमे कोई सरोकार न था, लेकिन उपयोगिता और अनुभव  के बाद एक बात पक्की है ये मीनार फिलहाल बैंक बालो के कब्जे मे है!! एक बारगी लगा कहीं ऐसा तो नहीं कुतुब मीनार बनाने के लिये कुत्बुद्दीन एबक ने लिये ऋण की अदायगी मे चूक के कारण बैंक ने इसे "गैर निष्पादन अस्ति" अर्थात "एनपीए"  के तहत मीनार को अपने उपयोग के लिये अपने आधिपत्य मे ले लिया हो?  कुतुब मीनार इतिहास की एक अकेली ऐसी मीनार है जो तमाम लोगो के सफलताओं और असफलताओं की एक मूक गवाह रही है। अनेकों ने इस मीनार से प्रेरणा ग्रहण कर इसकी ऊंचाई को अपने  आदर्श का पैमाने मान सफलताओं को हांसिल किया है इसके विपरीत कई लोगो ने अपनी असफलताओं पर दुःख और खेद जताने के लिये इसका सहारा ले जीवन की "ईह लीला" को समाप्त कर लिया?  ऐसी ही कुछ मामलों मे कुतुब मीनार की यहाँ चर्चा करूंगा। 

वर्षों पहले से ही  बैंक की नौकरी मे प्रबन्धक नाम का प्राणी हमेशा "टार्गेट" नमक शब्द से सबसे ज्यादा दुःखी पीढ़ित और परेशान रहा है। न जाने कितने निरीह मैनेजर इस टार्गेट रूपी दैत्य के कारण अपने उच्च प्रबंधन के क्रूर दुर्व्यवहार के शिकार हो गये। वर्षों पूर्व एक सीधा साधा ग्रामीण परवेश से निकला मैनेजर प्रोन्नति के चक्कर मे मैनेजर पद को तो प्राप्त हो गया। घर परिवार, नाते रिश्तेदारों  का खुश होना स्वाभाविक था पर हाय रे मैनेजर इस मैनेजरी के पीछे का दुःख तो तेरे सिवा और कौन जानता जिसके साथ वो  अपने दुखडों  को सांझा करता? उच्च अधिकारियों का दबाब कि बढ़ाओ डिपॉज़िट-एडवांस तो बढ़ जाता एनपीए और जब रीज़नल मैनेजर कहता कम करो एनपीए तो कम हो जाता डिपॉज़िट-एडवांस। जीवन की इस आपाधापी और रोज रोज की चिक चिक से उस गाँव के मैनेजर ने अपनी ईह जीवन लीला समाप्त करने का निर्णय ले लिया। दूसरों के सामने दुःखड़ा रोने का कोई मतलब न था क्योंकि वो कहावत है न "जाके पाँव न फटी बिवाई, वो क्या जाने पीर पराई"। डिपॉज़िट  लाने मे, खाते खोलने मे, गैर निष्पादन कारी आस्तियों को कम करने मे लाचार मैनेजर ने इस अंतिम घड़ी मे घर परिवार एवं बैंक को अपना संदेश भी लिख, शर्ट  की उपरी जेब मे रख लिया ताकि अंत समय किसी भी संकट मे किसी को कोई तकलीफ न हो और चल दिया मेहरोली की विश्व धरोहर "कुतुबमीनार" की ओर।  विचार यही था "न रहेगा बांस, न बजेगी बांसुरी"।

अपनी धुन मे खोये मैनेजर को कुतुबमिनार के गेट के अंदर प्रवेश करते ही पुरातत्व के कर्मचारी ने उसे रोक टिकिट मांगा? मैनेजर ने मन ही मन कहा, "हा शोक!", अंतर देशी यात्रा के लिये तो टिकिट लेने की अनिवार्यता को तो सुना और समझा था, पर दुनियाँ से विदा हो  अंतिम यात्रा अर्थात देवलोक गमन करने के लिये भी टिकिट लेना पड़ेगा इसका आभास न था? पर मरता क्या न करता दो रुपए का टिकिट ले कुतुब मीनार के परिसर मे प्रवेश किया। इरादा अटल था, निश्चय द्रढ़ था भरी दोपहरी कुतुब मीनार की पहली सीढ़ी पर  चढ़ने के लिये उसने कदम बढ़ा ही लिया था। उन दिनों आज की तरह मीनार के अंदर चढ़ने की मनाही न थी लेकिन शायद  इन्ही सब बैंक अफसरों के परलोक वासी  हादसों ने प्रशासन को इसकी ऊपरी मंजिलों पर चढ़ने की पाबंदी लगानी पड़ी।  पक्के इरादे के साथ मैनेजर ने दीन दुनियाँ को पीछे  मुड़ एक बार देखा, मन ही मन सभी को प्रणाम कर अपने किये के लिये माफी मांगी और बढ़ लिया आगे सीढ़ियों की ओर। एक, दो, तीन, चार लेकिन कहाँ तक सीढ़ियों को गिनता और इस तरह  बचपन के गिनती पहाड़े के बोझ को इस अंत समय मे सिर से हल्का कर लिया। चढ़ते चढ़ते मैनेजर   कुतुब मीनार की  पहली मंजिल और  जीवन की  आखिरी  मंजिल पर कब  पहुँच गया पता ही न चला।

मीनार के  पहले  और ज़िंदगी के  आखिरी पढ़ाव  पर दो पल के लिये सुस्ताया और एक बार घर मे छोटी नन्ही से प्यारी बेटी की यादों मे खो गया। बैंक के पूर्व कितनी सुखी और हँसती खेलती ज़िंदगी थी उसकी। गाँव के पोस्ट ऑफिस मे बाबू था। चैन की नौकरी थी। न टार्गेट का चक्कर न एनपीए या बसूली की खट खट। गाँव मे ही बूढ़े माँ-बाप और पत्नी परिवार के साथ खुश था। लेकिन सरपंच जी की सिफ़ारिश पर बैंक का अफसर हो उन दिनों गाये जाने बाले फिल्मी गीत को यथार्थ मे परिवर्तित कर दिया कि "साला मै तो साहब बन गया ..............."।  अफसर बन वह देश की राजधानी दिल्ली मे पदस्थ हुआ और कुछ समय बाद मैनेजर भी बना था। अचानक बीते हुए दिनों की कल्पना से बाहर आ  उसने पहली मंजिल से नीचे झाँका, शंका हुई वांछित फल की प्राप्ति हो न हो, परमगति मिली तो ठीक और यदि इसमे चूके तो टूटी  हड्डी पसलियाँ लिये समाज के लोग बड़ी छीछालेदर करेंगे? कहीं ऐसा तो नहीं, "आसमान से गिरे, खजूर मे अटके", तो बड़ी दुर्गति होगी। इन्हे शंकाओं-कुशंकाओं के बीच दृढ़ निश्चय और अटल इरादे लिये, चढ़ लिया उपर और उपर की ओर। अब इरादा था पाँचवी मंजिल। शंका लेश मात्र भी नहीं। आत्मघात का निश्चित लक्ष्य आँखों मे लिए पाँचवी मंजिल की बालकनी से झाँका, कहीं कोई शंका नहीं इकदम स्पष्ट लक्ष्य। दुनियाँ के सारे कष्टों से मुक्ति और ईश्वर से एकाकार होना सामने ही दिखाई पड़ रहा था। दो घड़ी रुका था वह ताकि इस अंतिम समय उपर वाले को स्मरण कर अपने किए धरे के लिये माफी मांगले। जैसे ही अत्महत्या के लिये कदम आगे बढ़ाया ही था कि अचानक किसी ने कॉलर पकड़ ज़ोर से पीछे खींचा! दरम्यानि उम्र के  एक भद्र पुरुष ने ज़ोर से पूंछा? किस स्केल मे है तू? सुनकर आश्चर्य तो हुआ जैसे अंतर्यामी श्रेष्ठी बैंक के प्रमोशन का इंटरव्यू लेने साक्षात धरती पर पधारे हों? मेरे मुंह से वरवश ही निकाल पड़ा स्केल-I॰ फिर क्या था चटा-चट दो थप्पड़ उन महाश्य  ने जड़  दिये मुंह के दोनों गालों पर और चीख कर बोले- "औकात भिखारियों की और शौक नवाबों के"। एक बार फिर चिहुँक कर बोला -: मूर्ख!!, ये पाँचवी मंजिल स्केल फाइव के लिये निर्धारित है, जा भाग यहाँ से सीधे पहली मंजिल की ओर। जैसे ही नीचे सीढ़ियों की तरफ देख अपनी औकात की मंजिल की ओर कदम बढ़ाते कि अचानक पीछे से एक जोरदार शक्ति का आभास हुआ मानों कार का एक्सिलेटर किसी ने पैर की  पूरी ताकत से दबाया हो? पिछवाड़े उस शक्ति के अहसास के अनुभव ने मैनेजर साहब के सारे के सारे कदम, एकसाथ बगैर कदमों के ही तेज रफ्तार से सीढ़ियों के नीचे की ओर गिरते-पढ़ते, लुढ़कते-पुढ़कते बढा  लिये मानों सीढ़ियों से नीचे कोई खाली ड्रम लुढ़कना शुरू करता हो। इस तरह कब पहली मंजिल निकली पता ही नहीं चला और अपनी औकात की पहली मंजिल से भी नीचे जमीन पर पड़ा था। सूरज की रोशनी का चका-चौंध वाला दिन था, पर न जाने क्यों दिन मे तारे साफ साफ दिखाई दे रहे थे!!  अब तक हिम्मत भी जबाब दे चुकी थी। अत्महत्या का भूत चारों खाने चित्त दिन मे तारों को गिन रहा था। रह रह कर उस थप्पड़ और स्वर्ग सिधारने के निर्धारित स्केल रूपी मार्ग  की कल्पना ने हाथ पैर फिर से ठंडे कर दिये थे। अगली सुबह मैनेजर साहब शाखा मे फिर से डांट खाने को हाज़िर थे। ये ही सोच कर हालात से सम्झौता कर लिया शायद बैंक के मैनेजर की ये ही नियति हो। संकट की इस घड़ी मे एक बार प्रभु स्मरण हो आना स्वाभाविक था मन ही मन उन्हे याद किया-:  

"सीता-राम, सीता-राम, सीता-राम कहिए। 

जाहे विधि राखे "आर॰ एम॰" ताहि विधि रहिए॥             

विजय सहगल     

सोमवार, 14 सितंबर 2020

मान न हम रखने पाये


"मान न हम रखने पाये"


 



लड़े जो देश की खातिर उनका,
मान न हम रखने पाये?
लज्जित है हम, "देश के वीरों",
कैसे "कृतघ्न" उस माँ के जाये॥


लड़े जो सीमा, देश की खातिर।
जान हथेली पर थी तब आखिर॥
सीमा पर तब जान लड़ाई।
बड़ी कठिनता "मुक्ति" पाई॥
कैसे "शिव" की हम संताने?
राष्ट्र भक्ति भी न जाने?
शीश झुका दुश्मन का तुमने
वीरों, देश का मान बढ़ाया।
हा शोक! दुर्भाग्य हमारे,
रूप "दोगला" तुम्हें दिखाया॥


राह मे "युद्धवीर" जो आया।
उसका वो सम्मान न भाया?
तुम निर्लज्ज कुमारग मति के।
अधम, नीच, पाथ पतित हे॥
हिंसा, विरुद्ध, वीर तुमने की।

दोष "नयन लहू" भरने की॥
जिसने देश का मान बढ़ाया।
अपमानित कर उसे गिराया॥
"शूर वीर" से कर अधिमाई।
हे नर, लाज तनिक न आई॥


थी कायरता, न थी शान।
ये नपुंसकता की पहचान॥
शर्मसार हैं, हर जन, मन मे।
कैसे कपूत हे "शिव", माँ जन्मे॥
कैसे कपूत हे "शिव", माँ जन्मे॥

विजय सहगल































 कैसे कपूत हे "शिव", माँ जन्मे॥ 

विजय सहगल 


शनिवार, 12 सितंबर 2020

बृहन्मुंबई म्यूनिसिपल कार्पोरेशन (बीएमसी)

 

"बृहन्मुंबई म्यूनिसिपल कार्पोरेशन"




बधाई हो!! बृहन्मुंबई म्यूनिसिपल कार्पोरेशन के बहादुर, जांबाज और वीरोचित आचरण और  पुरोषिचित  कर्म करने वाले, अपने आकाओं के पैरों के तलुए का रसास्वादन करने बाले चापलूस नपुंसक अधिकारियों तुमने एक महिला को उसकी औकात दिखा दी?? आपके इस महान कायरता पूर्ण क्रत पर देश शर्मसार है??  तुम्हारे बगैर पूंछ के  आकाओं की भाषा मे कहे तो तुम जैसे कर्तव्य परायण अधिकारियों के माध्यम से तुमने "उखाड़ दिया"। बृहन्मुंबई के रेगने बाले नौकरशाहों! एक महिला के विरुद्ध तुम्हारे इस पराक्रम को इतिहास मे लिखा तो अवश्य ही जाएगा ही लेकिन उसके अक्षरों का रंग स्वर्ण न हो कर स्याह कालिख लिये होगा।

बृहन्मुंबई के महान कर्मचारियों  तुम्हारे वैधानिक कर्तव्यों मे मुंबई की आवासीय व्यवस्था, प्रकाश व्यवस्था, जल-मल निकासी  व्यवस्था, सफाई एवं स्वस्थ व्यवस्था सहित  मुंबई के समस्त नागरिकों के जीवन को सरल, आसान और सुविधा जनक बनाने की महति ज़िम्मेदारी तुम्हारे कंधों पर थी। तुम्हारे आचरण और व्यवहार से ये अपेक्षा और आशा भी थी कि निष्पक्ष और विना भेदभाव के आप मुंबई के सभी नागरिकों से बगैर किसी राग द्वेष के विधि सम्मत आचरण और व्यवहार  करेंगे। लेकिन अपने क्लैव्यता और पौरुषहीन आश्रय दाताओं की "चापलूस  सूची" मे स्थान पाने की तुम्हारी तीव्र लालसा और एक महिला के घरौंदे को त्वरित गति से "उखाड़ने" की आकांक्षा ने अपने आपको जन सेवक की सूची से विलग "दरबारी सेवकों" की "भाड़" सूची मे शामिल होने मे सफलता हांसिल कर ली। बृहन्मुंबई नगर निगम ने देश तो छोड़िये   दुनियाँ की शायद ही कोई ऐसी म्यूनिसिपल कार्पोरेशन हो जिसने अखिल ब्रहमाण्ड नायक सुकुमार की निज आत्मतुष्ट अहंकार  और ईक्षा पूर्ति ने बिजली से भी तेज, त्वरित कार्यवाही कर एक  अबला के घर को धूल धूसरित करने की कुचेष्टाओं को अंजाम दिया। क्या ये बिना रीढ़ वाले अधिकारी शपथ पूर्वक कह सकते है कि मुंबई मे अब एक भी अनधिकृत घर नहीं? क्या मुंबई मे  दुनियाँ के सबसे बड़े डॉन दाऊद के घर सहित सभी आवासों के  निर्माण भी बृहनमुंबई म्यूनिसिपल कार्पोरेशन द्वारा स्वीकृत मानचित्र के अनुसार है? जो तेजी और तत्परता इस महिला  के घर को रौंदने मे  बीएमसी के नीति नियंताओं ने की, क्या हाइ कोर्ट के आदेशों के बाबजूद इस तत्परता का  एकांश प्रयास भी  भिंडी बाजार स्थित मुंबई के डॉन दाऊद के अवैध मकान को गिराने मे बीएमसी अधिकारियों ने किये? कदापि नहीं! बिल्कुल नहीं!  क्योंकि  बृहन्मुंबई के ये चाटुकार अधिकारी जानते थे कि एक साधारण औरत के विरुद्ध ये अपनी मर्दानगी बुलडोजर चला कर दिखा सकते है क्योंकि उनके राजनैतिक आकाओं का बरदहस्त उनके सर पर है। लेकिन यही वीरोचित कार्य, बहदुरी, मर्दानगी कर्तव्यपरायणता मुंबई के डॉन के घर को बुलडोजर से  नेस्तनाबूद करने की कार्यवाही तो दूर इस कार्यवाही की एक झूठ-मूठ झलक, नाटक-नौटंकी   या प्रयास भी इन अधिकारियों ने किये होते तो उनकी  पेंट के आगे गीले द्रव्य के दर्शन और पेंट के पीछे ठोस कम्पोस्ट खाद रूपी प्राकृतिक पदार्थ की झलक स्पष्ट दिखलाई देने लगती।           

"उखाड़ दिया" जैसे वीरोचित कार्य करने बाले "सामना" के संपादक महोदय, एक महिला के घर को इस तरह तोड़ आपने जो  घिनौनी कायरतापूर्ण कार्यवाही का चित्रण अपने सामना पत्र मे सुर्खियों मे छाप  कर खुद ही अपनी वाहवाही कर अपनी पीठ ठोक कर मंत्रमुग्ध होने का जो ये अधम कृत किया है,  हे! पापायु: पुरुष आपके इस तथाकथित वीरोचित  दुष्कृत को आपके अपने आदर्श देवलोक वासी  स्वर्गीय श्री की मृतात्मा  ही नहीं अपितु समान्यतः देश का सारा जनमानस और विशेषतः सारी "नारी जाति"  इस अपमान से शर्मसार महसूस कर रही  है। अपने आपको हिन्दू हृदय सम्राट का अनुयाई बताने वाले छद्म सनातन पुरुष जिस देश मे वेदों की ऋचाओं की ये आवाज "यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता:" सारे वातावरण मे गुंजायमान होती हो वहाँ तुम्हारे इस कुकृत ने महाभारत मे द्रोपदी के चीर हरण की उस निंदनीय घटना को पुनः स्मरण करा दिया। दुर्भाग्य तो ये है राज सत्ता की महाराष्ट्र सरकार जिसका कर्तव्य था कि प्रदेश की जनता को  बिना भेदभाव सेवा और सुरक्षा प्रदान करती। परंतु स्वयं ही अपने दल के क्षत्रपों और नौकर शाहों को महाभारत के पितामह भीष्म की तरह सत्ता के अनाचार और अत्याचार की अनदेखी कर मौन रही? वे बृहनमुंबई की  सत्ता के सरकारी नौकरों और जनसेवकों के कुटिल गठजोड़ से उपजी वैधानिक शक्ति का दुर्पयोग ठीक उसी तरह कर रहे है जैसे महाभारत काल मे कभी  दुर्योधन के कुकर्मों की अनदेखी ध्रटराष्ट्र और पितामह भीष्म ने की थी।  वे उन पौराणिक घटना क्रम  को विस्मृत कर रहे है जिसमे बृहनमुंबई कार्पोरेशन राजनैतिक नेताओं और नौकरशाहों के भ्रष्ट और पक्षपाती रवैये  को संरक्षित और पोषित  कर भस्मासुर रूपी दैत्याकार को रूप देने मे लगे है जो कालांतर मे उनके पतन का हेतु बनेगा।

बृहन्मुंबई म्यूनिसिपल कार्पोरेशन के  जिन निरंकुश नौकर शाहों ने अपने कुटिल आकाओं के संरक्षत्व मे एक नारी जिसकी  कोई बहुत बड़ी पारवारिक पृष्ठभूमि दिखाई नहीं देती। जिसके माता-पिता, भाई बहिन रूपी-रिश्ते इस संघर्ष रूपी घटना क्रम मे कहीं दूर दूर तक  सुनाई और दिखाई नहीं देते। क्या सामान्य भारतीय परिवारों की कोई महिला बगैर किसी पारवारिक सदस्यों के साथ या सहयोग के आकंठ भ्रष्टाचार, अनाचार और दुर्विचार रूपी कदाचार मे डूबे फिल्म उद्धयोग मे पूर्व से ही स्थापित परिवार बाद या  भाई-भतीजाबाद से लड़ सकती है? इसकी कल्पना भी मुश्किल है।   कौरवों के कुटिल सेना नायकों ने जिस तरह  अधोपतन सोच के बशीभूत   चक्रव्यूह की रचना कर वीर अभिमन्यु को जयद्रथ सहित कौरवों के सेनापतियों ने घेर कर नीति विरुद्ध शास्त्रीय युद्ध के नियमों की अवहेलना कर षड्यंत्र पूर्वक मारा था ऐसे ही कुछ साजिशें बृहन मुंबई के अधिकारियों की साँठ-गांठ से इन कुटिल राजनैतिक सेना नायकों ने एक अकेली नारी के विरुद्ध  साम-दाम-दंड-भेद की शास्त्र  विरुद्ध नीतियों का कपट पूर्ण उपयोग  कर किया जा रहा है। इस पुरुष प्रधान एवं व्यक्ति वर्चस्व रूपी समाजिक युद्ध मे जैसे वीर अभिमन्यु ने  कौरव पक्ष के सेनानायकों की वीरोचित अभिमान को परास्त कर व्यूह भेदन कर  उनको छट्टी का दूध याद दिला दिया था बैसे ही कुछ उस अकेली वीरांगना ने आज बीएमसी सहित मुंबई के राजनैतिक खलनायकों को कर दिखाया है।   

तुम्हारे दल के अखिल भारतीय प्रमुख से लेकर गली मुहल्ले के छुटभैये तथाकथित शेरों तक ने अपने सारे तीर-कमान, अशस्त्र-शस्त्र, भाले-बरछे रूपी सारी ताकत एक इकलौती "शस्त्र विहीन" महिला को परास्त करने मे झौंक दी। अपनी आत्म प्रशंसा के पुल बाँध "अपने मुंह मियाँ मिट्ठू" बनने बाले आपके मुख पत्र "सामना" मे एक महिला के विरुद्ध "उखाड़ दिया" जैसे निर्लज्ज शब्दों का पत्र के मुख्य पृष्ठ पर उल्लेख करके आप अपनी कौन सी  सांस्कृति और सभ्यता से देश को अवगत कराना चाहते है? इस कायरता पूर्ण फूहड़ प्रदर्शन  करके आपने कौन से पाराक्रम और विरोचित कार्य किया? आपके पूरे राजनैतिक  परिवार की ये हताशा, निराशा, निरंकुशता, ये प्रदर्शित कर रही है कि ये आपकी एक नारी के विरुद्ध हार है, पराजय है, शिकस्त है और हाँ पराभूत भी। जिसे आज सारा देश बड़ी स्पष्टता से देख रहा है।      

लेकिन वर्तमान शासकों और उनके सिपहसालार को एक बात अच्छी तरह याद रखना चाहिए कि इतिहास के स्वर्णाक्षरों मे नाम उन्ही वीरोचित वीर योद्धाओं और बलिदानियों के लिखे जाते है जिन्होंने अपने प्राणों की आहुति हमेशा नीति परक, शास्त्र विहित पथ पर चल देश के लिये की। कदाचित ही  कायरों, धोखेबाज़ों, कुटिल षड्यंत्रकारियों के नाम कहीं इतिहास के पन्नों मे दिखाई देता है? हाँ, जयचंद और मीर जाफ़रों के नाम को दुनियाँ सदा ही हिकारत की दृष्टि से देखती और धिक्कारती है।       

विजय सहगल

 

 

 

बुधवार, 9 सितंबर 2020

"सेल्फ़ी" और "सेल्फ़िटिस"


"सेल्फ़िटिस"




शायद सन् 2000 की बात थी, साल के बारे मे निश्चित नहीं हूँ पर बैंक की वो ट्रेनिंग अपने आप मे अलग ही तरह की थी। उक्त प्रशिक्षण छः बैंक के साउथ एक्सटैन्शन, नई दिल्ली  स्थित प्रशिक्षण महाविध्यालय मे किया गया था।  उस  प्रशिक्षण मे कोई भी बात बैंक या उसकी कार्य प्रणाली से जुड़ी न थी सारा ज़ोर नेतृत्व विकास पर था। प्रशिक्षण कार्यक्रम की विषय वस्तु मनोविज्ञान की पृष्ठभूमि मे समूहिक सफलता, छुपी प्रतिभा को परिष्कृत करना, आपसी सहयोग आदि  पर आधारित था।  उस ट्रेनिंग मे एक "जोहरी विंडो" (Joseph  and Heri नाम के दो मनोवैज्ञानिक के नाम पर Johary window) के नाम से विषय था जिसमे मानव स्वभाव का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण खुद और दूसरों के साथ सम्बन्धों की कल्पना की  गयी थी। उस विधि को जोहरी विंडो नाम दिया था।  उंक्त विषय के अंतर्गत किसी व्यक्ति के बारे  मे समाज के अन्य  लोग क्या और कैसे सोचते है से संबन्धित था, लेकिन इसमे एक पॉइंट जो विशेष था और जो हमे अब तक याद है वह था कि "कई बार हमे हमारी कमजोरियों, कमियाँ या आदते  स्वयं दिखाई नहीं देती जबकि दूसरे आपके साथी या  सामने उपस्थित अन्य लोग उसे साफ महसूस कर सकते है देख और सुन सकते है"। ये आदते जैसे बोलते समय आपका कोई "तकिया कलाम" अर्थात किसी शब्द का बोलते समय बार बार उपयोग या असामान्य हावभाव भी हो सकते है। उदाहरण के तौर पर भारत सरकार के केंद्रीय उपभोक्ता मंत्री श्री राम बिलास पासवान प्रायः अपने बोलचाल या भाषण मे दो वाक्यों का इस्तेमाल बार बार करते है पहला  "क्या कहते है कि" एवं दूसरा "जो है" या "ये जो है"। शायद वे इस कमी से वाकिफ हों या न हों पर जन सामान्य उनकी इस कमी या आदत से अच्छी तरह बाकिफ है।

एक अन्य केंद्रीय प्रभावशाली मंत्री श्री अमित शाह की भी  एक आदत  मेरे सहित अनेक लोगो ने भी शायद महसूस की होगी कि कभी कभी जब वे संसद मे या बाहर भी भाषण देते समय हाथ मे लिये पेजों या दस्तावेजों के पन्ने को अंगूठे या अंगुलियों को जीभ  मे लगे  थूंक की सहायता से पलटते है। अनेकों लोग इस आदत से पीढ़ित हो मजबूर होंगे। इस तरह की छोटी लेकिन महत्वपूर्ण कमियों या आदतों को आप का कोई हितैषी या शुभचिंतक अंतश्चेतन मन को मजबूर करने वाली इन  कमजोरी या आदत को आपको ऐसा करने से रोकने के लिये जरूर आगाह करा सकता है लेकिन यह तभी संभव होगा जब वह आपका अति निकटस्थ आपका मित्र या हितचिंतक हो।

कुछ समय पूर्व मै एक फ़ेस बुक पेज "विश्व हिन्दी संस्थान, कनाडा" से जुड़ा था। अपने थोड़े  लिखने-पढ़ने  आदि के शौक को उस ग्रुप मे प्रकाशित कर पूरा करता था। इस फ़ेस बुक पेज जिसके  लगभग सत्तर हजार के करीब सदस्य थे से जुड़ साहित्यिक ज्ञानार्जन आदि करता रहा। कुछ समय उस फ़ेस बुक पेज का अध्यन और अध्यापन कर मै शीघ्र ही एक अदृश्य  हीन  भावना से ग्रसित हो गया और  अपनी छोटी मोटी रचनाएँ उसमे पोस्ट करना बंद कर दिया क्योंकि उस ग्रुप मे लेखक और लेखिकायेँ अपनी रचना के साथ-साथ  अपनी सुंदर आभूषण और वस्त्रों से सुसज्जित  "स्वदेह रचना" (सेल्फी) की फोटो भी पोस्ट करते। इस आयोजन मे पुरुष और महिला लेखक समान रूप से सहभागी थे।  यध्यपि उनके द्वारा लिखित रचनाए अपने आप मे परिपूर्ण और उत्क्रष्ट थी, उन रचनाओं और आलेखों को आकर्षित और पठनीय बनाने हेतु  किसी बाहरी छद्म आडंबर रूपी क्षणभंगुर नश्वर देह की सुंदरता को शामिल करने की आवश्यकता नहीं थी। पर चूंकि वो एक रस्म और परंपरा बन गई थी इसलिये लेखक और कवि अपनी स्वरचित  रचना के साथ अपनी स्व-चित्र (सेल्फी) भी चिपकाने लगे।  जिसमे मुझ जैसे खुर-बुर्रे पके केश विन्यास, असुंदर चेहरे वाले व्यक्ति की "रचना/लेख"  उक्त व्यवस्था के अनुकूल न होने के कारण उससे दूरी बना लेने का मन करने लगा। पर दूसरे पल ही अर्जुन की "न दैन्यम न पलायनम्" अर्थात "चुनौतियों से भागना नहीं अपितु जूझना" वाली नीति का अनुसरण कर अपने रूखे, बहुतायत पके सफ़ेद-काले खिजड़ी  बालों मे कालिख पोत सुंदर चेहरा बना सुंदर सेल्फी लेने की विधि सीखने हेतु  गूगल पर छान बीन शुरू की। इस  प्रिक्रिया के दौरान सेल्फी की आधुनिक विधियों के बीच ही सेल्फी से जुड़ी एक मनोवैज्ञानिक बीमारी भी दिखाई दी जिसे "सेल्फ़िटिस" के नाम से बताया गया था। अब तो सेल्फी खींचना कहीं पृष्ठभूमि मे समा गई और "सेल्फ़िटिस" की खोज मुख्य विषय हो गया।     
        
इसी तारतम्य मे अभी कुछ दिन पूर्व देश के एक अग्रणी समाचार पत्र नवभारत टाइम्स मे सेल्फी से संबन्धित एक बीमारी "सेलफाइटिस" के बारे मे विस्तृत रिपोर्ट पढ़ी। (https://navbharattimes.indiatimes.com/lifestyle/health/more-than-three-selfies-a-day-may-cause-selfitis-disease/articleshow/62112204.cms)  इस नई मनोवैज्ञानिक रुग्णताके बारे मे कुछ विदेशी विश्व विध्यालय के अलावा तमिलनाडु के त्यागराजार स्कूल ऑफ मैनेजमेंट के छात्रों द्वारा सन् 2014-15 मे शोध पर आधारित थी। इस नशेबाजी  रूपी मानसिक अस्वस्था के शोध का प्रकाशन रिसर्च इंटरनैशनल जर्नल ऑफ मेंटल हेल्थ ऐंड अडिक्शन मे हुआ। (https://link.springer.com/article/10.1007/s11469-017-9844-x)। जान कर आश्चर्य हुआ कि इस बीमारी की पहली अवस्था मे तीन तक सेल्फी लेना पर सोश्ल मीडिया मे पोस्ट न करना। दूसरी अवस्था जिसे  क्रोनिक बीमारी कहा गया जिसमे फोटो सेल्फी को सोश्ल मीडिया मे पोस्ट करना है। तीसरी तो स्वाभाविक तौर पर हर समय सेल्फी ले मीडिया मे डालना की आदत को पागलपन की श्रेणी ने हमे हैरान और परेशान कर दिया।

अनुसंधानकर्ताओं ने इनके कारणों मे मुख्य रूप से आत्मविश्वास के क्षरण, अपनी स्वीकार्यता बढ़ाने एवं लोगो से आगे रहने की चाहत को माना।   

सेल्फ़िटिस रूपी इस बीमारी ने हमे हमारे रचना के साथ सेल्फी चिपकाने की आदत पर पुनर्विचार करने को मजबूर कर दिया। सेल्फ़िटिस की इस मनोदशा को सोचने और चिंतन मनन ने हमारी मन मे भयावह विचार मंथन का समुद्र उमड़ने घुमड़ने लगा, तब हमने अपने और अपने चारों ओर इस विषय मे शोध शुरू किया तो घोर आश्चर्य हुआ कि इस बीमारी की व्यापकता भाषा, प्रांत, क्षेत्रीयता, संप्रदाय, लिंग, शिक्षा, योग्यता, पद प्रतिष्ठा और उम्र  से परे है। बच्चे की सेल्फी की लालसा तो बचपना मान नजरंदाज की जा सकती थी पर परिपक्व वानप्रस्थ उम्र के लोगो की सेल्फी की बेकरारी पर सवाल लाज़मी था? अनपढ़ व्यक्तियों के सेल्फी की दीवानगी तो अशिक्षा के कारणों से समझी जा सकती थी लेकिन शिक्षित और विभिन विषयों के प्रकांड विद्वान  इस स्व-देह दर्शन के रोग से मन्त्र मुग्ध हों तो चिंता स्वाभाविक है। चतुर्थ श्रेणी या निम्न श्रेणी पद पर आसीन कर्मचारी यदि सेल्फ़िटिस से प्रभावित है तो एक बारगी उनके पदानुरूप व्यवहार की स्वीकार्यता है पर बैंक सहित अन्य संस्थानों के उच्चतम पद पर आसीन व्यक्ति "सेलफ़ी" रूपी  इस रुग्णता से आत्ममुग्ध हों  तो किस पद के मनोविश्लेषण को उचित ठहराया जा सकता है यह एक विचारणीय प्रश्न था?

एक मुद्दा और किसी व्यक्ति को यदि रोटी, पूरी, पराँठे, ढोसा के साथ रोज रोज सिर्फ और सिर्फ  सड़े आलू रूपी सब्जी परोसी जाय  तो भोजन से वितृष्णा होना एवं  बदहज़मी  होना स्वाभाविक है। तो क्यों न इस हमे इस बीमार रूपी  सेल्फी को रोका जाना चाहिये?? इसी विचार के वशीभूत हो मैंने इस शोध पूर्ण विषय मे "सेल्फी"  ही नहीं बल्कि "सेल्फ़िटिस" से भी आज़ादि  पा ली और अब सिर्फ अपने शौक और ईक्षा पर ध्यान केन्द्रित करने लगा हूँ।  

विजय सहगल