अविश्वास
की खाई
(श्रमिक पलायन)
समाचार पत्रों और टीवी और रेडियो पर आ रहे जन
समुदाय के सामूहिक पलायन का समाचार चिंता करने और कोरोना बाइरस फैलने की आशंका
बढ़ाने बाला है। हजारों हजार नर, नारी, छोटे छोटे मासूम वेवश बच्चों को जब भरी दोपहरी सड़क सर पर वोझा
लादे और कही-कही तो अपने नवजात भाई बहिनों
को गोदी मे लिये पैदल चलते द्रश्य ने मन को
पीढ़ा और दुःख की अनुभूति से ग्रसित कर दिया। आखिर क्या कारण रहा जो ये मजदूर अपनी
रोजी रोटी खोने के कारण विना किसी साधन के पैदल ही सैकड़ों किमी दूर अपने गंतव्य की ओर कूच करने को मजबूर हुए। बगैर भोजन पानी की व्यवस्था
के आखिर कब ये अपने घरों मे पहुंचेंगे? महाराष्ट्र और गुजरात की सीमा पर हजारों मजदूर
उत्तर प्रदेश और बिहार जाने के लिये निकले पर रास्ते मे फंसे हुए है। नोएडा के
आनंद बिहार और कौसांबी बस अड्डे मे लगभग 10-12 हजार प्रवासी अपने अपने घरों मे
जाने की बाट जोह रहे है।
आखिर क्या कारण है कि देश मे अलग अलग जगह के ये
प्रवासी मजदूर अपने घरों को पहुँचने मे इतने उतावले हुए कि वे बगैर कुछ आगा पीछा
सोचे हजारों किमी पैदल चलने का दुस्साहस कर रहे है? वो कौन सी शक्ति है जो इन मजदूरों के छोटे-छोटे मासूम बच्चों को कोरोना बाइरस जैसी जानलेवा
बीमारी से बेखौफ घर जाने को प्रेरित कर रही है? वो कौन से जिजीविषा भूख प्यास से वेहाल इन मजदूरों
को घर पहुँचने के दृढ़ निश्चय को मौत का भय भी डिगा न पा रहा हो? किस मनोबल के वशीभूत ये श्रमिक सिर्फ अपने घर
पहुँचने के लिये अपने परिवार के साथ सैकड़ो किमी जाने का खतरा उठाने से भी गुरेज
नहीं कर रहे? आखिर मजदूरों के इस दुस्साहस, धृष्टता और हठता
को हमारे नौकरशाह और जनप्रतिनिधि क्यों नहीं समझ पाये? प्रशासन के ये शासक इन प्रवासी कामगारों को विना
किसी अन्न और आवास की सुविधाओं को उपलब्ध कराये
क्यों उन मजदूरों को जहां है वही रोकने की
जिद पर उतारू रहे?
ऐसा प्रतीत होता है कि हमारे प्रशासनिक अधिकारी और रहनुमा
मजदूरों की सोच और बुद्धि को अपनी सोच और
विवेक के स्तर तक बल पूर्वक उठाना चाहते है, वे भूल जाते है कि दिहाड़ी मजदूर और कामगारों की
समस्या का समाधान तभी संभव है जब ये नौकरशाह और राजनेता अपने बौद्धिक स्तर को नीचे
लाकर मजदूरों की सोच के समकक्ष लाये। उन्हे
मजदूरों द्वारा सामना की जा रही कठिनाइयों और परेशानियों को समझना होगा। राजसी
वैभव से युक्त, सुविधा भोगी नैकरशाह या राजनेताओं और मजदूरों की संशयात्मक सोच
के बीच का ये विशाल अंतर ही असल मे समस्या
का सबसे बड़ा कारण है। दुर्भाग्य ये है कि लाल फीताशाही से ग्रसित नौकर शाह अपने
मानसिक सोच को आम जनों की सोच तक नीचे नहीं ला सके क्योंकि इन
जनेताओं/अधिकारियों ने मजदूरों के उस दुःख, संकट अनिश्चित जीवन और
भूख के उस दर्द को कभी महसूस ही नहीं किया। भामाशाहों को कभी इस दंश से नहीं
गुजरना पड़ा। जब मजदूरों के नियोक्ताओं और ठेकेदारों ने कोरोना महामारी के लॉक
डाउन से उपजे खौफ़ के कारण इन श्रमिकों को
रोज़गार से बेदखल कर उन्हे दूध मे मक्खी की तरह निकाल कर सड़कों पर ला दिया। खानपान
और असुरक्षा की इस शंका से ग्रसित कोई मजदूर पिता
कैसे अपने बीबी बच्चों को भूख
प्यास से तड़पता हुआ देख सकता था। ठेकेदारों द्वारा कामगारों को रोजगार से वंचित
किये जाने पर सरकार और प्रशासन द्वारा कोई
तात्कालिक कदम न उठाये जाने पर इन मजदूरों, मेहनतकशों और श्रमिकों को भूख प्यास के एक अदृश्य
डर और भय ने ही उन्हे इस महा पलायन के
लिये मजबूर कर दिया। इसी कारण इन मजदूरों
और प्रशसनिक व्यवस्था के बीच एक अमिट अविश्वास की ऊंची दीवार खींच दी। भूख प्यास और असुरक्षा
की इसी भावना ने मजदूरों के मन मे एक अदृश्य डर और भय ने इनको कोरोना जैसे महामारी रूपी संकट को
दरकिनार कर सैकड़ों किमी दूर पैदल ही अपने
घरों को जाने के लिये प्रेरित किया। पिछले दिनों चुनावों के चलते राजनैतिक दलों द्वारा
अपने ही क्षेत्र के लोगो को चिकित्सा, शिक्षा मे
प्राथमिकता की नीति के समर्थक इन
राजनेताओं के दोगले चरित्र के कारण ही इन प्रवासी मजदूरों द्वारा सहज ही इन नेताओं
की भोजन और चिकित्सा की उस अपील को नज़रअंदाज़ कर अविश्वास किया जो पलायन जैसे कठिन मार्ग का निर्णय लेने का मुख्य
कारण बना।
प्रशासन के ये अनुभवी अधिकारी क्यों इन मजदूरों को
उनके रहने, खाने पीने और चिकित्सा व्यवस्था की सुविधाओं का विश्वास उन्हे नहीं
दिला सके? नौकरशाहों से मजदूरों के मनोविज्ञान समझने मे कहाँ चूक हुई ये
बड़ा विचारणीय सबाल है जिस पर राजनेताओं और
व्यवस्था चलाने बाले को गहन चिंतन-मनन करने की आवश्यकता है?
यू भी ये ध्रुव सत्य है संकट की किसी भी घड़ी मे घर
और परिवार ही एक मात्र आश्रय स्थल होता है जहां व्यक्ति अपने आपको सुरक्षित महसूस
करता है। संकट की घड़ी मे इस तथ्य मे कोई भी संशय नहीं है कि मनुष्य तो क्या पशु
पक्षी भी अपने घरोंदों मे रहना पसंद करते है। उन के लिये घर कोई तिनके या फूस की बनी चारदीवारों का बना ढांचा
मात्र नहीं है उसकी बुनियाद मे आपसी
विश्वास की नीव भरी है। घर की दीवारें कितनी भी छोटी और कमजोर हों वे एक सुरक्षा
का अहसास कराती है। परिवार के सदस्यों का प्रेम भाव दहलीज़ के अंदर भरा कोषालय है जिसके बलबूते एक रंक भी घर
मे अपने को प्रत्यक्ष राजा मानता है। जो
सुख और सुकून किसी गरीब को अपने घर मे मिलता है कदाचित सोने के महल भी उसे ऐसा सुख
दे सके! तभी तो घर को मंदिर अर्थात देवालय
मानते है। क्या हमारे शासक इन सभी सुविधाओं और सोच का अहसास इन गरीब और भोले भाले
प्रवासी मजदूरों को कराने मे असफल रहे? यदि इन कामगारों को मात्र भोजन चिकित्सा और
सुरक्षा का वास्ता ये सरकारें इन वेवस मजदूरों को करा देती तो कोई कारण नहीं था कि
ये श्रमिक सैकड़ो किमी पैदल चल कर पलायन जैसे कठिन मार्ग का निर्णय लेने के लिये बाध्य
होते।
आज आवश्यकता है सरकारी अमले को अपनी कथनी और करनी
के बीच के अंतर को पूरी तरह समाप्त करने की ताकि ये प्रवासी कामगार जहां है वहीं
पर कोरोना कोविड 19 बाइरस की रोकथाम हेतु केंद्रीय सरकार के 21 दिन के सम्पूर्ण लॉक डाउन के आवाहन को
पूर्णरूप से सफल कर सके। आइये हम सभी इन कमजोर गरीब श्रमिकों के साथ खड़े होकर
मजदूरों के खाने पीने चिकित्सा और सुरक्षा से संबन्धित किसी भी संशय को दूर करें
और स्व एकांतवास कर कोरोना के विरुद्ध लड़ाई को सफल बनाये जाने को प्रेरित करे।
विजय सहगल






















