रविवार, 29 मार्च 2020

अविश्वास की खाई (श्रमिक पलायन)


अविश्वास की खाई
(श्रमिक पलायन)

समाचार पत्रों और टीवी और रेडियो पर आ रहे जन समुदाय के सामूहिक पलायन का समाचार चिंता करने और कोरोना बाइरस फैलने की आशंका बढ़ाने बाला है। हजारों हजार नर, नारी, छोटे छोटे मासूम वेवश बच्चों को जब भरी दोपहरी सड़क सर पर वोझा लादे और कही-कही तो  अपने नवजात भाई बहिनों को गोदी मे लिये  पैदल चलते द्रश्य ने मन को पीढ़ा और दुःख की अनुभूति से ग्रसित कर दिया। आखिर क्या कारण रहा जो ये मजदूर अपनी रोजी रोटी खोने के कारण विना किसी साधन के पैदल ही सैकड़ों किमी दूर अपने  गंतव्य की ओर कूच  करने को मजबूर हुए। बगैर भोजन पानी की व्यवस्था के आखिर कब ये अपने घरों मे पहुंचेंगे? महाराष्ट्र और गुजरात की सीमा पर हजारों मजदूर उत्तर प्रदेश और बिहार जाने के लिये निकले पर रास्ते मे फंसे हुए है। नोएडा के आनंद बिहार और कौसांबी बस अड्डे मे लगभग 10-12 हजार प्रवासी अपने अपने घरों मे जाने की बाट जोह रहे है।

आखिर क्या कारण है कि देश मे अलग अलग जगह के ये प्रवासी मजदूर अपने घरों को पहुँचने मे इतने उतावले हुए कि वे बगैर कुछ आगा पीछा सोचे हजारों किमी पैदल चलने का दुस्साहस कर रहे है? वो कौन सी शक्ति है जो इन मजदूरों के छोटे-छोटे  मासूम बच्चों को कोरोना बाइरस जैसी जानलेवा बीमारी से बेखौफ घर जाने को प्रेरित कर रही है? वो कौन से जिजीविषा भूख प्यास से वेहाल इन मजदूरों को घर पहुँचने के दृढ़ निश्चय को मौत का भय भी डिगा न पा रहा हो?  किस मनोबल के वशीभूत ये श्रमिक सिर्फ अपने घर पहुँचने के लिये अपने परिवार के साथ सैकड़ो किमी जाने का खतरा उठाने से भी गुरेज नहीं कर रहे? आखिर मजदूरों के इस दुस्साहस, धृष्टता और हठता  को हमारे नौकरशाह और जनप्रतिनिधि क्यों नहीं समझ पाये?   प्रशासन के ये शासक इन प्रवासी कामगारों को विना किसी अन्न  और आवास की सुविधाओं को उपलब्ध कराये क्यों उन मजदूरों को  जहां है वही रोकने की जिद पर उतारू रहे?

ऐसा प्रतीत होता है कि हमारे प्रशासनिक अधिकारी और रहनुमा मजदूरों की सोच और बुद्धि को  अपनी सोच और विवेक के स्तर तक बल पूर्वक उठाना चाहते है, वे भूल जाते है कि दिहाड़ी मजदूर और कामगारों की समस्या का समाधान तभी संभव है जब ये नौकरशाह और राजनेता अपने बौद्धिक स्तर को नीचे लाकर मजदूरों की सोच  के समकक्ष लाये। उन्हे मजदूरों द्वारा सामना की जा रही कठिनाइयों और परेशानियों को समझना होगा। राजसी वैभव से युक्त, सुविधा भोगी नैकरशाह या राजनेताओं और मजदूरों की संशयात्मक सोच के बीच का  ये विशाल अंतर ही असल मे समस्या का सबसे बड़ा कारण है। दुर्भाग्य ये है कि लाल फीताशाही से ग्रसित नौकर शाह अपने मानसिक सोच को आम जनों की सोच तक नीचे नहीं ला सके क्योंकि इन जनेताओं/अधिकारियों  ने  मजदूरों के उस दुःख, संकट अनिश्चित जीवन और भूख के उस दर्द को कभी महसूस ही नहीं किया। भामाशाहों को कभी इस दंश से नहीं गुजरना पड़ा।  जब मजदूरों के  नियोक्ताओं और ठेकेदारों ने कोरोना महामारी के लॉक डाउन से उपजे खौफ़ के कारण  इन श्रमिकों को रोज़गार से बेदखल कर उन्हे दूध मे मक्खी की तरह निकाल कर सड़कों पर ला दिया। खानपान और असुरक्षा की इस शंका से ग्रसित कोई मजदूर पिता  कैसे अपने बीबी  बच्चों को भूख प्यास से तड़पता हुआ देख सकता था। ठेकेदारों द्वारा कामगारों को रोजगार से वंचित किये जाने पर सरकार और प्रशासन द्वारा कोई  तात्कालिक कदम न उठाये जाने पर इन मजदूरों, मेहनतकशों और श्रमिकों को भूख प्यास के एक अदृश्य डर और भय ने ही उन्हे  इस महा पलायन के लिये मजबूर कर दिया। इसी कारण  इन मजदूरों और प्रशसनिक व्यवस्था के बीच एक अमिट  अविश्वास की ऊंची दीवार खींच दी। भूख प्यास और असुरक्षा की इसी भावना ने मजदूरों के मन मे एक  अदृश्य डर और भय  ने इनको कोरोना जैसे महामारी रूपी संकट को दरकिनार कर सैकड़ों किमी दूर  पैदल ही अपने घरों को जाने के लिये प्रेरित किया। पिछले दिनों चुनावों के चलते राजनैतिक दलों द्वारा  अपने ही क्षेत्र के लोगो को चिकित्सा, शिक्षा मे प्राथमिकता  की नीति के समर्थक इन राजनेताओं के दोगले चरित्र के कारण ही इन प्रवासी मजदूरों द्वारा सहज ही इन नेताओं की भोजन और चिकित्सा की उस अपील को नज़रअंदाज़ कर अविश्वास किया जो  पलायन जैसे कठिन मार्ग का निर्णय लेने का मुख्य कारण बना।

प्रशासन के ये अनुभवी अधिकारी क्यों इन मजदूरों को उनके रहने, खाने पीने और चिकित्सा व्यवस्था की सुविधाओं का विश्वास उन्हे नहीं दिला सके? नौकरशाहों से मजदूरों के मनोविज्ञान समझने मे कहाँ चूक हुई ये बड़ा  विचारणीय सबाल है जिस पर राजनेताओं और व्यवस्था चलाने बाले को गहन चिंतन-मनन  करने की आवश्यकता है?

यू भी ये ध्रुव सत्य है संकट की किसी भी घड़ी मे घर और परिवार ही एक मात्र आश्रय स्थल होता है जहां व्यक्ति अपने आपको सुरक्षित महसूस करता है। संकट की घड़ी मे इस तथ्य मे कोई भी संशय नहीं है कि मनुष्य तो क्या पशु पक्षी भी अपने घरोंदों मे रहना पसंद करते है। उन के लिये  घर कोई तिनके या फूस की बनी चारदीवारों का बना ढांचा मात्र नहीं है उसकी बुनियाद  मे आपसी विश्वास की नीव भरी है। घर की दीवारें कितनी भी छोटी और कमजोर हों वे एक सुरक्षा का अहसास कराती है। परिवार के सदस्यों का प्रेम भाव दहलीज़ के  अंदर भरा कोषालय है जिसके बलबूते एक रंक भी घर मे अपने को प्रत्यक्ष  राजा मानता है। जो सुख और सुकून किसी गरीब को अपने घर मे मिलता है कदाचित सोने के महल भी उसे ऐसा सुख दे सके!  तभी तो घर को मंदिर अर्थात देवालय मानते है। क्या हमारे शासक इन सभी सुविधाओं और सोच का अहसास इन गरीब और भोले भाले प्रवासी मजदूरों को कराने मे असफल रहे? यदि इन कामगारों को मात्र भोजन चिकित्सा और सुरक्षा का वास्ता ये सरकारें इन वेवस मजदूरों को करा देती तो कोई कारण नहीं था कि ये श्रमिक सैकड़ो किमी पैदल चल कर पलायन जैसे कठिन मार्ग का निर्णय लेने के लिये बाध्य होते।

आज आवश्यकता है सरकारी अमले को अपनी कथनी और करनी के बीच के अंतर को पूरी तरह समाप्त करने की ताकि ये प्रवासी कामगार जहां है वहीं पर कोरोना कोविड 19 बाइरस की रोकथाम हेतु केंद्रीय सरकार  के 21 दिन के सम्पूर्ण लॉक डाउन के आवाहन को पूर्णरूप से सफल  कर सके। आइये हम सभी  इन कमजोर गरीब श्रमिकों के साथ खड़े होकर मजदूरों के खाने पीने चिकित्सा और सुरक्षा से संबन्धित किसी भी संशय को दूर करें और स्व एकांतवास कर कोरोना के विरुद्ध लड़ाई को सफल बनाये जाने को प्रेरित करे। 
       
विजय सहगल
                        

शनिवार, 28 मार्च 2020

कोरोना का सूतक काल


"कोरोना का सूतक काल"





और दिन की तरह आज भी जब मेरी बात मेरी माँ से वीडियो कॉलिंग के माध्यम से झाँसी मे  हो रही थी। आज कल बातचीत का मुख्य विषय दुनियाँ मे फैली महामारी कोरोना कोविड 19 का ही रहता है। माँ ने बताया कि उसके  बचपन मे कमोवेश ऐसे ही हालत उन दिनों पैदा हुए थे जब प्लेग बीमारी झाँसी मे महामारी  के रूप मे फैली थी। मेरी ननिहाल झाँसी मे अनाज मंडी के निकट सुभाष गंज मे ही है। माँ ने बताया अनाज मंडी के कारण उन दिनों चारों ओर चूहों  के मरने पर उन्हे तुरत फुरत गोबर के उपलों के बीच रख कर जला दिया जाता था। चूहों के जलाने से उत्पन्न बदबू वातावरण मे चारों तरफ उन दिनों आती थी। चूहों के मरने से उत्पन्न छोटे कीड़े "पिस्षु" अगर आदमी को प्रभावित करता तो उसकी मौत हो जाती थी। उन दिनों शहर बहुत छोटा था प्लेग महामारी का रूप ले चुका था तब मेरी माँ अपने बहिन भाइयों के साथ झाँसी से घर छोड़ कर 30-32 किमी दूर "मंडोर"  गाँव मे अपने रिश्तेदारों के यहाँ चले गये थे। शहर मे जगह जगह पानी की तलाश मे चूहे बिलों से निकल कर गली कूँचों मे जहाँ-तहाँ मरे मिलते जो प्लेग रूपी महामारी फैलाते थे। आज के हालत कोरोना कोविड19 बीमारी के कारण भी कुछ ऐसे ही है बस फर्क इतना है कि उन दिनों लोग प्लेग के कारण  घरों को छोड़ने को मजबूर थे और आज कोरोना के कारण घरों मे रहने को मजबूर है।  
    
चिकित्सा विशेषज्ञ इस बीमारी से बचने का एक मात्र तरीका व्यक्तियों से व्यक्ति की सुरक्षित  दूरी बना कर रहने की सलाह दे रहे है ताकि ये बीमारी एक आदमी से दूसरे आदमी मे अंतरित न हो अतः सरकार सभी व्यक्तियों को सिर्फ और सिर्फ घरों मे रहने की हिदायत दे रही है।  अगर शतकों पूर्व आज के तरह की आकस्मिक परिस्थितियों के जीवन की कल्पना करे जब तमाम अंजान बीमारियों या महामारियों के कारण उन दिनों जानकारी और इलाज के अभाव मे अनेकों मौते हो जाया करती थी। छुआ छूट रूपी बीमारियों के कारण सैकड़ों लोग काल कल्वित हो जाया करते थे। शायद इस छुआ छूत रूपी बीमारियों के उन्मूलन हेतु समाज ने उन दिनों कुछ ऐसे अलिखित नियम कानून बनाए होंगे जिनका पालन पीढ़ी दर पीढ़ी होने के कारण  कालांतर मे वे  हमारे धार्मिक संस्कार हो गये।

हमे याद है मेरे प्रपिता (दादा) के देहांत पर मै 5-6 साल का रहा हूंगा। तब हमारे घर के साथ साथ घर के अगल-बगल, सामने, आसपास के 7-8 घरों मे जहाँ हमारे कुटुंब के ही अन्य  सदस्य निवास करते थे "सूतक" रूपी शोक संतप्त रस्म या संस्कार मे शामिल रहते थे। उस सूतक काल के संस्कार मे उक्त घरों के 30-40 सदस्य आज के एकांतवास (isolation) की तरह घरों के अंदर अपने आपको सीमित कर लिया करते थे। हो सकता है कभी इस छुआ छूट बीमारी के कारण समाज मे ये नियम आज के कोरोना वाइरस के कारण  एकांतवास की तरह कभी किसी मृतक के माध्यम से इस तरह की बिषाणु जनित रोग के कारण "सूतक" रूपी संस्कार की ये प्रथा शुरू की गई होगी। इस अनेकों  साल से  चली आ रही सनातन परंपरा कब से चली आ रही है नहीं मालूम पर इस परंपरा का उल्लेख वेद पुराणो मे अवश्य ही मिलता है। कुटुंब मे किसी भी बुजुर्ग या परिवार के सदस्य के निधन पर यह "सूतक" प्रथा  स्वतः ही शुरू हो जाती थी  और अन्त्येष्टि क्रिया के 4-5 दिन तक लागू रहती थी। शमशान घाट से अन्त्येष्टि के बाद घर बापसी मे मृतक के सभी छोटे बड़े कुटुंबी जन नीम की पत्ती मुंह मे चबा कर पानी से कुल्ला करने के पश्चात उपस्थित जन समुदाय का हाथ जोड़ कर उनके दुःख की इस घड़ी मे शामिल होने के लिये  आभार व्यक्त करता था। नीम की पत्ती का मुंह मे चबाना शायद नीम के एंटी सेप्टिक गुण के कारण किया जाता हो। इस सूतक काल मे मृतक के परिवार और कुटुंबी जन अपने अपने घरों मे ही रहा करते थे। यहाँ तक कि इस काल मे उनके घर पर भोजन भी नहीं पकाया जाता था। भोजन की व्यवस्था नजदीकी रिश्तेदार, मित्र और पड़ौसी सुबह शाम के अनुसार क्रम से करते थे। घरों के  पूजा गृह मे भगवान की पूजा करना निषेध था, पूजा हेतु कुलपुरोहित आते थे या सूतक काल मे भगवान के स्वरूपों को ही पंडितजी के गृह भेज दिया जाता था। उस शोक काल मे परिवार के किसी भी सदस्य चाहे वो  छोटा हो या बड़ा घर से बाहर जाना बर्जित था। शोकाकुल परिवार के  व्यापार और वाणिज्या संस्थान भी इस सूतक काल मे बंद रखे जाते थे जो शायद सामाजिक दूरी (social distancing) बनाने का ही एक रूप था ताकि विषाणु को फैलने से रोका जा सके। सूतक काल के दिनों यदि कोई बाहरी मित्र रिश्तेदार या मिलने बाले शोक संवेदना प्रकट करने मृतक के घर  आते थे तो वे शोक संतृप्त परिवार से एक स्वीकृत सुरक्षित  दूरी बना कर ही बैठ कर मृतक के प्रति संवेदना व्यक्त  कर अपना सम्मान प्रकट करते थे। शोक व्यक्त करने आने बाले व्यक्ति के लिये भी संवेदना प्रकट करने के पश्चात  बगैर किसी अन्य जगह जाए सीधे ही अपने घर जाकर स्नान करना आवश्यक होता था एवं पहने हुए सम्पूर्ण कपड़ो को बगैर कही किसी को छूए, धोना आवश्यक था। अस्पताल मे किसी बीमार रिश्तेदार को देख कर घर बापस आने पर भी ऐसा ही क्रम सुनिश्चित किया जाता था, जो छुआ छूट रूपी अणुओं और विषाणुओं घरों मे न फैलने का एक आदर्श उदाहरण था। ऐसा चलन कुटुंब के बाहर  दूसरे बच्चों या पड़ौस के अन्य बच्चों से संपर्क रखना, मिलना या खेलना कूदना पूर्ण तय: निषेध था। सूतक ग्रसित परिवार के सदस्यों की पहचान समाज मे सहज रूप से हो सके इस हेतु  इन परिवारों के सदस्य अपने सिर के बाल त्याग कर घुटी मुड़ी रखते थे। सम्पूर्ण घर का अपनी दैनिक आवश्यकताओं के रूप उपयोग करना  भी वर्जित था। घर के सीमित स्थान का प्रयोग दैनिक निस्तार हेतु किया जाता था। प्रायः पुरुष लोग घरों के बाहर चबूतरों पर खरारी (बगैर बिछोने/विस्तर बाली) खाट (चारपाई) पर ही सोया करते थे। मृतक का  अंतिम संस्कार की क्रिया करने बाला व्यक्ति के लिए तो और भी नियम कठोर होते थे। वह सूतक काल के दौरान सिर्फ दो धोती के इस्तेमाल ही कर सकता था एक को पहनना और दूसरी को धोकर  सुखाने हेतु डालना ताकि अगले दिन उसका उपयोग किया जा सके और उसका जमीन पर सोना आवश्यक था। इस सभी रीतियों, रस्मों  का सिर्फ और सिर्फ एक ही मकसद रहा होगा ताकि कोई भी विषाणु समज मे दूसरे लोगो को न फैले और सनय सनय ये बीमारे फैलाने बाले विषाणु स्वतः ही नष्ट हो जाये।

तदोपरांत 5-6 दिन बाद उस शोक संतृप्त  परिवार को एक अन्य रीति जिसे अलग अलग क्षेत्रों मे भिन्न भिन्न नमो से जाना जाता है कहीं इसे "शुद्धता" कही "उठावनी" या "उठाला", रस्म पगड़ी  आदि नाम से जानते है। इस दिन सम्पूर्ण घर और शोकाकुल परिवार के सदस्यों द्वारा उपयोग की गई हर वस्तु और सामान की धुलाई पुछाई कर विषाणु रहित किया जाता था। हमे याद है शुद्धता बाले दिन रिश्तेदार एवं मित्रगण एकत्रित होकर शोकाकुल परिवार के साथ लक्ष्मी तालाब पहुँच कर  अपने अपने बाल बनवा कर मृतक के प्रति सम्मान प्रकट करते थे। तालाब मे सभी स्नान आदि कर   दोपहर के पश्चात देवस्थान मे देव दर्शन कर  परिवार के अगले वरिष्ठ सदस्य को   समाज के गणमान्य व्यक्तियों की उपस्थिति मे पगड़ी पहनाकर, घर एवं  वाणिज्य प्रतिष्ठान का मुखिया के रूप मे मान्यता देकर स्वीकारते थे।

आज की इन आधुनिक बदली हुई परिस्थिति मे जहां एक तरफ एकल परिवार का चलन है और  समय के अभाव मे  ये परंपराये शहरों मे धीरे-धीरे  कम होकर लुप्तप्राय होती जा रही है पर सुदूर ग्रामों मे लोग  इस रस्मों रिवाज़ का पालन आज भी पूरे समर्पण और श्रद्धापूर्वक करते देखा जा सकताहै।
                                                                              आइये देश के प्रत्येक नागरिक मानव जाति पर आयी  इस विपदा "कोरोना कोविद 19" रूपी इस विषाणु से मुक्ति के लिये सूतक रूपी सनातन संस्कार को अपना कर 21 दिन का "घर मे प्रथक रह कर एकांतवास" करे एवं दृढ़ संकल्पित होकर  इस वाइरस विषाणु को परास्त कर इस रण मे "विजयी भवः" की मुद्रा मे आगे बढ़े।

विजय सहगल     
              

रविवार, 22 मार्च 2020

बैंड बाजा और बारात



"बैंड बाजा और बारात"





बैंड बाजों की धुन अलग अलग कारज  पर अलग अलग तरह की होती है इसको हम जैसे छोटे शहरों के वासिंदे बचपन मे ही समझने लगे थे। झाँसी मे हमारा घर मुख्य शहर मे ही था सड़क से लगभग डेढ़  सौ फीट अंदर  जब कभी दूर सड़क से कोई बैंड बाजे की आवाज अंदर घर मे   सुनाई देती  तो हम लोग समझ जाते कि ये बाजे बारात के है या किसी धार्मिक समारोह जैसे मंदिर मे पोशाक चढ़ाने, झण्डा चढ़ाने के या किसी व्यक्ति के देहावसान के वक्त निकलने वाली शवयात्रा के। क्योंकि अलग अलग कार्यों और अवसरों पर बैंड की धुन अलग होती थी। किसी व्यक्ति की शव यात्रा मे बाजे अलग धुन मे बजाये जाते जिसमे ट्रंपेट से  रामधुन बजती जिसे सुन कर घर के प्रायः सभी आसपास के घरों के लोग  बाहर चबूतरे पर या छत्त पर आ जाते और मृतक के प्रति प्रणाम करते चप्पल या जूते पहने सड़क पर चलते व्यक्ति अपने चप्पल या जूते उतार कर मृतक के प्रति सम्मान का भाव कर कुछ कदम उसी दिशा मे चलकर प्रणाम करते। ऐसे संस्कार प्रायः सभी परिवारों मे हम जैसे सारे  बच्चों मे बचपन से ही आ गये थे।

धार्मिक कार्यक्रमों मे बैंड की धुन देवी भजन या  रामायण की चौपाई "मंगल भवन अमंगल हारी"...... की धुन मृदंग वादन के साथ चलती। दशहरे पर राम रावण युद्ध के रूप मे भगवान राम चंद्र जी की युद्ध आवाहन करती यात्रा भी हम लोगो के घर से निकलती जिसमे जय घोष का नारा बैंड बाजों के वाद्य यंत्रों के माध्यम से बजाया जाता। कुछ लोग रमतूला को बजाते हुए बारात मे सबसे आगे चलते और अपने विशेष ध्वनि से युद्ध का शंखनाद करते।  उन दिनों भूतनाथ मंदिर और काली मंदिर, लक्ष्मी गेट से से शिवरात्रि पर भी एक विशाल शिव बारात निकाली जाती जिन मे झाँसी के बैंड बाजे बड़ी जोश खरोश से भाग लेते।  सुनते है इन कार्यक्रमों मे ये बैंड बाजे बाले अपनी नि:शुल्क सेवायें देते थे। गणेश चतुर्दशी के सप्ताहांत चलने बाले चाचर जैसे बुन्देली लोक नृत्य नगड़िया जैसे वाद्य यंत्र के विना अधूरे रहते। मै खुद भी चाचर जैसे लोक नृत्य का सहभागी बन अपने आपको नगड़ियाँ की जोश भरी आवाज पर अपने पैरों और हाथों मे ली चाचर को अगल बगल के साथी से लयवध्य होकर ज़ोर से टकराता जो एक अलग तरह के उत्साह और उमंग और रोमांच को प्रतिध्वनित करता था।   

बारात आदि मे ट्रंपेट या मशकबीन (बैग पाइपर) पर फिल्मी गाने, नागिन की धुन "तेरा मन डोले मेरा मन डोले......." या "आज मेरे यार की शादी है......" जैसे अनेक गीत बाजाये जाते जिसकी धुन पर बच्चे, युवा जम कर थिरकते थे। नगाड़े और शहनाई 2-3 दिन पहले से शादी बाले घर मे दिन भर बजाई जाती। बारात और विदाई के समय रमतूला का बजाना शुभ फल दायक माना जाता था और आवश्यक रूप से सभी वर्ग के लोगों के यहाँ बजाया जाता था। इन बाध्य यंत्रों के बजाने बाले अपने अपने यंत्रों मे महारत हासिल करने बाले उस्ताद या मास्टर कहलाते थे। 
  
बचपन के उस दौर मे एक और बैंड बाजा बारात प्रायः पूरे शहर मे घूमती वह होती शहर मे थिएटर मे चलने बाली किसी नई फिल्म के प्रचार की यात्रा। इस प्रचार मे प्रायः इलाइट सिनेमा मे चलने बाली फिल्मों का प्रचार लगातार चलता। इस प्रचार यात्रा मे तांगे मे एक सज्जन दो लाउडस्पीकर तांगे के उपर विपरीत दिशा मे लगा माइक से फिल्म का प्रचार करते। उस व्यक्ति की शक्ल आज भी हमारे अन्तःकरण मे स्पष्ट है। तांगे के आगे 15-20 बैंड बाजे बाले बैंड ट्रंपेट मशक बीन बैग पाइपर, झांझ और बड़े मजीरे नुमा यंत्र बजाते हुए शहर मे भ्रमण करते। बैंड बाजों के आगे दो चूने के पुते  कपड़े जो लकड़ी के फ्रेम पर कसे रहते और उपरी सिरे से जुड़े झोपड़ी नुमा बोर्ड के बीच मे घुसा एक लड़का अपने दोनों हाथो से बोर्ड को चार पहियों पर लुढ़का के चलता ("क्रांति"बोर्ड फिल्म की  आकृति का प्रयास संलग्न)। दोनों बोर्ड पर फिल्म के बड़े बड़े पोस्टर चिपके रहते और जिनके नीचे फिल्म शो की टाइमिंग, टिकिट की दर, टॉकीज का नाम और फिल्म कलाकारों के नाम बड़े  और रंगीन रंगों के अक्षरों से लिखा रहता। जहां एक ओर बैंड बाजे अपनी धुनों मे गाने बजाते एक जलूस के रूप मे  बाजार के बीच मे निकलते बही तांगे पर बैठा  व्यक्ति रेकॉर्ड प्लेयर से गाने बजाता और बीच बीच मे गानों को रोक कर फिल्म का नाम और कलाकारों के नाम बताता चलता। फिल्म के संगीतकर और गायकों के नाम का उल्लेख कर फिल्म के गानों की झलक सुनवा सभी आम लोगो से परिवार सहित फिल्म को देखने की गुजारिश करता। सड़क चलते लोग कौतूहल और उत्साह से निकलने बाले इस बैंड बाजे जलूस को सड़क के दोनों ओर खड़े होकर बड़े  कौतुहल के साथ अवश्य देखते। हम बच्चे भी बड़े उमंग से निकलते इस जलूस को खड़े होकर निहारते। ये बैंड बाजे बाले हम लोगो के घर के आसपास बने चबूतरे पर आकार विश्राम करते। 8-10 झोपड़ी नुमा बोर्ड को बे लोग सड़क किनारे लाइन से लगा देते। बैंड बाजे बाले अपने वाद्य यंत्रों को हमारे और आसपास के घरों के चबूतरे पर रख कर पास मे बने गोपाल धर्मशाला के नीचे स्थित गुंठू चाय बाले, जैन चाय बाले  की दुकानों पर चाय पीने चले जाते। उनकी अनुपस्थिति मे हम बच्चे कभी कभी बैंड बाजों पर लकड़ी से बजा कर अपना हाथ साफ कर खुश होते चारों तरफ चौकस निगाहों से पहरेदारी करते कहीं बैंड बाजे बाले तो नहीं आ रहे है। तांगे बाला शक्स भी चाय पीकर बापस तांगे मे बैठ कर सिगरेट के लंबे लंबे कश खींच सुट्टा लगाता  हुआ कुछ आराम करता। आधा पौना घंटा विश्राम के बाद बैंड बाजे का कारवाँ पुनः  एक बार फिर अगले पढ़ाव पर जाने की तैयारी करता। लाउडस्पीकर पर गाने और फिल्म की उद्घोषणा एक बार  फिर शुरू हो जाती और बैंड  बाजे अपनी लय मे गाना  बजाने शुरू कर  झोपड़ी नुमा फिल्मी पोस्टर के बोर्ड के बीच मे घुस कर लड़के अपने सिर और हाथो से बोर्ड को उठा जलूस के रूप मे आगे के मंजिल की ओर रवाना हो जाते।

उस दौर के फिल्मों के प्रचार का तरीका फिल्म देखने के लिए लोगो को प्रेरित करता टीवी, इंटरनेट के इस दौर मे अब वो सब पुरानी यादें ही शेष बन कर रह गई जो रह रह कर, बार बार याद आती है।

विजय सहगल                  

शनिवार, 14 मार्च 2020

गराडिया महादेव


"गराडिया महादेव"









"गराडिया महादेव"

"विन मांगे मोती मिले मांगे मिले न भीख" कहावत को मैंने फलार्थ होते देखा। मुझे एक सामाजिक कार्यक्रम मे  अपने नजदीकी रिश्तेदारी मे 4 फरवरी 2020  को कोटा (राजस्थान) जाना हुआ। तीन  दिन का प्रवास था सोचा क्या किया जाये, कैसे समय व्यतीत हो। सालों पहले एक बार कोटा आना हुआ था चंबल नदी के पास डैम और चंबल गार्डन के अलावा एक दो प्रसिद्ध मंदिर थे जिनहे पूर्व मे भी देखा हुआ था अतः उन स्थानों  के लिये विशेष रुचि न थी। एक बारगी  सवाई माधोपुर टाइगर सफारी देखने की योजना बनाई जिसकी  कोटा से  दूरी 130 किमी लगभग थी और टाइगर सफारी घूमने के लिये स्पॉट पर सुबह 6-7 बजे तक पहुँचना बगैर सवाई माधोपुर रात्रि विश्राम के संभव न था। इसलिये सवाई माधोपुर का कार्यक्रम भी छोड़ना पड़ा। चार फरवरी को यहाँ वहाँ सोते और टीवी देख समय व्यतीत किया। शाम को कार्यक्रम के चलते समय अच्छा बीता। पाँच तारीख को दिन मे कोटा स्टेशन और आसपास की सड़कों को नापते हुए भ्रमण किया शाम को कार्यक्रम मे शामिल होने के पश्चात अब हमारे लिये 6 तारीख का पूरा दिन था। अपने मेजबान से बातचीत करने पर उन्होने गराडिया महादेव जाने के सलाह दी। बड़े वेमन से सोचा दिन भर घर पर विस्तर तोड़ने और लोटने  से वेहतर रहेगा कि 5-6 घंटे का समय घूम फिर कर व्यतीत करे।  पास मे रेल्वे स्टेशन स्थित स्टैंड से मैजिक गाड़ी बाले से बात कर हम लोग कोटा स्टेशन से करीब 30 किमी दूर स्थित गराडिया महादेव के लिये रवाना हुए। कोटा मे राष्ट्रिय राजमार्ग संख्या 76 पर स्थित हैंगिंग ब्रिज पर खड़े होकर हिलते पुल का कुछ मिनिट  रोमांच अनुभव कर आगे बढ़े।  लक्ष्य से कुछ किमी पहले हम लोगो ने राष्ट्रीय राजमार्ग से हट कर एक जंगलात की सड़क का रुख किया। रास्ता ठीक ठाक ही था पर नितांत सुनसान और पत्थरीले रेगिस्तानी जंगल का रास्ता था। छोटे कांटे दार पेड़ों के जंगल के बीच 4-5 किमी दूर वन विभाग का एक जांच केंद्र था। वन विभाग के जांच केंद्र से पर्यटकों  और गाड़ी का  निर्धारित शुल्क को जमा कर हम लोग ने  मैजिक गाड़ी के साथ वन विभाग की सीमा मे प्रवेश किया। यहाँ से हम लोगो को लगभग 2 किमी अंदर जाना था। यात्रा के बाद हमे लगा वास्तव मे हमे ट्रेक्किंग का आनंद लेते हुए पैदल ही वन विभाग की सीमा मे स्थित गराडिया महादेव स्थल तक जाना चाहिए था।

अपने वांछित स्थल पर जो दृश्य देखा तो मारे खुशी के मै तो  झूम उठा। ये तो वह सीन था जिसे देखने की ईक्षा हर उस बार करता था जब जब मै टीवी पर राजस्थान पर्यटन विभाग का वो विज्ञापन देखता था जिसमे एक नीलांबर श्रीकृष्ण वेशधारी बालक साइकिल से चल कर कुछ विदेशी पर्यटकों को लेकर उस शानदार स्थल पर पहुंचता है जो एक शांत नदी से घिरे पहाड़ को नदी के दूसरी ओर के पहाड़ पर खड़े होकर निहारता है। मेरे सामने वही स्थल अपनी प्रकृतिक सुंदरता की धरोहर को सँजोये हुए मेरे सामने खड़ा था। मुझे कतई उम्मीद नहीं थी कि गराडिया महादेव स्थल  ही वो जगह है जिसे देखने की अभिलाषा मैंने पहली बार राजस्थान पर्यटन मण्डल के विज्ञापन को टीवी पर देख कर की थी। बिना आकांक्षा या योजना के अचानक मनोवांछित स्थल को देखना  मन को प्रफ़्फुलित करने बाला था।   बहुत ही अद्भुत अकल्पनीय प्रकर्तिक सुंदरता से भरपूर भव्य दृश्य। कुछ मिनटों तक तो मै एकटक उस सुंदरता को यूं ही निहारता रहा। सामने उतनी ही ऊंचाई लिये पर्वत जिसके सिर पर हरे भरे पेड़ों से आच्छादित मुकुट और पर्वत की नीचे भी उतनी ही विशाल संख्या मे  वृक्षों की हरियाली जिसे चारों तरफ वलयाकार मे बहती शांत शीतलता देती चंबल नदी की हल्की हरी और आसमानी विशाल जलराशि  बगैर किसी कोलाहल के बह रही थी। चंबल नदी के वेग का अनुमान लगाना उतना ही मुश्किल था मानों कोई सिंह दबे पाँव अपने बेपरवाह  शिकार की ओर बढ़ रहा हो।
धीरे धीरे कदमों को बढ़ाते हुए हम लगभग 200 फुट नीचे गहरे मंदिर मे छोटी छोटी सीढ़ियों से उतर कर गराडिया महादेव मंदिर के दर्शनार्थ उतरे। प्राकर्तिक जलधारा से प्राप्त जल से सभी लोगो ने भगवान शिव का जलाभिषेक किया वहाँ से भी चंबल नदी का दृश्य अति दर्शनीय था। बहती जल धाराएँ एक अद्भुत मनमोहक दृश्य उत्पन्न कर रही थी। नीचे से पर्वत की बड़ी बड़ी चट्टानें एक के उपर एक ऐसे लग रही थी मानों बचपन मे सितोलिया, पिट्ठू, या टीपो खेलते समय पत्थरों को एक के उपर एक रख कर खेलते थे। ऊंची नीची चट्टानों से चंबल नदी के उस पार के पर्वत का दृश्य हर स्थान से अलग-अलग  तरह की छवि उत्पन्न कर रहा था। सावन के महीने मे इस स्थल की कल्पना स्वर्गिक आनंद देने बाली होगी। 

चंबल नदी हो और चंबल के दस्युओं का जिक्र न हो ऐसा तो हो ही नहीं सकता। चंबल के बीहड़ों के दस्यु सम्राटों की तरह यहाँ भी उनकी उपस्थिती बंदरों के रूप मे मिली। बंदरों का आतंक यहाँ खुल कर देखा जा सकता है। कोई भी खाने की वस्तु यदि आप अति सावधानी पूर्वक नहीं रखेंगे तो निश्चित तौर पर उसे बंदरों द्वारा अचानक लूट  लिया जायेगा। कृपया यहाँ इस बात का विशेष ध्यान रखे।

अचानक से प्राप्त इस प्रियतम  गराडिया महादेव पर्यटक स्थल को घूमने का अद्भुत आनंद ऐसा लगा मानों हमे अचानक बिना मांगे विना मोल  मोती माणिक का ख़जाना मिल गया हो।   

विजय सहगल      


शनिवार, 7 मार्च 2020

होम करते हाथ जलना


"होम करते हाथ जलना"

नोट-: मेरा पाठकों से अनुरोध है कृपया इस साधारण सी घटना मे अपनी  आत्मप्रशंसा या अपने को गौरवान्वित करने का मेरा उद्देश्य या इरादा कतई नहीं है मैंने तो इस घटना को महज अपना ब्लॉग लिखने हेतु बहुत ही हल्की मंशा और मनःस्थिति के वशीभूत लिखा है।  







आज सवेरे भ्रमण पश्चात जब मै घर पहुंचा तो मेरे दोनों हाथ मे लगे खून और कपड़ो मे लगी धूल, मिट्टी और कीचड़ को देख सारा परिवार सकते मे आ गया। मै कुछ बोल पाता उसके पूर्व ही सवालों की झड़ी लग गई। श्रीमती जी ने प्रश्न का उत्तर सुने बिना ही घोषित कर  दिया कि कहीं फिसल गये? कितनी बार कहा सम्हल कर चलों। जब दोनों हाथ की हथेलियों मे खून देखा तब तो मानों जैसे आफत आ गई!  किसी मोटरसाइकल या कार ने टक्कर मार दी? कहीं गिर गये? किसी ने मार दिया क्या? गहरी चोट तो नहीं?  आदि आदि। मन ही मन खींझते हुए सोचा वेमतलब  चुप चाप सीधे घर आते तो ये डांट तो न खानी पड़ती। मुझे लगता है हिंदुस्तान के शत प्रतिशत लोग शादी के बाद पत्नी के इन्ही सवालों के कारण ही नई-नई वैज्ञानिक  खोजों या आविष्कारों से दूर रहे होंगे!!!! इसी उधेड़ बुन के बीच मैंने मेरे साथ घटित घटनाक्रम को घर मे कह सुनाया।  
      
नोएडा मे प्रवास पर मेरी हर रोज कोशिश रहती है कि मेरे आवास के पास मेघदूतम पार्क  नोएडा मे प्रातः भ्रमण के लिये अवश्य जाऊँ। आज भी भ्रमण से बापसी पर मैंने देखा कि पार्क से सैक्टर 50 मेट्रो स्टेशन, लिंक रोड को जोड़ने बाली सड़क पर एक पेड़ कल हुई लगातार वारिस के कारण उखड़ कर सड़क पर आ गिरा था। पेड़ गिरने के स्थल के 10-15 मीटर पहले आने जाने बाली सड़क को जोड़ता हुआ एक कट बना हुआ था।   उस रोड पर तीव्र मोड़ के कारण प्रायः हर कार, स्कूल बस और अन्य वाहन  उस ओर 10-15 मीटर  बढ़ते और गिरे पेड़ के कारण वाहनों को पीछे कर सड़क के कट पर आकार दूसरी दिशा बाली सड़क से जाते।  अधिकतर वाहनों का उस दिशा मे जाना और गिरे पेड़ के कारण पुनः वाहनों को बापस लाकर दूसरी दिशा बाली सड़क से वाहन गुजारने पर कुछ अव्यवस्था और अफरा तफरी और थोड़ी थोड़ी यातायात अवरुद्ध की स्थिति बन रही थी। उक्त दशा को देख मैंने सोचा क्यों न दूसरी दिशा को जोड़ने बाली सड़क के पहले  कुछ अवरोध लगा दिया जाये ताकि उस 10-15 मीटर आगे गिरे पेड़ तक वाहन जाये ही न। चारों तरफ नज़र दौड़ाई, जैसा मै चाहता था मुझे कोई रस्सी, सुतली, प्ल्रस्टिक रस्सी या धागा दिखाई न दिया जिसे सड़क के दोनों ओर बांध कर आवागमन को रोका जा सके। सड़क के दूसरी ओर सड़क किनारे एक बरगद का पेड़ मुझे दिखा मैंने सोचा यहाँ अवश्य ही  कोई धागा आदि हमे मिलेगा क्योंकि भारतीय सांस्कृति मे महिलाएं वट अमावस्य पर वरगद के पेड़ के चारों ओर धागा लपेट अपने पति की  दीर्घायू की कामना करती है। पेड़ के नीचे ही मुझे कलावा (रक्षा सूत्र) की पूरी पिंडी मिल गई। मुझे लगा अब इस कलावा धागे से सड़क के आर पर एक दो फेरे बंध जायेंगे। वमुश्किल एक फेरा ही पूरा कर पाया था अचानक आती एक कार ने उस धागे की लाइन को तोड़ दिया। पर आगे गिरा पेड़ देख कर कार मे बैठे दंपति ने मेरे सकारात्मक प्रयास को समझ, कार को पीछे कर खड़ा किया और मुझे मेरे प्रयास मे सहयोग करने कार से नीचे उतर आये। मैंने उन्हे बंधे धागे पर पास मे लगे वृक्षों की पत्तियों को धागे के उपर लगाने का निवेदन किया ताकि वाहन चालक दूर से ही इन पत्तियों को  क्रमवद्ध कतार देख कर आगे न बढ़े।  जिसे उन्होने सहर्ष स्वीकार कर वैसा ही किया। मैंने देखा धागे से बंधी पत्तियाँ इतनी छोटी थी कि वाहन चालक  कुछ समझ पाते तब तक वह कलावा फिर टूट जाता। मैंने पुनः प्रयास करते हुए आसपास पड़ी कुछ सूखी टहनी को सड़क पर विछाया और गिरे हुए पेड़ की कुछ हरी टहनियाँ तोड़ सड़क पर विछायी  जिनके कारण घटना स्थल तक  जाये बिना वाहन  दूसरी तरफ मुड़ जाये। मुझे अच्छा लगा मेरे प्रयास सार्थक हो रहे थे और लोग गिरे पेड़ बाले रास्ते पर न जाकर दूसरी ओर की सड़क पर मुड़ कर जा रहे थे। पर अचानक 5-6 गाय-बैल का झुंड आ गया। उन्होने मुझे हरी हरी टहनियाँ तोड़ते और सड़क पर विछाते देख अपने लिये भोजन की प्रत्याशा से विछि  हुई टहनियों को खाना शुरू कर दिया। मुझे लगा शायद हमारे  प्रयास इन पशुओं की वजह से पुनः निरर्थक न हो ऐसा सोच मैंने उन्हे एक लकड़ी से पेड़ की ओर हांक दिया ताकि भोजन के बड़े भंडार रूपी वृक्ष को   देख कर ये पशु इन टहनियों को न खाये। और इसका प्रभाव सार्थक भी हुआ। इन पशुओं का झुंड पेड़ो की पत्तियों को खाने मे मशगूल हो गया। मैंने देखा 40-50 कदम की  दूरी पर रास्ते मे 6-7 फुट लंबा  एक पुराना सूखा पेड़ नाली मे पड़ा है। उस पुराने सूखे पेड़ जिसमे बरसात के कारण काफी कीचड़ और धूल मिट्टी लगी हुई थी। मुझे लगा ये सड़क के अवरोध को और मजबूत करेगा। ऐसा सोच मैंने उसे घसीटते हुए अन्य अवरोध के साथ मिला दिया। अब अबरोध पूरी तरह तैयार हो आने जाने वाहन चालकों को स्पष्ट नज़र आ रहा था। लोग अब अपने वाहन दुर्घटना स्थल तक  न जाकर सड़क की दूसरी ओर मोड़ कर निकाल रहे थे।

हरे पेड़ की पत्तियों को तोड़ते वक्त मेरी एक उंगली मे छोटा सा कट लग गया जिससे खून बहने लगा। खून रोकने के प्रयास मे दोनों हाथों, हथेलियों मे धूल मिट्टी के साथ  खून लग गया। हमारे कपड़ों मे भी काफी कीचड़ मिट्टी लग चुकी थी पर तसल्ली थी कि मेरा एक छोटा सा प्रयास कामयाब हो गया था। पर घर पर लगी डांट फटकार चेहरे की हंसी को न दबा सकी।   मुझे  लगा कि ऐसी घटनाओं के कारण ही विद्वजनों ने इस मुहाबरे को गढ़ा होगा कि "होम करते हाथ जलना"  

विजय सहगल                    

बुधवार, 4 मार्च 2020

टेम्पो रूट नंबर-8


"टेम्पो रूट नंबर-8"




उन दिनों (1984) हम लखनऊ से स्थान्तरित होकर  ग्वालियर शाखा मे आये थे। इससे पूर्व ग्वालियर पहले कभी आना नहीं हुआ था। हम झाँसी से ग्वालियर ट्रेन से  डेली  अप डाउन करते थे। डेली अप डाउन बालों का जीवन बड़ा ही मशीनीकरण की तरह होता था। सुबह झाँसी से लगभग 7 बजे निकलना होता था। आज की तरह इंटरनेट जैसी  आधुनिक सुविधाये नहीं थी जिससे गाड़ियों की स्थिति पता कर पाते, पर उन दिनों आकाशवाणी ग्वालियर पर प्रातः 6 बजे के  समाचारों के पश्चात  ग्वालियर स्टेशन पर रेल गाड़ियों के आवागमन की स्थिति का प्रसारण किया जाता था। हम सभी डेली अप डाउनर ठीक 6 बजे के समाचार के  बाद झाँसी मे आकाशवाणी ग्वालियर स्टेशन सुनते थे और ग्वालियर स्टेशन पर गाड़ियों के स्थिति के अनुसार झाँसी मे उनके आने का अनुमान लगा कर सबसे अनुकूल ट्रेन  जो ऑफिस समय से पहले हमे ग्वालियर पहुंचा दे उस गाड़ी से ग्वालियर आते थे। प्रायः ग्वालियर की  दूरी (98किमी) के कारण ट्रंजिस्टर पर आवाज साफ नहीं आती थी और कई बार आकाशवाणी ग्वालियर गाड़ियों की स्थिति बताने मे ये कह कर असमर्थता व्यक्त करती कि "रेल विभाग से सूचना न मिलने के कारण गाड़ियों  की स्थिति बताने मे असमर्थ है" तो  बड़ी निराशा होती थी तब स्टेशन मास्टर ग्वालियर से हम लोग इस बात की शिकायत करते थे ताकि हर रोज आकाशवाणी ग्वालियर से गाड़ियों की स्थिति प्राप्त होती रहे।

ग्वालियर स्टेशन पर पहुँचने पर सभी डेलि पैसेंजर का लक्ष्य जल्दी से जल्दी ऑफिस पहुँचने की रहता था। प्रायः सभी के ऑफिस नयाबाजार, जयेन्द्रगंज, बाड़े के आसपास थे। एजी ऑफिस के लोग तो वहाँ तक जाने के साधन न होने के कारण प्रायः पैदल ही अपने ऑफिस पहुँच जाते थे। ऑफिस के लिए स्टेशन के बाहर से टेम्पो को पकड़ कर हम सभी ऑफिस के लिये जाते। एक साथ यात्रियों के आने से टेम्पो बाले कुछ मन मानी कर निर्धारित किराया से 25-30 पैसे  ज्यादा लेते थे। उन दिनों दैनिक आवागमन के खर्चों के बाद टेम्पो बालों का निर्धारित दर से ज्यादा किराया लेना बहुत खलता था, पर मजबूरी थी।  टेम्पो बालों की मनमानी चल रही थी, झगड़ा फसाद हम लोग कर नहीं सकते थे क्योंकि हम सभी नौकरी पेशावर लोग थे।

एक बार रोज-रोज की इस लूट और मनमानी से परेशान होकर पाटनकर बाज़ार स्थित यातायात पुलिस की चौकी पर हम अपने मित्र मुकेश रिहानी, विजय गुप्ता, राजकुमार खरे, राजीव कपूर आदि मित्र पहुँचे और टेम्पो बालों के मनमानी की शिकायत की। इस शिकायत पर यातायात पुलिस की प्रीतिक्रिया बड़ी सकारात्मक थी। उन्होने इस मनमानी का समाधान हम सभी को छपे हुए यातायात कार्ड देकर किया। उस पोस्ट कार्ड पर टेम्पो बालों की मनमानी की शिकायत के तीन चार कारण छपे थे जिसमे से एक निर्धारित दर से ज्यादा किराया लेने पर शिकायत का भी था। उस पर सिर्फ टेम्पो का नंबर, और शिकायत का क्र्मांक लिख कर अपने नाम पते के साथ डाक से पोस्ट करना था, सबसे बड़ी बात उक्त पोस्ट कार्ड पर कोई पोस्टल स्टैम्प का शुल्क भी नहीं अदा करना था। उन यातायात पुलिस के स्टाफ ने हम लोगो को 2-2, 3-3 छपे कार्ड दे दिये और कहा कि जो भी टेम्पो बाला आप से निर्धारित दर से ज्यादा पैसे ले आप उसका नंबर लिख कर डाक से हमारे पास भेज दो हम उस ड्राईवर के विरुद्ध कार्यवाही करेंगे। अब तो हम लोगो के पास कार्ड के रूप मे  एक ऐसा हथियार आ गया था जिससे हम टेम्पो बालो से उनकी मनमानी के विरुद्ध अहिंसात्मक लड़ाई लड़ सकते थे, पर इसमे एक समस्या थी और अनेक आशंकाओं रूपी सवाल भी थे  कि यदि टेम्पो बाला अभी पैसे ज्यादा ले गया तो शिकायत के बाद क्या कार्यवाही होगी? होगी कि नहीं होगी? और अगर होगी भी तो कब होगी? और हुई भी तो हमे कैसे पता चलेगा? और यदि सबकुछ हमारे पक्ष मे हो भी गया ततो  हमारे पैसे तो बापस मिलने से रहे? क्योंकि हम सभी भारतीय बचपन से पुलिस की  इस व्यवहार से भलीभाँति परिचित थे फिर पुलिस चाहे मध्यप्रदेश की हो उत्तर प्रदेश की या किसी अन्य राज्य की। हमे मालूम था यातायात कार्ड से प्राप्त हुई शिकायत पर कार्यवाही तो निश्चित होगी। यातायात पुलिस का सिपाही कार्ड के आधार पर टेम्पो ड्राईवर के विरुद्ध कार्यवाही निश्चित ही प्रारम्भ करेंगा, उस टेम्पो जिसकी शिकायत की गई है उसे रोकेगा पर अपना सुविधा शुल्क लेकर उसे छोड़ देगा क्योंकि इस तरह के शिकायती पत्र या कार्ड का कोई लिखित रेकॉर्ड या लेखा जोखा तो होता नहीं।

पर हम लोगो ने भी "सर्वे भवन्तु सुखिना:....... अर्थात सभी सुखी हों के तर्ज़ पर एक बीच का रास्ता निकाल लिया। पहले तो हम लोग बैग मे खुले पैसे रखते और निर्धारित राशि ही उसे देते फिर भी यदि  टेम्पो ड्राईवर हम लोगो से  ज्यादा पैसे मांगता तो उसे प्यार से ट्रैफिक शिकायती कार्ड दिखा कर यही बात  कहते देख भाई हमे निर्धारित किराये से   20-25 पैसे ज्यादा  देने मे कोई हर्ज़ नहीं पर यदि हम इस  यातायात पुलिस के  कार्ड से तुम्हारी शिकायत करेंगे तो हमे मालूम है तुम्हारा कुछ नहीं बिगड़ेगा पर इस कार्ड को पुलिस द्वारा फाड़ने (शिकायत को नज़रअंदाज़ करने) के लिये चाय पानी के नाम पर तुम्हें 5-10 रूपये तो खर्च करना ही पड़ेगा। क्योंकि शिकायत का लेखा जोखा रखना या न रखना उस पुलिस बाले की मर्जी पर होगा।  हम इसी बात मे तसल्ली कर लेंगे हमारे 20-25 पैसे बसूल हो गये? यह प्रयोग 99% सफल रहा। कार्ड दिखने पर  अब प्रायः टेम्पो बाले पुलिस के झंझट से बचने के लिये हम लोगो से ज्यादा पैसे लेने का जोखिम  नहीं लेते। प्रायः ऐसा ही होता था शिकायती कार्ड पाकर पुलिस का सिपाही  बैसे  ही खुश होता था जैसे रोटी के लिये आपस मे झगड़ती दो बिल्लियाँ का  न्याय पाने के  लिये बंदर के पास जाना!! यदि  एकाध टेम्पो ड्राईवर फिर भी हमारी बात न मान कर ज्यादा पैसे लेने का दुस्साहस करता तो हम लोग अनिर्लिप्त भाव से टेम्पो बाले की शिकायत  पुलिस रूपी बंदर की अदालत मे प्रेषित कर देते।

देश की आम जनता सरकार से मात्र कुछ उम्मीदे ही करती है कि उसका जीवन की छोटी-मोटी आवश्यकताओं की पूर्ति  बगैर किसी बाधा या कष्ट के पूरी होती रहे।  उक्त यातायात शिकायत कार्ड से एक बात तो स्पष्ट  है कि प्रशासन चाहे तो किसी भी समस्या, समाज विरोधी तत्व, या निर्धारित दर से ज्यादा राशि बसूलने बाले टेम्पो ड्राईवर, दुकानदार, या रिश्वत लेने बाले शासकीय अधिकारी या कर्मचारी को रोकने मे सक्षम है पर इसके लिये दृढ़ ईक्षा शक्ति की जरूरत है जिसके लिये देश की आम जनता लगातार पिछले 72 साल से इंतज़ार कर रही है। 

विजय सहगल