शनिवार, 21 सितंबर 2019

आरक्षण


"आरक्षण"






आज पड़ौस के लोगो मे कुछ गहमागहमी थी। मुहल्ले की जमादारिन विनियाँ बाई  द्वारा पिछले दो दिनों से लेट्रिन अर्थात देशी संडास (शौचालाय) को झाड़ा (सफाई) नहीं गया था। पड़ौस के सभी घरों से मर्द, औरत बच्चे  एकत्रित होकर उस बुजुर्ग महिला विनियाँ बाई को भला बुरा कह रहे थे जिसने पिछले दो दिन से संडास की सफाई नहीं की थी और उन्हे हुई परेशानी के लिये सफाई बाली महिला विनियाँ बाई को इसके लिये उलाहना दे रहे थे। पर जब मेरी माँ ने उस जमादारिन महिला विनियाँ बाई  से बात की और इसका कारण जाना तो माँ को भी कारण सुन कर उसके प्रति हमदर्दी हुई और सफाई बाली महिला के दर्द को जान कर माँ को भी वेदना पहुंची और माँ उस जमादारिन विनियाँ बाई के पक्ष मे खड़ी रही। बात वास्तव मे यह थी कि मैला ढोते समय उस सफाई कर्मी महिला को मैला को ढकने के लिये लोग घरों से चूल्हे की  राख या राखी नहीं देते थे जिसकी शिकायत बह प्रत्येक घर से बार बार कर चुकी थी, क्योंकि लोगो ने चूल्हे की लकड़ियों और उपलों की जगह केरोसिन ऑइल के  स्टोव का उपयोग शुरू कर दिया था जिससे राख का अभाव हो जाता था।  इसी राखी के अभाव मे मैला ढोने के कार्य मे होने बाले कष्ट के कारण विनियाँ ने  दो दिन मैला नहीं उठाया।   दरअसल वह सफाई बाली महिला विनियाँ  जो हमारी माँ के उम्र दराज या मेरी माँ से कुछेक  साल बड़ी रही होगी और प्रायः तीज त्योहार पर घर-घर से  पावन लेते हुए हमारे घर भी आती थी। वह महिला हर त्योहार पर एवं महीने की हर पूर्णमासी और अमावस्या पर शाम के समय "पावन" (घर पर बनी रोटी, चावल के साथ कुछ खाने आदि की वस्तु) मांगने घर आती थी। घर के दरवाजे से आवाज लगाना "पावन दे जाओ" उसका कार्य था। घर के मुख्य दरवाजों तक उसका आना निषेध था अतः वह हर घर के बाहर से  ज़ोर ज़ोर से चीख कर पावन मांगने कि गुहार लगाती। वह ऐसी आवाज प्रत्येक  घरों मे 2-3 बार से ज्यादा तो लगाती ही थी क्योंकि घर काफी लंबे हुआ करते थे जिनकी साधारणतः आवाज अंदर सुनाई नहीं देती थी।  पावन मे विनियाँ को  प्रत्येक घर से सुबह बनी हुई 4-6 रोटी के साथ कुछ सब्जी, चावल (अगर हुआ तो) हर घर से मिल जाता था। इस तरह उन  रोटियों से उस विनियाँ  को कुछ दिनों के लिये खाने के रूप मे रोटियाँ  मिल जाती जिनको धूप मे सुखा कर बह इन रोटियों से 6-8 दिन के खाने की  व्यवस्था कर लेती।  बड़े तीज त्योहार जैसे होली, दीवाली, दशहरा, राखी संक्रांति, अष्टमी  आदि पर उसे त्योहार पर घरों से रोटी या पूड़ी के साथ कुछ मिठाई या लड्डू भी मिल जाते साथ मे नगदी के रूप  चार-आठ आने भी  दिये जाते जिससे उसके परिवार मे भी त्योहारों कि खुशियाँ दिखाई देने लगती। घरों मे जब शादी-विवाह आदि मांगलिक कार्य होते तो उस बुजुर्ग महिला विनियाँ का परिवार भी बिना निमंत्रण पत्र के आमंत्रित रहता। विनियाँ के  परिवार के सदस्य भोज समारोह के दौरान फेंके गये झूठन मे से साबुत मिठाई खाने आदि की वस्तुए अपने प्रयोग के लिये एकत्रित कर बचे खाने को गाय-बैल आदि जानवरों को देते  और बाकी कचड़े जैसे  दौने, पत्तल, मिट्टी के कुल्हड़ को शहर से दूर निस्तारित करते। समारोह के अंत मे इस परिवार के भोजन का नंबर आता जो समारोह स्थल के आखिरी छोर पर बैठ कर अंत मे भोजन करता और परिवार के अन्य लोगो के लिये बांध कर ले जाता। पावन मांगने बाले दिनों मे ही उस विनियाँ  को देखते थे क्योंकि बाकी दिनों मे सुबह से देर दोपहर तक उसे मैले कि सफाई कर उसको सिर पर  ढोकर शहर से दूर फेंकने जाना पड़ता था। इस कार्य मे उसे 2-3 चक्कर से भी ज्यादा रोज लगाने पड़ते थे।   कभी कभी जब मेरी माँ फुर्सत मे होती तो पावन देने के बहाने  विनियाँ का  हाल चाल और घर परिवार के बारे मे पूंछती। वह महिला मेरी माँ को जिज्जी कह कर संबोधित करती और  हमेशा माँ से फांसला  बना कर नीचे सड़क पर बैठ माँ से बाते कर घड़ी-दो-घड़ी आराम कर लेती। मेरी माँ प्रायः हम लोगो से एक लोटा पानी लाकर उसको पिलाने के लिये कहती तो वह ओख से दोनों हाथ बांध कर पानी पीती और हम लोग चबूतरे से लोटे के  पानी की धार बना कर उसे पानी पिलाते। यध्यपि इस बात के सख्त हिदायत थी कि पानी पिलाते हुए लोटे को उससे छूना नहीं चाहिये अन्यथा लोटे को मिट्टी से मांझना, धोना पड़ेगा। मै  उन दिनों 8-10 साल का रहा हूंगा और प्रायः पानी पिलाना शुरू करने या समाप्त करने मे कई बार लोटा उसके हाथ से छू जाता तो भी मै किसी को नहीं बताता, क्योंकि मुझे लोटा धोने या मांझने मे कोई दिक्कत नहीं थी पर लोटे का उससे छू जाने के बाद लोटे को धोने  का  व्यवहार अंदर ही अंदर मन मे बड़ा  कचोटता था। ये वो महिला थी जो हर दिन हमारे शौचालय से मैले को साफ कर अपने सिर पर ढोकर ले जाती। कभी कल्पना करता हूँ कि जिस मैले को हम हाथ लगाने से भी घृणा करते हैं उस मैले को विनियाँ  ने अपनी सारी उम्र  साफ कर सिर पर ढो कर निस्तारित  किया होगा और ये कोई एक दिन कि बात नहीं थी बल्कि अनवरत चलने बाली हर दिन कि कहानी थी।  सिर पर मैला ढोने की इस  प्रथा ने, न जाने कितनी पीढ़ियों से  विनियाँ  या उस का परिवार अपनी आजीविका के रूप मे करता आ रहा होगा। न जाने कितनी पीढ़ियाँ इस कार्य को करते हुए मोक्ष को प्राप्त हो गई होंगी, जिसका कोई अंदाजा हम  आज भी नहीं लगा सकते और सबसे घृणास्पद कार्य जिसको मन मे सोचने भर से मन खिन्न  हो जाता था पर विनियाँ  हर दिन सिर्फ महीने मे दो-तीन  बार  "पावन" और चंद सिक्कों के लिये यह अपमान जनक कार्य करती थी ताकि वह और उसके परिवार का जीवन यापन हो सके। हमे याद है इस काम मे उस महिला की अगली पीढ़ी के  बेटे और बहू भी हाथ बंटाने लगे  थे।  इस सृष्टि मे सिर्फ एक माँ ही है जो बच्चे के जन्म लेने से उस बाल्य अवस्था तक, जब तक की बच्चा खुद इस काम को करने के लायक नहीं हो जाता अपने बच्चे कि गंदगी को बगैर किसी  घृणा भाव के दिन मे अनेकों बार साफ करती हैं और दूसरी तरफ उक्त बुजुर्ग विनियाँ  जो पूरे मुहल्ले के बच्चे, बूढ़े, बड़े, नौजवानों का मैला अपने हाथों से माँ की तरह साफ करती बगैर उम्र के भेदभाव किए। मेरा द्रढ़ निश्चित मत है इस सफाई बाली माँ का स्थान भी किसी भी मायने माँ से कमतर नहीं था। जब कभी उस सफाई कर्मी विनियाँ  को याद करता हूँ तो उसके कार्य को याद कर सिहर जाता हूँ कि कैसे उस  महिला न हमारे सहित समाज के सैकड़ो घरों का मैला न केबल साफ किया अपितु सिर पर ढोकर उसे घर से दूर ले जाकर निस्तारित किया। ये एक ऐसी माँ थी जिसने जन्म तो नहीं दिया पर माँ के समान अपनी ज़िंदगी के हर दिन को मैला ढो कर नरक मे अपना जीवन की आहुति दी  ताकि समाज की   संताने एक साफ सफाई से भरपूर सुखी और सम्पन्न स्वर्गिक आनंद को जी सके। विनियाँ आजकल  उम्र के अपने आखिरी पढ़ाव के दौर से गुजर रही थी। चलना फिरना कम हो गया था। कभी कभी बहू-बेटे के साथ पावन के बहाने अपने डेरे के लोगो को देखने चली आती। उसकी लाचारी और उम्र की बेबसी उसके चेहरे पर स्पष्ट देखी जा सकती थी। कभी  दूर आसमान के शून्य मे वेसुध होकर एकटक देख मन ही मन बुदबुदा कर अपने आप से ही बात करती?  

न जाने क्यों आज मै अपराध बोध से ग्रसित हूँ। ऐसा लग रहा है कि विनियाँ बाई हमे झकझोड़ रही है और  चीख-चीख कर समाज के हर व्यक्ति से  ये सवाल कर रही है "मानव मल को साफ करने और उस मैले को  सिर पर ढोने के  कार्य को  निर्वहन करना हमारे ही परिवार या    जाति की ही ज़िम्मेदारी क्यों रही??  छुआछूट और अस्पर्श्यता के श्राप से शिक्षा और अन्य रोज़गार से हमे सहस्त्रों वर्ष वंचित क्यों रखा गया?? हजारों वर्षों मे हमे समाज मे बराबरी के  दर्जे से क्यों वंचित रखा गया?? हमारे पूर्वजों ने उन्हे   सिर्फ और सिर्फ इस मैला ढोने के कार्य तक क्यों सीमित रखा?? समाज के अन्य वर्ग ने इस कार्य मे भागीदार होकर बराबरी क्यों नहीं की?? क्यों समाज के अन्य सभी वर्गों ने मानव मल को साफ कर  सिर पर ढोकर निस्तारित करने  के इस  कार्य को उसके परिवार एवं उसकी जाति के लिये "आरक्षित" कर दिया??

सैकड़ों सालों पूर्व  हमारे पूर्वजों ने इस जाति को मैला ढोने की प्रथा से मुक्ति  के लिये नहीं सोचा तो  क्या वर्तमान मे हम सभी को भी क्या जमादारिन विनियाँ और उसके परिवार/जाति के लिये "आरक्षित" इस सेवा कार्य से मुक्त करने के लिये  ठोस और  रचनात्मक प्रयास नहीं करने चाहिये?? जब कभी ये ख्याल दिल मे आता है  तब उस  माँ के प्रति मेरा सिर श्रद्धा और सम्मान से झुक जाता है और सोचता हूँ कि क्या उसके इस ऋण से एक  ज़िंदगी तो क्या कई ज़िंदगियों मे उऋण हुआ जा सकता हैं??

आज के इस प्रगतिशील वैज्ञानिक युग मे काफी जगह पुराने देशी शौचालय यध्यपि समाप्त हो गये है पर महानगरों मे सीवर की सफाई के लिये भी इसी वर्ग के लोगो से यही कार्य कराया जा रहा हैं। इस सबके बाबजूद भी ये देश का दुर्भाग्य है कि सिर पर मैला ढोने की इस कुत्सित प्रथा का पूर्णतः उन्मूलन आज  तक भी  नहीं हुआ है।

सिर पर मैला ढोने की इस अमानवीय अपमान जनक  प्रथा के बारे मे अपनी आने बाली संतानों को आज यदि हमने नहीं बताया तो हम एक बहुत बड़े अन्याय और पाप के  भागीदार होंगे। आज आवश्यकता है हमे अपने बच्चों को ये बताने और जागरूक  करने की "कि उन्होने जीवन मे जो सफलता, शिक्षा, ज्ञान हांसिल किया। जो बड़ी-बड़ी सफलता पायी दरअसल उसके पीछे विनियाँ जैसी महिला और उसकी उन अंगिनित अभागिन  पीढ़ियों का एक महत्वपूर्ण योगदान है  और हमारे पूर्वजों का इस वर्ग के प्रति भेदभाव एवं अन्याय पूर्ण व्यवहार   भी हैं जिनकी संताने इस मैला ढोने की अपमान जनक  प्रथा को अब तक करती  आ रही  है।  उक्त घृणित कार्य को करने बाले परिवार  स्वयं चाह कर भी आज के इस समता-मूलक समाज मे  अपना स्थान गाँव के आखिरी छोर पर बनी अपनी झोपड़ी की ही तरह देखते हैं क्योंकि सैकड़ो वर्षों से इस नरकीय जीवन को जीने बालों ने इस कार्य को ही अपने जीवन की "आखिरी नियति" मान लिया हैं !! कानूनी प्रावधानों के कारण वेशक आज हम इनको बराबरी का दर्जा दे रहे है पर ये कड़वी सच्चाई है और हमारा दुर्भाग्य भी, कि दिलों मे हम लोगो ने इन्हे आज भी बराबरी का दर्ज़ा नहीं दिया है ??

सैकड़ो साल से चली आ रही  इस अमानवीय  असमानता को सिर्फ कानून प्रदत्त उपायों से  चंद दशकों मे दूर किया जा सकता हैं??

इसके लिये एक बार अपने आप को विनियाँ बाई की जगह रख कर सोचने की महती आवश्यकता है और आवश्यकता है विनियाँ बाई द्वारा उठाये "गैर बराबरी" के प्रति उसके सवालों पर मंथन करने  की??

विजय सहगल

शुक्रवार, 20 सितंबर 2019

दिये की लौ


दिये की लौ



अंधियों मे जूझ जैसे, चलें समुद्र मे  कश्तियां।  
तिमिर के छँटने को काफी एक माटी का दिया॥  
जब घिरी  तम की घटाएँ सेतु के संसार मे।
जल रही थी लौ दिये की दूर कश्ती धार मे॥ 
दूर  वेशक न करे  प्रकाश के  अवसान को ।
टिमटिमा संदेश देती अपनी सत्ता शान को॥
दिया रोशन करे जब, कुबेर का कोषालय भी।
देव का देवालय भी, शिव का शिवालय भी। 
तमस क्यों संग है प्रबल, दम्भ और अन्याय के।
लौ दिये की है समर्पित, सत्य और पथ न्याय के॥  
धुंध  को जब चीर कर, लौ  दिये की जली।
घमंड झंझावात का, पवन-प्रचंड लेकर चली॥
नृशंस-मिथ्याचार के  संग, तमस क्यों होता बड़ा।  
"सत्य की लौ" साथ जैसे, ओट बन तिनका खड़ा॥  
है नहीं अवश्य ही हर, रोशनी सूरज सी  हो। 
घोर काली रात मे नन्ही-किरण-ज्योति की हो॥ 
स्याह आंधी युद्ध मे जब, हवा "लौ" को खा गयी।   
काल के इतिहास मे, "दिये की लौ" समा गयी॥
क्यों "दिये" होम होते, घुप्प अंधेरी रात मे।
दो घड़ी जीवन बिताते हाथ लेकर हाथ मे॥
सार्थक जीवन उन्ही का, जो दूसरों के काम आयें।
रश्मि बन जैसे दिये की, पथिक को रस्ता दिखाये॥
राह मंजिल की पाने, प्रकाश पथ मे चाहिये।
डिगाने श्याम रैन  को, लौ दिये की लाइये॥   

विजय सहगल



मंगलवार, 17 सितंबर 2019

गांधी जी के तीन बंदर




गांधी जी के तीन बंदर






आज कक्षा मे बच्चों को गांधी जी के तीन बंदर की कहानी सुनाई। गांधी जी के ये तीन बंदर उनके गुरु थे। क्लास के 3 विध्यार्थियों को तीन बंदर बनाया। सारे बच्चे कहानी सुन कर खुश थे साथ ही तीन बच्चों को बंदर बना देख कर भी खुश थी। तीनों बंदर कहानी सुन कर तो खुश थे ही और अपने आपको गांधी जी के बंदर बन कर भी खुश थे।

1.  बुरा मत देखो।
2.  बुरा मत सुनो।  
3.  बुरा मत बोलो।

बच्चों को तो कहानी अच्छी लगी। कहो आपको कैसी लगी बंदर और बच्चों की कहानी??

विजय सहगल

शनिवार, 14 सितंबर 2019

प्रदूषण का प्रमाण


प्रदूषण का प्रमाण






















श्रीमान नितिन गडकरी                                       14.09.2019
माननीय सड़क परिवहन मंत्री
भारत सरकार
नई दिल्ली।

महोदय

विषय :- प्रदूषण नियंत्र प्रमाण पत्र ॰  
  
आपके सड़क पर यातायात के नियमों पर कड़े दंडात्मक प्रावधानों का मै  स्वागत करता हूँ, फिर चाहे ये नियम ड्राइविंग लाईसेंस, गाड़ी के रजिस्ट्रेशन, प्रदूषण नियंत्रण प्रमाण पत्र या हेलमेट/सीट बेल्ट या अन्य नियमों से संबन्धित हो। एक कल्याण कारक राज्य मे अंततः आम जन के लिये ही उसके कल्याण हेतु  कार्य किये जाते हैं ताकि आम जन के जानमाल एवं धन-धान्य की रक्षा हो सके। उक्त सिद्धांत के अनुसार आप उक्त लक्ष्य को प्राप्त करने की दिशा  मे पूर्ण सफल हुए है, अतः आप बधाई के पात्र है। इन नियमों मे एक नियम वाहन के प्रदूषण प्रमाण की आवश्यकता पर भी ज़ोर दिया गया हैं ताकि पर्यावरण को प्रदूषित बनाने पर नियंत्रण किया जा सके। इस प्रदूषण प्रमाण पत्र के अभाव मे 10000/- रूपये का दंडात्मक प्रावधान का भी मै  स्वागत करता हूँ। निश्चित तौर पर उक्त दंडात्मक प्रावधान माननीय उच्चतम न्यायालय के आदेशों का पर्यावरण प्रदूषण के  पालन हेतु  लागू किये गये ताकि पर्यावरण के प्रदूषण पर नियंत्रण कर मानव जाति की रक्षा कर पर्यावरण संतुलन बनाया जा सके।  आपका चंद दिन पहले आपकी सरकार द्वारा लिये गये उक्त दंडात्मक प्रावधानों का डट कर लागू कराने का प्रयास और किसी भी प्रावधान मे कोई ढील न देने के संकल्प को भी देख कर प्रसन्नता हुई क्योंकि आपके दिल मे आम जनता के जीवन की रक्षा का संकल्प सर्वोपरि है।   

परन्तू खेद और दुःख का विषय है आपके विभाग ने उच्चतम न्यायालय के अदशों के कार्यान्वयन के जो नियम लागू किये हैं उनका कैसे मखौल और मज़ाक उड़ाया जा रहा है।  जिसको देख कर निहायत अफसोस होता है कि प्रदूषण नियंत्रण केंद्र का एक अदना संचालक किस तरह उच्चतम न्यायालय और आपकी सरकार की आँखों मे धूल झोक कर व्यवस्था को नाकामयाब कर चुनौती दे  रहा हैं, जिसकी एक छोटीसी बानगी मै आपके समक्ष रखना चाहता हूँ।  दिनांक 06.09.2019 प्रदूषण नियंत्रण प्रमाण पत्र लेने हेतु हम पीयूसी (Pollution Under Control) केंद्र गये जो कि भारत पेट्रोलियम पेट्रोल पम्प, सैक्टर 35, नोएडा  मे स्थित केंद्र "Natural Welfare Association" Centre Code 997 द्वारा संचालित किया जा रहा है।  लंबी लाइन मे खड़े लोग पूर्व से ही अपनी बारी का इंतज़ार कर रहे थे। उम्र के इस आखिरी पड़ाव के बाबजूद भी मैं अन्य लोगो की तरह प्रदूषण प्रमाण पत्र लेने हेतु उक्त पंक्ति मे खड़ा हो गया। यध्यपि तेज धूप थी पर सड़क परिवहन विभाग के आदेशों का भारत के एक जागरूक नागरिक की तरह  पालन हेतु  इतने कष्ट को भुगतना तो जायज़ मानता हूँ। पर उक्त केंद्र की मनमानी और भ्रष्ट आचरण देख कर हार्दिक दुःख हुआ। उंक्त केंद्र पर कुछ लोग लाइन के इतर ज्यादा पैसे देकर प्रमाण पत्र बाद मे लेने के आश्वासन के बाद जा रहे थे और लाइन मे खड़े अन्य लोगो के साथ केंद्र संचालक द्वारा की जा रही क्रूरता को सहन करने को मजबूर थे। उक्त प्रदूषण केंद्र पर जब मै अपनी Swift कार जिसका नंबर MP-07/CA 8150 का PUC प्रमाण पत्र लेने गया तो केंद्र पर  हो रही उक्त घोर अनियमितता का विरोध किया। मै हतप्रभ था कि लोगो से अधिक पैसे लेकर बगैर लाइन लगाए और बगैर वाहन का मशीन से प्रदूषण स्तर जाँचे  लोग प्रमाण पत्र ले रहे थे। मै वरिष्ठ नागरिक हूँ लगभग 1.30 घंटे लाइन मे लगकर धूप मे खड़ा था पर  बगैर लाइन मे लगे लोगो से  अधिक पैसे लेकर और बगैर "प्रदूषण स्तर" को मशीन से जाँचे  प्रमाण पत्र जारी का जब हमने विरोध किया तो मेरे नंबर आने पर उस केंद्र संचालक ने हमारी कार का प्रमाण पत्र ये कह कर देने से इंकार कर दिया कि आपकी गाड़ी मध्य प्रदेश की है इसलिए इसका प्रदूषण  प्रमाण पत्र यहाँ से जारी नहीं होगा। जिस प्रदूषण नियंत्रण केंद्र से सैकड़ो वाहन बगैर कोई प्रदूषण जांच किये प्रदूषण प्रमाण पत्र प्राप्त करे जा रहे हों  उस केंद्र के द्वारा महज इस बिना पर पीयूसी जारी करने से मना कर दिया जाता है कि गाड़ी मध्य प्रदेश की है? जबकि आरसी, डीएल, इन्सुयोरेंस हमारे पास था!  मै शपथ पूर्वक आपसे अनुरोध करता हूँ कि उक्त प्रदूषण  केंद्र मे मेरे द्वारा लगाए आरोप की सख्त निष्पक्ष जांच करें उक्त आरोपों  को आप सही पायेंगे।  
  
माननीय गडकरी जी टीवी, समाचार पत्रों मे  आपने स्वयं माना है कि आपका भी एक बार चालान कट चुका है। महोदय आपने गलती की थी अतः आपका चालान कटना उचित था पर हम जैसों की तो कोई गलती नहीं पर भ्रष्ट आचरण करने बाले व्यवस्था के ये "दीमक"  प्रदूषण नियंत्रण प्रमाण पत्र न देकर  हमसे बलपूर्वक गलती करा कर चालान काटने पर आमदा हैं? आप जैसे आर्थिक और राजनैतिक रूप से प्रभावशाली और बलशाली लोग हम जैसे निरीह और कमजोर वरिष्ठ नागरिक के दिल पर बीत रही उस क्रूरता का अंदाज नहीं लगा सकते जिसको डेढ़ घंटा कड़ी धूप मे खड़े रह कर जब उसका नंबर आये तो प्रदूषण प्रमाण पत्र केवल इस बिना पर जारी करने से मना कर दिया जाये कि आपकी गाड़ी मध्य प्रदेश की है?? ये क्रूरता और अमानवीयता की पराकाष्ठा है।  क्या दूसरे प्रदेश की गाड़ियों को अन्य प्रदेश मे प्रदूषण प्रमाण पत्र जारी नहीं किया जाता हैं?? और यदि हम 300/- रुपए की रिश्वत केंद्र संचालक को दे दे तो प्रमाण पत्र जारी कर दिया जाता हैं?
हम आपके और माननीय उच्चतम न्यायालय के निर्देश मानने के लिये सहमत ही नहीं बाध्य है पर आपके मातहत कम करने बाला  प्रदूषण नियंत्रण केंद्र आपके आदेश की  अवेहलना कर  अतिवादियों की तरह अपने निजी स्वार्थ, भ्रष्ट और आर्थिक लाभ के लिये आम नागरिकों को  मानसिक और शारीरिक यंत्रणा दे रहा हैं।

दुःख इस बात का तो है ही की एक छोटा मामूली प्रदूषण नियंत्रण केंद्र संचालक अपने मनमाने व्यवहार से लोगो को आहात करता है लेकिन उससे ज्यादा दुःख और कष्ट इस बात का है जब प्रदूषण  नियंत्रण केंद्र सैक्टर 35 के इस मनमानीपूर्ण व्यवहार की शिकायत आपको ट्वीटर पर की जाती है पर खेद है कोई कार्यवाही नहीं होती। दुःख इस बात का भी  है उक्त केंद्र की शिकायत जब भारत पेट्रोलियम कंपनी को की जाती है तो बगैर कोई कार्यवाही के शिकायत बंद कर दी जाती हैं और शिकायत बंद करने का एसएमएस भी हमे किया जाता हैं!! आपकी व्यवस्था की ये कारगुजारी आम जनता को मुंह चिढ़ाती हैं। दुःख इस बात का भी  है कि माननीय मुख्यमंत्री उत्तर प्रदेश, नोएडा यातायात पुलिस, नोएडा वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक, जिला कलेक्टर नोएडा, पर्यावरण बोर्ड लखनऊ, प्रधान मंत्री  नमो एप्प, राष्ट्रीय हरित अभिकरण को शिकायत करने के बाद भी कोई कार्यवाही नहीं होती। उत्तर प्रदेश पुलिस के फोन नंबर 100 पर शिकायत दर्ज़ तो की पर दिनक 07.09.2019 को  माननीय श्री उमेश, उप निरीक्षक, चौकी मोरना नोएडा के कहने के बाबजूद भी हमारी तरह उनको भी चलता कर कोई कार्यवाही नही की।   उक्त प्रदूषण केंद्र हमारी मोटर साइकल क्रमांक एमपी-04/एक्सएम 4675 को भी मध्यप्रदेश का होने के कारण भी  प्रदूषण प्रमाण पत्र जारी कर देने से मना कर देता हैं। (केंद्र के कम्प्युटर का स्क्रीन शॉट संलग्न)। हमे तो बचपन मे सुनी वह कहावत याद आती है "मारे और रोने भी न दे"। आज यदि यातायात विभाग हमारे वाहन को रोक कर "प्रदूषण प्रमाण पत्र"  न प्रस्तुत करने पर 10000/- रुपये जुर्माना माँगेगा तो इसके लिये कौन जिम्मेदार होगा?

मुझे मालूम है आपकी ज़िम्मेदारी यातायात के कानूनी प्रावधानों को सिर्फ आम जनता पर लागू कराने की  है, इन प्रावधानों को लागू  करने मे आ रही आम जनता की समस्याओं का योग क्षेम करना आपके कर्तव्यों मे नहीं होगा? श्रीमान तब आपको ये अवश्य ही याद रखना होगा कि ये अशुभ लक्षण एक कल्याण कारक राज्य के राजा के न  होकर एक "अंधेर नगरी चौपट राजा" के राज्य का होगा? और इस तरह आप जैसे माननीय पुरुष  अपकीर्ति को प्राप्त होंगे? और  अपकीर्ति के बारे मे भगवत गीता मे भगवान श्री कृष्ण कहते है:-

अकीर्तिं चापि भूतानि कथयिष्यन्ति तेऽव्ययाम्।
संभावितस्य        चाकीर्तिर्मरणादतिरिच्यते।।   (अध्याय 2 श्लोक 34)    
             अर्थात
(सब प्राणी भी तेरी सदा रहनेवाली अपकीर्ति का कथन करेंगे। वह अपकीर्ति माननीय पुरुष के लिये मृत्युसे भी बढ़कर दुःखदायी होती है।)
आज की इस घटना पर स्वर्गीय श्री लाल शुक्ल जी द्वारा रचित कालजयी कृति "राग दरबारी" रह रह कर याद आ रही है। सारी व्यवस्था एवं न्यायालय "राग दरबारी" के लँगड़े के रूप मे निरीह कमजोर कड़ी, हम जैसे नागरिकों के विरुद्ध  10000/- की दंडात्मक पेनल्टी लगा कर यातायात पुलिस  यही सबाल करेगी कि "प्रदूषण नियंत्रण प्रमाण पत्र" न लेने के कारण एवं सरकार द्वारा लागू  वाहन अधिनियम के आदेश की अवेहलना के आरोप मे विजय सहगल  पर 10000/- रुपए का जुर्माना लगाया जाता हैं!!

भवदीय

विजय सहगल



गुरुवार, 12 सितंबर 2019

माँ का आंचल


माँ का आंचल



पेड़ों की  डाली पे सावन का झूला।
आंगन के कोने मे मिट्टी का चूल्हा।
भोर  मे कौए का  कौ-कौ  बुलाना।
इंगित करता घर, मेहमा का आना॥
उठके बुहारे माँ, पहले घर आँगन।
नहा के करती,  ईश्वर आराधन॥
घर के हर कोने मे बरसे बरक्कत। 
झलके माँ तेरी मेहनत मशक़्क़त॥  
करे दूर  घर के  कष्टों  को सारे।  
भरदे जीवन मे, फूलों से उजियारे॥ 
लकड़ी मे उपले से चूल्हा जो दहके।  
चूल्हे की सौंधी  मिट्टी बो  महके॥
चकला-वेलन से रोटी बनाना।  
परथन लगा के रोटी पकाना। 
माँ की ममता है रोटी मे अर्पित।
पहली रोटी, माँ गौ को समर्पित॥
बचपन से चेहरे पे देखा जो माँ के।
खुश होती बच्चों का खाना बनाके॥
बटरी की दाल और चूल्हे की रोटी।
खिला के बच्चों को, माँ खुश होती॥ 
बचपन से अब तक देखा जो माँ के।
झटपट "शाला" का डिब्बा  बनाके॥
माँ के आंचल मे जो संसार देखा।
नन्ही सी लगती है वैकुंठि रेखा॥

विजय सहगल


बुधवार, 11 सितंबर 2019

डीडी उत्तर प्रदेश द्वारा स्कूल की रिपोर्ट




डीडी उत्तर प्रदेश द्वारा स्कूल की रिपोर्ट

प्रतिबोधक शिक्षा संस्थान द्वारा संचालित निर्माण कार्यों मे लगे बच्चो की क्लास को दूरदर्शन -उत्तर प्रदेश द्वारा एक समाचार डॉक्यूमेंटरी बना कर दिनांक 10/09/2019 को शाम 7.30 बजे अपना प्रदेश के अंतर्गत प्रसारित किया गया। दूरदर्शन की उक्त रिपोर्ट।


मंगलवार, 10 सितंबर 2019

टीवी प्रसारण

सूचना


हमे सूचित करते हुए  हर्ष है कि नोएडा सैक्टर 50  स्थित झोपड़ पट्टी मे निर्माण कार्यों मे लगे मजदूरों के   बच्चों  की क्लास  पर डीडी यू॰ पी॰ द्वारा  बच्चों पर "अपना प्रदेश न्यूज़ बुलेटिन"  के अंतर्गत  एक documentary न्यूज़  आज दिनांक 10/09/2019 मंगलबार को शाम 7.30 बजे से 8.00 बजे के समाचार बुलेटिन मे प्रसारित कर बच्चों का उत्साहवर्धन  किया है।  आपसे अनुरोध है कि निम्नलिखित चैनल पर उक्त बुलेटिन  प्रसारित किया जाएगा, आप उक्त बुलेटिन को देख कर अपनी टिप्पणियों के साथ बच्चों का उत्साहवर्धन करे। धन्यवाद।

विजय सहगल,
प्रतिबोधक  शिक्षा संस्थान ।