"जन नायक - स्व॰ श्री राजेंद्र अग्निहोत्री"
श्री राजेंद्र अग्निहोत्री
जी से हमारा कब परिचय हुआ ठीक-ठीक तो याद
नहीं पर शायद 1978-1979 की बात रही होगी
उस समय उनका कार्यालय संकट मोचन मंदिर के सामने स्थित घर मे प्रथम मंजिल पर था। उनसे
ये मेरा प्रथम परिचय था। धीरे धीरे उनके साथ परिचय हमारे परम मित्र अनिल समधिया के
साथ प्रगाण होता गया। 1980
मे झाँसी से विधायक के लिये जब उनको भारतीय जनता पार्टी का
प्रत्याशी घोषित किया गया तब उनसे संपर्क का सिलसिला भी बढ़ता चला गया। 1980 के
विधायक के चुनाव मे उनके विधान सभा क्षेत्र मे एक अलग ही लहर चल रही थी जो उनके आम
जनता से जुड़े होने का सबूत दे रही थी। उन दिनों हम पहली बार वोटर का दर्जा प्राप्त
कर रहे थे। चुनाव मे सक्रिय रूप से जुड़ने का यह हमारा प्रथम अवसर था। राजेंद्र जी
के हर वर्ग और हर उम्र के लोगो से उनका व्यक्तिगत जुड़ाव उनके सद्व्यवहार को इंगित
करता था। हम ये सोचते थे हम उनके काफी निकट और खास हैं,
कमोबेस सभी युवा, बुजुर्ग जवान सभी अपने आपको इसी भाव से
उन्हे देखते थे। ये खूबी थी उनके
व्यक्तित्व की। सभी से पारवारिकता का संबंध। 1980 मे उनकी झाँसी के विधायक के रूप
मे विजय झाँसी के आम जनों की जीत थी।
सौभाग्य से 1980 मे हमारी नौकरी लखनऊ मे बैंक मे लगी और साथ ही हमारे मित्र अनिल
समधिया की नौकरी भी कुछ समय बाद लखनऊ मे
ही बैंक मे लगी। अनिल जी की अग्निहोत्री जी से निकटता के कारण हमारा भी उनसे मिलना
और निकटता बढ़ती चली गई। उनका लखनऊ स्थित विधायक निवास झाँसी के लोगो के लिये
धर्मार्थ आश्रय स्थल था कभी भी कोई भी विधायक निवास मे आश्रय पा सकता था। 1984 मे
ग्वालियर स्थानांतरण तक लगभग हर दिन उनके लखनऊ प्रवास पर उनसे मुलाक़ात होती रहती थी।
कई बार उनका हमारी हजरतगंज स्थित बैंक शाखा मे आना हुआ था तभी एक बार चर्चा मे
उन्होने बताया था कि राजनीति मे आने के पूर्व वे भी उत्तर प्रदेश कोपरेटिव बैंक
कानपुर मे कार्य करते थे। उनकी ईमानदारी और लोगो से गहरे जुड़ाव के कारण साधु-संतों
जैसी फक्कड़ता हमने करीब से देखी और महसूस कि थी।
उनका एक किराये का मकान
अशोक मार्ग चारबाग स्टेशन के पास था वहाँ पर भी झाँसी के लोगो का आना जाना लगा
रहता। ये घर भी एक आश्रम की तरह ही था। इस घर मे हमने अपने मित्र स्व. अनिल समधिया
के साथ बिताये अविस्मरणीय संघर्ष पूर्ण पल
बिताये। जब थक हर कर हम दोनों जब घर
पहुँचते तो खाना बनाने, मिट्टी के तेल और राशन की जुगत
करने तक और घोर गर्मियों मे बगैर एसी-कूलर के सिर्फ पंखे मे खुली छत्त पर रात
व्यतीत करना और जब उसी दौरान स्व॰ राजेंद्र जी का अपने चाहने बालों के साथ आ जाए तो लगने बाले जमघट की बैठके,
राजनैतिक चर्चाए बहुत ही यादगार घटनाये होती। कभी कभी स्व॰ राजेंद्र जी के साले श्री
अशोक जिन्हे हम लोग मामा कहकर पुकारते लखनऊ
घर आते तो मामाजी के सौजन्य से बढ़िया होटल मे आइसक्रीम के साथ पार्टी होती। ये सारे
यादगार पल हमारे जीवन की अमूल्य धरोहर हैं।
1984 मे मेरा ट्रान्सफर लखनऊ से ग्वालियर हुआ, पर हमारी
रिहायश झाँसी ही रही क्योंकि झाँसी मे
हमारे बैंक की शाखा नहीं थी और झाँसी-ग्वालियर के बीच दैनिक आवागमन संभव था। जब
हमारी शाखा का झाँसी मे न होने का स्व॰ राजेंद्र जी को पता चला तो उन्होने तुरंत
ही हमारे बैंक के अध्यक्ष को झाँसी मे शाखा खोलने का आग्रह किया जिसके परिणाम स्वरूप
बाद मे हमारे बैंक कि शाखा भी झाँसी खुल
गई। पर इसी बीच हम ग्वालियर मे स्थापित हो चुके थे।
अब तक हमारे मित्र अनिल भी
लखनऊ से झाँसी आ चुके थे। अब तो प्रायः सिविल लाइन स्थित स्व॰ राजेंद्र जी के आवास
पर अनिल के साथ आना बना रहा। कलांतर मे
बहिन नीलम का रिश्ता ग्वालियर मे श्री ओम प्रकाश आर्य जी के सुपुत्र श्री राजेश से
तय हुआ जो ग्वालियर के एक प्रतिष्ठित नागरिक थे और हमारे बैंक के सम्मानित ग्राहक
भी थे। इस रिश्ते से हमारा दोनों ही परिवारों मे एक परिवार के सदस्य के रूप मे जीवन पर्यन्त का रिश्ता बना। श्री ओम प्रकाश
आर्या जी भी ग्वालियर मे हमारे सैटल होने के कारण हमारे सुख-दु:ख मे पिता तुल्य
रूप मे अपने जीवन भर हमारे साथ खड़े रहे।
राजेंद्र जी का स्नेह और
अपना पन हमारे साथ बना रहा। आगे झाँसी के चार बार सांसद के रूप मे हम उन से जुड़े रहे। झाँसी मे एक बार हमारे साथ कुछ ऐसी परीथितियाँ
बनी जिसके कारण हमारे उपर भारी संकट आन पड़ा
जिससे मैं तो संकट मे था ही मेरे कारण मेरे
माता-पिता और पूरा परिवार दुखी थे। उस संकट मे राजेंद्र जी का अति महात्वपूर्ण
अविस्मरणीय योगदान रहा। संकट के समय आज
जैसे मोबाइल के संपर्क कि सुविधा नहीं थी, स्व॰ राजेंद्र जी का घर मे न
होने के कारण तुरंत संपर्क न हो सका। लेकिन जब रात के लगभग 12 बजे वे अपने घर आये और उनको हमारे
उपर आयी विपत्ति के बारे मे पता चला तो रात लगभग 1 बजे बे मेरे घर पहुंचे और
निश्चिंत रहने का अभय दिया। उस संकट मे
हमारे मित्र स्व॰ अनिल समधिया द्वारा हमारी अनुपस्थिति मे राजेंद्र जी से संपर्क
करने हेतु दौड़-धूप करने मे लगे रहे और एक सच्ची मित्रता का परिचय दिया।
हमारे मित्र स्व॰ अनिल के बीमारी मे ऑपरेशन बाले दिन, स्व॰ राजेंद्र
जी का दिन भर बिना कुछ खाये पिये ऑपरेशन की समाप्ती तक सभी के साथ अपोलो हॉस्पिटल मे इंतज़ार करते रहना और कुशल-क्षेम
करना उनके सरल और सुहृदय स्वभाव को दर्शाता था। हम दैनिक यात्री भी उनसे गहरे से जुड़े
थे। प्रायः सांसद के रूप मे दिल्ली आते या जाते समय हम लोगो को ट्रेन मे मिल जाते तो
फिर, एसी या प्रथम एसी डिब्बा छोड़ कर हम लोगो के साथ ही ग्वालियर-झाँसी
के बीच यात्रा कर चर्चायेँ करते। बुंदेलखंड एक्सप्रेस को ग्वालियर तक बढ़ाने की मांग
मे उनका काफी योगदान रहा जिससे झाँसी-ग्वालियर के दैनिक यात्रियों को आवागमन मे काफी
सुहुलियत हुई। राजेंद्र जी का एक बार किसी से जुड़ जाने पर उसके साथ मजबूती से खड़ा
रहना और उसको अपनी निकटता का आभास कराना और अभय प्रदान करना उनके स्वभाव का अभिन्न
अंग था जिसे उन्होने हर उस व्यक्ति के प्रति निभाया और उसे कभी निराश नहीं किया जो
उनके साथ जुड़ा था या जो भी
उनके पास किसी भी कार्य की
आशा लेकर आया। अपने इस "जन सेवा"
के स्वभाव को उन्होने जीवनपर्यंत झाँसी के लोगो या दीगर चाहने बालों के लिये
निभाया। बो सच्चे मायने मे लोगो की सेवा
मे तत्पर खड़े होने के कारण एक "जन नायक" थे। जिन्हे हर वर्ग, हर
संप्रदाय, हर जाति से जुड़े लोग अपना निकतस्थ शुभ चिंतक मानता
था बिल्कुल हमारी तरह। ऐसे निश्चल, सरल हृदय, निष्कलंक सच्चे जन नायक को उनकी 11वि पुण्य तिथि पर उन्हे हम अपनी सच्ची, हार्दिक
श्रद्धांजलि अर्पित कर याद करते हैं।
स्व॰ श्री राजेंद्र अग्निहोत्री जी को सादर नमन्।
विजय
सहगल

2 टिप्पणियां:
Bahut achcha lekh hai sir ji
धन्यवाद Sir॰
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