"अम्बाह टू पोरसा"
मध्य प्रदेश
मे दस्यु प्रभावित चम्बल क्षेत्र स्थित मुरेना जिला का अपना अलग ही अर्थशास्त्र
और समाज शास्त्र हैं। सरसों की नगदी फसल इस क्षेत्र की समृद्धी की कहानी कहती हैं।
बैसे तो मुरेना की बहुतायत लोग धर्मपरायण है इसका उदाहरण ग्रामीण क्षेत्रों मे जगह
जगह श्रीमद भागवत कथा का श्रवण-वाचन देखने सुनने को मिल जाता हैं। भागवत कथा के पूर्ण होने पर भंडारों का विशाल आयोजन और उसमे शामिल होने बाले
धर्मप्रेमी बंधुओं का भंडारों मे बढ़-चढ़ कर शामिल होना इस बात की पुष्टि करता हैं। इस सबके बाबजूद कुछ
ऐसे लोग भी यहाँ मिल जाते हैं जो अपना कानून "जिसकी लाठी उसकी भैंस" के
तर्ज पर अपनी मनमानी करते हैं। ऐसे लोगो के कारण भिंड और
मुरेना की कानून व्यवस्था पूरे
प्रदेश से बदतर हैं। पूर्व मे सबसे ज्यादा डाकू (यहाँ पर इन्हे दस्यू कहा जाता हैं
और इनमे से सबसे बड़े डाकू को दस्यु सम्राट कहा जाता हैं) इन्ही क्षेत्रों से हुए
हैं। नगरा ग्राम मे स्थित हमारे बैंक की एक शाखा सिर्फ इस लिये जानी जाती थी कि डाकूओं पर बनी अभिनेता सुनील दत्त द्वारा अभिनीत
फिल्म "मुझे जीने दो" की शूटिंग इसी गाँव मे हुई थी। डाकूँ पुतली बाई, डाकू मान सिंह, पान सिंह तोमर, मलखन सिंह, मोहर सिंह आदि दस्यु इन्ही क्षेत्रों से हुए हैं। दिन मे
तो यात्रा इस क्षेत्र मे थोड़ी बहुत सुरक्षित हैं पर दिन ढलने पर लोग सुरक्षा कि
द्रष्टि से निजी या सार्वजनिक वाहनों से भी यात्रा करना उचित नहीं समझते। कब किस
व्यक्ति की पकड़ (अपहरण) हो जाये कह नहीं सकते। डबरा पोस्टिंग के समय स्टेट बैंक के
एक साथी श्री गुप्ता जी का अपहरण डबरा से ग्वालियर जाते समय कर लिया गया था जो हम
लोगो के साथ ही ग्वालियर से आते जाते थे। ऐसे एक-दो वाक्यों से हमारा भी पाला पढ़ा
जब हमारी पोस्टिंग जिला मुरेना के पोरसा तहसील मे थी। पहली घटना मे एक संगीतमय
वातावरण मे हुई थी। पोरसा पहुँचने के लिये मुरेना से वैध बस सेवा म.प्र. राज्य परिवहन की ही उपलब्ध रहती
थी जो प्रायः मुरेना से भिंड जाती थी रास्ते मे पहले अम्बाह फिर पोरसा पढ़ता था।
वैध साधनों से दुगनी संख्या अवैध वाहनों की थी। जिनका अपना संसार था और जिनके अपने
सारे नियम और कानून इन अवैध जीपों और बसों
के ड्राईवर और कंडक्टर के बनाये होते थे।
मुरेना से अम्बाह के लिये सबारियाँ ज्यादा उपलब्ध रहती थी तब लोग पोरसा के लिये
अम्बाह से जीप या बस बदल कर पोरसा पहुँचते थे। एक बार हम भी अम्बाह तक तो बस से
पहुँच गये पर अम्बाह से पोरसा (15 की.मी.) पहुँचने के लिये एक अवैध जीप की सेवाये
लेना हमारी मजबूरी थी। 12 यात्री तो कम से कम बैठाना जीप का अधिकार था, 12 से ज्यादा 20 तक या उससे
अधिक हो जाये तो जीप बाले को अतरिक्त बोनस मिल जाता था। ड्राईवर और कंडक्टर इस के
अतरिक्त होते थे। अब जब जीप मे 20-25 सबारियाँ हो जाये तो कंडक्टर कैसे जाने कि किस
किस सवारी ने टिकिट ले लिया और किस ने नहीं। तब उस कंडक्टर ने तुरंत ही सड़क पर धूल
धूसरित पड़े एक सिगरेट के खाली डिब्बी को उठा कर फाड़-फाड़ कर टिकिट के रूप मे उन सबरियों को दे दिया जिन्होने टिकिट के पैसे
दे दिये थे। उन मे से एक मै भी था। उस गंदे सिगरेट की डिब्बी के फटे टुकड़े को टिकिट
की तरह मजबूरी मे सम्हाल कर हमे अपनी जेब
मे रखना पड़ा। पोरसा से लगभग 1 कि.मी. पूर्व एक ग्रामीण को उतरना था। उसका टिकिट
(सिगरेट की डिब्बी का टुकड़ा) शायद कही खो या गिर गया। जब उस जीप के कंडक्टर ने
टिकिट मांगा तो वह ग्रामीण टिकिट न दे सका। अब तो कंडक्टर ने कहा अपने टिकिट नहीं
लिया तो किरया देना होगा। वह ग्रामीण बार बार कहे जा रहा था कि उसने किराया दे
दिया है और सिगरेट डिब्बी का टुकड़ा रूपी टिकिट
काही गिर या खो गया। कंडक्टर ने पुनः टिकिट के पैसे मांगे।
यात्री
ने कहा - "दय" (अर्थात किराए के पैसे दे दिये)
कंडक्टर
ने कहा - "न दय" (अर्थात नहीं दिये)। दोनों मे बड़ी रोचक संगीत मय बहस होने लगी अर्थात
"दय"
"न
दय"
"दय"
"न
दय"
"दय"
"न
दय"
और
अचानक कंडक्टर ने एक जोरदार तमाचा सवारी मे जड़ दिया जिसकी "छपाक" की
जोरदार आवाज चारों ओर सुनाई दी। सवारी के साथ जो हुआ सो हुआ ये सब देख कर हमारी
हालत अंदर से पतली हो गई। हमारी इतनी भी
हिम्मत न हुई कि उस कंडक्टर से कहे क्यों 4-5 रुपये के लिये 10-15 मिनिट से बहस कर
रहे हो और हम भी लेट हो रहे हिन? अंततः मै उनके झगड़े को छोड़ एक ग्रामीण से मोटरसाइकल से लिफ्ट
ले कर ब्रांच पहुंचा। मुरेना के समाजशास्त्र से ये हमारा पहला परिचय था।
एक
अन्य घटना मे मै ग्वालियर से मैनेजर मीटिंग के बाद पोरसा आ रहा था। ग्वालियर से
मुरेना पहुँचने मे ही काफी कुछ देर हो गई थी। दिन ढले मै मुरेना से पोरसा जाने के
लिये बस का इंतजार कर रहा था। कुछ लोग और थे जो अम्बाह या पोरसा जाने को बस का
इंतजार कर रहे थे, पता चला आखिरी सरकारी बस जा चुकी थी। अचानक एक बस आई जिसको देख
कर मेरे सहित सभी यात्री बस कि तरफ लपके। बस अम्बाह-पोरसा ही जा रही थी मुरेना के
समाजशास्त्र से बाकिफ़ हो जाने के कारण भी
हमने कंडक्टर से पूंछ ही लिया "बस पोरसा जायेगी"? उसके हाँ कहने पर ही मै बस मे चढ़ा और पोरसा का
किराया देकर आराम से सीट पर बैठ गया। शायद इतनी देर रात मै पहली बार मुरेना से
पोरसा जा रहा था। जंगलों के बीच रास्ते भर घुप्प अंधेरे को चीरती बस अपने गंतव्य
पोरसा को जा रही थी। अम्बाह आने पर जैसे ही बस रुकी तो एक-एक कर सारी सवारियाँ
अम्बाह पर उतर गई पोरसा के लिये मै अकेला ही बस मे बैठा था। इसे देख कर कंडक्टर ने
कहा बस पोरसा नहीं जायेगी। जब मैंने उसे वास्ता दिलाया कि मैं आपसे पूंछ कर ही बस
मे बैठा था कि बस पोरसा जायेगी, अचानक आप कैसे माना कर रहे हैं?
बस
कंडक्टर ने कहा आप अकेले है और अकेले के लिये हम बस को पोरसा तो ले नहीं जाएंगे।
मैंने कहा क्या कुतर्क दे रहा हैं, 10 लाख की
गाड़ी चलाते हो आपकी "जबान की भी कोई कीमत हैं या नहीं"? हम यहाँ इतनी रात अंजान
शहर मे कहाँ रुकेंगे, तुम अगर हमे मुरेना मे ही माना कर देते तो हम कही होटल आदि मे
रुक जाते, यहाँ तो होटल भी नहीं है रात भर मैं कहाँ रहूँगा। लेकिन उस
धूर्त प्राणी ने तो जैसे तय कर लिया था कि अकेली सवारी को तो पोरसा नहीं ही ले
जाना हैं। तब मैंने क्रोध से कहा तुम्हें अपनी दी गई जबान का भी ख्याल नहीं कितने
पैसे लोगे पोरसा तक के तो उस मक्कार और लालची कंडक्टर ने बड़े वेशर्मी से कहा हमारा
100 रुपये का डीजल लगेगा। अब "मरता क्या न करता" सोच कर हमने उसे 100
रुपये दिये तो उस निष्ठुर, वेहया, मक्कार, निर्लज्ज, धूर्त, कपटी कंडक्टर व्यक्ति ने बड़ी ही निर्लज्जता से 100 रुपये रख
लिये। हमे फिर भी तस्सली थी कि चलो घर तो पहुँच जायेंगे और इस तरह हम 100 रुपये देकर "चार्टर्ड बस"
से रात 11 बजे लगभग पोरसा पहुंचे!! अब तक मैं यहाँ के समाजशास्त्र से परिचित हो
चुका था क्योंकि ये हमारा मुरेना के समाजशास्त्र से दूसरा परिचय था।
विजय सहगल

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