पर्यावरण-प्रदूषण
2 दिसम्बर 1984 को भोपाल गैस त्रासदी बस्तुतः दूषित पर्यावरण का लापरवाह
पूर्ण क्रत था जिसमे 3000 से ज्यादा लोग मौत की नींद सो गये। मिथाइल आइसो साइनाइड
गैस ने जिस तेजी के साथ वातावरण मे फैल इतने बड़े स्तर पर जन हानि कर विश्व की सबसे
बड़ी त्रासदी बनी जिसके प्रभाव आज तक पीढ़ित
व्यक्तियों को दुःख और तकलीफ का कारण रहे
हैं। पर कुछ पर्यावरण संबन्धित घटनाये इस तरह होती हैं जिसका धीमा जहर अपने दूषित
प्रभाव को सालों बाद अस्थमा, स्वांस समाबंधित बीमारियों के रूप मे
दिखाई देता हैं। इस तरह की वायु प्रदूषण को दूषित करने बाली घटना सालों पहले
महीनों तक झाँसी रेल्वे स्टेशन पर होती रही जिसका उल्लेख कभी किसी समाचार पत्र की सुर्खियां
नहीं बनी। कोई आंदोलन न तो राजनैतिक दलों
या आम जनता द्वारा किया गया। इससे प्रभावित लोगो का यध्यपि कोई आंकड़ा उपलब्ध नहीं हैं पर इस पर शोध किये जाने की आवश्यकता हैं।
उन दिनों हम झँसी से ग्वालियर के बीच
दैनिक आवागमन किया करते थे। मई जून की गर्मी मे भी जब हम घर से झाँसी स्टेशन
पहुँचते तो ऐसा लगता मानो सर्दियों जैसी धुंद छाई हुई हैं। झाँसी स्टेशन के दूसरी
ओर स्थित यार्ड से ये धूल भरी हवाये हमे इस बात का अहसास कराती जैसे झाँसी रेल्वे
स्टेशन पर भरी गर्मी मे कोहरा छाया हैं। ये बात 1985-86 या आसपास की रही होगी जानकारी करने पर ज्ञात हुआ कि झाँसी
के पास स्थित कोछाभांवर गाँव मे नई स्थापित सीमेंट फ़ैक्टरि का जो कच्चा माल हैं बह झाँसी यार्ड मे उतारा
जाता हैं। उस कच्चे माल मे चूना पत्थर और मिश्रित कि जाने बाली मिट्टी (क्ले) हैं
जिसे चूने पत्थरों की खदानों से लाकर मालगाड़ियों से झाँसी यार्ड मे उतारा जाता हैं
जिससे सीमेंट का निर्माण होता हैं। ये
कच्चा माल मालगाड़ी के डिब्बे से पहले जमीन पर गिराया जाता हैं तब धूल उड़ती हैं फिर
पुनः जमीन से जेसीबी की सहायता से फिर बड़े बड़े डंपर मे कच्चे माल को पुनः लोड कर
सीमेंट फ़ैक्टरि मे भेजा जाता है जिससे पुनः धूल उड़ती हैं। पर्यावरण के मानकों की अनदेखी के कारण चूना
पत्थर और मिट्टी की धूल मालगाड़ी से इन खनिजों को उतरते समय और पुनः डंपरों मे
चढ़ाते समय यार्ड के आसपास 3-4 कि॰मी॰ के क्षेत्र मे प्रदूषण फैला कर पर्यावरण को
प्रदूषित करती रही। इसमे पूरे स्टेशन के क्षेत्र के साथ यार्ड और यार्ड के दूसरी
तरफ सीपरी क्षेत्र के आवास, नगरा के रास्ते मे पड़ रही रेल्वे कॉलोनी के घर प्रभावित हो रहे थे। हम
दैनिक यात्री भी सुबह के समय इससे प्रभवित हुए बिना नहीं रहते क्योंकि सुबह अनेकों
बार गाड़ियों कि बिलंब से चलने के कारण प्लेटफॉर्म घंटों इंतजार करना पड़ता था। धूल
के इस प्रदूषण से झाँसी स्टेशन पर हजारों रेल कर्मचारी, आसपास के क्षेत्रों मे रह रहे रहवासी हर रोज इस से प्रभावित होते और धीरे-धीरे श्वांस संबन्धित बीमारियों से ग्रसित होकर
अस्वस्थ होते। पर दुर्भाग्य ही कहेंगे इन
रहवासियों ने और स्टेशन पर कार्यरत कर्मचारियों ने इस के विरुद्ध कभी कोई आवाज
नहीं उठाई। हम डेलि पैसेंजर भी यदा कदा इस की आपस मे एवं रेल्वे कर्मचारियों से
चर्चा कर समाधान निकालने की बात करते। ऐसे ही एक दिन यात्रा के दौरान एक व्यक्ति से दैनिक यात्रियों
मे से किसी एक ने परिचय कराया जो सीपरी बाजार के किसी बार्ड से पारिषद थे। जब हमने
उनसे रेल्वे स्टेशन मे हो रहे वायु प्रदूषण की समस्या की तरफ ध्यानाकर्षित कराया
तो वह मँझे हुए राजनैतिज्ञ की तरह समस्या से बचते दिखे और व्यवस्था को कोसते नजर
आये। जब हमने उनको इस जन समस्या के विरुद्ध आंदोलन, धरना, प्रदर्शन को शुरू करने के लिये कहा तो वो इसके लिये शायद हिम्मत न
जुटा सके। हमने उन्हे उत्साहित करते हुए कहा ये जन आंदोलन आपको पारिषद से उपर
विधायक बनने का रास्ता दे सकता हैं। हमने पारिषद जी से लोगो को एकत्रित कर वायु
प्रदूषण के विरुद्ध संघर्ष की अगुआई कर लड़ाई लड़ने का आग्रह किया पर शायद उनकी
दिलचस्वी इसमे नहीं थी। एक बार हम कुछ दैनिक यात्रियों ने जिनमे श्री देवेंद्र
दुवेदी, कमल पांडे, डीबी सक्सेना, विजय गुप्ता, राजकुमार खरे, मुकेश रिहानी, राजीव कपूर आदि लोग थे
स्थानीय समाचार पत्र मे इस समस्या के निराकरण हेतु ज्ञापन देने उनकी प्रैस मे
पहुंचे और उनके संपादक को स्टेशन पर हो रहे प्रदूषण के बारे मे अपने समाचार पत्र
मे मुख्य जगह देने को कहा। मैंने उन्हे शिकायत भी की कि आप ऐसी जन समस्या को अपने समाचार पत्र मे स्थान
नहीं देते जिनसे आम जन पीढ़ित हैं बल्कि ऐसे छोटे-मोटे समाचार छापते हैं जैसे "चौराहे पर बैलो-गायों का झुंड बैठे
हैं" या "लड़ाई झगड़े" के समाचार या बेहद साधारण समाचार। हमे सुन कर
उन्होने पूंछा कि आप किस राजनैतिक दल से हैं। जब हमने कहा हम लोग नौकरी पेशा लोग
है प्रदूषण से पीढ़ित आम जन के लिये आवाज उठाने आये हैं। यध्यपि उन्होने समाचार को
प्रकाशित किया पर आम जनों कि समस्या अपने समाचार पत्र के हितों के अनुसार ही उठाते
रहे हैं। इस का जीता जागता प्रमाण आज के
समाचार पत्रों या टीवी समाचार चैनलों कि कार्य प्रणाली से देखा जा सकता हैं। जो कभी
भी बड़े उध्योग पतियों या बड़ी राजनैतिक हस्तियों के विरुद्ध कभी भी समाचार प्रकाशित
या प्रसारित नहीं करते।
ऐसे ही एक दिन गाड़ी के आने मे विलंब
था। हम लोग प्रदूषण की इस समस्या पर स्टेशन पर खड़े होकर चर्चा कर रहे थे। हममे से
किसी ने कहा रेल मण्डल प्रबन्धक से इस बारे मे चर्चा करनी चाहिये, पर समस्या ये थी कि कार्यालीन समय यानि सुबह 10 बजे हम लोग ग्वालियर
मे होते थे। किसी ने कहा क्यों न मण्डल रेल प्रबन्धक के घर फोन कर इस समस्या को
उठाया जाये यदि आवश्यक हो तो स्टेशन के पास ही उनके बंगले मे उनसे मिला जाये। कुछ
रेल कर्मचारियों ने भी इस बात का समर्थन किया पर चूंकि रेल्वे मे कार्यरत होने कि
बजह से वे लोग अपरोक्ष रूप से रह कर तो समर्थन कर सकते थे पर सामने नहीं आना चाहते थे। रेल विभाग का अपना
टेलीफ़ोन एक्स्चेंज हुआ करता था। पुराने सिस्टम के डायल करने बाले फोन तो जहां तहां
स्टेशन पर मिल जाते थे। जैसे प्लेटफॉर्म मे चाय कि स्टाल और पार्सल ऑफिस मे पर
मण्डल रेल प्रबन्धक के घर का नंबर उपलब्ध नहीं था। डीआरएम के घर के नंबर का पता
लगाने मे हमारे एक रेल्वे मे कार्यरत खान
बाबू ने सहायता की जो हम सभी दैनिक यात्रियों के अच्छे मित्र थे। डीआरएम बात करने
की ज़िम्मेदारी मेरे उपर थी। सच की ताक़त हम सबके साथ थी। मैंने चाय की स्टाल से उस दिन
सुबह लगभग 8.00 बजे उनको फोन लगाया। उन दिनों श्री सी एल काव मण्डल रेल प्रबन्धक
थे। फोन उन्होने ही उठाया, नमस्कार की औपचारिकता के पश्चात हमने
शिष्टाचारवश उन्हे सुबह सुबह फोन करने के
लिये खेद प्रकट कर सीमेंट के चूना पत्थर और मिट्टी के कारण झाँसी स्टेशन परिसर मे
फैल रहे वायु प्रदूषण की समस्या पर ध्यान आकर्षित किया और इससे पीढ़ित हो रहे आम
जनता के दुःख की बात बताई तो ऐसा लगा की
वे मेरी बात सुनकर असहज होकर चौके। उन्होने पूंछा आप कौन बोल रहे हैं तो मैंने
बताया कि मैं एक साधारण नागरिक बात कर रहा हूँ जो इस समय यात्रा के उद्देश्य से
प्लेटफॉर्म पर प्रदूषण को महसूस कर रहा हैं। उन्होने फिर उनके घर का नंबर और कहाँ
से फोन कर रहे के बारे मे भी पूंछा। तब मैंने शालीनता पूर्वक अपना नाम बताते हुए कहा कि श्रीमान फोन तो मैं प्लेटफॉर्म पर
स्थित चाय कि स्टॉल से कर रहा हूँ और नंबर मैंने जिस कर्मचारी से लिया उसे नहीं जनता
पर समस्या गंभीर हैं और इसका निराकरण आवश्यक हैं। उनका फोन के विवरण पूंछने से
क्या मंतव्य था मैं नहीं समझ पाया पर उन्होने हमे विस्तार से बताया कि ये समस्या
उन के संज्ञान मे हैं इसके निराकारण के लिये नई रेल्वे लाइन फ़ैक्टरि तक डाली जा
रही है तब तक कच्चे माल से फ़ेल रहे प्रदूषण से बचाव के लिये हम माल उतरते समय और
बाद मे भी पानी का छिड़काव करवाएँगे। हमे
बताते हुए खुशी है कुछ ही दिनों मे इस कार्य को अंजाम देकर पानी से छिड़काव के कारण पूरी तो नहीं पर थोड़ी बहुत समस्या पर काबू पाया जा सका। फ़ैक्टरि तक नई रेल
लाइन बन जाने पर प्रदूषण कि समस्या स्वतः ही समाप्त हो गई।
पर दु:ख और अफसोस का
विषय यह हैं कई महीने तक रेल प्रशासन अपने व्यवसाय के नाम पर आम जनता और यात्रियों
की ज़िंदगी से कैसे खेलता रहा?? उससे भी आश्चर्य करने बाली बात हैं
स्थानीय समाचार पत्रों और राजनैतिक दलों द्वारा इस पर्यावरण के मुद्दे और आम जनों, यात्रियों और रेल्वे स्टाफ
की ज़िंदगी से खिलवाड़ पर चुप्पी साधे रखना??
विजय सहगल

2 टिप्पणियां:
Bahut shandar lekh hai sir ji
धन्यवाद विवेक॰
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